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Islamic – पृष्ठ 11 – Net In Hindi.com

तवक्कुल क्या हौता है, अल्लाह पर तवक्कुल की हकीकत

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है : ” उस की कुरसी आस्मानों और जमीन को इहाता किये हुवे है”।

कुरसी से मुराद इल्मे इलाही है या मुल्के खुदावन्दी या फिर मशहूर आसमान का नाम है। हजरते अली रज़ीअल्लाहो अन्हो  से मरवी है कि कुरसी एक मोती है जिस की लम्बाई अल्लाह तआला के सिवा कोई नहीं जानता, हदीस में है कि सातों आसमान और ज़मीन कुरसी के सामने ऐसे हैं जैसे वसीअ सहरा में एक हल्का (गोला)  पड़ा हो । मजीद फ़रमाया कि आसमान कुरसी में हैं और कुरसी अर्श इलाही के सामने है।

हज़रते इकरमा रज़ीअल्लाहो अन्हो  से मरवी है, सूरज कुरसी के नूर का सत्तरवां हिस्सा है और अर्शे इलाही हिजाबाते इलाही के नूर का सत्तरवां हिस्सा है।

मरवी है कि अर्श और कुरसी के उठाने वाले फरिश्तों के बीच सत्तर हज़ार नूर के और सत्तर हज़ार जुल्मत के पर्दे हाइल हैं, हर पर्दा पांच सो साल का सफ़र है, अगर यह पर्दे न होते तो हामिलीने कुरसी हामिलीने अर्श के नूर से जल जाते ।

अर्श एक नूरानी शै है जो कुरसी से ऊपर है और एक अलाहिदा वुजूद रखता है मगर इस कौल से हज़रते हसन बसरी रज़ीअल्लाहो अन्हो  को इख़्तिलाफ़ है।

अर्श इलाही की बनावट

अर्शे इलाही की बनावट के मुतअल्लिक मुख्तलिफ़ रिवायतें हैं बा’ज़ कहते हैं : सुर्ख याकूत का है या सब्ज़ मोती का है बा’ज़ की राय है कि सफेद मोती से बनाया गया है, अल्लाह तआला ही इस की हक़ीक़त को बेहतर जानता है।

फ़लकियात के माहिरीन इसे नवां आसमान, फलके आ’ला, फ़लकुल अफ़लाक और फ़लके अतुलस कहते हैं । इस में कोई सितारा वगैरा नहीं है, क़दीम हैअत दानों के बक़ौल तमाम सितारे आठवें आस्मान में हैं जिस को वोह फ़लकुल बुरूज और अहले शरअ कुरसी कहते हैं।

अशें इलाही मख्लूकात की छत है, कोई चीज़ उस के दाइरे से बाहर नहीं निकल सकती, वह बन्दों के इल्मो इदराक और मतलूब की इन्तिहा है, अल्लाह तआला ने उसे “अज़ीम” करार दिया है चुनान्चे, फ़रमाने इलाही है

“पस अगर वोह फिर जाएं तो कहिये कि मुझे अल्लाह काफ़ी है उस के सिवा कोई मा’बूद नहीं उसी पर मेरा भरोसा है और वोह अर्श अज़ीम का मालिक है”।

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का नामे नामी तौरैत में मुतवक्किल था और क्यूं न होता, आप से बढ़ कर मा’रिफ़ते खुदावन्दी का शनासा और कौन है ? आप मुवहिहदीन के सरदार और

आरिफ़ीने कामिलीन के रहनुमा हैं, तवक्कुल की हकीक़त आप पर रोजे रोशन की तरह ज़ाहिर थी।

तवक्कुल की हकीकत

तवक्कुल का मतलब यह नहीं है कि असबाब से क़तए नज़र कर लिया जाए जैसा कि कुछ लोगों का ख़याल है बल्कि तवक्कुल अस्बाब के साथ साथ होता है, हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम  से एक बदवी ने पूछा : मैं ऊंट का पैर बांध कर, या खुला छोड़ कर तवक्कुल करूं ? आप ने । फ़रमाया : ऊंट का पाउं बांध दे और तवक्कुल कर अल्लाह पर ।

फ़रमाने नबवी है कि “अगर तुम, अल्लाह पर तवक्कुल करने की हक़ीक़त को पा लेते तो अल्लाह तआला तुम्हें परन्दों की तरह रिज्क देता जो सुब्ह भूके उठते हैं और शाम को पेट भरे होते हैं”

 

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हज़रते इब्राहीम बिन अदहम और हजरते शक़ीक़ बल्खी के दरमियान सवालो जवाब

हज़रते इब्राहीम बिन अदहम और हज़रते शकीक़ बल्खी रहमतुल्लाह अलैह  की मक्कए मुअज्जमा में मुलाकात हुई, इब्राहीम ने पूछा : ऐ शक़ीक़ बल्खी ! तुम ने यह बुलन्द मर्तबा कैसे पाया ? हज़रते शक़ीक़ ने जवाब दिया कि एक मरतबा मेरा एक बयाबान से गुज़र हुवा, वहां मैं ने एक ऐसा परिंदा पड़ा देखा जिस के दोनों बाजू टूट गए थे। मेरे दिल में येह वस्वसा पैदा हुवा कि देखू तो सही इसे कैसे रिज्क मिलता है, मैं वहां बैठ गया, कुछ देर बाद एक परिंदा आया जिस की चोंच में एक टिड्डी थी और उस ने वो परन्दे के मुंह में डाल दी । मैं ने दिल में सोचा कि वो राज़िके काइनात एक परिंदे के जरीए दूसरे परिंदे का रिज्क पहुंचा देता है, मेरा रिज्क भी मुझे हर हालत में पहुंचा सकता है लिहाज़ा मैं ने सब कारोबार छोड़ दिये और इबादत में मसरूफ़ हो गया।

हज़रते इब्राहीम बिन अदहम रहमतुल्लाह अलैह  ने कहा : ऐ शक़ीक़ ! तुम ने मजबूर व मा’जूर परन्दा बनना पसन्द किया और तन्दुरुस्त परन्दा बनना पसन्द न किया कि तुम को मकामे बुलन्द नसीब होता, क्या तुम ने यह फ़रमाने नबवी नहीं सुना कि ऊपर वाला हाथ नीचे वाले हाथ से बेहतर है, मोमिन तो हमेशा बुलन्दिये दरजात की तमन्ना करता है ताकि वोह अबरार की सफ़ में जगह पाता है।

हज़रते शक़ीक़ रहमतुल्लाह अलैह  ने येह सुनते ही हज़रते इब्राहीम रहमतुल्लाह अलैह  के हाथों को चूमा और कहा : बेशक आप मेरे उस्ताद हैं।

तवक्कुले हकीकी क्या है?

जब इन्सान रिज्क के हुसूल के अस्बाब मुहय्या कर ले तो अस्बाब की बजाए अपना नसबुल ऐन उस खालिके काइनात को बनाए जो हक़ीक़त में रोजी रसां है, साइल जो कश्कोल ले कर गदागरी करता रहता है वह कश्कोल को नहीं बल्कि हमेशा देने वाले सखी की तरफ़ मुतवज्जेह रहता है।

फरमाने नबवी है : “जो शख्स अपने आप को सब से ज़ियादा गनी बनाना चाहता है वोह अपने माल से ज़ियादा इन्आमे खुदावन्दी पर नज़र रखे।”

तवक्कुले हकीकी की एक मिसाल

हज़रते हुजैफ़ा मरअशी रहमतुल्लाह अलैह  ने कई साल तक हज़रते इब्राहीम बिन अदहम रहमतुल्लाह अलैह  की खिदमत की थी। एक मरतबा लोगों ने इन से पूछा कि तुम हज़रते इब्राहीम रहमतुल्लाह अलैह  की सोहबत का कोई अजीब वाक़िआ सुनाओ ! इन्हों ने कहा कि एक बार हम मक्का ए  मुअज्जमा की तरफ जा रहे थे, रास्ते में हमारा ज़ादेराह ख़त्म हो गया हम कूफ़ा की एक वीरान मस्जिद में ठहर गए, हज़रते इब्राहीम ने मुझे देख कर फ़रमाया : तुम भूक से निढाल नज़र आते हो, मैं ने कहा : हां, मुझे शिद्दत की भूख लग रही है। आप ने मुझ से कलम दवात मंगवाई और काग़ज़ पर बिस्मिल्लाह  के बाद लिखा “हर हालत में ऐ रब्बे जुल जलाल तू ही हमारा मक्सूद और हर काम में तू ही मल्जा है, फिर येह अश्आर लिखे :

मैं तेरी हम्द करने वाला, शुक्र करने वाला और ज़िक्र करने वाला हूं, मैं भूका, खस्ताहाल और बरह्ना हूं। ऐ अल्लाह ! तीन बातों का मैं ज़ामिन हूं और बकिय्या तीन की जमानत तू कबूल फ़रमा ले। तेरे सिवा किसी और की सना मेरे लिये आग से कम नहीं है, अपने बन्दे को उस आग से बचा ले।

और मुझ से फ़रमाया : दिल में किसी गैर का खयाल न लाना, जो आदमी तुम्हें सब से पहले नज़र आए यह रुक्आ दे देना । सब से पहला शख्स जो मुझे मिला वह एक खच्चर सवार था, मैं ने वह रुक्आ उस को दे दिया, उस ने पढ़ा और रोने लगा, फिर पूछा : इस रुक्ए का कातिब कहां है ? मैं ने कहा : फुलां वीरान मस्जिद में बैठा है। यह सुनते ही उस ने मुझे एक थैली दी जिस में छे सो दीनार थे, बाद में मुझे एक और शख्स मिला, मैं ने उस से खच्चर सुवार के बारे में पूछा : तो उस ने कहा कि वह नसरानी था, मैं ने वापस आ कर हज़रते इब्राहीम बिन अदहम रहमतुल्लाह अलैह  को सारा वाकिआ सुनाया। आप ने फ़रमाया : ज़रा ठहरो वो अभी आ जाएगा। कुछ देर के बाद वह नसरानी आ गया और हज़रते इब्राहीम के सर को चूमने लगा और मुसलमान हो गया।

ला हौला वाला कुव्वत इल्ला बिल्लाह  की एक कुव्वत

हज़रते इब्ने अब्बास रज़ीअल्लाहो अन्हो  से मरवी है कि अल्लाह तआला ने हामिलीने अर्श (फ़िरिश्तों) को पैदा फ़रमाया और उन्हें अर्श को उठाने का हुक्म दिया मगर वो न उठा सके, अल्लाह तआला ने हर फरिश्ते के साथ सात आस्मानों के फरिश्तों के बराबर फरिश्ते पैदा किये, फिर उन्हें अर्श उठाने का हुक्म दिया मगर वो न उठा सके, फिर अल्लाह तआला ने हर फ़रिश्ते के  साथ सातों आस्मानों और ज़मीनों के फरिश्तों के बराबर फरिश्ते पैदा फ़रमाए और उन्हें अर्श उठाने का हुक्म दिया मगर वो फिर भी न उठा सके, तब अल्लाह तआला ने फ़रमाया : तुम “ला हौला वाला कुव्वत इल्ला बिल्लाह”  कहो, जब उन्हों ने ये कहा तो अर्शे इलाही को उठा लिया मगर उन के कदम सातवीं ज़मीन में हवा पर जम गए । जब उन्हों ने महसूस किया कि हमारे कदम हवा पर हैं और नीचे कोई ठोस चीज़ मौजूद नहीं है तो उन्हों ने अर्शे इलाही को मजबूती से थाम लिया और ला हौला वाला कुव्वत इल्ला बिल्लाह  पढ़ने में महूव हो गए ताकि वो इन्तिहाई पस्तियों पर गिरने से महफूज़ रहें अब वो अर्श को उठाए हुवे हैं और अर्शे इलाही उन्हें थामे हुवे हैं बल्कि इन तमाम को कुदरते इलाही संभाले हुवे है।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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आसमानों का जिक्र और दूसरे मुबाहिस

अल्लाह ने आसमानों और कायनात को किस तरह बनाया

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 

रिवायत है कि अल्लाह तआला ने सब से पहले जोहर को पैदा किया, जब उस पर हैबत की निगाह डाली तो वो पिघल गया और खौफे खुदा से कांपने लगा जिस से वोह पानी बन गया, फिर अल्लाह तआला ने उस पर निगाहे रहमत डाली तो आधा पानी जम गया जिस से अर्श बनाया गया, अर्श कांपने लगा तो उस पर “ला इलाहा इल्लल्लाह मोहम्मदुर रसूलुल्लाह”     लिख दिया जिस से वो साकिन हो गया मगर पानी को इसी तरह छोड़ दिया गया जो कियामत तक मौजज़न रहेगा। फ़रमाने इलाही है : अल्लाह का अर्श पानी पर था।

तख्लीके कायनात – कायनात का बनाया जाना

फिर जब पानी में तलातुम खैज़ मौजें पैदा हुई जिन से तह ब तह धुवें के बादल उठे और झाग पैदा हुई और इस से ज़मीनो आसमान बनाए गए जो एक दूसरे से जुड़े हुवे थे फिर इन दोनों के दरमियान अल्लाह तआला ने हवा को पैदा किया जिस के दबाव से ज़मीनो आसमान  के तबके एक दूसरे से अलाहिदा हो गए चुनान्चे,

फ़रमाने इलाही है : “फिर आसमान  की तरफ़ कस्द फ़रमाया और वोह धुवां था”

अहले हिक्मत कहते हैं : अल्लाह तआला ने आस्मानों को धुवें से इस लिये पैदा फ़रमाया कि धुवां बाहम पैवस्त होता है और बुलन्दियों पर जा कर ठहरता है, बुख़ारात से इस लिये पैदा नहीं फ़रमाया कि वह वापस लौट जाते हैं, यह अल्लाह तआला के इल्मो हिकमत का अदना करिश्मा है, फिर इरशादे नबवी के मुताबिक़ अल्लाह तआला ने पानी की तरफ़ नज़रे रहमत की तो वह जम गया ।

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सात आसमानों के नाम और इन के रंग

ज़मीन और आसमान ए दुनिया का और हर आसमाने  दुनिया से दूसरे आसमान की दुरी और मसाफ़त पांच सो साल के सफ़र के बराबर है और इसी तरह हर आसमान का अपना अपना हज्म मोटाई है, कहते हैं कि पहला आसमान  दूध से भी ज़ियादा सफ़ेद है मगर कोहे काफ़ की सब्ज़े की वज्ह से यह हरा नज़र आता है, इस आसमान  का नाम रक़ीआ है।

दूसरे आसमान  का नाम फ़ीदूम या माऊन है और वोह ऐसे लोहे का है जिस से रोशनी की शुआएं फूटी पड़ती हैं।

तीसरे आसमान  का नाम मल्कूत या हारयून है और वोह तांबे का है। चौथे आसमान  का नाम ज़ाहिरा है और वोह आंखों में खीरगी पैदा करने वाली सफेद चांदी से बना है।

पांचवें आसमान  का नाम मजीना या मसहिरा है और वोह सुर्ख सोने का है।

छटे आसमान  का नाम ख़ालिसा है और वोह चमकदार मोतियों से बनाया गया है।

सातवें आसमान  का नाम लाबिया या दामिआ है, वोह सुर्ख याकूत का है और उसी में बैतुल मा’मूर है।

बैतुल मा’मूर के चार सुतून हैं : एक सुर्ख याकूत का, दूसरा सब्ज़ ज़बरजद का, तीसरा सफ़ेद चांदी का और चौथा सुर्ख सोने का है। बैतुल मा’मूर की इमारत सुर्ख अक़ीक़ की है हर रोज़ वहां सत्तर हज़ार फरिश्ते दाखिल होते हैं और एक मरतबा दाखिल हो जाते हैं फिर कियामत तक उन्हें दोबारा दाखिले का मौकअ नहीं मिलेगा।

