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Islamic – पृष्ठ 4 – Net In Hindi.com

फजाइले शाबानुल मुबारक – शाबान महीने की बरकतें

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 

शाबान , शअब से मुश्तक है जिस के मा’ना हैं घाटी वगैरा क्यूंकि इस माह में खैरो बरकत का उमूमी वुरूद होता है इस लिये इसे शाबान  कहा जाता है, जिस तरह घाटी पहाड़ का रास्ता होती है उसी तरह येह महीना खैरो बरकत की राह है।

हज़रते अबू उमामा बाहिली रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम फ़रमाया करते थे कि जब माहे शाबान  आ जाए तो अपने जिस्मों को पाकीज़ा रखो और इस माह में अपनी निय्यतें अच्छी रखो, इन्हें हसीन बनाओ। हुजूर का मा’मूल हज़रते आइशा रज़ीअल्लाहो अन्हा से मरवी है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम रोजे रखते यहां तक कि हम कहते अब हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम बिगैर रोजे के नहीं रहेंगे और फिर आप रोज़ा रखना छोड़ देते यहां तक कि हम कहते अब आप कभी रोजे नहीं रखेंगे और आप शाबान  में अक्सर बहुत रोज़े रखा करते थे ।

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निसाई की हदीस में हज़रते उसामा रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि मैं ने हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से अर्ज की, कि मैं ने आप को साल के किसी महीने में (रमज़ान के फ़र्ज़ रोजों के सिवा) शाबान  से ज़ियादा रोजे रखते नहीं देखा, आप ने फ़रमाया : लोग रजब और रमजान के इस दरमियानी महीने से गाफ़िल होते हैं हालांकि यह ऐसा महीना है जिस में अल्लाह के हुजूर आ’माल लाए जाते हैं लिहाज़ा मैं इस बात को पसन्द करता हूं कि जब मेरा अमल अल्लाह की बारगाह में लाया जाए तो मैं रोज़े से होऊ ।

सहीहैन में हज़रते आइशा रज़ीअल्लाहो अन्हा  से मरवी है कि मैं ने माहे रमज़ान के इलावा और किसी महीने के मुकम्मल रोजे रखते हुवे हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम को नहीं देखा और आप को शाबान  के इलावा किसी और महीने में बहुत ज़ियादा रोजे रखते नहीं देखा।

एक रिवायत में है कि आप शाबान  के पूरे रोजे रखा करते थे।

मुस्लिम की एक रिवायत है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम शाबान  के चन्द दिन छोड़ कर सारा माह रोज़े रखा करते थे।

येह रिवायत पहली रिवायत की तफ्सीर है, पूरे शाबान  से मुराद अक्सर शाबान  है।

शब ए बरात फरिश्तों की ईद और निजात की रात

कहा गया है कि आस्मान के फ़रिश्तों के लिये दो रातें ईद और मसर्रत की हैं जैसे दुनिया में मुसलमानों के लिये दो ईद की रातें ईद व मसर्रत की हैं, फ़रिश्तों की ईद रात, बराअत की रात या’नी पन्दरह शाबान  की रात और लैलतुल क़द्र हैं और मोमिनों की ईदें ईदुल फित्र और ईदुल अज्हा की रातें हैं, इसी लिये पन्दरह शाबान  की रात को फ़रिश्तों की ईद रात का नाम दिया गया है।

अल्लामा सुबकी रहमतुल्लाह अलैह ने इस क़ौल की तफ्सीर में कहा है कि येह रात साल भर के गुनाहों का कफ्फारा बनती है, जुमेंरात हफ्ते के गुनाहों का कफ्फारा और लैलतुल क़द्र उम्र भर के गुनाहों का कफ्फ़ारा होती है या’नी रातों में अल्लाह तआला की इबादत करना और यादे इलाही में सारी रात जाग कर गुज़ार देना गुनाहों के कफ्फारे का सबब होता है इसी लिये इस रात को कफ्फ़ारे की रात भी कहा जाता है और इसे ज़िन्दगी की रात भी कहा जाता है इस लिये कि मुन्ज़िरी ने मरफूअन येह हदीस नक्ल की है कि जिस ने दो ईद रातें और पन्दरह शाबान की रात जाग कर गुज़ार दी तो ऐसे दिन में जब कि तमाम दिल मर जाएंगे, उस इन्सान का दिल नहीं मरेगा।

इसे शफाअत की रात भी कहते हैं क्यूंकि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से मरवी है कि आप ने तेरहवीं की रात अल्लाह तआला से अपनी उम्मत की शफाअत की दुआ मांगी, अल्लाह ने एक तिहाई उम्मत की शफाअत मरहमत फ़रमाई और आप ने चौदहवीं की रात फिर उम्मत की शफाअत की दुआ की तो अल्लाह तआला ने दो तिहाई उम्मत की शफाअत की इजाज़त मरहमत फ़रमाई, फिर आप ने पन्दरहवीं की रात अपनी उम्मत की शफाअत की दरख्वास्त की तो अल्लाह तआला ने तमाम उम्मत की शफाअत मन्जूर फ़रमाई मगर वोह शख्स जो रहमते इलाही से ऊंट की तरह दूर भाग गया और गुनाहों पर इसरार कर के खुद ही दूर से दूर तर होता गया।।) (इस शफ़ाअत से महरूम रहेगा)।

बख्शिश और निजात की रात

इसे बख्रिशश की रात भी कहते हैं । इमाम अहमद रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : अल्लाह तआला पन्दरह शाबान  की रात अपने बन्दों पर जुहूर फ़रमाता है और दो शख्सों के इलावा दुन्या में रहने वाले तमाम इन्सानों को बख्श देता है, इन दो में से एक मुशरिक और दूसरा कीना परवर है।

इसे आज़ादी की रात भी कहा जाता है जैसा कि इब्ने इस्हाक़ ने हज़रते अनस बिन मालिक रज़ीअल्लाहो अन्हो से रिवायत नक्ल की है कि मुझे हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने हज़रते आइशा रज़ीअल्लाहो अन्हा  के घर किसी काम के लिये भेजा, मैं ने हज़रते आइशा रज़ीअल्लाहो अन्हा  से अर्ज की : जल्दी कीजिये मैं हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम को इस हाल में छोड़ आया हूं कि आप पन्दरह शाबान  की रात के सिलसिले में गुफ्तगू फरमा रहे थे।

हज़रते आइशा रज़ीअल्लाहो अन्हा ने मुझ से फ़रमाया : ऐ अनस ! बैठ मैं तुझे शाबान  की पन्दरहवीं रात की बात सुनाऊं, एक मरतबा येह रात मेरी बारी की रात थी, हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम तशरीफ़ लाए और मेरे साथ लिहाफ़ में लैट गए, रात को मैं बेदार हुई तो मैं ने आप को न पाया मैं ने अपने दिल में कहा शायद हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम अपनी लौंडी किब्ज़िय्या की तरफ़ तशरीफ़ ले गए हों, मैं अपने घर से बाहर निकली, जब मैं मस्जिद से गुज़री तो मेरा पाउं आप पर पड़ा, आप फ़रमा रहे थे कि “मेरे जिस्म और ख़याल ने तुझे सजदा किया, मेरा दिल तुझ पर ईमान लाया और येह मेरा हाथ है, मैं ने इस हाथ से कभी अपने जिस्म को गुनाह से आलूदा नहीं किया ऐ रब्बे अज़ीम ! तुझ से ही हर अज़ीम काम की उम्मीद की जाती है, मेरे बड़े गुनाहों को बख़्श, मेरे इस चेहरे ने तुझे सजदा किया जिसे तू ने पैदा फ़रमाया, इसे सूरत बख़्शी, इस में कान और आंख पैदा की।”

