कैक्टस के पौधे का अनुकूलन Adaptations in Cactus

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कैक्टस के पौधे का अनुकूलन

कैक्टस का पौधा सभी पौधों में अनोखा होता है इसे आसानी से पहचाना जा सकता है, लगभग प्रत्येक प्रजाति के कैक्टस के पौधे पर काटे पाए जाते हैं, यह एक रेगिस्तानी पौधा है, कैक्टस के पौधे में कांटे ही नहीं बल्कि बहुत सुंदर रंग-बिरंगे फूल भी आते हैं, कैक्टस के पौधे मोटे तने के होते हैं तथा यह 40 फीट लंबे तक हो सकते हैं, इन विशालकाय कैक्टस पौधों को देखने के लिए प्रकृति प्रेमी अक्सर रेगिस्तान में बने कैक्टस पार्कों में जाते हैं,  कैक्टस पौधे की कई प्रजातियां पाई जाती है, इनमें सबसे छोटी प्रजाति 3 इंच की fishhook cactus फिशहूक कैक्टस है तो वहीं 40 फीट लंबा saguaro cactus भी होता है.

कैक्टस पथरीले मैदानों और रेगिस्तान में उगते हैं, कैक्टस के पौधे में रेगिस्तान के गर्म और सूखे माहौल में रहने के लिए एडेप्टेशन  विशेष अनुकूलन उत्पन्न हो गया है.

कैक्टस के पौधे का अनुकूलन Adaptations in Cactus

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कैक्टस का पौधा अपने अनुकूलन की वजह से रेगिस्तान में भी पनप सकता है, दूसरे रेगिस्तानी पौधों में भी हमें कांटे और रसदार तना देखने को मिलता है परन्तु कैक्टस के पौधे में रेगिस्तान में रहने के अनुकूलन अपने उच्चतम स्तर में दिखाई देते हैं.

कैक्टस के पौधे में कई प्रकार के विशेष अनुकूलन पाए जाते हैं,  कैक्टस बहुत कम वर्षा के जल का भी उपयोग कर लेता है कैक्टस की जड़ें जमीन कि सतह के बहुत पास होती है जिससे कि  कम वर्षा में गिरने वाला थोड़ा पानी भी इसकी जड़ें सोख लेती हैं, इस पानी को यह अपने मोटे तने में सुरक्षित रखता है जो कि से सख्त सूखे और गर्मी के मौसम में काम आता है, कैक्टस की कुछ प्रजातियां ऐसी हैं जिनके तने पानी सोख कर मोटे हो जाते हैं जब इस पानी का इस्तेमाल कर लिया जाता है तो यह पतले हो जाते हैं, कैक्टस के पौधे की बहरी बनावट ऐसी होती है कि इस पर बनी सिलवटे पानी को इसकी जड़ों तक पहुंचा देती है.

गर्मी के मौसम में जब पानी उपलब्ध नहीं होता है तो कैक्टस के कई पौधे अपनी पत्तियां गिरा देते हैं और निष्क्रिय हो जाते हैं, लेकिन ऐसी अवस्था में भी कैक्टस का पौधा फोटोसिंथेसिस की प्रकिर्या  से अपना भोजन बनाता रहता है इसका हरा तना फोटोसिंथेसिस से पौधे के लिए खाना बनाता है, पत्तों के ना होने से कैक्टस काफी पानी बचा लेता है, क्यों की पत्तियों की सतह से अधिक मात्रा में पानी वाष्पीकृत होता है.

कैक्टस के पौधे पर पाए जाने वाले बहुत से कांटे इसे छाया प्रदान करते हैं, जिससे कि यह  आसपास के वातावरण से ठंडा रहता है, कई प्रकार के barrel cactus ऐसे हैं जो कि दक्षिण दिशा की तरफ झुक जाते हैं ताकि यह दिन में सूरज की गर्मी से बच सकें, कैक्टस के पौधे को अनुकूलन की एक कीमत भी चुकानी पड़ती है और वह कीमत है धीमा विकास, कैक्टस के पौधे बहुत ही धीमे बढ़ते हैं इनके बढ़ने की गति 0.25 इंच प्रतिवर्ष होती है.

कैक्टस के पौधे कहां पाए जाते हैं?

कैक्टस के पौधों की कई प्रकार की प्रजातियां पाई जाती है, यह मुख्यतः रेगिस्तान में ही पाए जाते हैं, कैक्टस के पौधे पर फूल मार्च से मई के महीने में आते हैं, अलग अलग कैक्टस की जातियों के पौधे में अलग-अलग प्रकार के फूल आते हैं जिनका रंग गहरे नीले से लेकर सफेद क्रीम कलर तक होता है.

सबसे बड़ा कैक्टस का पौधा कौन सा होता है तथा यह कहां पाया जाता है

कैक्टस का पौधा सभी पौधों में अनोखा होता है इसे आसानी से पहचाना जा सकता है, लगभग प्रत्येक प्रजाति के कैक्टस के पौधे पर काटे पाए जाते हैं, यह एक रेगिस्तानी पौधा है, कैक्टस के पौधे में कांटे ही नहीं बल्कि बहुत सुंदर रंग-बिरंगे फूल भी आते हैं, कैक्टस के पौधे मोटे तने के होते हैं तथा यह 40 फीट लंबे तक हो सकते हैं, इन विशालकाय कैक्टस पौधों को देखने के लिए प्रकृति प्रेमी अक्सर रेगिस्तान में बने कैक्टस पार्कों में जाते हैं,  कैक्टस पौधे की कई प्रजातियां पाई जाती है, इनमें सबसे छोटी प्रजाति 3 इंच की fishhook cactus फिशहूक कैक्टस है तो वहीं 40 फीट लंबा saguaro cactus भी होता है.

सबसे बड़े आकार का कैक्टस का पौधा Saguaro है जोकि arborescent cactus कि प्रजाति का एक प्रकार है,  यह कैक्टस का पौधा 40 फीट तक लंबा हो होता है, यह पौधा अमेरिका के एरिजोना राज्य के रेगिस्तान, मैक्सिको के रेगिस्तान तथा कैलिफोर्निया के पहाड़ी इलाकों में भी पाया जाता है,

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विलुप्ति के पंजे से बच आया है बाल्ड ईगल Bald Eagle Facts in hindi

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संयुक्त राज्य अमेरिका का राष्ट्रीय पक्षी बाल्ड ईगल

संयुक्त राज्य अमेरिका का राष्ट्रीय पक्षी बाल्ड ईगल है, बाल्ड ईगल को सन 1782 में अमेरिका का राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया गया था,  यह बाज़ की है एक प्रजाति होती है, इसके सर पर बहुत कम पंख होते हैं इसीलिए इसका नाम बाल्ड ईगल यानी कि गंजा बाज रखा गया है.