कौले मो’तबर यह है कि ज़मीन आसमान  से अफ़ज़ल है क्यूंकि यह अम्बिया के पैदा होने और दफ़न की जगह   है और ज़मीन के सब तबकात में बेहतर ऊपर वाला तबक़ है जिस पर खल्के खुदा आबाद और नफ्अ अन्दोज़ होती है।

सात सितारे और हर सितारे का आसमान ।

हज़रते इब्ने अब्बास रज़ीअल्लाहो अन्हो  से मरवी है कि आसमानों में सब से ज़ियादा अफ़ज़ल कुरसी है जिस की छत अर्शे इलाही से मिली हुई है, सात सितारों के इलावा तमाम फ़ाइदा बख़्श सितारे इसी आसमान  में हैं, सात सितारों की तफ्सील येह है : ……. “ज़हल” जो शम्बा के दिन का सितारा है, सातवें आसमान  में है। …..”मुश्तरी” जो पंजशम्बा का सितारा है, छटे आसमान  में है। …….सेह शम्बा का सय्यारा “मरीख” पांचवें आसमान  में है। …….यक शम्बा का सय्यारा “शम्स” चौथे आसमान  में है। …….जुमुआ का सय्यारा “जहरा” तीसरे आसमान  में है। ……चहार शम्बा का सय्यारा “अतारद” दूसरे आसमान  में है। …….और दो शम्बा का सय्यारा “कमर” पहले आसमान  में है। नुक्ता ……

अल्लाह तआला की कुदरते कामिला ने आस्मानो ज़मीन की सन्अत में बे इन्तिहा अजाइबात वहां दीअत किये हैं हालांकि सारे आसमान  धुवें से बनाए गए हैं मगर किसी में एक दूसरे की मुशाबहत नहीं पाई जाती, आसमान  से पानी बरसाया, उस से मुख्तलिफ़ सब्ज़ियां

और फल उगाए जिन के जाइके और रंग जुदा जुदा हैं, हिक्मते इलाही के ब मूजिब वोह एक दूसरे से बढ़ चढ़ कर लज़ीज़ हैं, आदम अलिहिस्सलाम की औलाद में मुख्तलिफ़ अक्साम बनाएं, कोई सफ़ेद है कोई सियाह, कोई खुश और कोई उदास, कोई मोमिन कोई काफ़िर, कोई आलिम और कोई जाहिल है हालांकि सब आदम . की नस्ल से तअल्लुक रखते हैं।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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मौत : बुजुर्गों के कौल और हदीस शरीफ 

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 

जिक्रे मर्ग मौत का बयान

फ़रमाने नबी सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम “लज्जतों को मिटाने वाली (या‘नी मौत) को बहुत याद करो” । इस फरमान में यह इशारा है कि इन्सान मौत को याद कर के दुन्यावी लज्जतों से किनारकश हो जाए ताकि उसे बारगाहे रबूबिय्यत में मकबूलिय्यत हासिल हो।

मौत को याद करने वाला शहीदों के साथ उठाया जाएगा

फ़रमाने नबवी है : अगर तुम्हारी तरह जानवर मौत को जान लेते तो इन में कोई मोटा जानवर खाने को न मिलता।

हज़रते आइशा राज़ी अल्लाहो अन्हुमा ने पूछा : या रसूलल्लाह ! किसी का हश्र शहीदों के साथ भी होगा ? आप ने फ़रमाया : हां ! जो शख्स दिन रात में बीस मरतबा मौत को याद करता है वह शहीद के साथ उठाया जाएगा।

इस फजीलत का सबब यह है कि मौत की याद दुनिया से दिल उचाट कर देती है और आख़िरत की तय्यारी पर उक्साती है लेकिन मौत को भूल जाना इन्सान को दुन्यावी ख्वाहिशात में मुन्हमिक कर देता है।

फरमाने नबवी है कि “मौत मोमिन के लिये एक तोहफ़ा है” इस लिये कि मोमिन दुनिया में कैदखाने जैसी ज़िन्दगी बसर करता है, उसे अपनी ख्वाहिशाते नफ्सानी की और शैतान की मुदाफ़अत करना पड़ती है और यह चीज़ किसी मोमिन के लिये अज़ाब से कम नहीं मगर मौत उसे इन मसाइब से नजात दिलाती है लिहाज़ा यह उस के लिये तोहफ़ा है।

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फ़रमाने नबवी है कि “मौत मुसलमान के लिये कफ्फारा है”। मुसलमान से मुराद वह मोमिने कामिल है जिस के हाथ और ज़बान से दूसरे मुसलमान महफूज़ रहें। उस में मोमिनों के अख़्लाक़े हसना पाए जाएं और वह हर कबीरा गुनाह से बचता हो, ऐसे शख्स की मौत उस के सगीरा गुनाहों का कफ्फ़ारा हो जाती है और फ़राइज़ की अदाएगी उसे गुनाहों से मुनज्जा व पाक कर देती है।

हज़रते अता खुरासानी रज़ीअल्लाहो अन्हो  से मरवी है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम एक ऐसी मजलिस से गुज़रे जिस में लोग ज़ोर ज़ोर से हंस रहे थे। आप ने फ़रमाया : अपनी मजलिस में लज्जतों को फ़ना कर देने वाली चीज़ का ज़िक्र करो ! पूछा गया : हुजूर वह क्या है ? आप ने इरशाद फ़रमाया : “वोह मौत है।”

हज़रते अनस रज़ीअल्लाहो अन्हो  से मरवी है : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : “मौत को कसरत से याद करो, इस से गुनाह ख़त्म हो जाते हैं और दुनिया से बे रगबती बढ़ती है।”

फ़रमाने नबवी है कि मौत जुदाई डालने के लिये काफ़ी है।आप ने मजीद इरशाद फ़रमाया कि मौत सब से बड़ा नासेह है।

एक मरतबा हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम मस्जिद की तरफ़ तशरीफ़ ले जा रहे थे कि आप ने ऐसी जमाअत को देखा जो हंस हंस कर बातें कर रहे थे। आप ने फ़रमाया : मौत को याद करो ! रब्बे जुल जलाल की कसम ! जिस के कब्जए कुदरत में मेरी जान है, जो मैं जानता हूं अगर वोह तुम्हें मालूम हो जाए तो कम हंसो और ज़ियादा रोओ।

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की महफ़िल में एक मरतबा एक शख्स की बहुत तारीफ़ की गई। आप ने फ़रमाया : क्या वोह मौत को याद करता है ? अर्ज किया गया कि हम ने कहीं नहीं सुना । तब आप ने फ़रमाया कि फिर वह ऐसा नहीं है जैसा तुम ख़याल करते हो ।

मौत के बारे में बुजुर्गाने दीन के इरशादात ।

हज़रते अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो  से मरवी है कि मैं दसवां शख्स था जो (एक दिन) हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की मजलिस में हाज़िर था, एक अन्सारी जवान ने पूछा : या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ! सब से ज़ियादा बा इज्जत और होशयार कौन है ? आप ने फ़रमाया : जो मौत को बहुत याद करता है और इस के लिये ज़बरदस्त तय्यारी करता है वह होशयार है और ऐसे ही लोग दुनिया और आख़िरत में बा इज्जत होते हैं।

हज़रते हसन रहमतुल्लाह अलैह का कौल है कि मौत ने दुनिया को ज़लील कर दिया है इस में किसी अक्लमन्द के लिये मसर्रत ही नहीं है। हज़रते रबीअ बिन खैसम का कौल है कि मोमिन के लिये मौत का इन्तिज़ार सब इन्तिज़ारों से बेहतर है। मजीद फ़रमाया कि एक दाना ने अपने दोस्त को लिखा : “ऐ भाई ! उस जगह जाने से पहले जहां आरजू के बा वुजूद भी मौत नहीं आएगी (उस जगह) मौत से डर और नेक अमल कर।”

इमाम इब्ने सीरीन की महफ़िल में जब मौत का तजकिरा किया जाता तो उन का हर उज्व सुन हो जाता था। हज़रते उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रज़ीअल्लाहो अन्हो  का दस्तूर था हर रात उलमा को जम्अ करते, मौत, कियामत और आख़िरत का जिक्र करते हुवे इतना रोते कि मा’लूम होता जैसे जनाज़ा सामने रखा है।

हज़रते इब्राहीम अल तैमी रहमतुल्लाह अलैह  का कौल है कि मुझे मौत और अल्लाह के हुजूर हाज़िरी की याद ने दुन्या की लज्ज़तों से ना आशना कर दिया है। हज़रते का’ब रज़ीअल्लाहो अन्हो  का कौल है कि जिस ने मौत को पहचान लिया उस से तमाम दुन्या के दुख-दर्द ख़त्म हो गए।

हज़रते मुर्रिफ़ रहमतुल्लाह अलैह  का कौल है कि मैं ने ख़्वाब में देखा : कोई शख्स बसरा की मस्जिद के बीच में खड़ा कह रहा था कि मौत की याद ने ख़ौफ़ ख़ुदा रखने वालों के जिगर टुकड़े टुकड़े कर दिये, रब की कसम ! तुम इन्हें हर वक्त बे चैन पाओगे।

हज़रते अशअस रज़ीअल्लाहो अन्हो  से मरवी है, हम जब भी हज़रते हसन रज़ीअल्लाहो अन्हो  की ख़िदमत में हाज़िर होते, वहां जहन्नम, कियामत और मौत का ज़िक्र सुनते।

हज़रते उम्मुल मोमिनीन सफ़िय्या रज़ीअल्लाहो अन्हुमा से मरवी है कि एक औरत ने हज़रते आइशा रज़ीअल्लाहो अन्हुमा  से अपनी संगदिली की शिकायत की तो उन्हों ने कहा : मौत को याद किया करो, तुम्हारा दिल नर्म हो जाएगा, उस ने ऐसा ही किया और उस का दिल नर्म हो गया, वोह हज़रते आइशा रज़ीअल्लाहो अन्हुमा की खिदमत में हाज़िर हुई और आप का शुक्रिया  अदा किया।

मौत के जिक्र पर ईसा अलैहिस्सलाम की हालत

हज़रते ईसा अलैहिस्सलाम जब मौत का ज़िक्र सुनते तो उन के जिस्म से खून के क़तरे गिरने लगते । हज़रते दावूद अलैहिस्सलाम जब मौत और क़ियामत का ज़िक्र करते तो उन की सांस उखड़ जाती और बदन पर लर्जा तारी हो जाता, जब रहमत का जिक्र करते तो उन की हालत संभल जाती । हज़रते हसन रज़ीअल्लाहो अन्हो  का कौल है : मैं ने जिस अक्लमन्द को देखा उस को मौत से लर्जी और गमगीन पाया।

हज़रते उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रज़ीअल्लाहो अन्हो  ने एक आलिम से कहा : मुझे नसीहत करो, उन्हों ने कहा : “तुम ख़लीफ़ा होने के बा वुजूद मौत से नहीं बच सकते, तुम्हारे आबाओ अजदाद में आदम अलैहिस्सलाम से ले कर आज तक हर किसी ने मौत का जाम पिया है, अब तुम्हारी बारी है। हज़रते उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रज़ीअल्लाहो अन्हो  ने यह सुना तो बहुत देर तक रोते रहे।

हज़रते रबीअ बिन खैसम रज़ीअल्लाहो अन्हो  ने अपने घर के एक गोशे में कब्र खोद रखी थी और दिन में कई मरतबा इस में जा कर सोते और हमेशा मौत का जिक्र करते हुवे कहते : अगर मैं एक लम्हा भी मौत की याद से गाफ़िल हो जाऊं तो सारा काम बिगड़ जाए।

हज़रते मुतर्रिफ़ बिन अब्दुल्लाह बिन शिख्ख़ीर रहमतुल्लाह अलैह  का कौल है : इस मौत ने दुन्यादारों से उन की दुन्या छीन ली है पस अल्लाह तआला से ऐसी नेमतों का सवाल करो जो दाइमी हैं।

हज़रते उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रज़ीअल्लाहो अन्हो  ने अम्बसा से कहा : “मौत को अकसर याद किया करो ! अगर तुम फ़राख दस्त हो तो यह तुम को तंगदस्त कर देगी और अगर तुम तंगदस्त हो तो यह तुम को हमेशा की फ़राख दस्ती अता कर देगी।”

हज़रते अबू सुलैमान अद्दारानी रहमतुल्लाह अलैह  का कौल है : मैं ने उम्मे हारून से पूछा कि तुझे मौत से महब्बत है? वह बोली : नहीं ! मैं ने पूछा : क्यूं ? तो उस ने कहा : मैं जिस शख्स की नाफ़रमानी करती हूँ उस से मुलाक़ात की तमन्ना कभी नहीं करती. मौत के लिए मैंने कोई काम नहीं किया लिहाज़ा उसे कैसे महबूब समझूँ.

हज़रते अबू मूसा तमीमी कहते हैं कि मशहूर शाइर फ़रज़-दक की बीवी का इन्तिकाल हो गया तो उस के जनाजे में बसरा की मुक्तदिर हस्तियां शरीक हुई जिन में हज़रते हसन रज़ीअल्लाहो अन्हो  भी मौजूद थे, आप ने फ़रमाया : ऐ अबू फ़रास ! तू ने इस दिन के लिये क्या तय्यारी की है ? उस ने कहा : साठ साल से मुतवातिर अल्लाह तआला की वहदानिय्यत का इक़रार कर रहा हूं, जब उसे दफ्न कर दिया गया तो फ़रज़-दक ने उस की कब्र पर खड़े हो कर कहा :

ऐ अल्लाह ! अगर तू मुझे मुआफ़ कर दे, मैं कब्र के फ़शार और शो’लों से ख़ाइफ़ हूं। ..जब क़ियामत का दिन आएगा तो एक संगदिल हैबतनाक फरिश्ता फ़रज़-दक को हंकाएगा। .बिला शुबा नस्ले आदम का वोही शख्स रुस्वा हुवा जिसे तौक पहना कर जहन्नम में भेजा गया।

कब्रों के हसरत भरे कतबात (कब्र के ऊपर लिखी इबारत)

अहले कुबूर के लिये बा’ज़ शो’रा ने कुछ इब्रत वाले  अश्आर कहे हैं :

कब्रों के सेहनों (कब्रिस्तान) में खड़ा हो कर इन से पूछ तुम में से कौन तारीकी में डूबा हुवा है। और कौन इस की गहराई में बा इज्जत तौर पर अमनो सुकून में है। आंख वालों के लिये एक ही सुकून है और मरातिब का फर्क दिखाई नहीं देता।अगर वो तुझे जवाब दें तो अपनी ज़बाने हाल से हालात की हक़ीक़त यूं बयान करेंगे। ..जो मुतीअ और फ़रमांबरदार था वो जन्नत के बागों में जहां चाहता है सैर करता है। ….और बद बख़्त मुजरिम सांपों के मसकन वाले एक गढ़े में तड़प रहा है। ….उस की तरफ़ बिच्छू दौड़ दौड़ कर बढ़ रहे हैं और उस की रूह इन की वज्ह से सख्त अज़ाब में है।

हज़रते मालिक बिन दीनार रहमतुल्लाह अलैह  फ़रमाते हैं कि मैं कब्रिस्तान से येह शे’र पढ़ता हुवा गुज़रा :

मैं ने कब्रिस्तान में आकर पुकारा कि इज्जतदार और फ़क़ीर कहां है ? अपनी पाक दामनी पर फकर करने वाला और बादशाहे वक्त कहां है ?

हज़रते मालिक बिन दीनार रहमतुल्लाह अलैह  फ़रमाते हैं कि मेरे सुवालात का क़ब्रों से येह जवाब आया :

सब फ़ना हो गए, कोई खबर देने वाला नहीं रहा, सब के सब मर गए इन के निशान भी मिट गए। ….सुब्ह होती है और शाम होती और इन की हसीन सूरतें मिट्टी बिगाड़ती चली जाती है। …ऐ गुज़रे हुवों के मुतअल्लिक़ पूछने वाले ! क्या तू ने इन कब्रों से इब्रत हासिल की है ?

