Irrfan Khan open letter इरफ़ान खान के नाम खुला ख़त !!!

open letter to irrfan khan

open letter to irrfan khan इरफ़ान खान के नाम खुला ख़त

अभिनेता इरफ़ान खान के नाम खुला ख़त !!!

Open Letter to Actor Irrfan Khan.

इरफ़ान खान साहब! अस सलाम अलयकुम,

यह खुला ख़त आपको इसलिए लिखना पड़ रहा है क्यों की आपने क़ुरबानी पर एक बयान देकर, कम इल्म, सीधे साधे और नई पीढ़ी के नोजवानों के दिलों में इस्लाम के बारे में शक-शुबहात पैदा कर दियें है जीससे उनके ईमान के कमज़ोर होने का खतरा पैदा हो गया है और क़ुरबानी के बारे में गलत जानकारी समाज में फ़ैल गयी है।

में बहुत मुख्तसरन बात करूंगा, क्यों की जानता हूँ की आपके पास और आज कल हर किसी के पास बहुत कम वक्त होता है।

अल्लाह का दीन

इरफ़ान भाई, दीन वह होता है जो अल्लाह अपने किसी रसूल के ज़रिये, इंसानों की हिदायत के लिए आसमान से नाज़िल (अवतरित) करता है, पैगम्बर भी उस दीन में अपनी तरफ से कुछ बढ़ा घटा नहीं सकते।

रस्मो रिवाज, परम्पराएँ, मत, संप्रदाय, त्यौहार, रिचुअल्स

रस्मो रिवाज, परम्पराएँ, मत, संप्रदाय, त्यौहार, रिचुअल्स इन्सान बनातें हैं, इनमे सही गलत बातें शामिल होती हैं और समाज और काल के हिसाब से ये बदलते रहतें हैं, इनका INTROSPECTION आत्म निरिक्षण किया जा सकता है।

अल्लाह का दीन रस्मो रिवाज, परम्पराएँ, मत, संप्रदाय, त्यौहार, रिचुअल्स हरगिज़ नहीं है !

ईद उल अज़हा पर की जाने वाली जानवरों की कुर्बानी का हुक्म अल्लाह ने दिया है और रसूलल्लाह मोहमम्द स.अ.व. ने खुद क़ुरबानी कर, इसका सुन्नत तरीका तमाम मुसलमानों को सिखाया है। यह कोई बाद में मुसलमानों के द्वारा शुरू की हुई परंपरा नहीं है। आपको किस बेवकूफ़ ने यह कह दिया की यह इंसानों द्वारा बनाई हुई परम्परा है!

(Irrfan Khan open letter)

अक्ल, तर्कवाद और दीन

इक़बाल का शेर याद दिला दूं

“निकल जा अक्ल से आगे की यह नूर……

चिरागे राह है……….. मंजिल नहीं है”

इरफ़ान भाई, अगर अक्ल से ही इंसानों को हिदायत (सही रास्ता) हांसिल होना होता तो सभी अक्लमंद हिदायत पा जाते, आप नज़र उठा कर देखिये, कितने अक्लमंद दानिश्वर लोग खुद किस तरह अपना और समाज का नुकसान कर रहें हैं। अक्ल के काम करने का एक अलग दायरा है, अक्ल, तर्कवाद अल्लाह के दीन पर सवाल नहीं उठा सकते। कल को आप की अक्ल कहेगी की में तीन बार हाथ-मुह धो कर वज़ू क्यों करूं में तो ऐसे ही पाक हूँ और नमाज़ पढ़ सकता हूँ, नमाज़ में काबे की तरफ रुख करके ही सजदा क्यों करूं? अल्लाह तो हर जगह है! ………..और इस तरह अक्ल सारे दीन को रद्द कर देगी और इन्सान अपनी अपनी अक्ल के मुताबिक भटकते रहेंगे।

क़ुरबानी की हिक़मत  

यूँ तो अल्लाह के हर हुक्म के पालन करने में इंसानों के लिए कई फायदे हैं, अल्लाह के हुक्म की हिकमत को समझना इन्सान की सीमित अक्ल के लिए संभव नहीं है, लेकिन चलिए फिर भी ईद उल अज़हा के मोके पर क़ुरबानी किये जाने से इंसानी समाज को कितना अज़ीम और चमत्कारिक फायदा होता है इसके बारे में सोच लें।

