Zamane par Shayari ज़माने पर शायरी

Zamane par Shayari ज़माने पर शायरी

Zamane par Shayari ज़माने पर शायरी

Zamane par Shayari

ज़माने पर शायरी

दोस्तों ज़माने लफ्ज़ पर शेर ओ शायरी का एक विशाल संकलन हम इस पेज पर प्रकाशित कर रहे है, उम्मीद है यह आपको पसंद आएगा और आप विभिन्न शायरों के ज़माने के बारे में ज़ज्बात जान सकेंगे.

अगर आप दुनिया लफ्ज़ पर शायरी पढना चाहते हें तो ये पेज देखे Duniya Shayari

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हमीं पे ख़त्म हैं जौर-ओ-सितम ज़माने के

हमारे बाद उसे किस की आरज़ू होगी

~फ़सीह अकमल

 

वो अदा-ए-दिलबरी हो कि नवा-ए-आशिक़ाना

जो दिलों को फ़तह कर ले वही फ़ातेह-ए-ज़माना

 

मिटा कर हस्ती-ए-नाकाम को राह-ए-मोहब्बत में

ज़माने के लिए इक दरस-ए-इबरत ले के आया हूँ

~नसीम शाहजहाँपुरी

 

ज़माना अहल-ए-ख़िरद से तो हो चुका मायूस,

अजब नहीं कोई दीवाना काम कर जाए !!

 

क्या ख़बर है उनको के दामन भी भड़क उठते हैं

जो ज़माने की हवाओं से बचाते हैं चिराग़

~Faraz

 

नज़र में शोखि़याँ लब पर मुहब्बत का तराना है

मेरी उम्मीद की जद में अभी सारा जमाना है

 

‘मीर’ ओ ‘गालिब’ के ज़माने से नए दौर तलक

शाएर-ए-हिंद गिरफ़्तार-ए-बला आज भी है

~बाक़र मेंहदी

 

Zamane par Shayari

ज़माना कुफ़्र-ए-मोहब्बत से कर चुका था गुरेज़,

तेरी नज़र ने पलट दी हवा ज़माने की !!

 

वो अहद कि दिल खंज़र की नोक पर रखते थे,

ऐ काश ये हो उन्हीं ज़ुर्रतों का ज़माना आए !! ~आतिशमिज़ाज

 

ये अपनी कहानी ज़माने में ‘हसरत’

सभी को पता है, सभी को ख़बर है

 

चलो कि हम भी ज़माने के साथ चलते हैं

नहीं बदलता ज़माना तो हम बदलते हैं

~सदा अम्बालवी

 

दबा के चल दिए सब क़ब्र में, दुआ न सलाम,

ज़रा सी देर में क्या हो गया ज़माने को

 

मेरी आवारगी भी एक करिश्मा है ज़माने में

हर एक दरवेश ने मुझको दुआ-ए-खैर ही दी है

 

रुके तो गर्दिशें उसका तवाफ़ करती हैं

चले तो उसको ज़माने ठहर के देखते हैं

 

कौन है अपना कौन पराया क्या सोचें

छोड़ ज़माना तेरा भी है मेरा भी

 

Zamane par Shayari

भड़का रहे हैं आग लब-ए-नग़्मागार से हम

ख़ामोश क्या रहेंगे ज़माने के डर से हम

~साहिर

 

हमसे क़ायम है ज़माने में तमद्दुम का निज़ाम

मुर्दा तहज़ीबो के परस्तार नहीं है हम लोग

 

क्यूँकर हुआ है फ़ाश ज़माने पे क्या कहें,

वो राज़-ए-दिल जो कह न सके राज़-दाँ से हम !!

 

नहीं बिकता हूँ मैं बाज़ार की मैली नुमाइश में

ज़माने में मुझे तो बस मेरे हक़दार पढ़ते हैं

 

ज़माना एक दिन मुझको इन्हीं लफ़्ज़ों में ढूँढेगा

वो हर एहसास जो लफ़्ज़ों में ढाला छोड़ जाऊँगा

 

रूठा हुआ है मुझसे इस बात पर ज़माना

शामिल नहीं है मेरी फ़ितरत में सर झुकाना

 

Zamane par Shayari

लगाई है जो ये सीने में आग तुमने मेरे,

अब वही आग ज़माने को लगा दूँ क्या मैं

 

नहीं इताब-ए-ज़माना ख़िताब के क़ाबिल,

तेरा जवाब यही है कि मुस्कुराए जा !!

 

बरसात की भीगी रातों में फिर कोई सुहानी याद आई

कुछ अपना ज़माना याद आया कुछ उनकी जवानी याद आई

 

किस-किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम,

तू मुझ से खफा है तो ज़माने के लिए आ !!

 

Zamane par Shayari

हमने छोड़ा था ज़माना जिन्हें पाने के लिए,

लो वही छोड़ चले हमको ज़माने के लिए !!

 

उन से एक पल में कैसे बिछड़ जाए हम

जिनसे मिलने मैं शायद ज़माने लगे….

 

मेरा कमाल-ए-शेर बस इतना है ऐ ‘जिगर’,

वो मुझ पे छा गए मैं ज़माने पे छा गया !!

 

ज़माना याद करे या सबा करे ख़ामोश,

हम इक चराग़-ए-मोहब्बत जलाए जाते हैं !!

 

हमको न मिल सका तो फ़क़त इक सुकून-ए-दिल

ऐ ज़िंदगी वगरना ज़माने में क्या न था

 

Zamane par Shayari

वो इक झलक दिखा के जिधर से निकल गया

इतनी तपिश बढ़ी कि ज़माना पिघल गया !!