फिर आप ने सर उठा कर कहा : ऐ अल्लाह ! मुझे डरने वाला दिल अता फ़रमा जो शिर्क से बरी और मुनज्जा हो, काफ़िर और बद बख़्त न हो, फिर आप सजदे में गिर गए और मैं ने सुना आप उस वक्त फ़रमा रहे थे ऐ अल्लाह ! मैं तेरी रज़ा के साथ तेरी नाराजी से पनाह चाहता हूं, तेरे अफ्व के तुफैल तेरे अज़ाब से, और तेरे तुफैल तेरी गिरिफ़्त से पनाह मांगता हूं, मैं तेरी मुकम्मल तारीफ़ नहीं कर सकता जैसा कि तू ने अपनी तारीफ़ की है, मैं वोही कुछ कहता हूं जो कुछ मेरे भाई दावूद ने कहा : मैं अपना चेहरा अपने आका के लिये खाक आलूद करता हूं और मेरा आका इस लाइक़ है कि उस के आगे चेहरा ख़ाक आलूद किया जाए।

फिर आप ने सर उठाया तो मैं ने अर्ज की : मेरे मां-बाप आप पर कुरबान हों आप यहां तशरीफ़ फ़रमा हैं और मैं वहां थी, आप ने फ़रमाया : ऐ हुमैरा ! क्या तुम नहीं जानती कि पन्दरह शाबान  की रात है, इस रात में अल्लाह तआला बनू कल्ब के रेवड़ों के बालों के बराबर लोगों को आग से आज़ाद फ़रमाता है मगर छे आदमी इस रात भी महरूम रहते हैं, शराब खोर, वालिदैन का ना फ़रमान, आदी जानी, कातेए रेहम, चंग व रबाब बजाने वाला और चुगुल खोर ।।

एक रिवायत में रबाब बजाने वाले की जगह मुसव्विर  का लफ्ज़ है।

इसे किस्मत और तकदीर की रात का नाम भी दिया गया है क्यूंकि अता बिन यसार से मरवी है कि जब शाबान  की पन्दरहवीं शब आती है तो मलकुल मौत को हर उस शख्स का नाम लिखवा दिया जाता है जो इस शाबान  से आयिन्दा शाबान  तक मरने वाला होता है, आदमी पौदे लगाता है, औरतों से निकाह करता है, इमारतें बनाता है हालांकि उस का नाम मुर्दो में होता है और मलकुल मौत इस इन्तिज़ार में होता है कि उसे कब हुक्म मिले और वोह उस की रूह क़ब्ज़ करे ।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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रजब महीने की फ़ज़ीलत और बरकत

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

रजब, तरजीब से मुश्तक है जिस के मा’ना ता’ज़ीम के हैं, इसे असब भी कहा गया है क्यूंकि इस में तौबा करने वालों पर रहमत उंडेली जाती है और नेक अमल करने वालों पर कबूलिय्यत के अन्वार का फैजान होता है। इसे असम्म भी कहा गया है क्यूंकि इस में जंग और किताल वगैरा महसूस नहीं किया जाता । एक कौल येह है कि रजब जन्नत की एक नहर का नाम है जिस का पानी दूध से ज़ियादा सफ़ेद, शहद से ज़ियादा मीठा और बर्फ से ज़ियादा ठन्डा है, इस का पानी वोही पियेगा जो रजब में रोजे रखता है।

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फ़रमाने नबवी है कि रजब अल्लाह का महीना, शा’बान मेरा महीना और रमजान मेरी उम्मत का महीना है ।

रुमुज़ शनास लोगों का कहना है कि रजब के तीन हुरूफ़ हैं : रा, जीम, और बा, रा से रहमते इलाही, जीम से बन्दे के जुर्म और गलतियां और बा से अल्लाह तआला की मेहरबानियां मुराद हैं, गोया अल्लाह फ़रमाता है कि मैं अपने बन्दे के गुनाहों को अपनी रहमत और मेहरबानियों में समो लेता हूं।

हज़रते अबू हुरैरा रज़ीअल्लाहो अन्होसे मरवी है : रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया कि जिस ने रजब की सत्ताईसवीं का रोज़ा रखा उस के लिये साठ माह के रोज़ों का सवाब लिखा जाता है, येह पहला दिन है जिस में हज़रते जिब्रील हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम के लिये पैगामे इलाही ले कर नाज़िल हुवे और इसी माह में हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम को मे’राज शरीफ़ का शरफ़ हासिल हुवा।

फ़रमाने नबवी है कि बा खबर हो जाओ, रजब अल्लाह तआला का माहे असम्म है, जिस ने रजब में एक दिन ईमान और तलबे सवाब की निय्यत से रोज़ा रखा उस ने अल्लाह तआला की अज़ीम रज़ामन्दी को अपने लिये वाजिब कर लिया।

कहा गया है कि अल्लाह तआला ने महीनों में से चार महीनों को जीनत बख़्शी है, जी का’दा, ज़िल हिज्जा, मुहर्रम और रजब । इसी लिये फ़रमाने इलाही है कि “इन में से चार महीने हराम हैं।”

इन में से तीन मिले हुवे हैं और एक तन्हा है और वोह है माहे रजबुल मुरज्जब । बैतुल मुक़द्दस में एक औरत रजब के हर दिन में बारह हज़ार मरतबा “कुल हो अल्लाहो अहद” पढ़ा करती थी और माहे रजबुल मुरज्जब में अदना लिबास पहनती थी, एक बार वोह बीमार हो गई

और उस ने अपने बेटे को वसिय्यत की, कि उसे बकरी के पश्मी लिबास समेत दफ़्न किया जाए। जब वोह मर गई तो उस के फ़रज़न्द ने उसे उम्दा कपड़ों का कफ़न पहनाया, रात को उस ने ख्वाब में मां को देखा वोह कह रही थी, मैं तुझ से राजी नहीं हूं क्यूंकि तू ने मेरी वसिय्यत के खिलाफ़ किया है। वोह घबरा कर उठ बैठा, अपनी मां का वोह लिबास उठाया ताकि उसे भी कब्र में दफ्न कर आए, उस ने जा कर मां की कब्र खोदी मगर उसे क़ब्र में कुछ न मिला, वोह बहुत हैरान हुवा तब उस ने येह निदा सुनी कि क्या तुझे मालूम नहीं कि जिस ने रजब में हमारी इताअत की, हम उसे तन्हा और अकेला नहीं छोड़ते।

