Shab Shayari शब और रात पर शायरी - Net In Hindi.com

Shab Shayari शब और रात पर शायरी

Shab Shayari

Shab Shayari शब और रात पर शायरी

Shab Shayari

शब और रात पर शायरी

Shab means night, we are presenting in this blog post some sher based on shab, shab e firaq, shab e wasl, shab e tanhai, for our readers.

शब यानि रात, तन्हाई की रात, शब ए फिराक़, शब ए वस्ल, शब ए इंतज़ार के कुछ चुनिन्दा शेर हम इस ब्लॉग पोस्ट में प्रकाशित कर रहें हैं.

सभी हिंदी शायरी की लिस्ट यहाँ हैं। Hindi Shayari

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कहूँ किससे मैं कि क्या है शब-ए-ग़म बुरी बला है

मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता।~ग़ालिब

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तेरा पहलू तेरे दिल की तरह आबाद रहे,

तुझ पे गुज़रे न क़यामत शब-ए-तन्हाई की।

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सफ़र तमाम करो अब कि सहर होती है

चराग़ ए आख़िर ए शब तुझको किसके नाम करूँ

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जल उठीं दर्द की शम्में बुझ गया दिल का चाँद

शब ए फ़िराक़ की अब नज़्र सब कलाम करूँ

*** Shab Shayari

कितनी मुश्किल से मैंने ख़ुद को सुलाया कल शब,

अपनी आँखों को तेरे ख़्वाब का लालच दे कर

***

जागती आँखों से भी देखो दुनिया को

ख़्वाबों का क्या है वो हर शब आते हैं

***

शब-ऐ-फुरकत का जागा हूं, ऐ फरिश्तों अब तो सोने दो

कभी होगी फुरसत तो कर लेना, हिसाब आहिस्ता आहिस्ता.

 

***

कब से हूँ क्या बताऊँ जहान-ए-ख़राब में

शब हाय हिज्र को भी रखूं गर हिसाब में ~ग़ालिब

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ग़ालिब छुटी शराब पर अब भी कभी कभी

पीता हूँ रोज़-ए-अब्र-ओ-शब-ए-माहताब में

~ग़ालिब

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दाग़-ए-फ़िराक़-ए-सोहबत-ए-शब की जली हुई

इक शम्मा रह गई है सो वो भी ख़मोश है

~ग़ालिब

*** Shab Shayari

जुल्मतकदे में मेरे शब-ऐ-ग़म का जोश है,

इक शम्मा है दलील-ए-सहर सो खामोश है.. ~ग़ालिब

***

सियाही जैसे गिर जावे दम-ए-तहरीर काग़ज़ पर

मिरी क़िस्मत में यूँ तस्वीर है शब-हा-ए-हिज्राँ की

***

तुम्हारे ख़ाब से हर शब लिपट के सोते हैं

सज़ाएं भेज दो, हमने ख़ताएँ भेजी हैं #Gulzar

***

तमाम शब जहाँ जलता है इक उदास दिया

हवा की राह में इक ऐसा घर भी आता है

***

गुलसिताँ का ज़र्रा ज़र्रा जाग उठे अंदलीब लुत्फ़ है

इस वक़्त तेरे नाला-ए-शब-गीर का ~हेंसन_रेहानी

*** Shab Shayari

इक तो शब-ए-फ़िराक़ के सदमे हैं जाँ-गुदाज़

अंधेर इस पे ये है कि होती सहर नहीं ~हैरत_इलाहाबादी

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ये दिल में था कि आज शब बिताएँ अपने साथ हम

निकल-निकल के आ गई इबारतें किताब से … ~निश्तर_ख़ानक़ाही

***

हमें ख़बर है के हम हैं चराग़-ए-आख़िर-ए-शब

हमारे बाद अँधेरा नहीं उजाला है ~ज़हीर_कश्मीरी

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मुझसे ही दिलबरी तुम करो मुझसे ही राब्ता रहे

मुझसे ही तेरी सहर हो मुझसे ही शब ढलने लगे

*** Shab Shayari

मैंने कल शब चाहतों कि सब क़िताबें फ़ाड़ दीं

सिर्फ इक कागज़ पे लिक्खा लफ़्ज़-‘माँ’ रहने दिया..

***

शब-ए-फुर्कत इन्हें देखे से अपना जी बहलता है,

झलक है जल्वा-ए-यार की कुछ कुछ सितारों में

***

तुम आ सको तो शब को बढ़ा दो कुछ और भी,

अपने कहे में सुब्ह का तारा है इन दिनों!