एक और कब्र पर लिखा हुवा था :

वोह कब्रें जिन के रहने वाले मनों मिट्टी के नीचे ख़ामोश पड़े हैं, ज़बाने हाल से तुझे येह कह रहे हैं। ….ऐ लोगों के लिये दुनिया जम्अ करने वाले ! तुझे तो मर जाना है फिर येह दुनिया तू किस के लिये जम्अ करता है?

इब्ने सम्माक रहमतुल्लाह अलैह  कहते हैं कि मैं कब्रिस्तान से गुज़रा, एक कब्र पर लिखा था :

मेरे रिश्तेदार मेरी क़ब्र के पहलू से अन्जान बन कर गुज़र जाते हैं।…उन्हों ने मेरा माल तो तक्सीम कर लिया मगर मेरा कर्ज न उतारा । अपने अपने हिस्से ले कर वह खुश हैं, हाए अफ्सोस ! वोह मुझे कितनी जल्दी भूल गए हैं!

एक और क़ब्र पर यह लिखा था :

मौत ने दोस्त को दोस्तों की महफ़िल से उचक लिया और कोई दरबान, चौकीदार उसे न बचा सका। वह दुन्यावी आसाइशों से कैसे खुश हो सकता है जिस की हर बात और हर सांस को गिना जाए। …ऐ गाफ़िल ! तू नुक्सान में सरगर्म है और तेरी ज़िन्दगी ख्वाहिशात में डूबी हुई है। …दबा के क़ब्र में सब चल दिये दुआ न सलाम ज़रा सी देर में क्या हो गया ज़माने को!

मौत किसी जाहिल पर जहालत के बाइस और किसी आलिम पर इल्म के सबब रहम नहीं करती। मौत ने कितने बोलने वालों को कब्रों में गूंगा बना दिया वह जवाब ही नहीं दे सकते। कल तेरा महल इज्जत से मा’मूर था और आज तेरी कब्र का निशान भी मिट गया है।

एक और क़ब्र पर लिखा था : .जब मेरे दोस्तों की कब्र ऊंट की कोहानों की तरह बुलन्द और बराबर हो गई तो मुझे मालूम हुवा। अगर्चे मैं रोया और मेरे आंसू बहने लगे मगर उन की आंखें इसी तरह ठहरी रहीं (उन्हों ने आंसू नहीं बहाए)।

एक तबीब की कब्र पर लिखा हुवा था :

जब किसी ने मुझ से पूछा तो मैं ने कहा कि लुक्मान जैसा तबीब व दानिशमन्द भी अपनी कब्र में जा सोया। .कहां है वोह जिस की तिब्ब में शख्सिय्यत मुसल्लम थी और उस जैसा कोई माहिर न था। …जो अपने आप से मौत को न टाल सका वह दूसरों से मौत को कैसे टालता।

एक और क़ब्र पर लिखा हुवा था :

ऐ लोगो ! मेरी बहुत सी तमन्नाएं थीं मगर मौत ने उन्हें पूरा करने की मोहलत न दी। अल्लाह से डर और अपनी ज़िन्दगी में नेक अमल कर। मैं अकेला यहां नहीं आया बल्कि हर किसी को यहां आना है।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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Mout ki yaad, mout hadees, mout ka bayan, mout se nasihat

 

इबादत गुजारी व तर्के हराम.

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

ताअत के मा’ना : फ़ाराइज़ की अदाएगी, हराम चीजों से परहेज़ और हुदूदे शरअ पर कारबन्द होना है। हज़रते मुजाहिद रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाने इलाही के मुतअल्लिक कहते हैं : “इस का मतलब यह है कि बन्दा अल्लाह तआला की इबादत व इताअत करता रहे।”

 

ताअत की हकीकत – अल्लाह की इताअत क्या है?

ताअत की हक़ीक़त अल्लाह तआला की मा’रिफ़त, खौफे खुदा, अल्लाह तआला से उम्मीद हमावक्त अल्लाह तआला की तरफ़ रुजूअ होना है, वह बन्दा जो इन अवसाफ़ से खाली होता है वह ईमान की हक़ीक़त को नहीं पा सकता लिहाज़ा इताअत उस वक़्त तक सहीह नहीं होती जब तक कि बन्दा अल्लाह की मा’रिफत और उस बे मिस्ल, बे मिसाल कादिर व खालिक रब्बे जुल जलाल की तमाम सिफ़तों पर ईमान नहीं लाता।

एक बदवी ने हज़रते मुहम्मद बिन अली बिन हुसैन रज़ीअल्लाहो अन्हो  से अर्ज की, कि तुम ने अल्लाह को देखा है उस की इबादत करते हो? आप ने फ़रमाया : हां ! देख कर इबादत करता हूं। पूछा : वह कैसे ? आप ने फ़रमाया : वह आंखों के नूर से नहीं दिल के इदराक से देखा जाता है, उसे हवास नहीं पा सकते, वह अपनी ला ता’दाद निशानियों से पहचाना जाता है, बे अन्दाज़ा अवसाफ़ से मौसूफ़ है, वह किसी पर जुल्म नहीं करता, वह आस्मानो ज़मीन का मालिक है और उस के सिवा कोई मा’बूद नहीं है। बदवी बे साख्ता कह उठा : अल्लाह जानता है कि उसे किस घराने में अपना रसूल भेजना है।

बातिनी इल्म क्या है?

एक आरिफ़ से बातिनी इल्म के मुतअल्लिक़ पूछा गया : उन्हों ने कहा : वह अल्लाह तआला का राज़ है जिसे वह अपने दोस्तों के दिलों में डाल देता है और किसी फरिश्ते और इन्सान को इस की ख़बर तक नहीं होती।

हज़रते का’ब अहबार रज़ीअल्लाहो अन्हो  का कौल है अगर इन्सान एक दाने के बराबर अल्लाह तआला की अज़मत पर यकीन हासिल करे तो वोह हवा पर उड़े और पानी पर चले, पाक है वह ज़ात जिस ने अपनी माअरिफ़त के इदराक पर इन्सान के इकरारे आजिज़ाना को ईमान करार दिया और अता कर्दा ने’मतों पर इन्सान के शुक्र न कर सकने के ए’तिराफ़ को शुक्र करार दिया है”।

हज़रते महमूद अल वर्राक के अश्आर हैं :

जब कि अल्लाह तआला की ने’मतों पर मेरा शुक्र करना भी अल्लाह की एक ने मत है जिस पर शुक्र वाजिब है। पस मैं कैसे उस के करम के बिगैर शुक्रिया अदा कर सकता हूं अगरचे मुझे बहुत तवील ज़िन्दगी भी दे दी जाए।

जब इन्सान को खुशी मिलती है तो मसर्रतें आम हो जाती हैं और जब कोई दुख पहुंचता है तो इस के बाद उसे बेहतरीन अज्र मिलता है। हर खुशी और गमी में अल्लाह तआला की ऐसी नेमत पोशीदा है जो बहरो-बर में नहीं समा सकती।

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जब मा’रिफ़ते खुदावन्दी हासिल हो जाए तो बन्दगी का इक़रार लाज़िमी है और जब ईमान दिल में जगह बना ले, रब तआला की ताअत वाजिब हो जाती है।

ईमान की दो किस्में हैं : ज़ाहिर और बातिन, ज़बान से इकरार को ज़ाहिर और दिल से तस्दीक को बातिन कहते हैं । कुर्बे खुदावन्दी और इबादत व इताअत में मोमिनों के मुख्तलिफ़ दरजात हैं मगर ईमान में सब बराबर के शरीक हैं। जो मोमिन तवक्कुल, इख्लास और अल्लाह की रज़ाजोई में जितना हिस्सा रखता है उसी कदर उस का मर्तबा बुलन्द होता है।

इख्लास यह है कि बन्दा अल्लाह तआला से अपने आ’माल के अज्र का तालिब न हो, इस लिये कि जो शख्स सवाब की उम्मीद और अज़ाब के ख़ौफ़ से इबादत करता है उस का इख्लास मुकम्मल नहीं होता क्यूंकि उस ने तो अपनी भलाई के लिये इबादत की है, हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का फरमान है कि “बुरे कुत्ते की तरह न बनो जो डर के मारे काम करता है, न ही बुरे मजदूर की तरह बनो जो उजरत के बिगैर काम ही नहीं करता”।

फ़रमाने इलाही है :  “और बाज़ लोगों में से वह है जो किनारे पर अल्लाह की इबादत करता है अगर उसे भलाई मिले तो वह मुतमइन हो जाता है और अगर उसे आज़माइश पड़े तो अपने मुंह वापस पलट जाए दुनिया  और आखिरत को ख़सारे में दिया।

अगर अल्लाह तआला आ’माल पर अज्र न देता तब भी उस के एहसानात और इन्आमात इतने हैं कि हम पर उस की इबादत और इताअत ज़रूरी थी जब की उस का हुक्म भी हो और अज्र का वादा भी हो ।

तवक्कुल’ यह है कि इन्सान हाजतमन्दी के वक्त अल्लाह तआला पर ए’तिमाद करे, ज़रूरत के वक्त उसी की तरफ़ रुजूअ करे और मसाइब के नुजूल में इतमीनाने कल्ब और कामिल सुकून का सुबूत फ़राहम करे क्यूंकि मुतवक्किल आदमी खूब जानता है कि मुसीबतों का उतरना अल्लाह ही की तरफ़ से है, वह खैरो शर के हर काम को बाप बेटे, मालो दौलत की तरफ़ से नहीं खालिके काइनात की तरफ़ से समझते हैं और किसी भी हालत में अल्लाह तआला के सिवा किसी और पर ए’तिमाद नहीं करते चुनान्चे, फ़रमाने इलाही है :

“जो अल्लाह पर तवक्कुल रखता है पस अल्लाह उसे काफ़ी है”

‘रज़ा’ का मा’ना यह है कि इन्सान अल्लाह के जारीकर्दा उमूर को मुस्कुराते हुवे कबूल करे।

बा’ज़ उलमा का कौल है कि अल्लाह की बारगाह में सब से ज़ियादा करीब वह शख्स है जो उस की रज़ा पर राजी है, हुकमा का कौल है कि बहुत सी मसर्रतें बीमारी होती हैं और बहुत सी बीमारियां शिफ़ा होती हैं। किसी शाइर का कौल है:

कितनी ने’मतें ऐसी हैं जो मसाइब से घिरी हुई हैं। और कितनी मसर्रतें ऐसी हैं जो मसाइब की तरह नाज़िल हुई। खुशी और गम दोनों में सब्र कर क्यूंकि हर काम का एक अन्जाम होता है। हर गम के बाद खुशी है और हर खूबी में बुराई पोशीदा है।

हमारे लिये यह इरशादे रब्बानी काफ़ी है कि “तुम किसी चीज़ को ना पसन्द करते हो हालांकि वह तुम्हारे लिये बेहतर होती है।”

बन्दे की इबादत और ताअत हुब्बे दुन्या तर्क किये बिगैर ना मुकम्मल रहती है।

एक दानिश्वर का कौल है कि बेहतरीन नसीहत वह है जो दिल पर कोई हिजाब न रहने दे और यह हिजाबात दुन्यावी तअल्लुकात हैं (या’नी इस नसीहत से तमाम दुन्यावी तअल्लुकात दिल से मुन्कत हो जाएं।) एक और हकीमाना मकूला है कि दुन्या एक लम्हा है, इसे ताअत व बन्दगी में गुज़ार दे। अबुल वलीद अल बाजी का कौल है :जब तुम खूब अच्छी तरह जानते हो कि तुम्हारी ज़िन्दगी एक साअत से ज़ियादा नहीं। ..तो तुम इसे एहतियात से क्यूं खर्च नहीं करते इसे ताअत व इबादत में क्यूं बसर नहीं करते।

एक शख्स ने हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लमसे अर्ज की : या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ! मैं मौत को ना पसन्द करता हूं। आप ने फ़रमाया : तेरा माल वगैरा है ? अर्ज़ की : जी हां । आप ने फ़रमाया : माल को पहले भेज दो कि आदमी अपने माल के साथ होगा।

हज़रते ईसा अलैहिस्सलाम का इरशाद है कि तीन चीज़ों में भलाई है : बोलने, देखने और चुप  रहने में। जिस का बोलना ज़िक्रे खुदा नहीं वोह बोलना “लग्व” बेकार  है, जिस का देखना इबरत की निगाह से नहीं वह देखना “सह्वो निस्यान” भूल  है और जिस की ख़ामोशी अपने अन्जाम पर गौर करने के लिये नहीं उस की ख़ामोशी “बेकार” है क्यूंकि “तफ़क्कुर” ही से दुन्यावी झुकाव खत्म होता है, पसन्दीदा चीजों की तमन्ना मुरझा जाती है और इन्सान गौरो फ़िक्र का आदी हो जाता है।

इन्सान को हराम चीज़ों की तरफ़ निगाह नहीं डालनी चाहिये क्यूंकि नज़र एक ऐसा तीर है जो ख़ता नहीं होता और येह एक ज़बरदस्त कुव्वत है।

फ़रमाने नबवी है : “नज़र शैतान के तीरों में से एक तीर है, जिस ने खौफे खुदा की वज्ह से इसे हराम से बचा लिया, अल्लाह तआला उसे ऐसा ईमान अता करेगा जिस की लज्जत वो अपने दिल की गहराइयों में महसूस करेगा”

हुकमा का कौल है : जिस ने अपनी निगाह को आवारा छोड़ दिया उस ने बे इन्तिहा शर्मिन्दगी उठाई, येह आज़ाद निगाही इन्सान को बे नकाब कर देती है, उसे जलीलो ख्वार करती है और जहन्नम में तवील मुद्दत तक रहने को उस पर वाजिब कर देती है, अपनी नज़र की हिफ़ाज़त कर ! अगर तू ने इसे आवारा छोड़ दिया तो बुराइयों में घिर जाएगा और अगर तू ने इस पर काबू पा लिया तो तमाम आ जाए बदन तेरे मुतीअ हो जाएंगे”

अफ्लातून से पूछा गया कि दिल के लिये ज़ियादा नुक्सान पहुंचाने वाली चीज़ कान है या आंख ? उस ने कहा : यह दोनों दिल के लिये परन्दे के दो परों की तरह हैं, वह इन्हीं की कुव्वत से उड़ता है, जब इन में कोई पर टूट जाता है तो वह उड़ने में बहुत दुश्वारी महसूस करता है।

हज़रते मुहम्मद बिन ज़व का कौल है कि अल्लाह तआला ने हर अक्ल वाले के लिये यह सज़ा रख दी है कि वह हर उस चीज़ के देखने पर मजबूर होता है जिस से वह नफ़रत करता है।

एक ज़ाहिद ने किसी शख्स को देखा, वह एक लड़के से हंसी मज़ाक कर रहा था, ज़ाहिद ने उस से कहा : ऐ अक्ल के अन्धे ! तुझे किरामन कातिबीन और मुहाफ़िज़ फ़िरिश्तों से भी शर्म नहीं आती जो तेरे आ’माल लिख कर इन्हें महफूज़ करते जा रहे हैं और तेरी इन बुराइयों के गवाह बन रहे हैं और तेरी ऐसी पोशीदा बुराइयों से वाकिफ़िय्यत हासिल कर रहे हैं जिन को तू लोगों के सामने करने से घबराता है।

काज़ियुल अरजानी कहते हैं : .ऐ मेरी दो आंखो ! तुम ने गलत निगाही से काम ले कर मेरे दिल को बहुत बुरी जगह पर ला खड़ा किया है। .ऐ मेरी आंखो ! मेरे दिल को गुमराह करने से रुक जाओ, तुम दो हो कर एक को क़त्ल करने की कोशिश कर रहे हो।

हज़रते अली रज़ीअल्लाहो अन्हो  का फरमान है कि आंखें शैतान का जाल हैं आंख सरीउल असर उज्व है और बहुत ही जल्द शिकस्त खा जाता है, जिस किसी ने अपने आज़ा ए बदन को अल्लाह तआला की इबादत में इस्ति’माल किया, उस की उम्मीद बर आई, और जिस ने अपने आज़ा ए बदन को ख़्वाहिशात के पीछे लगा दिया, उस के आ’माल बातिल हो गए।