रिवायत है कि जब रजब के अव्वलीन जुमुआ की एक तिहाई रात गुज़रती है तो कोई फ़रिश्ता बाक़ी नहीं रहता मगर सब रजब के रोज़ादारों के लिये बख्शिश की दुआ करते हैं।

हज़रते अनस रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है, हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : जिस ने माहे हराम (रजब) में तीन रोजे रखे, उस के लिये नव सो साल की इबादत का सवाब लिखा जाता है। हजरते अनस रज़ीअल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया : मेरे दोनों कान बहरे हों अगर मैं ने हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से येह बात न सुनी हो ।)

नुक्ता

माहे हराम चार हैं, अफ़्ज़ल तरीन फ़िरिश्ते चार हैं, नाज़िल कर्दा किताबों में अफ़्ज़ल किताबें चार हैं, वुजू के आ’ज़ा चार हैं, अफ्ज़ल तरीन कलिमाते तस्बीह चार हैं (या’नी सुबहान अल्लाह, अलहम्दो लिल्लाह ,ला इलाहा इललललाह,अल्लाहो अकबर )

हिसाब के अहम अरकान चार हैं : इकाइयां, दहाइयां, सेंकड़े और हज़ार, अवक़ात चार हैं : साअत, दिन, महीना और साल, साल के मोसिम चार हैं : सर्मा, गर्मा, बहार और खज़ां, तबाएअ चार हैं : हरारत, बरूदत, यबूसत और रतूबत, बदन के हुक्मरान चार हैं : सफ़रा, सौदा, खून और बलगम और खुलफ़ाए राशिदीन भी चार हैं : हज़रते अबू बक्र, हज़रते उमर, हज़रते उस्मान और हज़रते अली रज़ीअल्लाहो अन्हो

दैलमी ने हज़रते आइशा रज़ीअल्लाहो अन्हा  से एक रिवायत नक्ल की है कि नबिय्ये अकरम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : अल्लाह तआला चार रातों में खैरो बरकत की बारिश करता है, ईदुल अज़्हा की रात, ईदुल फ़ित्र की रात, पन्दरह शा’बान की रात और रजबुल मुरज्जब की पहली रात

दैलमी ने हज़रते अबू उमामा रज़ीअल्लाहो अन्हो से रिवायत भी नक्ल की है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : पांच रातें ऐसी हैं जिन में कोई दुआ रद्द नहीं की जाती, रजब की पहली रात, पन्दरह शा’ बान की रात, जुमुआ की रात और दो रातें ईदैन की ।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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इत्तिबाए खवाहिशात व बिदअत

नबिय्ये करीम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का फ़रमान है कि अपने आप को नए उमूर से बचाओ क्यूंकि हर नया काम बिदअत है और हर बिदअत गुमराही मूजिबे नार है।।

फरमाने नबवी है कि जिस ने हमारे इस दीन में कोई ऐसी बात निकाली जो दीन में से नहीं है तो वोह बात मर्दूद है।

एक और इरशाद में है कि तुम पर मेरे तरीके और मेरे बाद आने वाले खुलफ़ाए राशिदीन के तरीके की पैरवी लाज़िम है।

इन अहादीस से येह बात मालूम हुई कि हर वोह बात जो किताब व सुन्नत और इजमाए अइम्मा के मुखालिफ़ हो, वोह काबिले तरदीद बिदअत है (या’नी बिदअते सय्यिआ)।

 

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हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का इरशाद है कि जिस ने उम्दा तरीका जारी किया उसे इस का अज्र मिलेगा और कियामत तक जो भी इस पर अमल करेगा, तरीका जारी करने वाले को इस का सवाब मिलेगा और जिस ने बुरा तरीका जारी किया, उस को इस का और क़ियामत तक इस पर अमल करने वालों का गुनाह होगा। हज़रते क़तादा रज़ीअल्लाहो अन्हो ने इस फ़रमाने इलाही :

और तहक़ीक़ येह मेरा सीधा रास्ता है पस इस की इत्तिबाअ करो। के बारे में कहा : जान लो रास्ता सिर्फ एक रास्ता है जिस की जड़ हिदायत और जिस पर फिरना जन्नत की तरफ़ है और शैतान ने मुतफ़र्रिक रास्ते बनाए हैं जिन का अस्ल गुमराही और जिन पर फिरना जहन्नम की तरफ़ है।

हज़रते इब्ने मसऊद रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने अपने दस्ते मुबारक से एक लकीर खींची और फ़रमाया : येह अल्लाह की सीधी राह है, फिर आप ने उस लकीर के दाएं बाएं और बहुत सी लकीरें खींची और फ़रमाया : येह रास्ते हैं, इन में कोई रास्ता नहीं है मगर हर रास्ते पर शैतान है जो अपनी तरफ़ बुलाता रहता है, फिर आप ने मजकूरए बाला आयत तिलावत फ़रमाई।

हज़रते इब्ने अब्बास रज़ीअल्लाहो अन्हो का क़ौल है कि येह गुमराही के रास्ते हैं।

हज़रते इब्ने अतिय्या रज़ीअल्लाहो अन्हो का क़ौल है येही रास्ते जिन की हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने निशान देही फ़रमाई है, इन में यहूदिय्यत, नसरानिय्यत, मजूसिय्यत और तमाम पैरुवाने मज़ाहिबे बातिला, बिदअती, नफ़्सानी ख्वाहिशात की पैरवी करने वाले गुमराह, अपनी अलग राहें मुतअय्यन करने वाले वगैरा सब शामिल हैं चाहे वोह झगड़ों और फ़ितना व फ़साद में दिलचस्पी लेने वाले हों या गुफ्तगू में बाल की खाल उतारने वाले हों, येह तमाम लगज़िश के मैदान और बद ए’तिकादी के मनाज़िर हैं।

फ़रमाने नबवी है कि जिस ने मेरी सुन्नत से ए’राज़ किया वोह मुझ से नहीं है।

नीज़ फ़रमाने नबवी है कि ऐसी कोई उम्मत नहीं है जो अपने नबी के दीन में बिदआत को फ़रोग देती है और इस बिदअत के बराबर उस की सुन्नत जाएअ हो जाती है।

फ़रमाने नबवी है कि वोह ख्वाहिशे नफ़्स कि जिस की पैरवी की जाए उस से बढ़ कर आस्मान के नीचे अल्लाह के नज़दीक ऐसा (झूटा) मा’बूद नहीं जिस की इबादत की जाती हो।

फ़रमाने नबवी है कि सब से उम्दा बात अल्लाह की किताब है और सब से उम्दा हदायत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की हिदायत है और सब से बद तरीन उमूर बिदआत हैं और हर बिदअत जलालत है, मैं तुम पर तुम्हारी पुश्तों, शर्मगाहों और गुमराह कुन ख्वाहिशात की शहवात से डरता हूं, तुम हर बिदअत से बचो क्यूंकि हर बिदअत गुमराही है।

फ़रमाने नबवी है कि अल्लाह तआला हर बिदअती से तौबा को पोशीदा कर देता है।) यहां तक कि वोह बिदअत को तर्क न कर दे।