सभी प्रकार के बाज़ पक्षियों में बाल्ड ईगल सबसे बड़े आकार का होता है, बाल्ड ईगल केवल उत्तरी अमेरिकी महाद्वीप में ही पाया जाता है, यह उप आर्कटिक क्षेत्र से लेकर उत्तरी अमेरिका के कैलिफोर्निया के तटों तक पाया जाता है, यह शानदार बाज़ उत्तरी अमेरिका में अलग-अलग प्रकार के जंगलों और आवासीय क्षेत्रों में रहता है,  मछली ही इसका मुख्य भोजन स्रोत है, परन्तु बाल्ड ईगल छोटे जंतुओं का शिकार करने और मृत जानवरों का मांस खाने के लिए भी प्रसिद्ध है.

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सन 1960 में बाल्ड ईगल की संख्या बहुत कम हो गई थी, और यह विलुप्ती के कगार पर पहुंच गए थे तब इनकी संख्या एक हजार के लगभग ही बची थी, इसका मुख्य कारण मनुष्य के द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला डीटीटी रसायन था,  वैज्ञानिकों द्वारा पता लगाया गया था कि डीडीटी रसायन के द्वारा पक्षियों के अंडों की बाहरी खोल बहुत पतली हो जाती है जिससे कि यह बहुत जल्दी टूट जाते हैं और पक्षियों के बच्चे पूरी तरह विकसित नहीं हो पाते, इसी वजह से बाल्ड ईगल की संख्या में दिन-ब-दिन गिरावट आती जा रही थी. जब उत्तरी अमेरिका में इस रसायन को पूर्णता प्रतिबंधित कर दिया गया तब बल्ड इगल की संख्या में कुछ बढ़ोतरी देखी गई,  डीडीटी रसायन के उपयोग पर प्रतिबंध के बाद 7 से 8 सालों में इनकी संख्या दोगुनी होती गई, वर्तमान समय में ये बाज़ पूरे उत्तरी अमेरिका में पाए जाते हैं.

अमेरिका के राष्ट्रिय पक्षी बाल्ड ईगल के बारे में कुछ रोचक तथ्य

बाल्ड ईगल बाल्ड यानि गंजा नहीं होता, इसके सर पर कम पंख पाए जाते हैं,

बाल्ड ईगल का घोसला बहुत बड़ा होता है, इस के घोसले का व्यास 5 से 6 फीट होता है इस घोसले की गहराई 2 से 4 फीट होती है,  जिस पेड़ पर घोंसला बनाया जाता है अगर वह मजबूत है तो बाल्ड ईगल इस घोंसले का कई बार उपयोग करते हैं हर साल ये इस घोसले को थोड़ा और बड़ा करते और मजबूत करते जाते हैं इसलिए साल दर साल यह इनके घोसले बड़े होते जाते हैं.

1970 में बाल्ड ईगल एक संकटग्रस्त प्रजाति था,  परंतु अब इनकी संख्या पर्याप्त हो गई है सन 2007 में इन्हें संकटग्रस्त प्रजाति की सूची से बाहर कर दिया गया है.

बाल्ड ईगल को सन 1782 में अमेरिका का राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया गया था, इसका कारण यह है कि रोमन साम्राज्य के काल से ही बाज़ को शक्ति और सत्ता का प्रतीक माना जाता रहा है

बाल्ड ईगल की आंखों में दो फोकस होते हैं जिससे कि यह सामने और आसपास दोनों तरफ एक साथ देख सकता है.

नर बाल्ड ईगल मादा बाल्ड ईगल से 25% छोटा होता है

शिकार करते समय गोता लगाते हुए बाल्ड ईगल की रफ्तार 100 मील प्रति घंटा होती है, सामान्य रूप से उड़ते हुए यह 30 मील प्रति घंटा की रफ्तार से उड़ते हैं

बाल्ड ईगल के घोंसले पर कई प्रकृति प्रेमियों द्वारा वेब केम लगाए गए हैं, इंटरनेट का उपयोग करके कई प्रकृति प्रेमी बाल्ड ईगल को लाइव देख सकते हैं

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पालतू लव बर्ड्स को क्या खिलाना चाहिए? Love birds care in hindi

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पालतू लव बर्ड्स की देखरेख Love birds care

लव बर्ड्स बहुत सुंदर प्यारे और समझदार पक्षी होते हैं, इनके रंग बिरंगे पंखों और छोटे आकार की वजह से यह सभी को बहुत अच्छे लगते हैं, विश्व भर में लोग इसे पालतू बनाकर पिंजरे में रखना पसंद करते हैं दूसरी प्रजातियों की तुलना में लव बर्ड्स को पालने मैं काफी केयर और सावधानी की आवश्यकता होती है, अक्षर में ये जोड़ों में पाले जाते हैं क्योंकि यह एक बहुत ही सामाजिक प्राणी है और हमेशा झुंडों में ही पाए जाते हैं.

लव बर्ड्स बहुत ही छोटे आकार के होते हैं इनका आकार 5 से 6.7 इंच के लंबा होता है, इनकी लंबी पूछ होती है और एक बड़ी सी मुड़ी हुयी चोंच होती है, लव बर्ड्स की उम्र 10 से 12 साल होती है सावधानी से रखें जाने पर  यह ज्यादा लंबे समय तक जीवित रह सकते हैं.

लव बर्ड्स को कैसा भोजन किया जाना चाहिए? Food of love birds

लव बर्डस क्या खाते हैं?पालतू लव बर्डस पक्षियों को क्या क्या खिलाया जा सकता है?, पालतू लव बर्ड्स की केयर कैसे की जाए?

लव बर्ड्स को नहाना पसंद होता है

ज्यादातर लव बर्ड्स को नहाना पसंद होता है, इन को किसी चपटे बर्तन में नहलाया जा सकता है या फिर हल्के गुनगुने पानी से इन पर स्प्रे किया जा सकता है, अगर आप एक पानी से भरा हुआ बर्तन इनके पिंजरे में रखेंगे तो आप देखेंगे कि लव बर्ड्स अपने सर और पंखों को डूबकर नहाना शुरू कर देंगे.

लव बर्ड अपने नाखूनों और चोंच को अक्सर घिसते रहते हैं तथा इन्हें बढ़ने पर यह स्वयं ही कुतर कर कम कर लेते हैं, आवश्यकता होने पर, विशेष प्रकार के टूल्स जो की पेट स्टोर में मिलते हैं उनसे आप इनकी चोंच और  नाखूनों को छोटा कर सकते हैं.

लव बर्डस क्या खाते हैं? what love birds eats?

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जंगल में रहने वाले लव बर्ड्स बीज, छोटे फल, अनाज, घांस, छोटी कलियां, मक्का, अंजीर खाना पसंद करते हैं,  एक लव बर्ड को प्रतिदिन 45 से 60 ग्राम आहार दिया जाना आवश्यक होता है, इनके लिए तोतो को दिया जाने वाला आहार और साथ में विटामिन का सप्लीमेंट्स देने की सलाह दी जाती है,  लव बर्ड्स को हरी सब्जियां और प्रोटीन युक्त अनाज जैसे मूंग की दाल चने की दाल आदि दी जा सकती है, लव बर्ड्स को berries, apples, grapes, pears, bananas, and kiwi फल खाने के लिए दिए जा सकते हैं, एक्स्ट्रा प्रोटीन देने के लिए लव बर्ड्स को कई तरह के नट्स यानी में मेवे भी दिए जा सकते हैं, इनमें बादाम, अखरोट आदि प्रमुख है,  लव बर्ड्स को कभी भी एवोकैडो फल नहीं देना चाहिए क्योंकि यह सभी पक्षियों के लिए जहरीला होता है.