आपने रबी, खरीफ की फसल के बारे में सुना होगा! इन फसलों से हर साल अरबों रुपया बड़े शहरों से और देश के बाहर निर्यात के ज़रिये गावों के गरीब किसानो तक पहुचता है। यह गावों की तरफ मनी फ्लो और रोज़गार का बहुत बड़ा जरिया है।

वाल स्ट्रीट जनरल की एक रिपोर्ट के मुताबिक इंडोनेशिया में, जिसमे दुनिया की 12.7 प्रतिशत मुस्लिम आबादी रहती है, सन 2014 में 8 लाख जानवरों की क़ुरबानी की गयी, एक जानवर की औसत कीमत 895 डालर्स थी, इस हिसाब से लगभग 46 अरब 45 करोड़ भारतीय रूपये की कीमत के जानवरों की क़ुरबानी की गयी!

(लिंक http://blogs.wsj.com/briefly/2015/09/23/indoeid0923/)

यह 46.45 अरब रुपया किसके पास पहुंचा? ये रूपये शहरों से सीधे गावों के गरीब पशु पालकों के हाथ में गए, ये जानवर पालने वाले किसी भी देश के समाज में सबसे गरीब और निचले आर्थिक स्तर पर खड़े होतें है।

Irrfan Khan open letter इरफ़ान खान

Irrfan Khan open letter इरफ़ान खान के नाम खुला ख़त !!!

भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में पूरी दुनिया के मुसलमानों की 31 प्रतिशत आबादी रहती है, यहाँ पर भी बकरे पालने और बेचने का काम सबसे गरीब आदमी करता है, कई गावों में यह काम बूढे और महिलाओं की आय का साधन है, जो और कोई दूसरा काम नहीं कर सकते। अब इंडोनेशिया के रकम को तीन से गुणा कर लीजिये! करीब डेढ़ ख़रब रुपया (13935 करोड़) क़ुरबानी के हुक्म से, अल्लाह गरीब पशुपालकों तक पंहुचा रहा है और उनको रोज़गार दे रहा है। कभी किसी बूढी औरत या किसान के चेहरे की ख़ुशी और आँखों की चमक जाकर बाज़ार में देखिएगा, जब वह अपना बकरा बेचकर घर की तरफ लोटता है, क्यों की उसकी साल भर की मेहनत सफल हुई है।

Irrfan Khan open letter इरफ़ान खान के नाम खुला ख़त !!!

Goat Farmers of India

भारत सरकार के सेन्ट्रल इंस्टिट्यूट फॉर रिसर्च ओन गोट्स के अनुसार (लिंक http://www.cirg.res.in/) (Irrfan Khan open letter)

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विश्व में सर्वाधिक संख्या में बकरियां हमारे देश में पाई जाती हैं, जिनका आजीविका एवं खाद्य सुरक्षा में काफी अहम् योगदान है. बकरियों से 6 लाख गावों के लगभग 7 करोड़ किसानों को प्रतिपूरक आय प्राप्त होती है. बकरियों के द्वारा देश में 4.7 से 5.96 लाख टन मांस का उत्पादन विगत दस वर्षो में प्राप्त हुआ.

बकरियों के उत्पादों से देश को कुल 38590 करोड़ का योगदान प्राप्त होता है, जिसमे मांस द्वारा 22625 दूध द्वारा 9564 खाल द्वारा 1491 एवं खाद द्वारा 1535 करोड़ क्रमश: प्राप्त होते हैं.

Irrfan Khan open letter इरफ़ान खान के नाम खुला ख़त !!!