फ़रमाने नबवी है कि अल्लाह तआला किसी साहिबे बिदअत का रोज़ा, हज, उमरह, जिहाद, हीला और इन्साफ़ कुछ भी क़बूल नहीं करता वोह इस्लाम से ऐसे निकल जाता है जैसे आटे से बाल निकलता है, मैं तुम्हें सफ़ेद और वाजेह दीन पर छोड़ रहा हूं, इस का दिन और रात बराबर हैं, इस से वोही फिरेगा जो हलाक होगा, हर जिन्दगी के लिये एक हिम्मत है और हर हिम्मत के लिये एक कमज़ोरी है, जिस की हिम्मत मेरी सुन्नत की तरफ़ है वोह हिदायत पा गया और जिस की हिम्मत दूसरी तरफ़ रागिब हुई वोह हलाक हुवा, मैं अपनी उम्मत पर तीन चीजों से डरता हूं, आलिम की लगज़िश, काबिले तक्लीद ख्वाहिशात और ज़ालिम हाकिम,

मेरी उम्मत के लिये येह तीन चीजें बहुत खतरनाक होंगी।

आलाते लह्वो लइब की मजम्मत ।

बुख़ारी शरीफ़ में मरवी है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : जिस शख्स ने अपने साथी से कहा कि आओ जूआ खेलें, उसे चाहिये कि सदका करे ।

मुस्लिम, अबू दावूद और इब्ने माजा की रिवायत है : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : जो नर्द या नर्द शीर से खेला, गोया उस ने ख्रिन्जीर के गोश्त और लहू में हाथ को डूबोया।

अहमद वगैरा की रिवायत है हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया ऐसे शख्स की मिसाल जो नर्द खेलता है फिर नमाज के लिये खड़ा होता है, ऐसी है जैसे कोई शख्स पीप और खिन्ज़ीर के खून से वुजू करता है और फिर नमाज़ के लिये खड़ा होता है या’नी उस की नमाज़ कबूल नहीं होती जैसा कि दूसरी रिवायत में इस की तस्रीह मौजूद है।

बैहकी ने यहया बिन कसीर रज़ीअल्लाहो अन्हो से रिवायत की है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का ऐसे लोगों के पास से गुज़र हुवा जो नर्द खेल रहे थे आप ने फ़रमाया : दिल गाफ़िल है, हाथ करने वाले हैं और ज़बानें फुजूल बकने वाली हैं।

दैलमी ने रिवायत नक्ल की है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : जब तुम ऐसे लोगों से गुज़रो जो इन फ़ाल के तीरों, शतरन्ज, नर्द और इन से मुशाबेह हर उस चीज़ में जो हराम कर दिया गया है, लगे हों तो उन्हें सलाम न करो, अगर वोह तुम्हें सलाम करें तो उन के सलाम का जवाब न दो ।

फ़रमाने नबवी है कि तीन चीजें जूआ हैं, शर्तिया बाज़ियां छोटे छोटे तीरों को फेंक कर जूआ खेलना और सीटियां बजा बजा कर कबूतर उड़ाना ।

हज़रते अली रज़ीअल्लाहो अन्हो का ऐसे लोगों के पास से गुज़र हुवा जो शतरन्ज खेल रहे थे, आप ने फ़रमाया : क्या येह वोह सूरतें हैं जिन के वासिते तुम ए’तिकाफ़ करने वाले हो ? तुम में से किसी एक के हाथों में अंगारे उठा लेना यहां तक कि वोह बुझ जाएं, इन्हें छूने से बेहतर है, फिर फ़रमाया : ब खुदा ! तुम इस के इलावा किसी और काम के लिये पैदा किये गए हो।

मजीद इरशादे नबवी है कि शतरन्ज खेलने वाले बहुत झूटे होते हैं, इन में से एक कहता है मैं ने कत्ल कर दिया और मारा हालांकि उस ने किसी को कत्ल किया होता है और न मारा होता है।

हज़रते अबू मूसा अश्अरी ने फ़रमाया कि शतरन्ज हमेशा खताकार ही खेलता है। और येह बात जेह्न नशीन कर लीजिये कि आलाते नगमा व तरब या तो हराम हैं जैसे सारंगी, तम्बूरा, रबाब, तबला, बांसरी और हर वोह साज़ जो इनफ़िरादी तौर पर गाने वाले की आवाज़ से हम आहंग हो या फिर मकरूह हैं और वोह ऐसे साज़ हैं जो गना में तरबिय्या कैफ़िय्यत को नुमायां करते हैं मगर इनफ़िरादी तौर पर इन से नगमात का काम न लिया जा सके जैसे नरकुल, चंग वगैरा, इन का गना के साथ सुनना मकरूह है, बिगैर नगमात के नहीं और जो साज़ जाइज़ हैं वोह ऐसे हैं जो नगमा व तरब के लिये नहीं बल्कि इत्तिलाअ के लिये बजाए जाते हैं, जैसे बिगिल, तब्ले जंग या मज्मअ इकठ्ठा करने का तब्ल या निकाह के एलान के लिये दफ़ बजाना वगैरा।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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bidat hadees, bidaat ke bare me hadees

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

समाअ का बयान  

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

समाअ के नाजायज़ होने की दलीलें और रिवायतें

क़ाज़ी अबू तय्यिब तबरी रहमतुल्लाह अलैह ने हज़रते इमाम शाफ़ेई, इमाम अबू हनीफ़ा, इमाम मालिक, हज़रते सुफ्यान रज़ीअल्लाहो अन्हो और उलमाए किराम की एक जमाअत से ऐसे अल्फ़ाज़ नक्ल किये हैं जो इस अम्र पर दलालत करते हैं कि येह हज़रात समाअ के अद्दे जवाज़ के काइल थे।

इमाम शाफेई रज़ीअल्लाहो अन्हो ने अपनी किताब आदाबुल क़ज़ा में कहा है कि गना एक ना मुनासिब और मकरूह चीज़ है जो एक लचर (बेहूदा) चीज़ की तरह है, जो ब कसरत इस में मश्गूल हो वोह बे समझ है और उस की गवाही रोक दी जाएगी।

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काज़ी अबू तय्यिब रहमतुल्लाह अलैह ने कहा है कि शवाफ़ेअ हज़रात ने कहा है कि गैर महरम औरत से कुछ सुनना ख्वाह वोह पर्दे में हो या सामने, वोह आज़ाद हो या बांदी, हर सूरत में नाजाइज़ है।

काजी साहिब ने इमाम शाफ़ेई रज़ीअल्लाहो अन्हो का येह कौल नक्ल किया है कि बांदी का मालिक जब लोगों को उस से कुछ सुनने के लिये जम्अ करे तो वोह बेवुकूफ़ है, उस की गवाही मर्दूद है।

मज़ीद कहा कि इमाम शाफ़ेई रज़ीअल्लाहो अन्हो से नक्ल किया गया है कि आप दो टहनियों को आपस में मार कर भी साज़ की सी आवाज़ निकालने को मकरूह जानते थे और फ़रमाते थे कि इसे बे दीनों ने ईजाद किया है ताकि इस की वज्ह से लोगों की तवज्जोह कुरआने मजीद से हट जाए।