लव बर्ड्स को जिस बर्तन में खाना पानी दिया जाता है वह मिट्टी के होने चाहिए क्योंकि यह प्लास्टिक को कुतर कर खा जाते हैं जो की इन के लिए जानलेवा साबित हो सकता है, लव बर्ड्स अधिक मात्रा में पानी पीते हैं इस बात का ध्यान रखना चाहिए की इनके पिंजरे के अंदर पानी का बर्तन हमेशा भरा रहे.

लव बर्ड को किस स्थान पर रखा जाना? Perfect cage for love bird

लव बर्ड्स बहुत सक्रिय पक्षी होते हैं, इसलिए उन्हें बहुत ज्यादा स्पेस की आवश्यकता होती है एक जोड़ा लव बर्ड पक्षियों के लिए 32” x 20” x 20” आकार का पिंजरा उपयुक्त रहता है,  इस पिंजरे में बैठने के लिए स्थान तथा खाने और पानी रखने और नहाने के लिए अलग बर्तन होना चाहिए, इस पिंजरे को हमेशा जमीन से थोड़ा ऊपर या दीवार पर लटका कर रखना चाहिए, इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि जहां यह पिंजरा रखा गया है वहां पर प्रकाश और वायु की पर्याप्त व्यवस्था हो, साथ ही साथ यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि इस पिंजरे पर सीधी धूप ना पड़े, सीधी धूप पड़ने से लव बर्ड्स गर्मी से मर सकते हैं.

लव बर्ड्स किस तापमान में रहते हैं Temperature for love birds

लव बर्ड्स को रखने के लिए सही तापमान 65 डिग्री फॉरेनहाइट से 70 डिग्री फॉरेनहाइट के बीच होता है तथा रात का तापमान 40 डिग्री फॉरेनहाइट से कम नहीं होना चाहिए, मोटे मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि जो तापमान आप पसंद करते हैं वही आपके लव बर्ड्स के लिए सही रहता है,रात के समय लव बर्ड्स के पिंजरे को ढक देना चाहिए जिससे कि वो आसानी और सुकून के साथ सो सकें.

लव बर्ड का रखरखाव कैसे करें? how to take care lovebirds?

लव बर्ड्स को सुरक्षित व स्वस्थ रहने के लिए उनके खाने और पानी को सही समय में बदला जाना चाहिए, लव बर्ड्स के पिंजरे में कोई कागज या अखबार बिछा होना चाहिए जिसे प्रतिदिन बदला जाना चाहिए, सप्ताह में एक बार आपको लव बर्ड्स  के पिंजरे को धोना और साफ करना चाहिए था इस पर कोई डिसइनफेक्ट स्प्रे छिड़कना चाहिए जिससे कि लव बर्ड्स बीमारी से बचे रहें.

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काली चील ने इंसानों के साथ रहना सीख लिया है Black Kite adaptations  

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Black Kite  काली चील में अनुकूलन Adaptation in Black Kite

ब्लैक काईट काली चील एक मध्यम आकार का शिकारी पक्षी है, यह एक मौकापरस्त शिकारी होता है जो किअपना ज्यादातर समय आकाश में उड़ते हुए और ग्लाइड करते हुए बिताता है, यह शिकार कम करता है और अक्सर मृत जानवरों की तलाश करता है, भारतीय काली चील का आकार छोटा होता है,  काली चील की विश्व भर में कई प्रजातियां पाई जाती है जैसे कि

  • Black Kite
  • Red Kite
  • Brahminy Kite
  • Black Winged Kite

काली चील  का वैज्ञानिक नाम (Milvus migrans) है  यह Accipitridae परिवार का सदस्य है, इस पक्षी परिवार में कई प्रकार के पक्षी जैसे बाज़, हेरियर , बज्ज़र्ड आते हैं, इस वर्ग के दूसरे पक्षियों की तुलना में काली चील  शिकार करने के बजाय मृत भक्षी व्यव्हार प्रदर्शित करती है यह अपना ज्यादातर समय आकाश में मंडराते हुए गुज़रती है, इसके मुड़े हुए पंख और पूछ के द्वारा इसे आसानी से पहचाना जा सकता है. पूरे एशिया में इसकी काफी तादाद पाई जाती है इसलिए यह एक संकटग्रस्त प्रजाति नहीं है.

काली चील लगभग पूरे एशिया और ऑस्ट्रेलिया में पाई जाती है, तापमान के बदलाव के साथ कुछ प्रजातियां प्रवास भी करती हैं नीचे दिए गए मानचित्र में आप काली चील के प्रवासी अनुकूलन को देख सकते हैं,  काली चील की कुछ प्रजातियां यूरोप में भी पाई जाती है परंतु उनकी संख्या बहुत कम होती है.

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काली चील की अनुकूलन विशेषताएं Black kite adaptations

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एसा प्रतीत होता हे की काली चील ने मनुष्यों की आबादी के साथ रहना सीख लिया हे, छोटे आकार का यह शिकारी पक्षी भारतीय शहरों के रहने के लिए अनुकूलित हो गया है, जहाँ दूसरे पक्षी मानव गतिविधियों के कारण विलुप्त होते जा रहे हैं वही काली चील अनुकूलन की वजह से शहरों के आसपास अपना अस्तित्व बचाने में सफल रही है, काली चील धुए और आग की तरफ आकर्षित होती है, इसका कारण यह है कि जंगल में आग लगने पर छोटे जीव जंतु इससे घबराकर इधर उधर  भागते हैं जिन का शिकार काली चील आसानी से कर लेती.

यह मनुष्य की घनी आबादी के नजदीक भी रहने के अनुकूलित हो गई है, मनुष्य द्वारा फेंका गया जानवरों का मांस इसका मुख्य भोजन होता है, लगभग हर भारतीय शहर के आकाश में इसे उड़ते हुए देखा जा सकता है, कई शहरों में यह इंसानों के हाथ से खाने की चीजें छीन कर ले जाती है, मनुष्य द्वारा आहार के लिए पशुओं के मारे जाने के स्थान पर इनके झुण्ड अक्सर देखे जा सकते हैं, मनुष्य के साथ रहने के कारण काली चील शिकार पर ज्यादा निर्भर ना रहते हुए मृत जानवरों के मांस खाने के अनुकूलित हो गई.

काली चील के लम्बे मजबूत पंजे होते हैं जो इन्हें शिकार करने और शिकार को उठाकर ले जाने में मदद करते हैं,  काली चील की आंखें बहुत तेज होती है यह बहुत ऊंचाई से चूहे जैसे छोटे जानवरों को भी देख लेती है.

