भारत का प्राचीन खगोल विज्ञान और वैज्ञानिक

भारत का प्राचीन खगोल विज्ञान में योगदान

Ancient Astronomy in India in hindi

भारत का प्राचीन खगोल विज्ञान

भारतीय खगोल शास्त्र का इतिहास बहुत पुराना है,  इसकी जड़ें सिंधु घाटी सभ्यता और वैदिक काल तक जाती है,  1500 ईसा पूर्व खगोल शास्त्र को वैदिक युग में वेदों के अध्ययन के एक हिस्से के रूप में जोड़ लिया गया था, सबसे पुराना खगोल शास्त्र का ग्रंथ वेदांग ज्योतिष हे  जिसे 1200  ईसापूर्व लिखा गया था. .

ईसा  से 400 वर्ष पूर्वभारतीय ज्योतिष पर  ग्रीक  खगोल शास्त्र का भी बहुत असर पड़ा ईसा पूर्व दूसरी  सदी में  ग्रीक ग्रंथों का अनुवाद हमें संस्कृत में मिलता है जिनमें  यवन जातक  और रोमाका सिद्धांत  नाम के ग्रंथ प्रमुख हैं.

पांचवी सदी में भारतीय खगोलशास्त्र को आर्यभट्ट ने काफी विकसित किया उन्होंने उस समय के सभी खगोल शास्त्र के ज्ञान को अपने ग्रंथ आर्यभट्टिया मैं समाहित किया. आगे चलकर भारतीय खगोल शास्त्र नें मुस्लिम खगोल शास्त्र, चीनी खगोल शास्त्र और यूरोपियन खगोल शास्त्र को प्रभावित किया.

आर्यभट्ट के काम को आगे चलकर ब्रह्मगुप्त, वराह मिहिर, लल्ला जैसे खगोल शास्त्रियों ने आगे बढ़ाया.

मध्यकाल में भी भारतीय खगोल शास्त्र का कुछ ना कुछ कार्य होता रहा राजाओं ने कई  वेधशालाओं का निर्माण किया तथा  16वीं शताब्दी में केरल के खगोल और गणित विद्यालय में खगोल शास्त्र पर काफी कम हुआ.

भारत का खगोल विज्ञान के क्षेत्र में योगदान

Contribution of India in Astronomy in hindi

 प्राचीन भारत में कई महान खगोल शास्त्री हुए  हैं जिन्होंने कई खगोल विज्ञान के सिद्धांतों और यंत्रों का आविष्कार किया,   इससे खगोल विज्ञान का  काफी विकास हुआ,  मध्यकाल में राजाओं ने अंतरिक्ष वेधशाला का निर्माण किया तथा खगोल शास्त्रियों की बहुत आर्थिक मदद की.

 भारत के प्राचीन खगोल  वैज्ञानिक Ancient Indian Astronomers in hindi

 भारत के कुछ प्राचीन खगोल वैज्ञानिक और उनके योगदान का वर्णन हम संक्षिप्त रूप से यहां कर रहे हैं.

लागध (Lagadha) :- ईसा से हजार वर्ष पूर्व लागध ने वेदांग ज्योदिश नाम के ग्रन्थ की रचना की, इस ग्रन्थ में आकाशीय घटनाओं के समय का वर्णन किया गया हे जिनका उपयोग सामाजिक और धार्मिक कार्यों के समय का निर्धारण करने में किया जाता था. इस ग्रन्थ में समय, मौसम चन्द्र महीनों सूर्य महीनो आदि का वर्णन है. इस ग्रन्थ में 27 नक्षत्र समूहों, ग्रहणों, साथ ग्रहों, और ज्योतिष की १२ राशियों का ज़िक्र हे.

आर्यभट :- आर्यभट का समय कल 476 -550 CE हे, आर्यभट ने खगोल शाश्त्र के दो ग्रंथो की रचना की, आर्यभट्टिया और आर्यभट्ट सिद्धांत, इन ग्रंथों में आर्यभट ने पहली बार बताया की प्रथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है, तथा यही कारण हे की सभी तारे पश्चिम की और जाते हुए दिखाई देतें है, आर्यभट ने लिखा की पृथ्वी एक गोला हे जिसका व्यास 39967 Km. है, आर्यभट ने ही चंद्रमा के चमकने का कारण बताया और कहा के या  सूर्य के प्रकाश की वजह से चमकता है.

ब्रह्मगुप्त :- ब्रह्मगुप्त का समयकाल 598-668 CE हे, इन्होने ब्रह्मगुप्त सिद्धांत नमक ग्रन्थ की रचना की, इस ग्रन्थ का बगदाद में अरबी भाषा में अनुवाद किया गया और इसने इस्लामिक गणित और खगोल विज्ञान पर बहुत प्रभाव डाला, इस ग्रन्थ में दिन के समय की शुरुवात रात्रि 12 बजे बताई गयी,   ब्रह्मगुप्त ने यह सिद्धांत लिखा की सभी द्रव्यमान वाली चीजें पृथ्वी की और आकर्षित होती है,

वरहामिहिर: वरहामिहिर का समय कल 505 CE माना जाता हे, वरहामिहिर ने भारतीय,ग्रीक,मिश्र और रोमन खगोल शास्त्र का अध्यन किया, उन्हें इस समस्त ज्ञान को अपने ग्रन्थ पंकसिद्धान्तिका में एक जगह एकत्रित किया.

भास्कर 1 : इनका समयकाल  629 CE इन्होने तीन ग्रंथो महाभास्कर्य, लघु भास्कर्य, और आर्य भट्टिया भाष्य नमक ग्रंथो की रचना की. इन ग्रंथो में खगोल विज्ञान के कई सिद्धांतों का वर्णन है.

लल्ला : लल्ला नामक खगोल वैज्ञानिक 8 वि सदी में हुए हैं, इन का प्रमुख ग्रन्थ शिष्याधिव्र्द्धिदा है, इसमें आर्य भट्ट के कई सिद्धांतो को ठीक किया गया हे.

भास्कर द्वितीय – इनका समय काल 1114 इसवी का हे, यह उज्जैन की वेधशाला के प्रमुख थे, इन्होने सिद्धांत शिरोमणि और करानाकुतुहलाह नमक ग्रंथो की रचना की.

इनके आलावा भारत में कई और खगोल शाश्त्री हुए जिन्होंने कई नए ग्रंथो की रचना कर खगोल विज्ञान के विकास में अभूतपूर्व योगदान दिया, इनमे श्रीपति, महेंद्र सूरी, नीलकंठ सोमाया, अच्युता पिसरति प्रमुख हैं.     

Ancient Indian Astronomical Observatories in hindi

भारत की प्राचीन अंतरिक्ष वेधशालाएं

प्राचीन समय में भारत में कई अंतरिक्ष वेध शालाओं का निर्माण किया गया, मुग़ल सम्राट हुमायूँ ने दिल्ली में एक वेधशाला observatory का निर्माण करवाया था, मुग़ल साम्राज्य के पतन के बाद अम्बर के रजा जय सिंह द्वितीय ने खगोल विज्ञान को जीवित करने का प्रयास किया,  उन्होंने भारत के 6 शहरों में जंतर मंतर नाम की वेध शालाओं का निर्माण करवाया. रजा जय सिंह ने समरकंद के रजा उलुघ बेग की वेधशाला को देखकर उनकी प्रतिस्पर्धा में इन वेध शालाओं का निर्माण करवाया था,

भारत की आधुनिक एस्ट्रोनॉमिकल ऑब्जर्वेटरीज़ की जानकारी

 

 

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