इमाम शाफेई रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि हदीस शरीफ़ में नह्य वारिद होने के सबब में दीगर तमाम साजहाए नगमा व तरब से नर्द को ज़ियादा मकरूह समझता हूं, मैं शतरन्ज खेलने को मकरूह समझता हूं और मैं हर खेल को मकरूह समझता हूं क्यूंकि येह खेल वगैरा दीनदार और साहिबे तक्वा लोगों का शैवा नहीं है। ……

इमाम मालिक रज़ीअल्लाहो अन्हो ने गना से मन्अ फ़रमाया है और इन का कौल है कि जब किसी ने लौंडी खरीदी और उसे पता चला कि वोह मुगन्निया है तो उसे लौंडी वापस करने का हक़ हासिल है और इब्राहीम बिन सा’द रहमतुल्लाह अलैह के इलावा तमाम अहले मदीना का येही मज़हब है।

इमाम अबू हनीफ़ा रज़ीअल्लाहो अन्हो भी गना को मकरूह जानते थे और गना का सुनना गुनाहों में शुमार करते थे और तमाम अहले कूफ़ा हज़रते सुप्यान सौरी, शैख़ हम्माद, इब्राहीम, शा’बी (Kailss) वगैरहुम का येही मस्लक है।

मजकूरए बाला तमाम रिवायात काजी अबू तय्यिब तबरी ने नक्ल की हैं। ।

जवाजे समाअ के दलाइल

समाअ के नजायज़ होने की दलीलें और रिवायतें

हज़रते अबू तालिब मक्की ने एक जमाअत से समाअ का जवाज़ नक्ल किया है और उन का येह कौल भी है कि सहाबा से हज़रते अब्दुल्लाह बिन जा’फ़र, अब्दुल्लाह बिन जुबैर, मुगीरा बिन शो’बा और मुआविय्या रज़ीअल्लाहो अन्हो से समाअ मन्कूल है।

अबू तालिब मक्की रहमतुल्लाह अलैह ने येह भी कहा है कि सलफ़े सालिहीन में से सहाबा और ताबेईन की कसीर जमाअत ने इसे अच्छा समझा है और हमारे यहां अहले हिजाज़ मक्कए मुअज्जमा में साल के बेहतरीन अय्याम में समाअ सुनते थे।

बेहतरीन अय्याम से मुराद वोह अय्याम हैं जिन में अल्लाह तआला ने अपने बन्दों को इबादत और ज़िक्र का हुक्म दिया है जैसे अय्यामे तशरीक वगैरा और हमारे ज़माने तक अहले मदीना भी अहले मक्का की तरह हमेशा पाबन्दी से समाअ सुना करते थे।

हम ने अबू मरवान काज़ी को इस हालत में पाया कि उन के पास चन्द लड़कियां थीं जो लोगों को खुश इल्हानी से गा कर सुनाती थीं, काजी साहिब ने इन्हें सूफ़ियाए किराम के लिये तय्यार किया था।

मजीद फ़रमाया कि हज़रते अता रहमतुल्लाह अलैह के यहां दो लड़कियां थीं और आप के भाई उन से समाअ किया करते थे।

हज़रते अबू तालिब मक्की रहमतुल्लाह अलैह ने येह कौल भी नक्ल किया है कि अबुल हसन बिन सालिम रहमतुल्लाह अलैह से कहा गया कि तुम समाअ का कैसे इन्कार करते हो ? हालांकि हज़रते जुनैद, सरी सकती और जुनून रहमतुल्लाह अलैह इसे सुना करते थे ? उन्हों ने कहा कि मैं समाअ का कैसे इन्कार करूंगा हालांकि मुझ से बेहतर शख्स ने इसे सुना और इस की इजाजत दी है चुनान्चे, हज़रते अब्दुल्लाह बिन जा’फ़र तय्यार रज़ीअल्लाहो अन्हो समाअ सुना करते थे इन्हों ने समाअ में सिर्फ लह्वो लइब को मन्अ फ़रमाया है।

हज़रते यहया बिन मुआज़ रहमतुल्लाह अलैह से मरवी है : इन्हों ने कहा कि हम ने तीन चीज़ों को गुम किया है, फिर हम ने उन्हें नहीं देखा और जूं जूं दिन गुज़रते जाते हैं, इन का फुक़दान फुजूं होता जाता है, हसीन चेहरा जो पाकबाज़ हो, सच्ची बात जिस में दियानत की झलक नुमायां हो और बेहतरीन भाईचारा जिस में वफ़ा ही वफ़ा हो ।

और मैं ने बा’ज़ किताबों में बि ऐनिही येह कौल हज़रते हारिसे मुहासबी से मन्कूल देखा है और इस में ऐसी बात पाई जाती है जो उन के जोह्द, पाकबाज़ी और दीनी मुआमलात में उन की जिद्दो जहद और एहतिमाम के बा वुजूद इस अम्र पर दलालत करती है कि वोह जवाजे समाअ के काइल थे।

इब्ने मुजाहिद का समाअ पर जोर

हज़रते इब्ने मुजाहिद रज़ीअल्लाहो अन्हो का तरीका येह था कि आप कभी ऐसी दा’वत कबूल नहीं फ़रमाते थे जिस में समाअ न हो और फिर एक से ज़ियादा लोगों ने येह बात बयान की है कि वोह किसी दा’वत में जम्अ हुवे और हमारे साथ अबुल कासिम इब्ने बिन्ते मनीअ, अबू बक्र इब्ने दावूद और इब्ने मुजाहिद रहमतुल्लाह अलैह अपने हम मशरबों के साथ मौजूद थे, तब महफ़िले समाअ मुन्अकिद हुई, इब्ने मुजाहिद, इब्ने बिन्ते मनीअ को इस बात पर बर-अंगेख्ता करने लगे कि वोह इब्ने दावूद को इस के सुनने पर आमादा करें, इब्ने दावूद बोले : मुझे मेरे बाप ने हज़रते अहमद बिन हम्बल रज़ीअल्लाहो अन्हो का येह फ़रमान बतलाया है कि आप समाअ को मकरूह जानते थे, मेरे वालिद भी इसे मकरूह समझते थे और मैं भी अपने बाप के मज़हब पर हूं और अबुल कासिम इब्ने बिन्ते मनी ने कहा : मेरे दादा अहमद बिन बिन्ते मनी ने मुझे हज़रते सालेह बिन अहमद के बारे में बतलाया कि इन के वालिद इब्ने खुब्बाज़ा का कौल सुना करते थे। येह सुन कर इब्ने मुजाहिद ने इब्ने दावूद से कहा : मुझे छोड़ दो, तुम अपने बाप की बातें करते हो और इब्ने बिन्ते मनीअ से कहा : मुझे छोड़ दो, तुम अपने दादा की बातें मान लो ! ऐ अबू बक्र ! तुम मुझे इतनी सी बात बताओ कि अगर किसी ने शे’र पढ़ा या शे’र कहा तो क्या वोह नाजाइज़ है ? इब्ने दावूद बोले : नहीं ! इब्ने मुजाहिद बोले कि अगर शे’र कहने वाला हसीन आवाज़ वाला हो तो उस के लिये शे’र कहना हराम है ? वोह बोले : नहीं ! इब्ने मुजाहिद ने कहा : अच्छा अगर वोह इस तौर पर अश्आर पढ़ता है कि ममदूद हर्फ़ को मक्सूर और मक्सूर को ममदूद कर देता है तो क्या येह हराम है ? इब्ने दावूद ने कहा कि मैं तो एक शैतान पर काबू नहीं पा सकता, दो शैतानों का मुकाबला कैसे करूंगा ?