काली चील का भोजन और व्यहवार black kite habit and habitat

काली चील का मुख्य भोजन जानवरों का मांस, छोटी मछलियां, छोटे पक्षी, चमगादड़ आदि हैं.

भारतीय काली चील का प्रजनन काल जनवरी से लेकर फरवरी तक रहता है अंडों से निकले हुए बच्चे मानसून के पहले उड़ने लग जाते हैं  यह चील अपना घोंसला पेड़ की ऊंची शाखाओं पर बनाती है, यह एक ही घोसले को कई सालों तक इस्तेमाल करती है, घोंसला बनाने में नर और मादा दोनों सहयोग करते हैं, बच्चों के पालन में भी दोनों मिलकर कार्य करते हैं , काली चील एक बार में 2 से 3 अंडे देती है इन अन्डो को को 30 से 34 दिन तक सेया जाता है, अंडे से निकलने के बाद बच्चे 2 महीने तक घोंसले के अंदर ही रहते हैं.

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सिर्फ 150 सोन चिरैया ही बची है भारत में Great Indian Bustard in Hindi

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ग्रेट इंडियन बस्टर्ड सोन चिरैया

ग्रेट इंडियन बस्टर्ड जिसे की सोन चिरैया के नाम से जाना जाता है भारत का एक शानदार पक्षी है परंतु यह दुख की बात है कि अब केवल 150 ग्रेट इंडियन बस्टर्ड ही बचे हैं यह प्रजाति विलुप्ति  के कगार पर है तथा अति संकटग्रस्त प्रजाति की श्रेणी में रखी गई है.

ग्रेट इंडियन बस्टर्ड का वैज्ञानिक नाम Ardeotis nigriceps  हिंदी में इसे कई नामों से जाना जाता है जैसे  गोडावण, सोहन चिड़िया, हुकना, गुरायिन ‘सोन चिरैया’इत्यादि, यह एक बहुत बड़े आकार का पक्षी होता है जिसका क्षेतिज आकार का शरीर होता है तथा लंबे पैर होते हैं, जिसकी वजह से यह ऑस्ट्रिच पक्षी के समान दिखाई देता है, ऑस्ट्रिच पक्षी उड़ नहीं पता है परंतु ग्रेट इंडियन बस्टर्ड भारी होने के बावजूद उड़ सकता है, यह  उड़ने वाले पक्षियों में एक सबसे भारी पक्षी है, अतीत में यह भारतीय सूखे मैदानों में बहुतायत में मिलता था लेकिन अब इनकी संख्या केवल 150 ही बची है, यह एक संकटग्रस्त प्रजाति है जो की शिकार और अपने आवास के नष्ट होने की वजह से विलुप्त होने के कगार पर आ गई, इन शानदार पक्षियों का आवास सूखी घास के मैदान और अर्ध रेगिस्तानी इलाके होते हैं,  यह अक्सर काले हिरणों के साथ साथ दिखाई देते हैं क्योंकि दोनों का आवास लगभग एक ही जैसा है. भारत के वाइल्ड लाइफ प्रोटक्शन एक्ट 1972 के तहत यह एक संरक्षित पक्षी है.

ग्रेट इंडियन बस्टर्ड  कहाँ पाया जाता है?

ग्रेट इंडियन बस्टर्ड जिसे की सोन चिरैया के नाम से जाना जाता है भारत का एक शानदार पक्षी है परंतु यह दुख की बात है कि अब केवल 150 ग्रेट इंडियन बस्टर्ड ही बचे हैं यह प्रजाति विलुप्ति  के कगार पर है तथा अति संकटग्रस्त प्रजाति की श्रेणी में रखी गई है.

ग्रेट इंडियन बस्टर्ड पक्षी पाकिस्तान में भी पाए जाते हैं परंतु यहां भी इनकी संख्या बहुत कम बची है, अतीत में यह लगभग पूरे भारत में पाए जाते हैं इनमें पंजाब हरियाणा उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ उड़ीसा आंध्र प्रदेश राजस्थान गुजरात महाराष्ट्र कर्नाटक तमिलनाडु आंध्र प्रदेश आदि प्रदेश प्रमुख थे अब यह केवल केवल राजस्थान, गुजरात महाराष्ट्र कर्नाटक और तमिलनाडु में ही  पाया जाता है बाकी अन्य प्रदेशों से यह पूरी तरह लुप्त हो चुके हैं.

ग्रेट इंडियन बस्टर्ड  क्या खाता है?

ग्रेट इंडियन बस्टर्ड सोन चिरैया पक्षी सर्वाहारी पक्षी होता है, यह सभी प्रकार के कीट पतंगे खा लेता है यह सभी प्रकार के अनाज, छोटी छिपकलियां, चूहे सभी कुछ खा सकता है,  खेती वाले इलाकों में यह फसलों को नुकसान पहुंचा सकते हैं, क्योंकि यह अनाज और मूंगफली बड़े शौक से खाते हैं, अर्ध रेगिस्तानी इलाकों में पानी कम उपलब्ध होता है, पानी उपलब्ध होने पर यह पक्षी  बैठकर पानी पीता है तथा आस पास देखता रहता है, खतरा होने पर मादा पक्षी अपने बच्चों को पंख के नीचे छुपा लेती है यह बहुत ही शर्मिला पक्षी होता है तथा अक्सर लंबी घास के अंदर छुपा होता है.

ग्रेट इंडियन बस्टर्ड का प्रजनन और व्यहवार

ग्रेट इंडियन बस्टर्ड मार्च से सितंबर के बीच होता है,  प्रजनन काल के दौरान इसकी आवाज 500 मीटर दूर से भी सुनाई दी जाती है,  मादा सोन चिरैया पक्षी एक बार में एक ही अंडा देती है इस का घोंसला ज़मीन पर ही बना होता है, अंडों को सेने और बच्चों के पालन का कार्य केवल मादा ही करती है इस काम में नर भाग नहीं लेता है, इसके अंडों को कई प्रकार के जीवों से खतरा रहता है  जमीन पर चलने वाले शाकाहारी पशु इसके अंडों को कुचल सकते हैं, तथा कोव्वे इनके अन्डो को खा जाते हैं.

ग्रीटइंडियन बस्टर्ड  के संरक्षण का कार्य किस राष्ट्रीय अभ्यारण में किया जा रहा है?

राजस्थान सरकार ने इस पक्षी को बचाने के लिए प्रोजेक्ट ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की शुरुआत की है यह प्रोजेक्ट सन 2013 में वर्ल्ड एनवायरनमेंट डे के दिन शुरू किया गया है इस प्रोजेक्ट के तहत ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के आवास स्थल और प्रजनन स्थल की पहचान करना, उसे बचाना और सुरक्षित करना मुख्य उद्देश्य है.