हजरते अब्दुल्लाह बिन मुबारक रज़ीअल्लाहो अन्हो  की नसीहतें

हज़रते अब्दुल्लाह बिन मुबारक रज़ीअल्लाहो अन्हो  ने कहा है : ईमान की हक़ीक़त रसूलों की लाई हुई किताबों की तस्दीक़ को कहा जाता है जो कुरआन की तस्दीक करता है इस के अहकामात पर अमल करता है उसे जहन्नम से नजात मिल गई।

जो हराम कर्दा चीज़ों से किनारा कश हुवा वो तौबा पर माइल हुवा, जिस ने रिज्के हलाल खाया वोह मुत्तकी बन गया, जिस ने फ़राइज़ को अन्जाम दिया उस का इस्लाम मुकम्मल हो गया, जिस ने ज़बान को सच बोलने वाली बनाया वह हलाकत से बच गया, जिस ने जुल्म को ना पसन्द किया वोह किसास से बच गया, जिस ने सुनन को अदा किया, उस के आ’माल पाकीज़ा हो गए और जिस ने खुलूस से अल्लाह की इबादत की उस के आ’माल मक़बूल हो गए।

हज़रते अबुद्दरदा रज़ीअल्लाहो अन्हो  से मरवी है : इन्हों ने हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से अर्ज किया : मुझे वसियत फ़रमाइये ! आप ने फ़रमाया : “पाकीज़ा हुनर इख़्तियार कर, नेक अमल कर, अल्लाह से हर दिन का रिज्क तलब करता रह और अपने आप को मुर्दो में शुमार कर ।

और हर इन्सान के लिये ज़रूरी है कि वह अपने नेक आ’माल पर न इतराए क्यूंकि यह आ’माल के लिये एक अज़ीम हलाकत है, ऐसा आदमी अमल कर के अल्लाह तआला पर एहसान धरता है हालांकि उसे यह इल्म नहीं होता कि उस का अमल मक़बूल हुवा या नहीं, ऐसे गुनाह जिन के बाद नदामत और पशेमानी हो उस इबादत से अच्छे हैं जिस में तकब्बुर और रिया शामिल हो।

फ़रमाने इलाही है :

बा’ज़ मुफस्सिरीन का कौल है कि इस आयत का मतलब यह है कि वह नेक अमल कर के इतराया करते थे, आख़िरत में उन की वह नेकियां बुराइयों की शक्ल में जाहिर होंगी। एक बुजुर्ग जब यह आयत पढ़ते तो फ़रमाया करते कि दिखावे की इबादत करने वालों के लिये हलाकत है और फ़रमाने इलाही : “अल्लाह की इबादत में किसी को शरीक न कर” से भी बा’ज़ उलमा ने रिया की शिर्कत मुराद ली है।

हज़रते इब्ने मसऊद रज़ीअल्लाहो अन्हो  से मरवी है कि सब से आखिर में कुरआने मजीद की यह आयत नाज़िल हुई :

और डरो उस दिन से जिस में तुम अल्लाह की तरफ़ लौटाए जाओगे फिर हर नफ्स को अपने आ’माल का पूरा बदला दिया जाएगा और किसी पर जुल्म नहीं होगा। मुहम्मद बिन बिशर रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं :

तेरा कसीर वक़्त गुज़र चुका, इस बकिय्या थोड़े को काम में ला इस तरह कि तू आदिल गवाह हो और तेरे येह अफ़्आल तेरी नेक ख़स्लतों की शहादत देंगे। अगर तू ने गुज़श्ता दिनों में बुराइयां इकठ्ठी कर ली हैं तो अब नेकियां कर, तू नेक बख़्त हो जाएगा। अच्छी बात को कल पर न डाल, शायद कल आए और तू न हो।

बुरी ख्वाहिशात को जल्द पूरा करता है और तौबा को कल पर डाल देता है। इसी गफलत में मौत आ जाएगी, यह अक्लमन्दों का काम नहीं है।

हजरते दाउद अलैहिस्सलाम की हजरते सुलैमान अलैहिस्सलाम को नसीहतें

हजरते दाउद अलैहिस्सलाम की हजरते सुलैमान अलैहिस्सलाम से फ़रमाया :

तीन चीजें मोमिन की परहेज़गारी पर दलालत करती हैं  “न पाने की सूरत में बेहतरीन तवक्कुल” “पा लेने की सूरत में बेहतरीन रज़ा” और “ख़त्म हो जाने की सूरत में बेहतरीन सब्र।”

एक हकीम का कौल है कि जिस ने मसाइब पर सब्र किया उस ने मक्सूद को पा लिया। शाइर कहता है:

अगर तुझ पर ज़माना कोई मुसीबत नाज़िल करे तो सब्र कर, आहो फुगां न कर। अगर दुनिया अपने तमाम तर हुस्न के बा वुजूद तुझ से मुंह फेर ले तो सब्र कर क्यूंकि यह तकवा और नेकी की निशानी है। अपने नफ्स को सब्र और तकवा पर मजबूर कर फिर तू हर उस फजीलत को पा लेगा जिस की तू तमन्ना रखता है।

दूसरा शाइर कहता है: .सब्र हुसूले मक्सूद की कुंजी है और एक दाइमी मददगार है। अगर दुख की रात तवील हो जाए तो सब्र कर क्यूंकि अकसर देखा गया है दुख का अन्जाम मसर्रत होता है। और बसा अवकात सब्र करने वाले को सब्र करने के बाद पछताना नहीं पड़ता ?

एक और शाइर कहता है:

सब्र-ईमान की मज़बूत रस्सी शैतानी वसाविस के लिये ढाल है। सब्र का अन्जाम बेहतरीन और गुस्से का अन्जाम बद तरीन होता है। अगर तुझे ज़माना कोई दुख दे तो समझ ले कि शुरूअ ही से ऐसा होता है। इस यक़ीने मुहूकम के साथ सब्र की जिरह पहन ले कि सब्र खुशनूदिये ख़ुदा का बाइस है।

और सब्र की कई किस्मे हैं, पाबन्दी से फ़राइज़े खुदावन्दी का अदा करना और इन के बेहतरीन अवक़ात का खयाल रखना, इबादत पर सब्र, दोस्तों और हमसायों की ज़ियादतियों पर सब्र, मरज़ पर सब्र, फ़क्र  पर सब्र, गुनाहों, नाजाइज़ ख़्वाहिशात, शैतानी वसाविस और आ’जा ए जिस्मानी को गैर ज़रूरी कामों में इस्ति’माल करने से सब्र वगैरा ।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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 लम्बी लम्बी उम्मीदों का सहारा और फरमाने नबवी

फ़रमाने नबवी है कि मैं तुम पर दो चीज़ों के तसल्लुत से डरता हूं : तूले अमल या‘नी लम्बी उम्मीदें और ख्वाहिशात की पैरवी। बे शुबा तवील उम्मीदें आख़िरत की याद भुला देती हैं और ख्वाहिशात की पैरवी हक़ व सदाक़त से रोक देती है।

फ़रमाने नबवी है कि मैं तीन शख्सों के लिये तीन चीज़ों का ज़ामिन हूं : दुनिया में हमातन गर्क दुनिया के हरीस और बख़ील के लिये दाइमी फ़कर, दाइमी मश्शूलिय्यत और दाइमी गम मुक़द्दर किया गया है ।

हज़रते अबू दरदा रज़ीअल्लाहो अन्हो  ने हिम्स वालों से कहा : तुम्हें शर्म नहीं आती तुम ऐसे मकानात बनाते हो जिन में तुम्हें नहीं रहना, ऐसी उम्मीदें रखते हो जिन्हें नहीं पा सकते और ऐसा सामान जम्अ करते हो जिसे अपने मस्रफ़ में नहीं लाते। तुम से पहली उम्मतों ने आलीशान इमारतें बनवाई, बहुत मालो दौलत जम्अ किया और तवील तरीन उम्मीदें रखीं मगर उन की उम्मीदें फ़रेब निकलीं और उन का जम्अ कर्दा माल बरबाद और उन की इमारतें कब्रें बन गई।

हज़रते अली रज़ीअल्लाहो अन्हो  ने हज़रते उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो  से कहा : अगर तुम अपने दोस्त से आरजुए मुलाकात रखते हो तो पैवन्द लगा कपड़ा पहनो, पुराना जूता इस्ति’माल करो, उम्मीदें कम करो और पेट भर कर न खाओ।

आदम अलैहिस्सलाम की बेटे शीस अलैहिस्सलाम को पांच बातों की वसियत

हज़रते आदम अलैहिस्सलाम ने अपने बेटे शीस अलैहिस्सलाम को पांच बातों की वसियत की और फ़रमाया : अपनी औलाद को भी येही वसियत करना, आरिज़ी दुन्या पर मुतमइन न होना ! मैं जाविदानी जन्नत में मुतमइन था, अल्लाह तआला ने मुझे वहां से निकाल दिया।

औरतों की ख्वाहिशात पर काम न करना ! मैं ने अपनी बीवी की ख्वाहिश पर शजरे ममनूआ खा लिया और शर्मिन्दगी उठाई।

हर एक काम करने से पहले उस का अन्जाम सोच लो ! अगर मैं अन्जाम सोच लेता तो जन्नत से न निकाला जाता ।

जिस काम से तुम्हारा दिल मुतमइन न हो उस काम को न करो क्यों की जब मैं ने शजरे ममनुआ खाया तो मेरा दिल मुतमइन नहीं था मगर मैं उस के खाने से बाज़ न रहा।

काम करने से पहले मश्वरा कर लिया करो क्यूंकि अगर मैं फरिश्तों से मश्वरा कर लेता तो मुझे येह तक्लीफ़ न उठानी पड़ती।

मुजाहिद  का कौल है : मुझ से अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो  ने फ़रमाया कि सुबह को शाम की फ़िक्र न करो और शाम को दूसरी सुब्ह की फ़िक्र न करो, मौत से पहले जिन्दगी को, बीमारी से पहले तंदुरुस्ती को गनीमत समझो क्यंकि पता नहीं कल तुम्हारा क्या हाल होगा।

 

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अल्लाह तआला से शर्म करो जैसा हक़ है

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने सहाबए किराम से फ़रमाया : क्या तुम सब जन्नत में जाने की तमन्ना रखते हो ? उन्हों ने अर्ज़ की : हां ! आप ने फ़रमाया : उम्मीदें कम करो और अल्लाह तआला से कमा हक्कुहू शर्म करो । सहाबए किराम ने अर्ज की : या रसूलल्लाह ! हम अल्लाह से शर्म करते हैं। आप ने फ़रमाया : हया वह नहीं जो तुम समझते हो, हया यह है कि तुम कब्रों और इन की तकालीफ़ को याद करो, पेट को हराम से महफूज रखो, दिमाग को बुरे खयालात की आमाजगाह न बनाओ और जो शख्स आखिरत की इज्जत चाहता है वह दुन्यावी जीनतों को तर्क कर दे, यही हकीक़ी शर्म है और इसी से बन्दा अल्लाह तआला का कुर्ब हासिल करता है।

फ़रमाने नबवी है : इस उम्मत की अव्वलीन नेकी ज़ोहद  और यकीन है और इस की हलाकत का आखिरी सबब बुख़्ल और झूटी उम्मीदें हैं।

लम्बी उम्मीदों के बारे में इरशादाते सहाबा

हज़रते उम्मे मुन्ज़िर रज़ीअल्लाहो अन्हो  से मरवी है : एक मरतबा हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम रात को लोगों के पास आए और फ़रमाया : ऐ लोगो! अल्लाह से शर्म करो : सहाबए किराम ने अर्ज किया : किस तरह या रसूलल्लाह ! आप ने फ़रमाया : तुम वोह कुछ जम्अ करते हो जो खाते नहीं, वह उम्मीदें रखते हो जो पा नहीं सकते और ऐसे मकानात बनाते हो जिन में तुम्हें हमेशा नहीं रहना है।

हज़रते अबू सईद खुदरी रज़ीअल्लाहो अन्हो  से मरवी है : हज़रते उसामा बिन जैद रज़ीअल्लाहो अन्हो  ने एक माह के कर्ज पर एक सो दीनार में लौंडी खरीदी । जब हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने सुना तो फ़रमाया : तुम्हें तअज्जुब नहीं हुवा ! उसामा ने एक माह के क़र्ज़ पर लौंडी खरीदी है, इस की उम्मीदें बहुत तवील हैं। रब्बे जुल जलाल की कसम ! मैं आंखें खोलता हूं तो मुझे इतनी उम्मीद नहीं होती कि पलकें एक दूसरे से मिलेंगी या अल्लाह तआला इस से पहले मेरी रूह कब्ज़ फ़रमा लेगा, मैं तो निगाह उठाने के बाद निगाह की वापसी की उम्मीद नहीं रखता, लुक्मा मुंह में डाल कर उसे चबाने तक ज़िन्दगी की उम्मीद नहीं रखता फिर इरशाद फ़रमाया : “ऐ लोगो ! अगर तुम अक्लमन्द हो तो अपने आप को मुर्दो में शामिल समझो, रब्बे जुल जलाल की क़सम ! जिस के कब्जए कुदरत में मेरी जान है तुम पर एक वक्त मुकर्रर (मौत) आएगा जिस को तुम टाल नहीं सकोगे।”

हज़रते इब्ने अब्बास रज़ीअल्लाहो अन्हो  से मरवी है : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम  मिट्टी से मस्ह फ़रमा लेते, मैं अर्ज करता : हुजूर पानी करीब है आप फ़रमाते क्या ख़बर मैं पानी तक पहुंच सकू या न पहुंच सकू।

रिवायत है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने तीन लकड़ियां लीं, एक को सामने, दूसरी को पहलू में और तीसरी को दूर नस्ब फ़रमाया और फ़रमाया : जानते हो ! येह क्या है ? सहाबा ने अर्जु की : अल्लाह और उस का रसूल सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम बेहतर जानते है । फ़रमाया : “यह इन्सान है, यह मौत है और वह इन्सान की उम्मीदें हैं, आदमी उम्मीदों के पीछे भागता है मगर रास्ते में उसे मौत आ लेती है।”

 

हजरते ईसा का एक वाकिआ

मरवी है कि हज़रते ईसा अलैहिस्सलाम बैठे हुवे थे और एक बूढ़ा फावड़े से ज़मीन खोद रहा था, आप ने अल्लाह तआला से दुआ मांगी : ऐ अल्लाह ! इस से ज़िन्दगी की उम्मीद छीन ले। बूढ़े ने फाऊड़ा रख दिया और लैट गया, जब कुछ देर गुज़र गई तो आप ने अल्लाह तआला से दुआ की इसे इस की उम्मीदें लौटा दे । बूढ़ा खड़ा हो गया और फाऊड़े से ज़मीन खोदने लगा तो आप ने इस का सबब पूछा : तो वोह कहने लगा : काम करते हुवे मेरे दिल में खयाल आया कि मैं अब बूढ़ा हो गया हूं, कब तक यह काम करता रहूंगा लिहाज़ा मैं ने फावड़ा रख दिया और लैट गया, कुछ देर बाद मेरे दिल में ख़याल आया तुझे ज़िन्दगी गुज़ारने के लिये ज़रूर कुछ न कुछ करना चाहिये चुनान्चे, मैं फावड़ा संभाल कर फिर खड़ा हो गया और काम करने लगा।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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Lambi ummeeden, duniya ki khwaishen, mout ko bhula dena, aakhirat ko bhula dena

 

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 

 

बुख़्ल कंजूसी करने की सजा और अज़ाब

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

फ़रमाने इलाही है :

जो लोग अल्लाह तआला के अता कर्दा माल में बुख़्ल करते हैं वोह इसे अपने लिये बेहतर न समझें बल्कि येह उन के लिये मुसीबत है अन करीब बुख़्ल के माल से कियामत के दिन उन को तौक पहनाए जाएंगे।

फ़रमाने इलाही है :

उन मुशरिकीन के लिये हलाकत है जो ज़कात नहीं अदा करते । इस आयते करीमा में अल्लाह तआला ने ज़कात न देने वालों को मुशरिक कहा है।

फ़रमाने नबवी है : जो शख्स अपने माल की ज़कात अदा नहीं करता, कियामत के दिन उस का माल गन्जे सांप की शक्ल में उस की गर्दन में झूल रहा होगा

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने पांच बातों से अल्लाह की पनाह मांगी

फ़रमाने नबवी है : ऐ गिरोह ए मुहाजिरीन ! पांच बलाएं ऐसी हैं जिन के मुतअल्लिक मैं अल्लाह तआला से तुम्हारे लिये पनाह मांगता हूं :

1 जब किसी क़ौम में खुल्लम खुल्ला बदकारियां होती हैं तो अल्लाह तआला उन पर ऐसे मकरूहात नाज़िल करता है जो पहले किसी पर नाज़िल नहीं होते।

2 जब कोई कौम नाप तोल में कमी करती है तो उन पर तंगदस्ती, कहत साली (सूखा) और ज़ालिम हाकिम मुसल्लत कर दिया जाता है.