हज़रते इमाम अस्कलानी को समाअ का शौक

हज़रते अबुल हसन अस्कलानी रहमतुल्लाह अलैह जो औलिया के सरदार थे, समाअ का शौक़ फ़रमाया करते थे और ब वक्ते समाअ जज्ब व शौक से आश्ना होते थे, इन्हों ने इस सिलसिले में एक किताब भी लिखी है जिस में इन्हों ने मुन्किरीने समाअ की तरदीद की है यूंही एक जमाअत ने समाअ के मुन्किरीन के रद्द में कुतुब लिखी हैं।

मशाइख में से किसी शैख़ से मरवी है कि इन्हों ने अबुल अब्बास खिज्र अलैहहिस्सलाम  को देखा और इन से पूछा कि आप का समाअ के मुतअल्लिक़ क्या ख़याल है ? जिस के बारे में हमारे साथियों में इख़्तिलाफ़ पाया जाता है, हज़रते खिज्र अलैहहिस्सलाम  ने फ़रमाया : येह शीरीं और साफ़ खुशगवार है, इस पर उलमा के सिवा किसी के क़दम नहीं जम सकते

हज़रते मुमशाद दीनवरी रज़ीअल्लाहो अन्हो से मन्कूल है कि मैं ने ख्वाब में नबिय्ये करीम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की जियारत की और आप से पूछा : या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम क्या आप इस समाअ में से किसी चीज़ को ना पसन्द फ़रमाते हैं ? आप ने फ़रमाया कि मैं इस में से किसी चीज़ को ना पसन्द नहीं करता लेकिन इन्हें कह दो कि समाअ का इफ़्तिताह कुरआने मजीद से करें और इस का इख़्तिताम भी कुरआने मजीद ही पर करें।

हज़रते ताहिर बिन बिलाल सम्दानी वरराक रहमतुल्लाह अलैह, से मन्कूल है जो अकाबिर उलमा में से थे, कि मैं समन्दर के किनारे जद्दा की जामे मस्जिद में मो’तकिफ़ था कि एक दिन मैं ने ऐसी जमाअत को देखा जो मस्जिद में कुछ अश्आर पढ़ रहे थे और दूसरे लोग सुन रहे थे, मुझे येह बात सख्त ना पसन्द हुई और मैं ने अपने दिल में कहा कि येह लोग अल्लाह के घरों में से एक घर में अश्आ र पढ़ रहे हैं।

हज़रते ताहिर फ़रमाते हैं कि मैं ने उसी रात ख़्वाब में हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की ज़ियारत की, आप उसी कोने में तशरीफ़ फ़रमा थे, आप के पहलू में हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ीअल्लाहो अन्हो थे, दफ्अतन हज़रते अबू बक्र रज़ीअल्लाहो अन्हो कुछ कहने लगे और हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम समाअत फ़रमाने लगे और आप ने वज्द करने वाले की तरह अपना दस्ते मुबारक सीनए अन्वर पर रखा हुवा था।

मैं ने अपने दिल में कहा : मेरे लिये येह मुनासिब न था कि मैं उस जमाअत को ना पसन्द करता जो महफ़िले समाअ मुन्अकिद किये हुवे थे हालांकि उसे हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम समाअत फ़रमा रहे हैं और हज़रते अबू बक्र रज़ीअल्लाहो अन्हो पढ़ रहे हैं, हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम मेरी तरफ़ मुतवज्जेह हुवे और फ़रमाया : येह हक़ के साथ हक़ है या येह हक़ से हक़ है, मैं येह भूल गया हूं कि आप ने इन दो बातों में से कोन सी बात इरशाद फ़रमाई थी।

हज़रते जुनैद रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि इस गुरौह पर तीन मवाकेअ पर रहमते इलाही का नुजूल होता है : .खाने के वक्त क्यूंकि येह बिगैर फ़ाका किये कुछ नहीं खाते। गुफ्तगू के वक्त क्यूंकि वोह सिद्दीकों के मकामात के इलावा और कोई गुफ्तगू नहीं करते। समाअ के वक्त क्यूंकि वोह जज्ब व शौक़ से सुनते हैं और हक़ की गवाही देते हैं।

हज़रते इब्ने जुरैह रज़ीअल्लाहो अन्हो समाअ की इजाजत देते थे, इन से कहा गया कि येह फे’ल क़यामत के दिन नेकियों में शुमार होगा या बुराइयों में ? इन्हों ने कहा : न नेकियों में और न ही गुनाहों में क्यूंकि यह लग्व बात के मुशाबेह है और फ़रमाने इलाही है :  नहीं मुआखज़ा करेगा अल्लाह तआला तुम्हारा फुजूल कसमों पर। ऊपर हम ने जो कुछ नक्ल किया है येह मुख्तलिफ़ अक्वाल का मजमूआ है, जो शख्स तक्लीद में रह कर हक़ को तलाश करेगा तो वोह इन अक्वाल में तआरुज़ पाएगा जिस के सबब वोह मुतहय्यर होगा, या अपनी ख्वाहिशात के जेरे असर किसी कौल को पसन्द कर लेगा हालांकि येह दोनों बातें गलत हैं, बल्कि हक़ को सहीह तरीके से तलाश करे और येह हज्र व इबाहत के अबवाब की तलाश करने से ही मा’लूम हो सकता है।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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Sama ki bahas, sama jayaz he, kavvali jayaz he, kavvali najayaz he

 

 

 

शैतान की चालें और फ़रेब कारियां

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

क्या शैतान सोता है?

किसी शख्स ने हज़रते हसन रज़ीअल्लाहो अन्हो से अर्ज़ किया कि क्या शैतान सोता भी है ? वो मुस्कुराए और कहा : अगर वोह सोता तो हम राहत पाते, मा’लूम हुवा कि मोमिन को शैतान से रिहाई पाना दुश्वार है, हां उसे अपने से दूर करने और उस की कुव्वत को कमजोर करने की राहें हैं।

फ़रमाने नबवी है कि मोमिन शैतान को दुबला कर देता है जैसे तुम में से कोई (तवील) सफ़र में ऊंट को दुबला कर देता है।

हज़रते इब्ने मसऊद रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि मोमिन का शैतान लागिर होता है। हज़रते कैस बिन हज्जाज रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि मुझ से मेरे शैतान ने कहा : जब मैं तेरे अन्दर दाखिल हुवा तो ऊंट की तरह था और अब मैं चिड़या की तरह हूं, मैं ने कहा : वोह क्यूं ? शैतान ने कहा : तू ने मुझे ज़िक्रे खुदा से लागिर कर दिया है।

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शैतान पर काबू पाया जा सकता है