इस पक्षी को बचाने के लिए कई राष्ट्रीय पक्षी अभयारण्य काम कर रहे हैं,  जैसलमेर के निकट डेजर्ट नेशनल पार्क अभयारण्य में इस पक्षी को बचाने के लिए काफी कार्य किया जा रहा है गुजरात के कच्छ डिस्ट्रिक्ट में स्थित अबदासा मैं भी इन की कुछ संख्या को बचाया जा रहा है, अन्य प्रदेशों में निम्न अभयारण्यों में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को संरक्षित करने का कार्य किया जा रहा है.

Naliya in Kutch,

Karera Wildlife Sanctuary in Shivpuri district

Great Indian Bustard Sanctuary near Nannaj,18 km from Solapur in Maharashtra,

Shrigonda taluka in Ahmednagar district of Maharashtra,

Chandrapur district in Maharashtra

Rollapadu Wildlife Sanctuary, Kurnool in Andhra Pradesh.

Ranibennur Blackbuck Sanctuary,

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ग्रेट इंडियन हॉर्नबिल धनेश पक्षी कैसा हौता है

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भारत का शानदार पक्षी ग्रेट इंडियन हॉर्नबिल

हमारे देश भारत में कई प्रकार सुंदर रंग-बिरंगे पक्षी पाए जाते हैं, कई पक्षी तो ऐसे हैं जो सिर्फ भारत में ही पाए जाते हैं, इन्हीं में से एक बहुत बड़े आकर का शानदार पक्षी ग्रेट इंडियन हॉर्नबिल है इस का हिंदी नाम धनेश पक्षी है तथा इसका वैज्ञानिक नाम Buceros bicornis है , हॉर्नबिल पक्षी कई प्रकार के होते हैं इन्ही में से एक ग्रेट इंडियन हॉर्नबिल भी है यह भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण पूर्व एशिया में पाया जाता है, इसके बड़े आकार और रंगीन पंखों से प्रभावित होकर कई जनजातीय संस्कृतियों में इसे अच्छा माना जाता है,  ग्रेट इंडियन हॉर्नबिल काफी लंबे समय तक जीवित रहता है, इसका जीवनकाल 50 वर्ष का होता है, जंगल में ये सबसे बड़े फल खाने वाले पक्षी होते हैं, परन्तु ये मौका परस्त होते हैं ये समय-समय पर छोटे स्तनधारी प्राणी और यहां तक कि छोटे पक्षियों को भी खा जाता है, ग्रेट इंडियन हॉर्नबिल प्रवासी पक्षी नहीं है, यह हिमालय के जंगलों में और वेस्टर्न घाट के जंगलों में पाया जाता है. यह अपना सारा समय घने जंगलो में व्यतीत करता हे इसलिए इसे तेज़ गति से उड़ने की आवश्यकता नहीं होती, यह कारण है की इसके उन्दने की गति मध्यम होती है.

ग्रेट इंडियन हॉर्नबिल को केसे पहचाने Great Indian Hornbill

ग्रेट इंडियन हॉर्नबिल एक बहुत बड़े आकार का पक्षी होता है, इसका आकार 37 इंच से लेकर 51 इंच तक हो सकता है इसके पंखों का फेलाव 60 इंच का होता है तथा इसका भार ढाई से 4 किलो के बीच पाया गया है, हॉर्नबिल की प्रजाति में यह सबसे भारी पक्षी होता है, मादा इंडियन हॉर्नबिल नर से छोटी होती है जिसकी आंखें नीली सफेद होती है नर पक्षी की आंखें लाल रंग की होती है

ग्रेट इंडियन हॉर्नबिल की सबसे अजीब विशेषता इसकी बड़ी चोंच के ऊपर सर पर स्थित पीले केसरिया लाल रंग की टोपी जैसी संरचना होती है, जिसकी वजह से इसे आसानी से पहचाना जा सकता है, मादा पक्षी में इस टोपी का रंग पीछे की तरफ लाल होता है,  इसके पंखों के फड़फड़ाने की आवाज बहुत तेज होती है जब यह उड़ान भरता है तो इसकी आवाज बहुत दूर से सुनी जा सकती है. यह जंगलों के ऊपर उड़ते हैं.

ग्रेट इंडियन हॉर्नबिल पक्षी का वैज्ञानिक वर्गीकरण Great Indian Hornbill

ग्रेट इंडियन हॉर्नबिल पक्षी का वर्गीकरण किया गया है

Scientific classification

Kingdom: Animalia

Phylum: Chordata

Class: Aves

Order: Bucerotiformes

Family: Bucerotidae

Subfamily: Bucerotinae

Genus: Buceros

Species: B. bicornis

Binomial name Buceros bicornis

ग्रेट इंडियन हॉर्नबिल पक्षी कहाँ पाया जाता है? Great Indian Hornbill

ग्रेट इंडियन हॉर्नबिल पक्षी भारत भूटान नेपाल मलेशिया कंबोडिया इंडोनेशिया सुमात्रा आदि देशों में पाया जाता है, इन पक्षियों के समूह अलग-अलग जंगलों में बिखरे हुए होते हैं, इन पक्षियों की कुछ आबादी तो हिमालय के आस पास पाए जाने वाले जंगलों में पाई जाती है तथा कुछ आबादी भारत के वेस्टर्न में घाट के जंगलों में पाई जाती है, इंडियन हार्न बिल पक्षी का आवास  बहुत घने जंगल होते हैं इन्हें पहाड़ी इलाकों के आसपास के घने जंगल पसंद है, ग्रेट इंडियन हॉर्नबिल पक्षी को काफी बड़े इलाके की आवश्यकता होती है, एक हॉर्नबिल पक्षी के जोड़े को प्रजनन काल के मौसम में 4 वर्ग किलोमीटर की और वर्ष भर इन्हें करीब 15 वर्ग किलोमीटर इलाके की आवश्यकता होती है.

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ग्रेट इंडियन हॉर्नबिल पक्षी क्या खाते हैं  Great Indian Hornbill

ग्रेट इंडियन हॉर्नबिल पक्षी छोटे-छोटे समूह में देखे जाते हैं केवल फलदार वृक्षों पर ही इनके बड़े झुण्ड  देखे जा सकते हैं दक्षिणी पूर्वी भूटान में इनके 150 से 200 के झुंड में देखे गए, ग्रेट इंडियन हॉर्नबिल पक्षी की खुराक मुख्यतः फल ही हैं ये अंजीर को खासतौर पर बहुत पसंद करते हैं, परन्तु यह मौका परस्त पक्षी है मौका मिलने पर यह छोटे स्तनधारी प्राणी, छिपकलियां और  छोटे पक्षियों को भी खा लेता है.

ग्रेट इंडियन हॉर्नबिल पक्षी का प्रजनन  Great Indian Hornbill

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ग्रेट इंडियन हॉर्नबिल पक्षी का का प्रजननकाल  जनवरी से अप्रैल के बीच होता है, इस दौरान ये काफी शोरगुल मचाते और तेज आवाज निकालते हैं इनकी आवाज kok kok  की तरह होती है मादा और नर एक ही तरह की आवाज निकलते हैं.