Goat farmers of India

हर साल करोड़ों बकरों की क़ुरबानी की जाती है, लेकिन फिर अगले साल इतने ही बकरे तैयार हो जातें हैं, रबी-खरीफ की तरह यह भी एक फसल है, क़ुरबानी करने का नियम अगर इन्सानों का बनाया हुआ होता तो बकरों के साथ बकरियों की भी क़ुरबानी की जाती और तब इतनी तादात में क़ुरबानी करने की वजह से यह स्पिशिज़ (प्रजाती) ख़त्म हो जाती, लेकिन एसा नहीं है, क्यों की यह नियम अल्लाह द्वारा बनाया गया है इसलिए इसमें कोई flaw गलती नहीं है।

अल्लाह का हुक्म पूरा करना ही क़ुरबानी है.

एक बकरे की कम से कम कीमत दस से बारह हज़ार होती है, क़ुरबानी करने के लिए अपने घर खर्च में से इतनी रकम निकलना और फिर क़ुरबानी के गोश्त को गरीबों और रिश्तेदारों को तकसीम करना भी कम मुश्किल नहीं है, इससे इन्सान के दिल का बुख्ल (कंजूसी) कम होता है और सखावत (दान) की प्रवत्ति बढती है।

जिस भी किसी मुस्लमान के पास 52.5 तोला चाँदी या इसके बराबर पैसा है उस पर क़ुरबानी करना वाजिब है, अब देखिये 52.5 तोला चाँदी की कीमत आजकल पच्चीस हज़ार के आस पास चल रही है, जिस भी मुस्लमान के पास पच्चीस हज़ार या इतनी कीमत का सोना चांदी है तो उसे क़ुरबानी करना वाजिब है। अब पच्चीस हज़ार में से बारह हज़ार खर्च कर गरीबों और रिश्तेदारों को खाना खिलाना क़ुरबानी नहीं है?

(Irrfan Khan open letter)

इरफान भाई खुद मूसा अलेहहिस्सलाम जो की अल्लाह से कलाम करते थे, हज़रात खिज्र अलेहहिस्सलाम के कामों की हिकमत नहीं समझ पाए थे।

आपको पैगम्बर मूसा अलेहहिस्सलाम और खिज्र अलेहहिस्सलाम का किस्सा याद होगा, बहुत शोर्ट में अर्ज़ कर दूं ।

मूसा अलेह. ने एक बार महसूस किया की इस ज़माने में मुझ से ज्यादा इल्म वाल कोई नहीं है तब अल्लाह ने उन को खिज्र अलेह. से मिलने के लिए कहा। खिज्र अलेह. ने कहा ठीक है अगर आप मेरे साथ रहकर इल्म सीखना चाहतें है तो चलिए लेकिन जिस चीज़ का आपको इल्म नहीं है उसके बारे में आप सब्र न रख सकेंगे और सवाल पूछने लगेगें। मूसा ने कहा की अगर अल्लाह ने चाहा तो आप मुझे सब्र करने वाला पाएंगे।

खिज्र अलेह. ने कहा की ठीक है लेकिन मुझ से मेरे किसी काम के बारे में कोई सवाल मत पूछियेगा।

मूसा राज़ी हो गए और दोनों साथ चल दिए। दोनों एक गरीब मल्लाह की कश्ती में सवार हुए और किनारे पर उतरने पर खिज्र ने किश्ती को थोडा तोड़कर एबदार बना दिया, इस पर मूसा ने सवाल किया और कहा की आपने एक गरीब की कश्ती को तोड़कर बुरा काम किया।

खिज्र अलेह. ने कहा की मेने आपको पहले ही कहा था की आप सब्र ना रख सकेंगे, इस पर मूसा अलेह. ने माफ़ी मांगी और दोनों फिर आगे चल दिए।।

रस्ते में एक गाँव आया, जब दोनों ने वहां के रहने वालों से थोडा खाना और एक रात रुकने की जगह मांगी तो सभी गावं वालों ने उन्हे मना कर दिया।…. इसी गावं में हज़रत खिज्र को एक पुराने घर की दिवार गिरती हुई दिखाई दी तो उन्होंने उसे मरम्मत कर के सही कर दिया और घर वालों से बदले में कुछ भी नहीं लिया।….. इस पर मूसा अलेह. ने फिर सवाल उठाया की आप चाहते तो कुछ मेहनताना ले सकते थे जिससे खाने का कुछ इंतज़ाम हो जाता। हज़रात खिज्र ने कहा की आपने फिर मेरे अमल पर सवाल उठाया, मूसा ने तुरंत माफ़ी मांगी और कहा की अगर अब में कोई सवाल करूं तो आप मुझे जाने के लिए कह सकतें हैं।

