Khiza Shayari in Hindi खिजां और पतझड़ पर कुछ शायरी - Net In Hindi.com

Khiza Shayari in Hindi खिजां और पतझड़ पर कुछ शायरी

Khiza Shayari in Hindi खिजां और पतझड़ पर कुछ शायरी

Khiza Shayari in Hindi खिजां और पतझड़ पर कुछ शायरी

Khiza Shayari in Hindi

खिजां और पतझड़ पर कुछ शायरी

 

दोस्तों चमन में हमेशा बहार का मोसम नहीं रहता, बहार के बाद खिजां और पतझड़ का मोसम भी आता है, पेश है खिजां के मोसम और पर कुछ शायरी.

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फिर देख उसका रंग निखरता है किस तरह,

दोशीजए- खिजां को खिताब-ए-बहार दे !! -अदम

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मंज़िल तो सबकी एक ही है, रास्ते हैं जुदा,

कोई पतझड़ से गुजरा, कोई सहरा से गया।

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उल्फ़त के मारों से ना पूछों आलम इंतज़ार का

पतझड़ सी है ज़िन्दगी, ख्याल है बहार का।

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खिजां के लूट से बर्बादिए-चमन तो हुई

यकीन आमदे-फस्ले-बहार कम न हुआ – मजाज

**** Khiza Shayari in Hindi

 

ये खिजां की ज़र्द सी शाल में जी उदास पेड़ के पास है

ये तुम्हारे घर की बहार है इसे आंसुओ से हरा करो

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पलकों से आँसुओं की क़तारों को पोंछ लो

पतझड़ की बात ठीक नहीं है बहार में.!!

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फूल खिलते हैं, लोग मिलते हैं मगर,

पतझड़ में जो फूल मुरझा जाते हैं,

वो बहारों के आने से खिलते नहीं.

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पतझड़ के मौसम में दिल को सुकून बहुत मिलता है…

शाख से टूटे हर पत्ते में चेहरा अपना जो दिखता है.

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अरसे बाद खिजां पलटी नज़र आई बहार

बरसों बीते तन्हाईओं के बाद आई खुमार

*** Khiza Shayari in Hindi

“सुनायेगी ये दास्तां शमा मेरे मजार की

खिजां में भी खिली रही ये कली अनार की

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खिजां अब आयेगी तो आयेगी ढलकर बहारों में,

कुछ इस अन्दाज से नज्मे-गुलिस्तां कर रहा हूँ मैं।

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फिर इसके बाद नज़रे नज़र को तरसेंगे

वो जा रहा है खिजां के गुलाब दे जाओ

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फूल चुन लिए उसने सारे मेरे शाख़े-गुल से

खिजां थी हिस्से मेरे, जो बागबां में ही रह गई

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खिजां में है कोई तीरगी, न बहार में कोई रोशनी,

ये नजर-नजर के चराग है, कहीं जल गये, कहीं बुझ गये।

*** Khiza Shayari in Hindi

अब रंजिशो-खुशी से बहारो-खिजां से क्या

महवे-खयाले-यार हैं हमको जहाँ से क्या ~मजरूह सुल्तानपुरी

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सुकूत-ऐ-शाम-ऐ-खिजां में हुस्न की एक अंगड़ाई \

इधर सूखे दरख्तो पर हरे पत्ते निकल आए..

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होता नहीं है कोई बुरे वक्त में शरीक,

पत्ते भी भागते हैं खिजां में शजर से दूर। #असीर

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जुबां पे दर्द भरी दास्तान चली आई

बहार आने से पहले खिजां चली आई

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उम्मीदों के फूल गुलशन में कबके मुरझा चुके

जो बचा है खिजां में वो कांटों का तमाशा है

खिजां के लूट से बर्बादिए-चमन तो हुई

यकीन आमदे-फस्ले-बहार कम न हुआ – मजाज

***

क्या खबर थी खिजां होगी मुक्कदर अपना,

मैंने तो माहौल बनाया था बहारों के लिए!

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तेरी जुल्फ में लगा सकूं, वो कली न मैं खिला सकूं

बेबस खिजां में बैठा हूं, वो बहार भी न मैं ला सकूं

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असीरान-ए-कफस को वास्ता क्या इन झमेलों से,

चमन में कब खिजां आई, चमन में कब बहार आई

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गुल खिलेंगे फिर कैसे दिल में आरजुओं के,

दोस्ती खिजां से जब करता गुलसितां अपना।

** Khiza Shayari in Hindi

खिजां पुरानी पड़ी, कूच कर गया सैयाद,

नई बहारें नए बागवां की बात करो।

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जहाँ बस्ती थी खुशियाँ, आज हैं मातम वहाँ

वक़्त लाया था बहारें वक़्त लाया है खिजां

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मुमकिन है कि तू जिसको समझता है बहारां ,

औरों की निगाहों में वो मौसम हो खिजां का …

*** Khiza Shayari in Hindi

तड़प रहे हैं हम यहाँ, तुम्हारे इंतज़ार में

खिजां का रंग, आ-चला है, मौसम-ए-बहार में

***

जिसकी कफस में आंख खुली हो मेरी तरह,

उसके लिए चमन की खिजां क्या बहार क्या?

*** Khiza Shayari in Hindi

मिला जो पयार तो हम पयार के क़ाबिल न रहे

खिजां के फूल बहार के क़ाबिल न रहे।

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यही तंग हाल जो सबका है यह करिश्मा कुदरते रब का है

जो बहार थी सो खिजां हुई जो खिजां थी अब वह बहार है।”-जोश मलीहाबादी

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क्या हुआ जो खिजां के फूल सा मुरझा गए,

बनके “खुशबू ए जिंदगी” महकते रहेंगे हम ।

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खिले गुलशन-ए-वफा में गुल-ए-नामुराद ऐसे

ना बहार ही ने पूछा ना खिजां के काम आए

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गमों की फसल हमेशा तर-ओ-ताजा रही ,

ये वो खिजां है जो शर्मिन्दा-ए-बहार नहीं ……..

*** Khiza Shayari in Hindi

कांटो ने बहुत याद किया उन को खिजां में ,

जो गुल कभी जिंदा थे बहारों के सहारे ……

***

फूलों की बस्ती में आखिर कांटों का क्या काम था

ऐ खुदा तेरे गुलशन में आ जाती क्यूं खिजां है…

***

खिजां में पेड़ से टूटे हुए पत्ते बताते हैं…

बिछड़ कर अपनों से मिलती है बस दर-दर की दुत्कारी…

*** Khiza Shayari in Hindi

वह संभलेंगे गेसू जो बलखा गए हैं,

बहार आ रही है, खिजां के सहारे।

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खिजां के बाद गुलशन में बहार आई तो है लेकिन,

उड़ा जाता है क्यों अहल-ए-चमन का रंग क्या कहिए।

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