मादा हॉर्नबिल पक्षी पेड़ के खोखले ताने में घोंसला बनाती है, अंडा देने के बाद यह  घोसले को अन्दर से बंद कर देती है तथा केवल एक छोटा सा छेद ही खुला रखती है, अंडे सेने के दौरान  मादा इस घोसले में ही बंद रहती है, इस दौरान नर खाने का प्रबंध करता है और छोटे से छेद में से मादा को खाना देता रहता है, एक बार में मादा केवल एक से दो ही अंडे देती है इन अंडों से बच्चे 30 से 40 दिनों मैं निकलते हैं.

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जानिए कैसा होता है सुन्दर सुरखाब या चकवा पक्षी

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सुरखाब पक्षी की रोचक जानकारी

अक्सर आपने सुरखाब पक्षी और चकवा पक्षी के बारे में सुना और पढ़ा होगा, पर क्या आप जानते हैं की यह एक ही पक्षी के दो नाम हैं, आइये जानते हैं इस सुन्दर पक्षी के बारे में

चकवा – सुरखाब पक्षी बहुत ही सुंदर पक्षी होता है यह हंस वर्ग का सदस्य है,   चकवा – सुरखाब पक्षी के कई नाम प्रसिद्ध है अंग्रेजी में इसे Ruddy Shelduck  कहते हैं इस का वैज्ञानिक नाम Tadorna ferruginea है, इसका एक नाम सुरखाब बहुत प्रसिद्द है, इस पक्षी के पंख इतने सुन्दर होते हैं की इन पंखो पर एक मज़ेदार  कहावत बन गयी है, अक्सर उलाहना देने के लिए यह कहा जाता है की “उसमे कौन से सुरखाब के पंख लगे हैं?”

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यह अनोखा जलीय पक्षी है जो झील और तालाब के किनारे रहना पसंद करता है,  इसका आकार 45 -58 सेंटीमीटर के बीच होता है, इसके पंखों का फैलाव 110 से 135 सेंटीमीटर तक होता है,  चकवा – सुरखाब पक्षी देखने में अत्यंत सुंदर होता है इसके शरीर का रंग सफेद और गहरा नारंगी भूरा होता है,  इसकी पूंछ और पंख काले-सफ़ेद होते हैं यह प्रवासी पक्षी है जो की सर्दियों का वक्त भारतीय उपमहाद्वीप में व्यतीत करता है यह अपना प्रजनन काल दक्षिणी यूरोप और मध्य एशिया में व्यतीत करता है, इसकी आवाज बहुत तेज हॉंक हॉंक जैसी होती है.

चकवा – सुरखाब पक्षी नदी तालाबों झीलों के आसपास ही पाए जाते हैं,  चकवा – सुरखाब के बारे में कथा प्रसिद्ध है कि इसे श्राप दिया गया है की दिन में तो नर और मादा साथ रहते हैं लेकिन रात में चकवा – चकवी अलग अलग हो जाते हैं जिससे कि यह वियोग में तड़पते रहते हैं और एक दूसरे को पुकारते रहते हैं,  वास्तव में यह केवल साहित्य की कहानियों और कविताओं में दी गयी उपमा मात्र है.

चकवा – सुरखाब पक्षी उम्र भर के लिए जोड़ा बनाते हैं, यह पानी से काफी दूरी पर घोंसला बनाता है , मादा एक बार में 8 अंडे देती है,  मादा चार हफ्तों तक इन अन्डो को सेती है, अंडों से निकले हुए बच्चों का पालन माता पिता दोनों मिलकर करते हैं, अंडों से निकलने के 8 हफ्ते बाद सुरखाब के बच्चे उड़ने लगते हैं.

मध्य और पूर्वी एशिया में इनकी संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है, यूरोप में इनकी संख्या में लगातार कमी आती जा रही है, कुल मिलाकर पूरी दुनिया में चकवा – सुरखाब पक्षी की अच्छी आबादी मौजूद है इसलिए इन्हें कम चिंता वाले जीवों की श्रेणी में रखा गया है.

चकवा – सुरखाब पक्षी एक रात्रिचर पक्षी होता है, यह रात्रि में ही सक्रिय होता है, यह सर्वाहारी पक्षी है जो की घास, छोटे अंकुर, छोटे पौधे, अनाज तथा कीट पतंगे खा लेता है यह केवल पानी की सतह पर ही तैरता है  बत्तख की तरह पानी के अंदर गोता नहीं लगाता.

चकवा – सुरखाब पक्षी हमेशा जोड़ों में ही देखे जाते हैं, कभी-कभी यह छोटे झुण्ड में भी दिख जाते हैं, सर्दियों के समय प्रवास के दौरान झीलों के किनारे इनके बड़े झुंड एकत्रित हो जाते हैं.

चकवा – सुरखाब पक्षी मध्य एशिया में प्रजनन के लिए मार्च से अप्रैल के महीने में आते हैं, नर और मादा में आपसी संबंध बहुत मजबूत होता है यह अपने इलाकों की बहुत आक्रामकता से रक्षा करते हैं.

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बर्फीले वातावरण में पेंग्विन पक्षी कैसे रह पाते हैं? Adaptations of Penguins

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पेंग्विन पक्षी का अनोखा अनुकूलन Adaptations of Penguins

पेंग्विन एक अंटार्कटिका महाद्वीप में रहने वाला पक्षी है, पेंग्विन की 17 प्रजातियां पाई जाती है, इनमे से किसी भी प्रकार का पेंग्विन उड़ नहीं पाता है, परंतु पेंग्विन बहुत अच्छे तैराक होते हैं, सभी प्रकार के पेंग्विन बर्फीले अंटार्कटिक महाद्वीप के आसपास के इलाकों में पाए जाते हैं, पेंग्विन अंटार्कटिक महाद्वीप के आसपास छोटे  दीपों के समुद्री किनारों पर बर्फ या जमीन पर अंडे देते हैं.

अंटार्कटिक एक बर्फीला महाद्वीप है तथा इसके आसपास के समुद्र के पानी का तापमान भी जीरो डिग्री सेल्सियस ही बना रहता है,  कुछ पेंग्विन इन अंटार्कटिका से उत्तर में पाए जाने वाले द्वीपों में भी रहते हैं,

पेंग्विन कई महीनों तक समुद्र में रह सकते हैं, ये केवल प्रजनन काल में ही तट पर आते हैं,अंटार्कटिक महाद्वीप के बर्फीले माहौल में रहने के पेंग्विन अनुकूलित हो चुके हैं इनमें कई ऐसी विशेषताओं का विकास हुआ है जिससे कि यह बर्फीले वातावरण में रहने के लिए अनुकूलित हो गए हैं.

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पेंग्विन पक्षी के तेरने का अनुकूलन

पेंग्विंस के बत्तख की तरह झिल्ली दार पैर होते हैं, इनका शरीर पूरी तरह रेखीय होता है जो कि तैरने में  सहायक होता है, पेंग्विन पक्षी के पंख इस तरह से अनुकूलित हो गए हैं कि यह पानी के अंदर आसानी से चप्पू की तरह काम आते हैं.