*** Shab Shayari

याद का फिर कोई दरवाज़ा खुला आख़िरे-शब

दिल में बिख़री कोई ख़ुशबू-ए-क़बा आख़िरे-शब

***

कुछ बे-अदबी और शब-ए-वस्ल नहीं की

हाँ यार के रुख़्सार पे रुख़्सार तो रक्खा

***

तुम चले जाना शब-ए-वस्ल को ढल जाने दो

अपने तालिब की तबीयत तो बहल जाने दो

***

तेरी उम्मीद तेरा इंतज़ार जब से है

शब को दिन से शिकायत न दिन को शब से है

*** Shab Shayari

दिन गुज़ारा था बड़ी मुश्किल से

फिर तेरा वादा-ए-शब याद आया

***

 

तफ़्सील-ए-इनायात तो अब याद नहीं है

पर पहली मुलाक़ात की शब याद है मुझ को

***

मेरी शब-ए-तारीक का चेहरा हुआ रौशन

सूरज सा कोई शाम को महताब में डूबा

***

टूटी जो आस जल गये पलकों पे सौ चिराग़,

निखरा कुछ और रंग शब-ए-इंतज़ार का !!- मुमताज़ मिर्ज़ा

*** Shab Shayari

मैं तमाम दिन का थका हुआ, तू तमाम शब का जगा हुआ

ज़रा ठहर जा इसी मोड़ पर, तेरे साथ शाम गुज़ार लूँ -Bashir badr

***

पलकों ने इतनी एड़ीयां रगड़ी शब-ए-फ़िराक़

ज़म ज़म तुम्हारी याद का जारी है आज भी

***

सितारों से उलझता जा रहा हूँ

शब-ए-फ़ुरक़त बहुत घबरा रहा हूँ

तेरे ग़म को भी कुछ बहला रहा हूँ

जहाँ को भी समझा रहा हूँ

*** Shab Shayari

तुम आये हो न शब ए इंतज़ार गुज़री है

तलाश में है सहर, बार बार गुज़री है

***

ज़िक्र-ए-शब-ए-विसाल हो क्या क़िस्सा मुख़्तसर

जिस बात से वो डरते थे वो बात हो गई !!

***

सामने उम्र पड़ी है शब-ए-तन्हाई की

वो मुझे छोड़ गया शाम से पहले पहले

***

जुस्तुजू खोए हुओं की उम्र-भर करते रहे ~

चाँद के हमराह हम हर शब सफ़र करते रहे!

***

शब-ए-तन्हाई-ए-फ़ुर्क़त में दिल से,

कुछ उस की गुफ़्तुगू है और मैं हूँ !!

*** Shab Shayari

उस शब का नुज़ूल हो रहा है जिस शब की सहर न मिल सकेगी

पूछोगे हर इक से हम कहाँ हैं और अपनी ख़बर न मिल सकेगी

***

शिकवा-ए-जुल्मते-शब से तो कहीं बेहतर था।।

अपने हिस्से की कोई शमअ जलाते जाते।।

***

किस नाज़ से कहते हैं वो झुंझला के शब-ए-वस्ल,

तुम तो हमें करवट भी बदलने नहीं देते…

***

इस शहर-ए-बे-चराग़ में जाएगी तू कहाँ,

आ ऐ शब-ए-फ़िराक़ तुझे घर ही ले चलें!

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तुम भी हर शब दिया जला कर पलकों की दहलीज़ पर रखना

मैं भी रोज़ इक ख़्वाब तुम्हारे शहर की जानिब भेजूँगा

***

मिटा सकी न उन्हें रोज़ ओ शब की बारिश भी

दिलों पे नक़्श जो रंग-ए-हिना के रक्खे थे

*** Shab Shayari

लम्बी है बहुत आज की शब जागने वालो

और याद मुझे कोई कहानी भी नहीं है

***

शब-ए-इन्तज़ार की कशमकश न पूछ कैसे सहर हुई

कभी इक चिराग़ जला दिया कभी इक चिराग़ बुझा दिया.

***

है निस्फ-ए-शब वो दीवाना अभी तक घर नहीं आया

किसी से चाँदनी रातों का किस्सा छिड़ गया होगा

***

वादे की रात वो आए ही नहीं

उस शब की अब तक सुबह न हुई

***

ये एक शब की मुलाक़ात भी ग़नीमत है।।

किसे है कल की ख़बर थोड़ी दूर साथ चलो।। ~फ़राज़

*** Shab Shayari

दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के

वो जा रहा है कोई शब ए ग़म गुज़ार के ~Faiz

***

न पूछो कि किस तरह ये शब गुज़ारी है

ग़म-ए-हिज्र से बेहाल होकर ज़िंदगी हारी है,

ताउम्र भटकता रहा है तन्हा अक्स मेरा ऐसे

अब तो बस आईने में नुमाया शख़्स से ही यारी है !…

*** Shab Shayari

 

ये नही इल्म के किस तरह करूंगा…

लेकिन बात ये तय है के इस शब को सहर करना है…

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