3 जब कोई क़ौम अपने मालों की ज़कात नहीं देती उन्हें खुश्क साली घेर लेती है, अगर ज़मीन पर चोपाए न हों तो कभी उन पर बारिश न बरसे ।

4 जब कोई कौम अल्लाह और उस के रसूल के अहद को तोड़ देती है तो उस पर उस के दुश्मन मुसल्लत हो जाते हैं जो उन से उन का मालो दौलत छीन लेते हैं और

5 जिस कौम के फ़रमारवा किताबुल्लाह से फैसला नहीं करते, उन के दिलों में एक दूसरे से खौफ पैदा हो जाता है।

फ़रमाने नबवी है : “अल्लाह तआला बखील की ज़िन्दगी और सखी की मौत को ना पसन्द फ़रमाता है।”

फ़रमाने नबवी है : “दो आदतें मोमिन में जम्अ नहीं हो सकती, बुख़्ल और बद खुल्की।”

फ़रमाने नबवी है : “अल्लाह तआला ने कसम खाई है कि बख़ील को जन्नत में नहीं भेजेगा ।”

फ़रमाने नबवी है : “बुख़्ल से बचो ! जिस कौम में बुख़्ल आ जाता है वोह लोग ज़कात नहीं देते, सिला ए रहमी नहीं करते और नाहक खून रेजियां करते हैं।”

फ़रमाने नबवी है : “अल्लाह तआला ने रकाकत (सुस्ती काहिली) और शो‘लापन को पैदा किया और उसे माल और बुख़्ल से ठांप दिया।

 

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हज़रते हसन रहमतुल्लाह अलैह से बुख़्ल के मुतअल्लिक़ पूछा गया : आप ने फ़रमाया : “बुख़्ल यह है कि इन्सान राहे खुदा में खर्च करने को माल का ज़ाया हो जाना और माल जम्अ करने को खूबी समझे, बुख़्ल की बुन्याद, औलाद और माल की महब्बत, फ़क्रो फ़ाक़ा का खौफ़ और तूले अमल (लम्बी उम्मीदें) है। हदीस शरीफ़ में है : बा’ज़ आदमी ऐसे हैं जो अपने माल की ज़कात की अदाएगी और अपने अहलो अयाल पर खर्च करने को अच्छा नहीं समझते उन की महब्बत रूपिया जम्अ करने और इसे संभाल कर रखने में होती है हालांकि वह जानते हैं कि उन्हें एक दिन मर जाना है।

इन बखीलों के बारे में एक शाइर का क़ौल है

ऐ भाई ! अक्लमन्द लोगों की शक्ल में बहुत से जानवर भी होते हैं। जो अपने माल की हर ऊंच नीच को जानते हैं लेकिन अगर उन का दीन चला जाए तो उन्हें महसूस भी नहीं होता।

एक और शाइर कहता है

बुख़्ल ऐसी बीमारी है जो किसी बा मुरुव्वत, अक्लमन्द और दीनदार के लाइक नहीं। .जिस ने मालो दौलत हासिल कर के बुख़्ल किया मुझे ज़िन्दगी की कसम वोह धोके में रहा । .हाए अपसोस ! जिस ने दुन्या व आखिरत के हुकूक अदा न किये उस ने हक़ीर चीज़ के बदले अपने दीन के बाद दुनिया भी बेच डाली।

एक और शाइर कहता है :

जब माल किसी दोस्त को नफ्अ न पहुंचाए, किसी अज़ीज़ के काम न आए और किसी तंगदस्त की हाजत रवाई न करे। तो अन्जाम येह होगा कि माल तो वारिस के हथ्थे चढ़ेगा और बखील कियामत की शर्मिन्दगी अपने साथ ले जाएगा।

हज़रते बिश्र का कौल है कि बख़ील की मुलाकात मूजिबे मलाल और उसे देखना दिल की संगीनी में इज़ाफ़ा करता है, अरब एक दूसरे को बुख़्ल और बुज़दिली पर शर्म दिलाया करते थे। शाइर कहता है:

ख़र्च करता रह और कमी का ख़ौफ़ न कर, अल्लाह तआला ने बन्दों के रिज्क बांट दिये हैं। दुनिया से जाते हुवे बुख़्ल कोई फ़ाइदा न देगा और सखावत कोई नुक्सान न पहुंचाएगी।

एक और शाइर का कौल है:

मैं ने लोगों को अहले सखा का दोस्त पाया है मगर दो आलम में बखील का किसी को दोस्त नहीं देखा। ..मैं ने देखा है कि बुख़्ल बख़ीलों को ज़लीलो ख्वार करता है लिहाज़ा मैं ने बुख़्ल से किनारा कशी कर ली।

बख़ील की ज़िल्लत के लिये इतना ही काफ़ी है कि वह दूसरे के लिये माल जम्अ करता है, खर्च करने से तक्लीफ़ महसूस करता है और इस की फ़रावानी से लुत्फ़ अन्दोज़ नहीं होता ऐसे आदमियों के लिये हज़रते वकीअ का कौल है :

बख़ील हमेशा उस के वारिसों के लिये माल इकठ्ठा करता है और उस की हिफ़ाज़त करता है। ….शिकारी कुत्ते की तरह है जो भूका होने के बा वुजूद शिकार की हिफ़ाज़त करता है ताकि उसे दूसरे खाएं।

एक ज़रबुल मसल है कि बखील के माल की आने वाले वारिस को खुश खबरी दे दो । इमाम अबू हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह का कौल है : मैं बख़ील का फैसला नहीं कर सकता क्यूंकि वह अपने बुख़्ल की वज्ह से अपने हक़ से ज़ियादा लेने की कोशिश करता है और ऐसा आदमी अमानतदार नहीं होता।

 

इब्लीसे लईन शैतान बुख़्ल को पसन्द करता है

हज़रते यहया . ने पूछा : तुझे कौन सा आदमी पसन्द, कौन सा ना पसन्द है ? इब्लीस शैतान ने कहा : मुझे मोमिन बखील पसन्द है मगर गुनहगार सखी पसन्द नहीं ? आप ने पूछा : वह क्यूं ? इब्लीस ने कहा : इस लिये कि बखील को तो उस का बुख़्ल ही ले डूबेगा मगर फ़ासिक सखी के मुतअल्लिक़ मुझे येह खतरा है कहीं अल्लाह तआला उस के गुनाहों को उस की सखावत के बाइस मुआफ़ न फ़रमा दे। फिर इब्लीस जाते हुवे कहता गया कि अगर आप यहया पैग़म्बर न होते तो मैं (राज़ की येह बातें) कभी न बतलाता।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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वालिदैन से हुस्ने सुलूक अच्छा बर्ताव

‘सहीहैन’ में हज़रते अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ीअल्लाहो अन्हो  से मरवी है : मैंने रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लमसे पूछा : अल्लाह तआला को कौन सा अमल ज़ियादा महबूब है ? फ़रमाया : नमाज़ को उस के वक्त पर अदा करना, मैं ने कहा : इस के बा’द ! आप ने फ़रमाया : वालिदैन से हुस्ने सुलूक, मैं ने पूछा : फिर कौन सा अमल महबूब है ? आप ने फ़रमाया : जिहाद फ़ी सबीलिल्लाह ।

‘मुस्लिम’ की रिवायत है : आप ने फ़रमाया : “बेटा बाप का हक़ अदा नहीं कर सकता यहां तक कि वोह बाप को गुलाम पाए और उसे खरीद कर आज़ाद कर दे”। (जब भी वोह हक्के अबुव्वत अदा नहीं कर सकता)

‘मुस्लिम’ की रिवायत है : एक शख्स ने आप की खिदमत में हाज़िर हो कर अर्ज किया : मैं आप के हाथ पर अल्लाह की रिज़ाजूई में हिजरत और जिहाद की बैअत करता हूं, आप ने पूछा : तेरे वालिदैन में से कोई जिन्दा है ? अर्ज की : दोनों ज़िन्दा हैं, आप ने फ़रमाया : जा और वालिदैन की खिदमत कर !

अबू या’ला और तबरानी की रिवायत है : एक आदमी आप की खिदमत में आया और कहा : मैं जिहाद की तमन्ना रखता हूं मगर चन्द मजबूरियों की बिना पर मा’जूर हूं। आप ने फ़रमाया : तुम्हारे वालिदैन में से कोई जिन्दा है ? अर्ज की : मेरी मां जिन्दा है। आप ने फ़रमाया : अल्लाह से तौफ़ीक़ मांग कर मां से हुस्ने सुलूक करता रह, तुझे हज, उमरह और जिहाद फ़ी सबीलिल्लाह का सवाब मिलेगा ।

 

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तबरानी में है एक आदमी ने जिहाद की तमन्ना ज़ाहिर की तो आप ने पूछा : तेरी मां ज़िन्दा है? उस ने कहा : मेरी मां जिन्दा है, आप ने फ़रमाया : मां के कदमों को पकड़, जन्नत पा लेगा।

इब्ने माजा की रिवायत है : रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से दरयाफ्त किया गया कि औलाद पर वालिदैन के क्या हुकक हैं ? आप ने फरमाया : वो तेरी जन्नत और जहन्नम हैं।

इब्ने माजा, निसाई और हाकिम की रिवायत है : एक आदमी ने आप की खिदमत में हाज़िर हो कर अर्ज की : मेरा जिहाद करने का इरादा है, आप से मश्वरा लेने आया हूं। आप ने फ़रमाया : तेरी मां जिन्दा है ? अर्ज की : हां या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ! आप ने फ़रमाया : मां से हुस्ने सुलूक कर, जन्नत मां के क़दमों के पास है।

एक रिवायत में है कि आप ने पूछा : तेरे वालिदैन हैं ? उस ने कहा : हां । आप ने फ़रमाया : उन की ख़िदमत कर, जन्नत उन के क़दमों में है।

 

माँ बाप का दर्जा हदीसे पाक की रौशनी में

तिर्मिज़ी में है : हज़रते अबुद्दरदा रज़ीअल्लाहो अन्हो  से एक शख्स ने आ कर कहा : मेरी मां मुझे बीवी को तलाक देने का कहती है, आप ने फ़रमाया : मैं ने हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से सुना है : आप ने फ़रमाया : वालिदैन जन्नत का दरमियानी दरवाज़ा है, चाहे तो इसे जाएअ कर दे और चाहे तो इस की हिफ़ाज़त कर ।

इब्ने हब्बान की रिवायत है : एक आदमी ने हज़रते अबुद्दरदा रज़ीअल्लाहो अन्हो  से शिकायत की, कि मेरा बाप पहले तो मुझे शादी करने को कहता रहा और अब कहता है कि अपनी बीवी को तलाक़ दे दो, आप ने फ़रमाया : न मैं तुझे वालिदैन की नाफरमानी के लिये कहता हूं और न ही बीवी को तलाक देने के लिये कहता हूं, मैं तुम्हें हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से सुनी हुई हदीस सुनाता हूं, हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : “बाप जन्नत का दरमियानी दरवाज़ा है, तेरी मरज़ी है, इस की हिफ़ाज़त कर या इसे छोड़ दे।

सुनने अरबआ, इब्ने हब्बान और तिर्मिज़ी ने कहा : येह हदीस हसने सहीह है, हज़रते अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो  कहते हैं : मेरे निकाह में एक औरत थी जिसे मैं बहुत पसन्द

करता था मगर मेरा बाप उसे अच्छा नहीं समझता था, मेरे बाप ने कहा : उसे तलाक दे दो तो मैं ने इन्कार कर दिया, मेरे बाप ने हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की ख़िदमत में जा कर वाकिआ सुनाया तो हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने मुझ से फ़रमाया कि बीवी को तलाक दे दो।

मुस्नदे अहमद में रिवायत है कि जो दराज़िये उम्र और फराखिये रिज्क की तमन्ना रखता हो वोह वालिदैन के साथ हुस्ने सुलूक करे और सिलए रहमी करे ।

अबू या’ला और हाकिम की रिवायत है : आप ने फ़रमाया : जिस ने वालिदैन से हुस्ने सुलूक किया उसे मुबारक हो कि अल्लाह तआला ने उस की उम्र बढ़ा दी।

इब्ने माजा, इब्ने हब्बान और हाकिम की रिवायत है : आप ने फ़रमाया : आदमी गुनाहों के सबब रिज़क से महरूम हो जाता है, दुआ तक़दीर को लौटा देती है और हुस्ने खुल्क उम्र को दराज़ी अता करता है।

तिर्मिज़ी की एक रिवायत है : दुआ क़ज़ा को लौटा देती है और हुस्ने सुलूक उम्र को दराज़ कर देता है।

हाकिम की रिवायत है : दूसरे लोगों की औरतों से दरगुज़र करो, तुम्हारी औरतों से दरगुज़र किया जाएगा, अपने वालिदैन से हुस्ने सुलूक करो तुम्हारी औलाद तुम से हुस्ने सुलूक करेगी।

तबरानी की रिवायत है : अपने वालिदैन से हुस्ने सुलूक करो, तुम्हारी औलाद तुम से हुस्ने सुलूक करेगी और तुम दरगुज़र करो तुम्हारी औरतें भी दरगुज़र करेंगी।

मुस्लिम शरीफ़ की रिवायत है : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : उस की नाक गुबार आलूद हो, उस की नाक गुबार आलूद हो, उस की नाक गुबार आलूद हो, अर्ज किया गया : किस की या रसूलल्लाह ! आप ने फ़रमाया : जिस ने वालिदैन को या किसी एक को बुढ़ापे में पाया और जन्नत में न गया या उन्हों ने इसे जन्नत में दाखिल न किया । (वालिदैन को हुस्ने सुलूक से राज़ी न किया)

तबरानी की हदीस है : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम एक मरतबा मिम्बर पर तशरीफ़ फ़रमा हुवे और फ़रमाया : “आमीन आमीन आमीन”, फिर फ़रमाया : जिब्रील आए और उन्हों ने अर्ज की : या रसूलल्लाह ! जिस ने अपने वालिदैन में से किसी एक को पाया और उस से हुस्ने सुलूक न किया और मर गया तो वोह जहन्नम में गया, अल्लाह उसे दूर करे, आप आमीन कहें ! तो मैं ने आमीन कही, फिर जिबील ने अर्ज की : या रसूलल्लाह ! जिस ने माहे रमज़ान को पाया और गुनाह बख़्शवाए बिगैर मर गया तो वोह जहन्नम में गया, अल्लाह ने उसे दूर कर दिया, आप आमीन कहें ! तो मैं ने आमीन कही, फिर जिब्रील ने अर्ज की : या रसूलल्लाह ! जिस शख्स के सामने आप का ज़िक्र हुवा और उस ने आप पर दुरूद न भेजा और मर गया तो वोह जहन्नम में गया, अल्लाह ने उसे अपनी रहमत से दूर कर दिया, कहिये ! आमीन, तो मैं ने आमीन कही।

इब्ने हब्बान की रिवायत के अल्फ़ाज़ हैं : जिस ने अपने मां-बाप या उन में से किसी एक को पाया और उन से हुस्ने सुलूक न किया और वोह मर गया तो जहन्नम में गया, अल्लाह उसे अपनी रहमत से दूर करे, मैं ने आमीन कही।

हाकिम वगैरा की रिवायत के आखिर में है कि वोह रहमत से दूर हो गया जिस ने अपने वालिदैन या उन में से किसी एक को बुढ़ापे की हालत में पाया और उन्हों ने उसे जन्नत में नहीं पहुंचाया, मैं ने आमीन कही।

तबरानी की एक रिवायत यह है कि जिस ने अपने वालिदैन या उन में से किसी एक को पाया और उन से हुस्ने सुलूक न किया वो अल्लाह की रहमत से दूर हुवा और गज़बे ख़ुदा का मुस्तहिक बना, मैं ने आमीन कही।

अहमद की रिवायत है, जिस ने किसी गुलाम मुसलमान को आज़ाद किया, वोह जहन्नम से आजाद हो गया और जिस ने अपने वालिदैन में से किसी एक को पाया फिर भी उस की बख्शिश न हुई, अल्लाह उसे रहमत से दूर कर दे ।

‘सहीहैन’ की रिवायत है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से दरयाप्त किया गया : या रसूलल्लाह ! लोगों में कौन महब्बत करने के ज़ियादा लाइक़ है? आप ने फ़रमाया : मां ! पूछा : फिर कौन ? फ़रमाया : मां ! पूछा गया : फिर कौन ? फ़रमाया : मां ! जब चौथी बार पूछा गया : तो आप ने फ़रमाया : बाप !