पेंग्विन पक्षी का गर्म रहने का अनुकूलन

पेंग्विन पक्षी के शरीर का तापमान 38 डिग्री सेल्सियस के लगभग बना रहता है, जबकि उनके वातावरण का तापमान बर्फ और बर्फीली हवाओं की वजह से शून्य और अक्सर शून्य से भी नीचे चला जाता है, पेंग्विन की त्वचा के नीचे चर्बी की एक मोटी परत होती है यह परत ऊष्मा अवरोधक का काम करती है, पेंग्विन पक्षी अक्सर झुंडों में पास-पास बैठते  हैं जिसकी वजह से इनके शरीर की ऊष्मा बनी रहती है. पेंग्विन पक्षियों में ऐसा सामाजिक व्यवहार उत्पन्न हो गया है की बर्फीली हवाओं के चलने हवाएं चलने पर यह बड़े-बड़े झुंडों में पास पास बैठ जाते हैं जिससे कि यह बर्फीली हवाओं से बच जाते हैं.

पेंग्विन के शरीर का ऊपरी हिस्सा काला होता है जो कि धूप की गर्मी बड़ी तेजी से सोख लेता है इससे इन्हें गर्म रहने में मदद मिलती है.

पेंग्विन पक्षी के पंखो का अनुकूलन

पेंग्विन पक्षी के पंखों में बर्फीले क्षेत्र में रहने का विशेष अनुकूलन उत्पन्न हो गया है उनके पंख बहुत पास पास होते हैं, इससे ऊष्मा का निष्काशन नहीं होता है और यह गर्म बने रहते हैं, पेंग्विन के शरीर की एक विशेष ग्रंथि से तेल जैसा पदार्थ निकलता है जो इन के पंखों पर फैल जाता है, और इन्हें बर्फीले पानी से बचाता है, अंटार्कटिक में पानी का तापमान कभी भी 2 डिग्री सेल्सियस से ऊपर नहीं जाता है और वर्ष भर यह पानी अधिक ठंडा बना ही रहता है.

पेंग्विन पानी के अंदर कैसे गोता लगा लेते हैं

सभी पक्षियों की हड्डियां खोखली  और हल्की होती है परंतु पेंग्विन की हड्डियां भारी और मजबूत होती है जिससे कि ये पानी  में काफी गहराई तक गोता लगा सकते हैं.

पेंग्विन पर समुद्री पानी का असर क्यों नहीं होता है?

समुद्र के पानी में भारी मात्रा में नमक पाया जाता है अगर कोई जीव इस पानी को पी ले तो उसके शरीर में नमक की मात्रा बढ़ जाती है, ऐसे में उनके शरीर को नमक बाहर निकलने में बहुत दिक्कत होती है, पेंग्विन पक्षी की आंखों के पास एक विशेष प्रकार की ग्रंथि होती है जो कि शरीर से नमक को बाहर निकालती रहती है, यह ग्रंथि इतनी प्रभावशाली होती है कि पेंग्विन पक्षी समुद्र का पानी भी पी सकते हैं और उनके शरीर पर इसका कोई भी हानिकारक प्रभाव नहीं होता है.

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क्या गॉडज़िल्ला Godzilla जेसा विशालकाय जीव पृथ्वी पर चल सकता है?

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भय से उत्पन्न हुआ है गॉडज़िल्ला Godzilla

आप सभी ने भयानक विशालकाय गॉडज़िल्ला Godzilla प्राणी को फिल्मों में अवश्य देखा होगा, इस प्राणी के बारे में आपके मन में कई प्रकार के प्रश्न होंगे, गॉडज़िल्ला Godzilla के बारे में अक्सर कई प्रकार के प्रश्न पूछे जाते हैं जैसे कि क्या गॉडज़िल्ला Godzilla एक डायनासोर है? गॉडज़िल्ला Godzilla किस प्रकार का डायनासोर है? क्या गॉडज़िल्ला Godzilla वास्तव में होते हैं? गॉडज़िल्ला Godzilla का नाम गॉडज़िल्ला क्यों रखा गया? इत्यादि, आइए  गॉडज़िल्ला Godzilla के बारे में इन रोचक प्रश्नों का उत्तर जानने का प्रयत्न करते हैं.

गॉडज़िल्ला Godzilla वास्तविक प्राणी नहीं है?

गॉडज़िल्ला Godzilla एक वास्तविक प्राणी नहीं है, ना तो वर्तमान में और ना ही अतीत में इस प्रकार के विशालकाय प्राणी पाए जाते थे, यह एक काल्पनिक जीव है, इस जीव की कल्पना जापान के किस्सों कहानियों और फिल्मों में की गई है.

गॉडज़िल्ला Godzilla एक काल्पनिक जीव है जोकि इसी नाम की जापानी फिल्मों में दिखाया जाता है,  इसे सबसे पहले सन 1956 में आई फिल्म Godzilla में दिखाया गया था यह फिल्म Ishiro Honda ने बनाई थी,  यह फिल्म काफी लोकप्रिय हुई और तभी से गॉडज़िल्ला Godzilla एक विश्व प्रसिद्ध काल्पनिक जीव बन गया, इसे मॉन्सटरस का राजा यानी की देत्यों का राजा कहा जाने लगा.

गॉडज़िल्ला Godzilla फिल्मों में इस प्राणी का चित्रण किया इस प्रकार किया जाता है कि यह समुद्र में रहने वाला एक बहुत विशालकाय खतरनाक और विनाशकारी जीव है, न्यूक्लियर रेडिएशन की वजह से समुद्र के इस भयानक जानवर में म्यूटेशन उत्पन्न हो गया है जिससे कि यह आकार में इतना बड़ा हो गया है तथा यह एटॉमिक रेडिएशन से युक्त आग अपने मुंह से उगल सकता है.

भय से उत्पन्न हुआ है गॉडज़िल्ला Godzilla

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गॉडज़िल्ला Godzilla की उत्पत्ति वास्तव में  परमाणु बमों के भय की वजह से हुई थी, द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिका ने  जापान के नागासाकी और हिरोशिमा द्वीपों पर विनाशकारी परमाणु बम गिराए थे, जिससे लाखों लोग मारे गए थे और रेडिएशन की चपेट में आ गए थे, परमाणु बमों का यह विनाश जापान के लोगों ने अपनी आंखों से देखा और भोग था उनका यही भय उनके कहानी किस्सों और आगे चलकर फिल्मों में भी गॉडज़िल्ला Godzilla के रूप में प्रकट हुआ.

गॉडज़िल्ला Godzilla का नाम गॉडज़िल्ला Godzilla क्यों रखा गया है?

गॉडजिला नाम जापानी शब्द Gojira  का अंग्रेजी रूपांतरण है, जैपनीज़ शब्द Gojira  दो शब्दों से मिलकर बना है पहला gorira इसका मतलब होता है गोरिल्ला और दूसरा kujira  इसका मतलब होता है इस तरह Gojira का मतलब हुआ गोरिल्ला व्हेल.,

क्या गॉडज़िल्ला Godzilla डायनासोर है ?