लिहाज़ा मुत्तकी बन्दों पर शैतान के ज़ाहिरी दरवाज़ों का बन्द करना और उन रास्तों की निगहबानी करना जो गुनाहों की तरफ़ ले जाते हैं कुछ दुश्वार नहीं था, इन के लिये लगज़िश का बाइस वोह ख़ुफ़िया शैतानी रास्ते बनते थे जिन की खिड़कियां दिल में खुलती हैं, वोह उन रास्तों की निगहबानी से मा’जूर थे क्यूंकि दिल में शैतान के बहुत से रास्ते हैं और फ़रिश्ते का सिर्फ एक दरवाज़ा है और येह एक दरवाज़ा भी उन बहुत सारे दरवाजों में खल्त मल्त हो गया है।

और बन्दे की मिसाल ऐसी है जैसे कोई मुसाफ़िर ऐसे जंगल में भटक जाए जिस में बहुत से रास्ते हों और रात की तारीकी ने उन से रास्तों पर सियाह चादर तान दी हो तो वो बसीरत वाली आंख और चमकदार सूरज के सिवा रास्ता नहीं पा सकता। यहां बसीरत वाली आंख और तक्वा से शफ्फ़ाफ़ दिल और चमकदार सूरज से वोह मुक़द्दस इल्म मुराद है जो किताबुल्लाह और सुन्नते रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से हासिल किया गया हो, इन्हीं से इन्सान उन अन्धेरे रास्तों पर चल सकता है वरना रात अन्धेरी और रास्ते बे शुमार हैं।

हज़रते अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि एक दिन हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने हमारे सामने एक लकीर खींची और फ़रमाया : येह अल्लाह का रास्ता है फिर उस लकीर के दाएं बाएं बहुत सी लकीरें खींची और फ़रमाया :

येह वोह रास्ते हैं कि जिन में से हर एक पर शैतान है जो अपनी तरफ़ बुलाता है, फिर हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने येह आयत पढ़ी :  तहकीक़ यह मेरी सीधी राह है पस इस की पैरवी करो और दीगर राहों की पैरवी न करो पस वोह

तुम को उस की राह से जुदा कर देंगे। और बिला शुबा हम मुख़्तलिफ़ रास्तों में जिस छुपे हुवे रास्ते की मिसाल ज़िक्र कर चुके हैं, येही वोह रास्ता है कि जिस पर उलमा और वोह बन्दे जो गुनाहों से रुकने वाले और अपनी ख्वाहिशात की निगहबानी करने वाले हैं, धोका खा जाते हैं।

अब हम ऐसे वाजेह रास्ते की मिसाल बयान कर रहे हैं जिस पर चलने के लिये बा’ज़ अवकात आदमी मामूर हो जाता है और वोह मिसाल येह है जो नबिय्ये करीम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने बयान फ़रमाई कि

बनी इस्राईल के एक आबिद को शैतान ने बर्बाद किया

बनी इस्राईल में एक राहिब था, शैतान ने एक लडकी का कस्द किया और उसे आसेब में मुब्तला कर दिया और उस के दिल में येह बात डाल दी कि इस का इलाज राहिब के पास है चुनान्चे, वोह लड़की को ले कर राहिब के पास आए मगर उस ने लड़की को साथ रखने से इन्कार कर दिया लेकिन उन्हों ने बहुत ज़ियादा इस्रार किया जिस की वज्ह से राहिब लड़की को साथ रखने पर रज़ामन्द हो गया, जब वोह लड़की इलाज के लिये राहिब के पास ठहरी तो शैतान राहिब के पास लड़की के कुर्ब को हसीन अन्दाज़ में पेश कर रहा था यहां तक कि राहिब ने लड़की से जिमाअ कर लिया और वोह हामिला हो गई, तब शैतान ने राहिब के दिल में वस्वसा डाला कि अब जब कि इस के घर वाले आएंगे तो तू बहुत शर्मिन्दा और रुस्वा होगा लिहाज़ा उस को क़त्ल कर दे, अगर वोह तुझ से पूछे तो कह देना कि वोह मर गई, चुनान्चे, उस ने लड़की को क़त्ल कर के दफ्न कर दिया।

उधर शैतान ने लड़की के घर वालों के दिलों में येह वस्वसा डाला कि लड़की राहिब से हामिला हो गई है फिर राहिब ने उसे क़त्ल कर के दफ्न कर दिया है लिहाजा वोह लोग राहिब के पास आए और उस से लड़की के मुतअल्लिक पुछ गछ की, राहिब ने कहा : वोह मर गई है। चुनान्चे, उन्हों ने राहिब को पकड़ लिया ताकि वोह उसे लड़की के बदले में कत्ल कर दें उस लम्हे शैतान ने राहिब के पास आ कर कहा : मैं ही वोह हूं जिस ने लड़की को आसेब ज़दा किया था और मैं ने ही लड़की के घर वालों के दिल में येह बात डाली है तू मेरी पैरवी कर ले, मैं तुझे इन से रिहाई और नजात दिला दूंगा, राहिब बोला : कैसे करूं ? शैतान ने कहा : मुझे दो सजदे कर ले चुनान्चे, राहिब ने उसे दो सजदे कर लिये, शैतान ने सजदे कराते ही कहा कि अब मैं तुझ से बरी हूं। येह वोही बात है जिस के मुतअल्लिक फ़रमाने इलाही है कि

“शैतान की तरह जिस वक्त उस ने इन्सान से कहा कुफ्र कर पस उस ने कुफ्र किया तो शैतान ने कहा तहक़ीक़ मैं तुझ से बरी हूं।”

इमाम शाफ़ेई रज़ीअल्लाहो अन्हो का शैतान को जवाब

मरवी है कि शैतान ने इमाम शाफ़ेई रज़ीअल्लाहो अन्हो से पूछा तुम्हारा उस ज़ात के बारे में क्या ख़याल है जिस ने मुझे अपनी पसन्द पर पैदा किया, जैसे चाहा मुझे इस्ति’माल किया और इस के बाद अगर चाहे तो मुझे जन्नत में दाखिल करे और चाहे तो जहन्नम में दाखिल करे, क्या वोह अपने इस अमल में अद्ल करने वाला है या जुल्म करने वाला है ? इमाम शाफ़ेई रज़ीअल्लाहो अन्हो ने उस की बात में गौर फ़रमाया और कहा : ऐ शख्स ! अगर उस ने तुझे तेरी मन्शा पर पैदा किया है तो वाकेई तुझ पर जुल्म किया है और अगर उस ने तुझे अपनी मन्शा पर पैदा किया है तो वोह उस चीज़ के मुतअल्लिक नहीं पूछा जाता जो वोह करता है और न उस से सवाल किये जा सकते हैं, येह सुनते ही शैतान बिखरने लगा यहां तक कि बिल्कुल मा’दूम हो गया फिर कहा : ब खुदा ! ऐ शाफ़ेई ! मैं ने इसी सवाल से सत्तर हज़ार आबिदों को उबूदिय्यत के दफ्तर से निकाल कर बे दीनी की राहों पर धकेल दिया है।