 

चुपके-चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है

हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है !!

 

यूँ ही नहीं मशहूर-ए-ज़माना मेरा क़ातिल,

उस शख़्स को इस फ़न में महारत भी बहुत थी !!

 

तुम फिर उसी अदा से अंगड़ाई लेके हँस दो

आ जाएगा पलट कर गुज़रा हुआ ज़माना -शकीलबदायुनी

 

अपना ज़माना आप बनाते हैं अहले-दिल,

हम वे नहीं कि जिसको ज़माना बना गया !! -ज़िगर

 

Zamane par Shayari

रुके तो गर्दिशे उसका तवाफ़ करती हैं,

चले तो उसको ज़माने ठहर के देखते हैं !!

 

देख कर दिल-कशी ज़माने की,

आरज़ू है फ़रेब खाने की !!

 

मोहब्बत मे ऐसे कदम डगमगाए,

ज़माना यह समझा के हम पी के आए !! -हसरत जयपुरी

 

Zamane par Shayari

बहकना मेरी फ़ितरत में नहीं पर

सँभलने में परेशानी बहुत है

~मुज़फ़्फ़र_अबदाली

 

क्या हुस्न ने समझा है क्या इश्क ने जाना है,

हम खाक नशीनो की ठोकर में ज़माना है!! –

 

Zamane par Shayari

ज़माना ये आ गया है ~रहबर कि एह्ले बीनिश को कौन पूछे,

जमें हैं मक्कार कुर्सी पर, दिखा रहे हैं गवार आँखें !!

 

पहले तराशा उस ने मेरा वजूद शीशे से ‘फ़राज़’,

फिर ज़माने भर के हाथों में पत्थर थमा दिए !!

 

मासूम मोहब्बत का बस इतना फसाना है,

कगाज़ की हवेली है बारिश का ज़माना है !!

 

ग़म-ए-ज़माना ने मजबूर कर दिया वर्ना,

ये आरज़ू थी कि बस तेरी आरज़ू करते !!

 

परवाह नहीं चाहे जमाना कितना भी खिलाफ हो,

चलूँगा उसी राह पर जो सीधी और साफ हो !!

 

Zamane par Shayari

कहते हैं कि उम्मीद पे जीता है ज़माना

वो क्या करे जिसे कोई उम्मीद ही नहीं ..

 

“सच को मैंने सच कहा, जब कह दिया तो कह दिया,

अब ज़माने की नज़र में ये हिमाकत है तो है !!”

 

बस एक ख़ुद से ही अपनी नहीं बनी वरना

ज़माने भर से हमेशा बना के रखतें हैं.!!

 

चालाकियां ज़माने की देखा किये ..सहा किये,

उम्र भर लेकिन वही सादा-दिल इंसान से रहे.!!

 

मैने देखा है ज़माने को शराबें पी कर

दम निकल जाये अगर होश में आकर देखूँ.!!

 

बे-वफ़ाई का ज़माना है मगर आप ‘हफीज़’

नग़मा-ए-मेहर-ए-वफा सब को सुनाते रहिये.!!

 

Zamane par Shayari

दिल की आवाज़ से आवाज़ मिलाते रहिये

जागते रहिये ज़माने को जगाते रहिए.!!

 

 

मेरे कहकहों के ज़द पर कभी गर्दिशें जहाँ की

मेरे आँसूओं की रौ में कभी तल्ख़ी-ए-ज़माना

~मुइन अहसन

 

पहले तो ज़माने में कहीं खो दिया ख़ुद को

आईने में अब अपना पता ढूँढ रहे हैं.!!

~राजेश रेड्डी

मैं अपना रक़्स-ए-जाम तुझे भी दिखाऊँगा

ऐ गर्दिश-ए-ज़माना मेरे दिन अगर फिरे

~फ़ना निज़ामी

 

ज़माना चाहता है क्यों,मेरी फ़ितरत बदल देना

इसे क्यों ज़िद है आख़िर,फूल को पत्थर बनाने की.!!

 

Zamane par Shayari

हर आँख हाँ यूँ तो बहुत रोती है

हर बूँद मगर अश्क़ नहीं होती है,

पर देख के रो दे जो ज़माने का ग़म

उस आँख से आँसू जो गिरे मोती है.!!

 

बिखरे तो फिर ज़माने की ठोकर में आ गए

और मुत्तहिद हुए तो ज़माने पे छा गए.!!

अगर है झूट पे क़ायम निज़ाम दुनिया का

तो फिर जिधर है ज़माना उधर न जाऊँ मैं.!!

 

वो शख्स एक हि लम्हे में टूट-फूट गया

जिसे तराश रहा था मैं एक ज़माने से..!!

~इक़बाल अशहर

 

फिर से मौसम बहारों का आने को है

फिर से रंगी ज़माना बदल जाएगा

अब के बज़्मे चरागाँ सजा लेंगे हम

ये भी अरमान दिल का निकल जाएगा

 

शायरी में मीरो-ग़ालिब के ज़माने अब कहाँ।।

शोहरतें जब इतनी सस्ती हो अदब देखेगा कौन..!!

 

थोड़ा हट के चलता हूँ ज़माने की रिवायत से।।

कि जिनपे मैं बोझ डालूँ वो कंधा याद रखता हूँ..!!

 

क्या खाक़ तरक्की की है ज़माने ने

मर्ज़े-इश्क़ तो अब भी ला-इलाज है

 

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1 Response

  1. सलीमसोलंकी says:

    बे ईन्तहा,बहुत खूब

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