गॉडज़िल्ला Godzilla जीवो की कल्पना इस प्रकार की गई है कि ऐसा लगता है कि यह तीन अलग-अलग डायनासोरों को मिलाकर बनाया गया है गॉडज़िल्ला Godzilla के पीठ पर पाई जाने वाली प्लेट्स स्टैगोसोरस डायनासोर के समान है, गॉडज़िल्ला Godzilla के चलने का तरीका इगुआनाडॉन डायनासोरों के जैसा है, इसके आगे के छोटे पैर और पंजे पूरी तरह टी रेक्स डायनासोर के समान है. गॉडज़िल्ला Godzilla डायनासोर नहीं है बल्कि एक काल्पनिक  समुद्री जीव है.

गॉडज़िल्ला Godzilla पर कितनी फिल्मे बन चुकी हैं?

सन 1954 से लेकर अब तक गॉडज़िल्ला Godzilla पर 31 फिल्मों का निर्माण हो चुका है इसमें से तीन अमेरिका के हॉलीवुड में बनी है तथा बाकी जापान में बनी है.

क्या गॉडज़िल्ला Godzilla जैसा विशालकाय जीव पृथ्वी पर चल सकता है?

वैज्ञानिकों के अनुसार गॉडज़िल्ला Godzilla जैसा विशालकाय जीव कभी भी पृथ्वी पर नहीं चल सकता,  इसका कारण है उसका विशाल आकार एवं भार, जैसे ही यह भयानक विशालकाय जीव पृथ्वी पर कदम रखेगा तो इसके भार से ही इसके पैर जमीन में धंस जाएंगे, अत्यधिक भार  की वजह से इसकी हड्डियां और हड्डियों के आसपास के उत्तक इतना भार संभाल नहीं पाएंगे और टूट जाएंगे जिससे कि यह जमीन पर गिर जाएगा.

गुरुत्वाकर्षण के अलावा भी  कई ऐसे कारण हैं जिनकी वजह से गॉडज़िल्ला Godzilla कभी भी पृथ्वी पर नहीं रह सकता, इतने विशालकाय जीव को जीवित रहने के लिए 215 मिलियन कैलोरी प्रतिदिन की आवश्यकता होगी, इतना अधिक भोजन प्राप्त करना किसी भी जीव के लिए असंभव है इसलिए पृथ्वी पर इतने विशालकाय जीव कभी भी नहीं उत्पन्न नहीं हो सकता है.

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भारतीय सुनहरा ओरियल पक्षी Indian golden oriole

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भारतीय सुनहरा ओरियल पक्षी Indian golden oriole

भारतीय सुनहरा ओरियल पक्षी एक बहुत ही सुंदर गहरे पीले रंग का पक्षी होता है, इसका वैज्ञानिक नाम Oriolus kundoo है  यह ओरियल पक्षी की ही एक प्रजाति है पहले इसे यूरोप की गोल्डन ओरियल प्रजाति का पक्षी समझा जाता था लेकिन अभी हाल ही में वैज्ञानिकों  की पड़ताल से यह पता चला है कि यह एक बिल्कुल अलग प्रजाति है.

भारतीय सुनहरे ओरियल पक्षी और यूरोपियन सुनहरे ओरियल पक्षी में अंतर

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The Indian Golden Oriole, (oriolus kundoo)भारतीय सुनहरा ओरियल पक्षी को इसकी आंखों पर बनी पट्टी से आसानी से पहचाना जा सकता है भारतीय सुनहरा ओरियल पक्षी के आंखों की पट्टी छोटी होती है जबकि यूरोपीय सुनहरा ओरियल के आंखों के ऊपर पाए जाने वाले वाले काले रंग की पट्टी काफी लंबी होती है, जो उसके सर के पीछे तक जाती है, भारतीय पक्षी के पंखों का रंग ज्यादा गहरा पीला होता है, भारतीय मादा ओरियल पक्षी के शरीर पर पाए जाने वाली धारियां ज्यादा गहरी होती है यूरोपीय मादा ओरियल पक्षी की तुलना में.  यूरोपियों ओरियल पक्षी आकार में बड़ा होता है इसकी लंबाई 150 से 162 मिलीमीटर होती है जबकि भारतीय ओरियल पक्षी 136 मिलीमीटर से लेकर 144 मिलीमीटर आकार का होता है.

भारतीय सुनहरा ओरियल पक्षी संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में पाया जाता है यह बलूचिस्तान, पाकिस्तान और हिमालय के आसपास के क्षेत्रों में पाया जाता है, सर्दियों के मौसम में दक्षिण भारत की ओर प्रवास कर जाते हैं, कुछ सुनहरे ओरियल पक्षी तो श्रीलंका तक उड़कर प्रवास करते हैं,  कुछ सुनहरे भारतीय ओरियल पक्षी मालद्वीप और अंडमान निकोबार दीप समूह में भी देखे गए हैं यह ज्ञात नहीं है की ये प्रवासी पक्षी हें या वहां के मूल निवासी हैं.

सुनहरे ओरियल पक्षी का आवास

भारतीय ओरियल पक्षी लगभग सभी प्रकार के जंगलों में रह सकता है, यह पतझड़ वनों, अर्ध  सदाबहार जंगलों, वुडलैंड, जंगलों के किनारे, मंग्रुव के जंगलों, शहर के आसपास बिखरे हुए जंगलों और बगीचों में रह सकता है.

भारतीय सुनहरा ओरियल पक्षी अर्ध प्रवासी पक्षी है, यह अपना प्रजनन काल मध्य एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप में व्यतीत करता है, भारत में पाए जाने वाला यह पक्षी ज्यादातर भारत का ही मूल निवासी है,

सुनहरे ओरियल पक्षी का प्रजनन काल 

सुनहरे ओरियल पक्षी का प्रजनन काल अप्रैल से लेकर अगस्त तक होता है,  इन का घोसला छोटे आकार का होता है जो कि पेड़ की टहनी के किनारे बनाया जाता है पक्षी अपना घोंसला ज्यादातर ब्लैक ड्रॉन्गो  पक्षी के घोंसले के आसपास बनाता है, मादा ओरियल पक्षी 2 से 3 अंडे देती है, नर तथा मादा दोनों घोसले को बनाने और बच्चों की देखरेख में सहयोग करते हैं, यह अपने घोंसले की रक्षा अन्य शिकारी पक्षियों से करते हैं, सामान्यतः इन्हें शिकरा और कोंवों  से बहुत खतरा होता है.

सुनहरे ओरियल पक्षी क्या खाते हैं?

सुनहरे औरियल पक्षी का मुख्य भोजन फल है, यह फूलों का रस और कीट पतंगे भी खाते हैं, यह छोटे कीट पतंगे और यहां तक कि छोटी छिपकलियों तक का भी शिकार कर लेते हैं इस तरह ये एक सर्वाहारी वर्ग के पक्ष हैं.

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