कुछ आगे सफ़र करने के बाद हज़रात खिज्र को एक लड़का खेलता हुआ दिखाई दिया जिसका उन्होंने क़त्ल कर दिया। यह देखकर मूसा केसे चुप रहते। …उन्होंने कहा की आपने बहुत ही बुरा काम किया है की एक निर्दोष बच्चे को क़त्ल कर दिया।

हज़रात खिज्र ने कहा की आपका और मेरा साथ यहीं तक था।….

सुनिए जो मेने गरीब नाविक की कश्ती को एबदार बना दिया था उसमे ये हिकमत थी की उस इलाके का ज़ालिम बादशाह अच्छी नई कश्तियाँ नाविकों से छीन लिया करता था, इसलिए मेने उस कश्ती को एबदार बना दिया और इस तरह उस गरीब नाविक की मदद की।

जो गिरती हुई दिवार मेने सही की थी, उस घर में दो यतीम बच्चे रहतें हैं और उस दिवार में उनके पिता ने उनके लिए खज़ाना छुपा कर रखा था, अगर वह दिवार गिर जाती तो उस खजाने पर गावं वाले कब्ज़ा कर लेते!

और आखिर में जिस लड़के को मेने क़त्ल किया उसके माँ बाप बहुत नेक हैं लेकिन वाल लड़का बड़ा होकर गुनाहगार बन जाता इसीलिए अल्लाह ने मुझे उसे ख़त्म करने का हुक्म दिया और अल्लाह उन्हें उस के बदले एक नेक बेटा अता कर देगा।

यह तीनो काम मेने अपनी इच्छा से नहीं बल्कि अल्लाह के हुक्म से किये हैं!

जब एक पैगम्बर दुसरे पैगम्बर के अमल की हिकमत को नहीं समझ सकता तो एक आम इन्सान जिसने दीन का इल्म भी हांसिल नहीं किया है, अल्लाह के हुक्म की हिकमत को  कैसे समझ सकता है! और अल्लाह के हुक्म को ग़लत कैसे ठहरा सकता है।

(Irrfan Khan open letter)

तो इन तीन तथ्यों पर गौर कीजिये

  1. अल्लाह का दीन, इंसानों के द्वारा बनाया गया रस्मो रिवाज, परम्परा, मत, संप्रदाय, रिचुअल नहीं है।
  2. क़ुरबानी से इंसानी समाज को कई फायदें हैं, एक चमत्कारिक फायदा तो यह है की इससे खरबों रुपया गावों के गरीब-बूढ़े पशुपालकों और महिलाओं तक पहुँच रहा है।
  3. अल्लाह के दीन पर अक्ल सवाल नहीं उठा सकती, अगर एसी हिमाकत और नादानी की गयी तो वुजू, नमाज़, रोज़ा, ज़कात, हज सभी को, अक्ल रद्द कर देगी और इन्सान अपनी-अपनी अक्ल के मुताबिक भटकते रहेंगे।

 

ऊपर इक़बाल का जिक्र किया है तो ग़ालिब का भी तज़किरा कर दूँ …

इमां मुझे रोके है … जो खीचे है मुझे कुफ्र ….

इरफ़ान भाई, इमां और कुफ्र दोनों का, अपनी ज़िन्दगी का थोडा सा वक्त देकर, जितना हो सके इल्म हांसिल कर लीजिये.

इसीलिए आपसे गुज़ारिश है की आप इन तथ्यों पर गौर करते हुए, क़ुरबानी पर गहराई से चिंतन करें, और सही फैसला कर एक नया बयान मिडिया और शोशल मिडिया पर जारी करें जिससे लोगों के दिलों की बदगुमानी (भ्रांती) दूर हो सके।

ताज मोहम्मद शेख

taj_ms2003@yahoo.co.in

(यह लेखक के अपने निजी विचार हैं)

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Irrfan Khan open letter इरफ़ान खान के नाम खुला ख़त !!!

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