सहीहैन में हज़रते अस्मा बिन्ते अबी बक्र रज़ीअल्लाहो अन्हो  से मरवी है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम के अहदे मुबारक में मेरी मुशरिका मां मेरे पास आई तो मैं ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से अर्ज किया कि मेरी बे दीन मां आई है ! मैं इस से क्या सुलूक करूं ? आप ने फ़रमाया : हुस्ने सुलूक करो ।

इब्ने हब्बान और हाकिम की रिवायत है : आप ने फ़रमाया : अल्लाह की रिजा वालिद की रिज़ा में है या वालिदैन की रिज़ा में है और अल्लाह की नाराजी वालिद या वालिदैन की नाराज़ी में है।

तबरानी की एक रिवायत है : वालिद या वालिदैन की इताअत में अल्लाह की इताअत है और वालिद या वालिदैन की ना फ़रमानी में अल्लाह की ना फ़रमानी है।

बज्जाज़ की एक रिवायत है, आप ने फ़रमाया : वालिदैन की रिज़ा में रब की रिज़ा है और वालिदैन की नाराज़ी में अल्लाह की नाराज़ी है।

तिर्मिज़ी, इब्ने हब्बान और हाकिम से मरवी है कि एक शख्स ने हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से अर्ज की, कि मैं ने बहुत बड़ा गुनाह किया है, मेरे लिये तौबा है ? आप ने फ़रमाया : तेरी मां है ? अर्ज की : नहीं ! फिर आप ने फ़रमाया : तेरी ख़ाला है ? अर्ज की : हां ! फ़रमाया : जाओ ! और खाला से हुस्ने सुलूक करो !

अबू दावूद और इब्ने माजा में मरवी है कि एक शख्स ने पूछा : या रसूलल्लाह ! वालिदैन की मौत के बाद इन से नेकी करने की कोई सूरत है ? आप ने फ़रमाया : इन के लिये दुआए मगफिरत करो, इन के वा’दों को पूरा करो, इन के रिश्तेदारों से तअल्लुक रखो और इन के दोस्तों की इज्जत करो।

इब्ने हब्बान की रिवायत में इतना इज़ाफ़ा है कि उस जवान ने कहा : येह कितनी उम्दा और जामेअ बात है, आप ने फ़रमाया : जाओ और इस पर अमल करो।

इमामे मुस्लिम से रिवायत है कि हज़रते अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो  मक्का की तरफ जा रहे थे, रास्ते में उन्हें बदवी मिला, आप ने उसे अपने गधे पर सवार किया और अपनी पगड़ी उतार कर उसे दे दी। इब्ने दीनार ने कहा : अल्लाह तआला आप पर रहम करे येह बदवी लोग तो मा’मूली सी अता से खुश हो जाते हैं, आप ने फ़रमाया : इस का बाप मेरे बाप का दोस्त था और मैं ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से सुना है कि आप ने फ़रमाया : बेहतरीन नेकी बेटे का अपने बाप के दोस्तों को अज़ीज़ रखना है ।

सहीह इब्ने हब्बान में हज़रते अबू बुरदा रज़ीअल्लाहो अन्हो  से मरवी है कि मैं मदीने में आया तो अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो  मेरे यहां तशरीफ़ लाए और फ़रमाया : जानते हो मैं तुम्हारे पास क्यूं आया हूं? मैं ने कहा : नहीं। उन्हों ने फ़रमाया : मैं ने हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम को फ़रमाते हुवे सुना है कि जो शख्स कब्र में सोए हुवे बाप से नेकी चाहता है वोह उस के दोस्तों से हुस्ने सुलूक करे, मेरे बाप उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो  और तुम्हारे बाप में भाईचारा था मैं इस लिये हाज़िर हुवा हूं। ।

 

एक ग़ार में बंद तीन नौजवानो का किस्सा

सहीहैन और दूसरी कुतुबे अहादीस में मरवी है कि अगले वक्तों में तीन आदमी तलाशे मुआश के लिये सफ़र में निकले, रास्ते में उन्हें बारिश ने आ लिया और वोह भाग कर एक गार में छुप गए, अचानक एक चट्टान लुढ़क कर गार के मुंह पर आ कर रुक गई और गार का मुंह बन्द हो गया, उन्हों ने आपस में येह तै किया कि हर एक अपने अच्छे आ माल को याद कर के दुआ मांगे ताकि येह चट्टान हट जाए, एक और रिवायत के लफ़्ज़ येह हैं : उन्हों ने एक दूसरे से कहा : ज़रा सोचो और कोई ऐसा अमल याद करो जो तुम ने अल्लाह की रिज़ाजूई में किया हो और उस अमल को वास्ता बना कर इस चट्टान से नजात की दुआ मांगो, एक और रिवायत के अल्फ़ाज़ हैं : चट्टान गिरने की वज्ह से गार का निशान मिट गया,

 

अल्लाह तआला के सिवा कोई नहीं जानता हम कहां हैं, अल्लाह तआला से अपने बेहतरीन अमल को सामने रखते हुवे दुआ करें, तब उन में से एक ने कहा : इलाहल आलमीन ! मेरे वालिदैन बूढ़े थे, मैं उन से पहले शाम को किसी बच्चे को दूध नहीं पिलाया करता था। एक मरतबा ऐसा इत्तिफ़ाक़ हुवा, मैं किसी काम से चला गया, जब मैं वापस आया तो वोह सो चुके थे, मैं ने दूध दोहा और सारी रात दूध ले कर सिरहाने खड़ा रहा यहां तक कि सुब्ह हो गई और मेरे बच्चे सारी रात भूके सोते रहे, ऐ रब्बे जुल जलाल ! मैं ने येह सब कुछ तेरी रज़ाजूई के लिये किया था, अब तू येह चट्टान हम से हटा दे इस दुआ के बाद चट्टान इतनी हट गई कि सूरज की रोशनी अन्दर आने लगी।।)

एक रिवायत के अल्फ़ाज़ हैं : मेरे छोटे बच्चे थे, मैं जब बकरियां चरा कर वापस आता तो दूध दोह कर पहले वालिदैन को पिलाता फिर बच्चों को देता । एक मरतबा मुझे ज़रूरी काम के लिये जाना हुवा, वापसी उस वक्त हुई जब मेरे वालिदैन सो चुके थे, मैं ने हस्बे मा’मूल दूध निकाला और ले कर वालिदैन के सिरहाने खड़ा हो गया और बच्चे मेरे क़दमों में पड़े दूध तलब करते रहे मगर मैं ने वालिदैन को दूध पिलाए बिगैर इन्हें दूध देना मुनासिब न समझा यहां तक कि सुब्ह हो गई। ऐ अल्लाह ! अगर मेरा येह अमल तेरी रज़ाजूई में था तो इस चट्टान को हटा दे कि हम आस्मान को देख सकें। चट्टान इतनी हट गई कि उन्हें आस्मान नज़र आने लगा। दूसरे ने चचाज़ाद बहन से ज़िना से बाज़ रहने का जिक्र किया और तीसरे ने मजदूर की उजरत की अमानत दारी का ज़िक्र किया यहां तक कि चट्टान मुकम्मल तौर पर हट गई और वोह बाहर निकल गए।

 

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 

 

 

सिला रहमी का सवाब और कता रहमी का अज़ाब

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

सिला रहमी रिश्तेदारी निभाना, रिश्तेदारों पर रहम करना

कता रहमी – रिश्तेदारी ना निभाना, रिश्तों को तोड़ देना

फ़रमाने इलाही है :  “अल्लाह से डरो जिस के नाम पर मांगते हो और रिश्तों का लिहाज़ रखो”। फ़रमाने इलाही है: “तो क्या तुम्हारे यह ढंग नज़र आते हैं कि अगर तुम्हें हुकूमत मिले तो तुम ज़मीन पर फ़ितना व फ़साद फैलाओ और अपने रिश्ते तोड़ दो। यह वह लोग हैं जिन पर अल्लाह तआला ने ला‘नत फ़रमाई जिन्हें हक के सुनने से बहरा और हक के देखने से अन्धा कर दिया”। फ़रमाने इलाही है: “ जो अल्लाह से किये हुवे वा‘दे को तोड़ते हैं और जिस चीज़ के मिलाने का रब ने हुक्म दिया है उस से क़तए तअल्लुक करते हैं और ज़मीन में फ़साद मचाते हैं वह नुक्सान में हैं”।

फ़रमाने इलाही है : “जो लोग अहदे खुदावन्दी को तोड़ते हैं और जिस चीज़ के मिलाने का रब तआला ने हुक्म दिया है उस से कता ए तअल्लुक करते हैं उन के लिये ला‘नते खुदावन्दी और बड़ा ठिकाना है”

 

सिला रहमी और कता रहमी के बारे में  नबिय्ये अकरम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम के इरशादात

सहीहैन में हज़रते अबू हुरैरा रज़ीअल्लाहो अन्हो  से मरवी है : रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया :  “जब अल्लाह तआला मख्लूक की पैदाइश से फ़ारिग हो गया तो क़राबत ने खड़े हो कर अर्ज़ किया : मैं तुझ से क़तए रहमी की पनाह चाहती हूं, रब तआला ने फ़रमाया : क्या तू इस बात पर राज़ी है कि जिस ने तुझ से तअल्लुक जोड़ा, मैं उस से तअल्लुक जोडूंगा और जिस ने तुझ से कतअ कर लिया मैं उसे कतअ कर दूंगा। उस ने कहा : मैं राजी हूं। फिर हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने यह आयत पढ़ी।

 

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हज़रते अबी बक्र रज़ीअल्लाहो अन्हो  से मरवी है : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया कि “बगावत और कता ए रहमी दो ऐसे गुनाह हैं जिन पर दुन्या और आख़िरत में अज़ाब दिया जाता है”।

सहीहैन में है कि “कता ए रहमी करने वाला जन्नत में नहीं जाएगा।“

मुस्नदे अहमद में है : “इन्सानों के आ‘माल हर जुमा रात को पेश किये जाते हैं मगर क़तए रहमी करने वाले का कोई अमल मक्बूल नहीं होता”।

बैहक़ी से रिवायत है : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : “जिब्रील  पन्दरहवीं शा‘बान की रात को मेरे पास आए और कहा : आज की रात अल्लाह तआला बनू कल्ब की बकरियों के बालों के बराबर गुनहगारों को बख्श देता है मगर मुशरिक, कीना परवर, कता ए रेहम, तकब्बुर से अपने तहबन्द को घसीट कर चलने वाला, वालिदैन का नाफरमान और शराबी को नहीं बख्शा जाता”

इब्ने हब्बान से मरवी है : तीन आदमी जन्नत में नहीं जाएंगे : शराबी, कता ए रहमी करने वाला , जादूगर ।

मुस्नदे अहमद, इब्ने अबिदुन्या और बैहक़ी से मरवी है : इस उम्मत के कुछ लोग खाने पीने और लह्वो लइब में रातें गुजारेंगे, जब सुब्ह होगी तो इन की सूरतें मस्ख हो जाएंगी, इन्हें जमीन में धंसा दिया जाएगा, सुब्ह को लोग एक दूसरे से कहेंगे : फुलां ख़ानदान जमीन में धंस गया है, फुलां मुअज्जज़ अपने घर के साथ ज़मीन में गर्क हो गया है, इन की शराब नोशी, सूद खोरी, कृतए रहमी, नाच गाने पर फ़ोफ्तगी और रेशमी लिबास पहनने की वज्ह से इन पर कौमे लूत की तरह पथ्थरों की बारिश होगी और कौमे आद की तरह उन पर हलाकत खेज़ आंधियां भेजी जाएंगी जिन से वोह अपने कबाइल समेत हलाक हो जाएंगे।

 

सिला ए रहमी का सवाब बहुत जल्द मिलता है

तबरानी ने औसत में हज़रते जाबिर रज़ीअल्लाहो अन्हो  से रिवायत की है : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम काशानए नबुव्वत से बाहर तशरीफ़ लाए, हम लोग इकट्ठे बैठे हुवे थे, आप ने हमें देख कर फ़रमाया : ऐ मुसलमानो ! अल्लाह से डरो और सिलए रहमी करो क्यूंकि सिलए रहमी का सवाब बहुत जल्द मिलता है, जुल्म व ज़ियादती से बचो क्यूंकि उस की गिरिफ़्त बहुत जल्द होती है, वालिदैन की नाफरमानी से बचो, जन्नत की खुश्बू हज़ार साल के फ़ासिले से आएगी मगर वालिदैन का नाफरमान इस से महरूम रहेगा, क़राबत न रखने वाला, बूढा जानी और तकब्बुर से इज़ार घसीटने वाला, इस से महरूम रहेंगे”

अस्बहानी से मरवी है : हम रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की खिदमत में बैठे हुवे थे, आप ने फ़रमाया : कातेए रेहम हमारी मजलिस में न बैठे, मजलिस में से एक जवान उठ कर खाला के यहाँ  चला गया, उन के दरमियान कोई तनाजुआ था जिस की उस ने मुआफ़ी मांगी। दोनों ने एक दूसरे को मुआफ़ कर दिया और वोह दोबारा हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम

की मजलिस में बैठ गया, आप ने फ़रमाया : “उस कौम पर रहमते खुदावन्दी का नुजूल नहीं होता जिस में कातेए रेहम मौजूद हो”

इस की ताईद इस रिवायत से होती है जिस में मरवी है : हज़रते अबू हुरैरा रज़ीअल्लाहो अन्हो  हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की अहादीस सुना रहे थे। आप ने कहा कि हर कातेए रेहूम हमारी महफ़िल से उठ जाए। एक जवान उठ कर अपनी ख़ाला के यहाँ गया जिस से उस का दो साल पुराना झगड़ा था, जब दोनों एक दूसरे से राजी हो गए तो उस जवान से ख़ाला ने कहा : तुम जा कर इस का सबब पूछो, आखिर ऐसा क्यूं हुवा ? हज़रते अबू हुरैरा रज़ीअल्लाहो अन्हो  ने कहा कि मैं ने हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से सुना है, आप ने फ़रमाया : जिस कौम में कातेए रेहम हो, उस पर अल्लाह की रहमत का नुजूल नहीं होता।

 

रिश्तेदारी तोड़ने वाले पर रहम नहीं किया जाता

तबरानी में आ’मस की रिवायत है : हज़रते इब्ने मसऊद रज़ीअल्लाहो अन्हो  एक सुब्ह महफ़िल में बैठे हुवे थे, इन्हों ने कहा : मैं कातेए रेहम को अल्लाह की कसम देता हूं कि वोह यहां से उठ जाए ताकि हम अल्लाह तआला से मगफिरत की दुआ करें क्यूंकि कातेए रेहम पर आस्मान के दरवाजे बन्द रहते हैं। (अगर वोह यहां मौजूद रहेगा तो हमारी दुआ कबूल नहीं होगी)

सहीहैन में है : क़राबत और रिश्तेदारी अशें खुदा से मुअल्लक है और कहती है : जिस ने मुझे मिलाया अल्लाह उसे मिलाए और जिस ने मुझ से क़तए तअल्लुक किया अल्लाह तआला उस से क़तए तअल्लुक करे ।)

हज़रते अब्दुर्रहमान बिन औफ़ रज़ीअल्लाहो अन्हो  कहते हैं : मैं ने हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से सुना। आप फ़रमा रहे थे : अल्लाह तआला फ़रमाता है : मैं अल्लाह हूं, मैं रहमान हूं, मैं ने रहम को पैदा किया और इसे अपने नाम से मुश्तक किया, जिस ने सिलए रहमी की मैं उसे अपनी रहमत से मिलाऊंगा और जिस ने कता ए रहमी की मैं उसे अपनी रहमत से दूर कर दूंगा।

मुस्नदे अहमद में रिवायत है कि सब से बड़ा सूद मुसलमान के माल को नाहक खाना है और क़राबत व सिलए रहमी अल्लाह तआला के नाम की एक शाख़ है, जिस ने सिलए रहमी न की अल्लाह तआला उस पर जन्नत हराम कर देता है।

सहीह इब्ने हब्बान में है : रहम रब्बे जुल जलाल की एक अता है, रहम ने अल्लाह तआला की बारगाह में अर्ज की : ऐ रब ! मुझ पर जुल्म हुवा, मुझे बुरा कहा गया, मुझे कतअ किया गया, रब तआला ने फ़रमाया : जो तुझे मिलाएगा मैं उसे अपनी रहमत से मिलाऊंगा, जो तुझे काटेगा मैं उसे अपनी रहमत से दूर कर दूंगा।

बज्जार ने रिवायत की है : रहम (क़राबत व रिश्तेदारी) अशें खुदा से चिमटी हुई अर्ज़ करती है : ऐ अल्लाह ! जिस ने मुझे मिलाया तू उसे मिला, जिस ने मुझे काटा तू उस से तअल्लुक़ मुन्कतअ फ़रमा ! रब तआला ने फ़रमाया : मैं ने तेरा नाम अपने नाम रहमान और रहीम से मुश्तक किया है जिस ने तुझे मिलाया मैं उसे अपनी रहमत से मिलाऊंगा, जिस ने तुझ से तअल्लुक मुन्कृत किया मैं उस से रहमत को मुन्कत कर लूंगा।

बज्जार की रिवायत है : तीन चीजें अशें खुदा से लटकी हुई हैं, कराबत कहती है : ऐ अल्लाह ! मैं तेरे साथ हूं, कभी तुझ से जुदा न होऊंगी, अमानत कहती है : ऐ अल्लाह ! मैं तेरे साथ हूं, मैं तेरी रहमत से कभी जुदा न होऊंगी, नेमत कहती है : ऐ अल्लाह ! मैं तेरी रहमत से जुदाई नहीं चाहती, मेरा इन्कार न किया जाए ।

बैहक़ी की रिवायत है : खसलत या सरिश्त अर्श के दरवाज़ों से मुअल्लक है जब कि रहम में तश्कीक वाकेअ हो जाए और गुनाहों पर अमल बढ़ जाए और अहकामे इलाहिय्या पर अमल न करने पर जुरअत पैदा हो जाए तो अल्लाह तआला सरिश्त को भेजता है जो उस के कल्ब पर हावी हो जाती है और इस के बाद उस को गुनाहों का शुऊर बाकी नहीं रहता।

 

रिज्क में बरकत और तवील उम्र के लिए सिला ए रहमी

 

सहीहैन में है : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : जो शख्स अल्लाह और क़ियामत पर ईमान रखता है वोह अपने मेहमान की इज्जत करे, सिलए रहमी करे और अच्छी बात करे या चुप रहे। एक और रिवायत है : जो शख्स तवील उम्र और फराखिये रिज्क की तमन्ना रखता है उसे चाहिये वोह सिलए रहमी करे

हज़रते अबू हुरैरा रज़ीअल्लाहो अन्हो  से मरवी है : मैं ने रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम को फ़रमाते सुना : “जो शख़्स फ़राखिये रिज्क और उम्रे तवील को पसन्द करता है वोह सिलए रहमी करे ।

मजीद फ़रमाया : अपना नसब याद करो ताकि रिश्तेदारों को पहचान सको, इस लिये कि रिश्तेदारों से मैल मिलाप में ख़ानदान की महब्बत बढ़ती है, मालो दौलत ज़ियादा होती है और उम्र तवील हो जाती है।

बज्जार और हाकिम की रिवायत है : जो शख्स येह तमन्ना रखता हो कि उस की उम्र तवील हो, रिज्क में कुशादगी हो और बुरी मौत से बच जाए वोह अल्लाह से डरे और सिलए रहमी करे।

हाकिम और बज्जार की रिवायत है : फ़रमाने नबवी है, तौरात में मरकूम है कि जो उम्र तवील और ज़ियादतिये रिज्क का ख्वाहिश्मन्द हो वोह सिलए रहमी करे

अबू या’ला ने बनू खसअम के एक शख्स से रिवायत की है : उस ने कहा : मैं हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की खिदमत में हाज़िर हुवा, आप उस वक्त सहाबए किराम के साथ तशरीफ़ फ़रमा थे, मैं ने पूछा : आप ने रसूले ख़ुदा होने का दावा किया है ? आप ने फ़रमाया : हां ! मैं ने पूछा : ऐ नबिय्यल्लाह ! मुझे बताइये कौन सा अमल अल्लाह तआला को ज़ियादा पसन्द है? आप ने फ़रमाया : अल्लाह के साथ ईमान लाना । मैं ने पूछा : फिर ? फ़रमाया : सिलए रहमी ! मैं ने पूछा : और कौन सा अमल अल्लाह तआला को सब से ज़ियादा ना पसन्द है ? आप ने फ़रमाया : अल्लाह तआला के साथ किसी को शरीक ठहराना । मैं ने पूछा : इस के बा’द ? फ़रमाया : कता ए रहमी ! मैं ने पूछा : फिर ? आप ने फ़रमाया : बुराइयों की तरगीब देना और नेकी से रोकना ।

बुखारी व मुस्लिम की रिवायत है : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ऊंटनी पर सुवार सहाबए किराम के साथ सफ़र में जा रहे थे कि एक बदवी ने आ कर आप की ऊंटनी की मुहार पकड़ ली और कहा : हुजूर ! मुझे ऐसा अमल बतलाइये जो जन्नत के करीब और जहन्नम से दूर कर दे। आप ठहर गए और सहाबए किराम की तरफ़ देख कर फ़रमाया : येह शख्स हिदायत याब हो गया। हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने बदवी से फ़रमाया कि अपना सुवाल दोहराओ, उस के दोहराने पर आप ने इरशाद फ़रमाया : अल्लाह तआला को वहूदहू ला शरीक जान कर उस की इबादत कर, नमाज़ पढ़, जकात दे और सिलए रहमी कर और अब मेरी ऊंटनी की मुहार छोड़ दे। जब बदवी चला गया तो आप ने इरशाद फ़रमाया : अगर येह इन बातों पर अमल करता रहा तो जन्नत में जाएगा।

तबरानी की रिवायत है : आप ने फ़रमाया : एक कौम ऐसी है कि अल्लाह तआला उस के शहरों को आबाद करता है, उस के माल को बढ़ाता है और जब से उन्हें पैदा किया है कभी नाराजी की निगाह से उन्हें नहीं देखा। पूछा गया : वोह क्यूं ? आप ने फ़रमाया : उस कौम की सिलए रहमी की वज्ह से। (या’नी वोह कौम सिलए रहमी करती है)

 

सिलए रहमी के बारे में चन्द अहादीसे मुबारका

“मुस्नदे अहमद” की रिवायत है : जिसे नर्मी दी गई उसे दीनो दुन्या की भलाई से हिस्सा दिया गया, अच्छी हमसाएगी और हुस्ने खुल्क का नतीजा शहरों की आबादी और उम्रों की दराज़ी है ।

अबुश्शैख, इब्ने हब्बान और बैहक़ी की रिवायत है कि सहाबए किराम ने सुवाल किया : या रसूलल्लाह ! सब से बेहतर इन्सान कौन सा है? आप ने फ़रमाया : रब से ज़ियादा डरने वाला, ज़ियादा सिलए रहमी करने वाला और नेकियों का हुक्म देने वाला, बुराइयों से रोकने वाला।

तबरानी की रिवायत है : हज़रते अबू जर रज़ीअल्लाहो अन्हो  कहते हैं कि मुझे मेरे हबीब सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने चन्द अच्छी चीज़ों की वसिय्यत फ़रमाई है और वोह यह हैं : मैं अपने से ऊपर वाले को नहीं बल्कि नीचे वाले को देखू, मैं यतीमों से महब्बत रखू और इन से करीब रहूं, मैं सिलए रहमी करूं अगर्चे रिश्तेदार पीठ फेर जाएं, अल्लाह तआला के मुआमले में किसी से न डरूं, सच्ची बात अगर्चे तल्ख हो मैं कहता रहूं, “ला हौला वाला कुव्वता इल्ला बिल्लाह” कसरत से पढ़ता रहूं क्यूंकि यह जन्नत का खज़ाना है।

“सहीहैन” की रिवायत है : उम्मुल मोमिनीन हज़रते मैमूना रज़ीअल्लाहो अन्हुम  ने हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम  से दरयाफ़्त किये बिगैर अपनी लौंडी आज़ाद कर दी। जब हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम इन के यहां तशरीफ़ लाए तो इन्हों ने कहा : या रसूलल्लाह ! आप को मालूम है मैं ने अपनी लौंडी को आज़ाद कर दिया है ? आप ने फ़रमाया : वाकेई ? अर्ज़ की : जी हां। आप ने फ़रमाया : अगर तुम वोह लौंडी अपने ख़ालाज़ाद को दे देती तो तुम्हें बहुत ज़ियादा सवाब मिलता।.

‘इब्ने हब्बान’ और ‘हाकिम’ की रिवायत है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की बारगाह में एक शख्स हाज़िर हुवा और कहा कि मैं ने बहुत बड़ा गुनाह किया है, तौबा की कोई सूरत बतलाइये ! आप सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम  ने पूछा : तेरी मां जिन्दा है ? कहा : “नहीं।” आप ने फिर पूछा : तुम्हारी खाला जिन्दा है ? अर्ज की : हां या रसूलल्लाह ! फ़रमाया : “जाओ ! और उस की खिदमत करो।” (येही सिलए रहमी है)

बुख़ारी वगैरा में है : सिलए रहमी येह नहीं कि मिलने जुलने वाले रिश्तेदारों से मेल मिलाप बर करार रखे बल्कि सिलए रहमी येह है कि जो रिश्तेदार तअल्लुकात मुन्कतअ कर चुके हों उन से भी मेल मिलाप बर करार रखे।

तिर्मिज़ी की रिवायत है : उन लोगों से न बनो जो कहते हैं अगर लोग हमारे साथ भलाई करेंगे तो हम भी भलाई करेंगे और अगर वोह हम पर ज़ियादती करेंगे तो हम भी ज़ियादती करेंगे बल्कि तुम इस बात के आदी बनो कि अगर लोग तुम्हारे साथ भलाई करें तो भलाई करो और अगर वोह ज़ियादती करें तो तुम ज़ियादती न करो।

मुस्लिम की रिवायत है एक शख्स ने हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की खिदमत में अर्ज की : मैं रिश्तेदारों से तअल्लुक जोड़ता हूं मगर वोह मुझ से तअल्लुक़ तोड़ते हैं, मैं उन से भलाई करता हूं, वोह मेरी बुराई करते हैं, मैं उन से हिल्म व बुर्दबारी का सुलूक करता हूं, वोह मुझे ख़ातिर में नहीं लाते, आप ने फ़रमाया : अगर तेरी बातें सच्ची हैं तो तू ने एक दूर दराज़ रास्ते को तै कर लिया और जब तक तू इस आदत पर काइम रहेगा अल्लाह तआला तेरा हामी व नासिर होगा।

तबरानी, इब्ने खुर्जामा और हाकिम की रिवायत है कि सब से बेहतरीन सदक़ा कीना परवर रिश्तेदार को कुछ देना है, हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम के इस फरमान का भी येही मतलब है कि  जो रिश्तेदार तुझ से तअल्लुक मुन्कतअ कर ले तू उस से तअल्लुक जोड़।

बज्जाज़, हाकिम और तबरानी की रिवायत है कि जिस में येह तीन सिफ़ात पाई जाएंगी उस का हिसाब इन्तिहाई आसान होगा, सहाबा ने अर्ज की : हुजूर वोह कौन सी हैं ? फ़रमाया : जो तुझे महरूम रखे तू उसे देता रह, जो तअल्लुक़ तोड़े उस से तअल्लुक जोड़ता रह और जो तुझ पर जुल्म करे तू उसे मुआफ करता रह, तेरा ठिकाना जन्नत में होगा।

अहमद की रिवायत है, हज़रते उक्बा बिन आमिर रज़ीअल्लाहो अन्हो  कहते हैं कि मैं हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की ख़िदमत में हाज़िर हुवा और आप का दस्ते अक्दस थाम कर अर्ज़ किया : या रसूलल्लाह ! मुझे बेहतरीन आ’माल बतलाइये । आप ने फ़रमाया : “उक्बा ! कता ए तअल्लुक़ करने वाले से सिलए रहमी कर, जो तुझे महरूम करे उसे अता कर और जो तुझ पर जुल्म करे उसे मुआफ कर दे।”

हाकिम की रिवायत में है, जो दराज़िये उम्र और फराखिये रिज्क की आरजू रखता हो, वोह सिलए रहमी करे ।

तबरानी की रिवायत है : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : लोगो ! मैं तुम को दुन्या और आखिरत की बेहतरीन आदतें बतलाता हूं, तुम तअल्लुकात मुन्कत करने वाले रिश्तेदारों से सिलए रहमी करते रहो, जो तुम को महरूम रखे, उसे देते रहो और जो ज़ियादती करे उसे मुआफ़ करते रहो।

तबरानी की रिवायत है : आप ने फ़रमाया : क़तए तअल्लुक़ करने वालों से सिलए रहमी कर, महरूम करने वाले को अता कर और जिस ने तुझे गालियां दीं उस से दरगुज़र कर।

 

बज्जाज़ की रिवायत है : नबिय्ये करीम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : मैं तुम्हें वोह बातें न बतलाऊं जिन से दरजात बुलन्द होते हैं । तबरानी की रिवायत में है, मैं तुम्हें उस चीज़ की ख़बर न दूं जिस से अल्लाह तआला इज्जत देता है और दरजात बुलन्द करता है ? सहाबए किराम ने अर्ज किया : ज़रूर बतलाइये या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ! आप ने फ़रमाया : जो तुम से ए’राज़ करे उस से दर गुज़र करो, जिस ने तुम पर जुल्म किया उसे मुआफ़ कर दो, जिस ने तुम को महरूम किया उसे अता करो और जिस ने तअल्लुकात ख़त्म किये उस से तअल्लुकात उस्तुवार करो।

इब्ने माजा की रिवायत है कि सब आ’माल से जल्दी अज्र पाने वाली चीज़ एहसान और सिलए रहमी है या’नी एहसान और सिलए रहमी से ज़ियादा जल्द अज्र और किसी अमल का नहीं मिलता और सब आ’माल से जल्दी अज़ाब लाने वाली चीज़ जुल्म व ज़ियादती और कतए रहमी है।

तबरानी की रिवायत है : झूट, कता ए रहमी और खियानत का मुर्तकिब इस लाइक़ होता है कि अल्लाह तआला उसे दुन्या में भी अज़ाब दे और आख़िरत में भी सज़ा का मुस्तहिक गरदाने और सब आ’माल से जल्दी अज्र सिलए रहमी का मिलता है अगर्चे उस घर के लोग गुनहगार होते हैं मगर सिलए रहमी की वज्ह से उन का माल भी खूब बढ़ता है और उन की औलाद  भी ब कसरत होती है।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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ज़िना बदकारी यानी व्यभिचार की सज़ा

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 

फ़रमाने इलाही है :

वो हराम और बदकारियों से अपनी शर्मगाहों की हिफ़ाज़त करते हैं।

एक और आयत में इरशादे रब्बानी है :

या‘नी छोटे बड़े ज़ाहिर पोशीदा किसी भी गुनाह के करीब मत जाओ। या’नी न ही किसी बड़ी बे हयाई का इर्तिकाब करो जैसा कि ज़िना और न छोटी का जैसा कि गैर महरम को छूना, देखना वगैरा कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का इरशादे मुबारक है, “हाथ ज़ीना करते हैं, पैर ज़िना करते हैं और आंखें ज़िना करती हैं.”

फ़रमाने इलाही है :

मोमिनों से कह दीजिये अपनी आंखें बन्द कर लें और अपनी शर्मगाहों की हिफ़ाज़त करें।

 

अल्लाह तआला ने मुसलमान मर्दो और औरतों को हुक्म दिया है कि वो हराम की तरफ़ न देखें और अपनी शर्मगाहों को इरतिकाबे हराम से महफूज रखें। अल्लाह तआला ने कई आयात में ज़िना की हुरमत बयान फ़रमाई है, एक जगह इरशादे रब्बानी है :

जो शख्स ज़िना करता है उसे असाम में डाला जाएगा। असाम के मुतअल्लिक़ कहा गया है कि जहन्नम की एक वादी है। बा’ज़ उलमा ने कहा है कि वो जहन्नम का एक गार है, जब उस का मुंह खोला जाएगा तो उस की शदीद बदबू से जहन्नमी चीख उठेंगे।

 

ज़ीना बदकारी में छे मुसीबतें हैं

बा’ज़ सहाबए किराम रज़ीअल्लाहो अन्हो  से मरवी है : ज़िना से बचो ! इस में छे मुसीबतें हैं जिन में से तीन का तअल्लुक दुनिया से है और तीन का आख़िरत से । दुनिया में रिज्क कम हो जाता है, ज़िन्दगी मुख्तसर हो जाती है और चेहरा मस्ख हो जाता है, आखिरत में खुदा की नाराज़ी, सख्त पूछ ताछ  और जहन्नम में दाखिल होना है।

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रिवायत है कि हज़रते मूसा अलैहहिससलाम  ने ज़ानी की सज़ा के बारे में पूछा तो रब तआला ने फ़रमाया : मैं उसे आग की ज़िरह पहनाऊंगा। वो ऐसी वज़नी है कि अगर बहुत बड़े पहाड़ पर रख दी जाए तो वो भी रेज़ा रेज़ा हो जाए। कहते हैं  इब्लीस को हज़ार बदकार मर्दो से एक बदकार औरत ज़ियादा पसन्द होती है।

‘मसाबीह’ में इरशादे रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम है :  “जब बन्दा ज़िना करता है तो उस का ईमान निकल कर उस के सर पर छतरी की तरह मुअल्लक रहता है और जब वो इस गुनाह से फ़ारिग हो जाता है तो उस का ईमान फिर लौट आता है”

किताबे इक़नाअ में फ़रमाने हुजूरे पुरनूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम है : अल्लाह तआला के नज़दीक नुत्फे को हराम कारी में सर्फ करने से बड़ा कोई गुनाह नहीं है और लिवातत ज़ीना से भी बदतर है, जैसा कि हज़रते अनस बिन मालिक रज़ी अल्लाहो अन्हो  से मरवी है : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया कि जन्नत की खुश्बू पांच सो साल के सफ़र की दूरी से आएगी मगर लूती इस से महरूम रहेगा।

 

अमरद एक फितना है

हज़रते अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो  घर से बाहर बैठे थे कि एक हसीन लड़का (अम्रद) आता हुवा नज़र आया आप दौड़ कर घर में घुस गए और दरवाज़ा बन्द कर लिया, कुछ देर बा’द पूछा : फ़ितना चला गया या नहीं ? लोगों ने कहा : चला गया। तब आप बाहर तशरीफ़ लाए और फ़रमाया : फ़रमाने नबवी स.अ.व. है : इन की तरफ़ देखना, गुफ्तगू करना और इन के पास बैठना हराम है।

हज़रते काजी इमाम रहमतुल्लाह अलैह का कौल है : मैं ने बा’ज़ मशाइख से सुना है कि औरत के साथ एक शैतान और हसीन लड़के के साथ अठ्ठारह शैतान होते हैं।

रिवायत है कि जिस ने शहवत के साथ लड़के को बोसा दिया वो पांच सो साल जहन्नम में जलेगा और जिस ने किसी औरत का बोसा लिया उस ने गोया सत्तर बाकिरा खुवातीन के साथ ज़ीना किया और जिस ने किसी बाकिरा औरत से ज़िना किया उस ने गोया सत्तर हज़ार शादीशुदा औरतों से ज़ीना किया।

‘रौनकुत्तफ़ासीर’ में कल्बी रहमतुल्लाह अलैह से मन्कूल है : सब से पहले लिवातत इब्लीस ने शुरू की, वो लूत की क़ौम में एक हसीनो जमील लड़के की सूरत में आया और लोगों को अपनी तरफ़ माइल किया यहां तक कि लिवातत उन लोगों की आदत बन गई, जो भी मुसाफ़िर आता वो उस से बद फ़ेली करते । हज़रते लूत  ने उन्हें इस फे’ले बद से रोका

अल्लाह की तरफ़ बुलाया और अज़ाबे ख़ुदावन्दी से डराया तो वो कहने लगे : अगर तुम सच्चे हो तो जाओ अज़ाब ले आओ ! हज़रते लूत  ने अल्लाह रब्बुल इज्जत से दुआ मांगी : जिस के जवाब में उन पर पथ्थरों की बारिश हुई, हर पथ्थर पर एक आदमी का नाम लिखा हुवा था और वो उस आदमी को आ कर लगा, अल्लाह तआला का फरमान है :

 

कौमे लूत के एक ताजिर का किस्सा

हज़रते लूत अलैहिस्सलाम  की कौम का एक ताजिर मक्का में ब गरजे तिजारत आया उस के नाम का पथ्थर वहीं पहुंच गया मगर फ़िरिश्तों ने येह कह कर रोक दिया कि येह अल्लाह का हरम है

चुनान्चे, चालीस दिन येह पथ्थर हरम के बाहर ज़मीनो आस्मान के दरमियान मुअल्लक रहा यहां तक कि वो शख्स तिजारत से फ़ारिग हो कर मक्कए मुअज्जमा से बाहर निकला और वो पथ्थर उसे जा लगा जिस से वो हलाक हो गया। हज़रते लूत अलैहिस्सलाम  अपने तमाम अहले खाना को ले कर बस्ती से निकल गए, और फ़रमाया : कोई मुड़ कर न देखे । जब क़ौम पर अज़ाब नाज़िल हुवा तो इन की बीवी ने आवाजें सुन कर पीछे देखा और कहा : हाए मेरी क़ौम ! जिस की पादाश में उसे भी एक पथ्थर लगा और वो हलाक हो गई।

 

मुजाहिद कहते हैं : जब सुब्ह करीब हुई तो हज़रते जिब्रील ने उन बस्तियों को परों पर उठा लिया और इतनी बुलन्दी तक ले गए कि आस्मान के फ़िरिश्तों ने उन के कुत्तों को भोंकता और मुर्गों की बांगों को सुन लिया, उस वक़्त येह बस्तियां उलट दी गई, सब से पहले उन के मकानात गिरे, फिर वो खुद औंधे मुंह जमीन पर आ रहे और उन पर पथ्थर बरसाए गए।

कहते हैं कि येह पांच शहर थे जिन में सब से बड़ा सदूम का शहर था, इन शहरों की आबादी चार लाख थी, अल्लाह तआला ने इन्हें सूरए बराअत में मोतफ़िकात के नाम से याद किया है।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

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ज़कात अदा न करने वाले पर अजाब

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 फ़रमाने इलाही है

“और वो लोग जो ज़कात अदा करने वाले हैं।“

हज़रते अबू हुरैरा रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम  ने फ़रमाया : “जो शख्स, अपने मालो दौलत का हक़ अदा नहीं करता कियामत के दिन उस के पहलू और पीठ जहन्नम के सख्त गर्म पथ्थरों से दागी जाएगी और उस का जिस्म वसीअ कर दिया जाएगा और जब कभी उस की हरारत में कमी आएगी उस को बढ़ा दिया जाएगा और दिन उस के लिये तवील कर दिया जाएगा जिस की मिक्दार पचास हज़ार साल होगी यहां तक कि बन्दों के आ’माल का फैसला होगा फिर वो जन्नत की तरफ़ अपना रास्ता इख्तियार करेगा”

फ़रमाने इलाही है :

और जो लोग सोना चांदी जम्अ करते हैं और इसे राहे खुदा में खर्च नहीं करते उन्हें अज़ाबे अलीम  की खुश खबरी दे दो जिस दिन उन के माल को जहन्नम की आग में तपाया जाएगा और इस से उन के पहलूओं, पेशानियों और पीठों को दागा जाएगा कि येह है जो कुछ तुम ने जम्अ किया था अब अपने जम्अ कर्दा माल का मज़ा चखो ।

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कियामत के दिन “फुकरा” (गरीब)  मालदारों के लिये बाइसे हलाकत होंगे.

फ़रमाने नबवी है कि “क़ियामत के दिन फुकरा, मालदारों  के लिये हलाकत का सबब बनेंगे, जब वो अल्लाह तआला की बारगाह में अर्ज करेंगे : ऐ अल्लाह ! इन्हों ने हमारे हुकूक गसब कर के हम पर जुल्म किया था। रब फ़रमाएगा : मुझे अपनी इज्जतो जलाल की क़सम ! आज मैं तुम्हें अपने जवारे रहमत में जगह दूंगा और इन्हें अपनी रहमत से दूर कर दूंगा, फिर आप सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने येह आयत पढ़ी :

“मालदार के माल में साइल और फ़कीर का एक मुअय्यन हक़ है”।

 

फ़रमाने नबवी है : “मे’राज की रात मेरा गुज़र एक ऐसी कौम पर हुवा जिन्हों ने आगे पीछे चीथड़े लगाए हुवे थे और जहन्नम का थोहड़, ऐलवा और बदबू दार घास जानवरों की तरह खा रहे थे। मैं ने पूछा : जिब्रील येह कौन हैं ? जिब्रील ने अर्ज़ की : हुजूर येह वो लोग हैं जो अपने माल का सदक़ा (ज़कात) नहीं देते थे। अल्लाह तआला ने नहीं बल्कि इन्हों ने खुद ही अपने आप पर जुल्म किया है”

 

अजीबो गरीब हिकायत – ज़कात अदा ना करने वाले की कब्र में अज़ाब का मंज़र

ताबेईन  की एक जमाअत हज़रते अबी सिनान रज़ीअल्लाहो अन्हो की जियारत के लिये आई, जब उन लोगों को वहां बैठे कुछ देर हो गई तो हज़रते अबी सिनान रज़ीअल्लाहो अन्हो ने कहा : हमारा एक हमसाया फ़ौत हो गया है, चलो ताजिय्यत के लिये उस के भाई के पास चलें, मुहम्मद यूसुफ़ अल फ़िरयाबी कहते हैं : हम आप के साथ रवाना हो गए और उस के भाई के पास पहुंचे तो देखा वो बहुत आहो बुका कर रहा था। हम ने उसे काफ़ी तसल्लियां दीं, सब्र की तल्कीन की मगर उस की गिर्या व जारी बराबर जारी रही। हम ने कहा : क्या तुम्हें मालूम नहीं कि हर शख्स को आखिर मर जाना है ? वो कहने लगा : येह सही है मगर मैं अपने भाई के अज़ाब पर रोता हूं। हम ने पूछा  क्या अल्लाह तआला ने तुम्हें गैब से तुम्हारे भाई के अज़ाब की खबर दी है ? कहने लगा : नहीं बल्कि हुवा यूं कि जब सब लोग मेरे भाई को दफ्न कर के चल दिये तो मैं वहीं बैठा रहा, मैं ने उस की कब्र से आवाज़ सुनी वो कह रहा था आह ! वो मुझे तन्हा छोड़ गए और मैं अज़ाब में मुब्तला हूं, मेरी नमाजें और रोजे कहां गए ? मुझ से बरदाश्त न हो सका, मैं ने उस की कब्र खोदना शुरूअ कर दी ताकि देखू मेरा भाई किस हाल में है ? जूही कब्र खुली ! मैं ने देखा उस की कब्र में आग दहक रही है और उस की गर्दन में आग का तौक पड़ा हुवा है मगर मैं महब्बत में दीवाना वार आगे बढ़ा और उस तौक को उतारना चाहा, जिस को हाथ लगाते ही मेरा येह हाथ उंगलियों समेत जल गया है।

हम ने देखा वाकेई उस का हाथ बिल्कुल सियाह हो चुका था, उस ने सिलसिलए कलाम जारी रखते हुवे कहा : मैं ने उस की कब्र पर मिट्टी डाली और वापस लौट आया। अब अगर मैं न रोऊं तो और कौन रोएगा ? हम ने पूछा : तेरे भाई का कोई ऐसा काम भी था जिस के बाइस उसे येह सज़ा मीली ? उस ने कहा : वो अपने माल की ज़कात नहीं देता था। हम बे साख्ता पुकार उठे कि येह इस फ़रमाने इलाही की तस्दीक है :

“और जो लोग हमारे फल से अता कर्दा माल में बुख्ल पार करते हैं वो इसे अपने लिये बेहतर न समझें बल्कि येह उन के लिये मुसीबत है अन करीब कियामत के  दिन उन्हे तौक पहनाया जाएगा”।

 

तेरे भाई को कियामत से पहले ही अज़ाब दे दिया गया। हज़रते मुहम्मद बिन यूसुफ़ अल फ़िरयाबी कहते हैं : हम वहां से रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम के सहाबी हज़रते अबू ज़र रज़ीअल्लाहो अन्हो की ख़िदमत में आए और उन्हें सारा माजिरा सुना कर दरयाफ्त किया कि यहूदो नसारा मरते हैं मगर उन के साथ कभी ऐसा इत्तिफ़ाक़ नहीं देखा गया, इस की क्या वज्ह है ? इन्हों ने फ़रमाया : इस में कोई शक नहीं कि वो दाइमी अज़ाब में हैं मगर अल्लाह तआला तुम्हें इब्रत हासिल करने के लिये मुसलमानों की येह हालतें दिखाता है।

 

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का इरशाद है : “ज़कात न देने वाले अल्लाह तआला के यहां यहूदो नसारा की तरह हैं, उश्र न देने वाले मजूस की तरह और जो लोग ज़कात और उश्र न दें नबिय्ये करीम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम  और फरिश्तों की ज़बान से मलऊन करार पाए और उन की गवाही ना मक़बूल है”

 

और फ़रमाया : “उस शख्स के लिये खुश खबरी है जिस ने ज़कात और उश्र अदा किया और उस के लिये भी खुश खबरी है जिस पर क़यामत और ज़कात का अज़ाब नहीं है। जिस शख्स ने अपने माल की ज़कात अदा की अल्लाह तआला ने उस से अज़ाबे क़ब्र को उठा लिया, उस पर जहन्नम को हराम कर दिया, उस के लिये बिगैर हिसाब के जन्नत वाजिब कर दी और उसे क़यामत के दिन प्यास नहीं लगेगी.”

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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