येह भी मरवी है कि शैतान मलऊन हज़रते ईसा के सामने आया और आप को कलिमए तय्यिबा पढ़ने को कहा, आप ने कहा : येह कलिमा बरहक़ है मगर मैं तेरे कहने से नहीं कहूंगा क्यूंकि बुराइयों की तरह नेकियों में भी शैतान खल्त मल्त करता रहता है और इन्ही अफ़्आल से वोह आबिद, जाहिद, गनी और तमाम किस्म के लोगों को हलाकत में डालता रहता है, उस की बुराइयों से वोही महफूज़ रहता है जिसे अल्लाह तआला महफूज़ फ़रमा ले।

ऐ रब्बे जुल जलाल ! हमें शैतान के मक्रों से महफूज़ रख ताकि हम हिदायत याफ्ता लोगों से मुलाकात करें । आमीन।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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जिहाद करने की फज़िलतें

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है :

बेशक मोमिन वोही लोग हैं जो अल्लाह और उस के रसूल पर ईमान लाए और अपने  मालों और जानों के साथ अल्लाह की राह में जिहाद किया येही लोग सच्चे हैं।

हज़रते नो’मान बिन बशीर रज़ीअल्लाहो अन्हो का कहना है : मैं मिम्बरे रसूल के करीब था कि एक आदमी को येह कहते हुवे सुना कि मुझे इस्लाम के बाद और किसी अमल की तमन्ना नहीं मगर येह कि मैं हाजियों को पानी पिलाऊं, दूसरे ने कहा : मुझे इस्लाम के बा’द बैतुल्लाह की ख़िदमत के सिवा किसी और अमल की तमन्ना नहीं है, एक और बोला कि तुम्हारे इन कामों से जिहाद अफ़ज़ल है । हज़रते उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो ने उन्हें झिड़क दिया और कहा कि मिम्बरे रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम के करीब आवाजें बुलन्द न करो, वोह जुमुआ का दिन था। जब मैं ने जुमुआ की नमाज़ अदा कर ली तो मैं हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की ख़िदमत में हाज़िर हुवा और इस बात के मुतअल्लिक़ पूछा : जिस में वोह इख्तिलाफ़ कर रहे थे, तब अल्लाह तआला ने अपना येह फ़रमान नाज़िल फ़रमाया

क्या हाजियों का पानी पिलाना और मस्जिदे हराम की खिदमत करना उस शख्स के आ‘माल की तरह है जो अल्लाह और आखिरत के दिन पर ईमान लाता है और उस की राहे खुदा में जिहाद करता है येह लोग अल्लाह के नज़दीक बराबर नहीं हो सकते और अल्लाह तआला ज़ालिमों की क़ौम को हिदायत नहीं फ़रमाता।

सभी इस्लामी विषयों टॉपिक्स की लिस्ट इस पेज पर देखें – इस्लामी जानकारी-कुरआन, हदीस, किस्से हिंदी में

हज़रते अब्दुल्लाह बिन सलाम रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि हम चन्द साथी इकठे बैठे थे। हम ने कहा अगर हम जानते कि कौन सा अमल अफ़ज़ल है और अल्लाह तआला को ज़ियादा महबूब है तो हम वोही अमल करते, इस पर येह आयाते मुबारका नाज़िल हुईं। “अल्लाह की पाकी बयान करती है जो चीज भी आस्मानों और ज़मीनों में है और वोह गालिब हिक्मत वाला है ऐ ईमान वालो वोह बात क्यूं कहते हो जो नहीं करते अल्लाह के नज़दीक येह बात बहुत ना पसन्दीदा है कि तुम वोह कुछ कहो जो नहीं करते तहकीक अल्लाह तआला उन लोगों को महबूब रखता है जो उस की राह में सफ़ बांध कर लड़ते हैं जैसे वोह सीसा पिलाई हुई दीवार हों। और हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने हमें येह आयात सुनाई ।

जिहाद जैसा कोई अमल नहीं

एक रिवायत में है कि एक शख्स ने अर्ज की : या रसूलल्लाह ! मुझे ऐसा अमल बतलाइये जो जिहाद के बराबर हो, आप ने फ़रमाया : मैं ऐसा कोई अमल नहीं पाता, फिर फ़रमाया : क्या तुम इस बात की ताब रखते हो कि जब मुजाहिद जिहाद के लिये रवाना हों तो तुम मस्जिद में दाखिल हो जाओ और हमेशा इबादत में रहो, कभी वक़्फ़ा न करो, हमेशा रोजे से रहो, कभी इफ्तार न करो, उस ने अर्ज़ की : या रसूलल्लाह ! कौन है जो इस की ताकत रखता है।

हज़रते अबू हुरैरा रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम के एक सहाबी का ऐसी घाटी से गुज़र हुवा जिस में मीठे पानी का चश्मा था, उन्हों ने कहा  मैं लोगों से गोशा नशीनी इख्तियार कर के इस घाटी में इबादत करूंगा और यहीं कियाम करूंगा लेकिन हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की इजाज़त के बिगैर ऐसा हरगिज़ नहीं करूंगा चुनान्चे, उन्हों ने हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की

ख़िदमत में आ कर येह बात अर्ज़ की तो आप ने फ़रमाया : ऐसा न करो क्यूंकि तुम्हारा राहे खुदा में जिहाद के लिये खड़ा होना, घर में सत्तर साल की नमाज़ से अफ़ज़ल है, क्या तुम इस बात को पसन्द नहीं करते कि अल्लाह तुम्हें बख़्श दे और तुम्हें जन्नत में दाखिल करे, राहे खुदा में जिहाद करो जो शख्स ऊंटनी का दूध दोहने के वक्फे के बराबर भी जिहाद करता है उस के लिये जन्नत वाजिब हो जाती है।

जब हुजूर रज़ीअल्लाहो अन्हो ने अपने सहाबी को इबादत के लिये उज्लत नशीनी की इजाजत नहीं दी हालांकि उन का शौके इबादत मुसल्लम था और नेकियों में उन की मुवाफ़क़त शको शुबा से बाला थी, बल्कि उन्हें जिहाद की तरगीब दी, तो हम जब कि हमारी नेकियां कम हैं और गुनाह ज़ियादा, हम हराम और मुश्तबा गिजाएं खाते हैं और हमारे अज़ाइम और निय्यतें फ़ासिद हैं, हमारे लिये जिहाद का तर्क करना किस तरह मुनासिब हो सकता है।

रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का इरशाद है कि राहे खुदा में जिहाद करने वाले की मिसाल रोज़ादार, खुशूअ व खुजूअ से इबादत करने वाले, कियाम करने वाले, रुकूअ करने वाले और सुजूद करने वाले जैसी है और अल्लाह तआला जानता है कि कौन उस की राह में जिहाद करने वाला है।

फ़रमाने नबवी है कि जो अल्लाह के रब होने पर, इस्लाम के दीन होने पर और मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम के रसूल होने पर राजी हुवा उस के लिये जन्नत वाजिब हो गई । हज़रते अबू सईद खुदरी रज़ीअल्लाहो अन्हो को येह बात पसन्द आई, अर्ज की : या रसूलल्लाह ! एक बार येह बात मुझ से फिर इरशाद फ़रमा दीजिये चुनान्चे, आप ने उसे मुकर्रर फ़रमाया फिर फ़रमाया : एक और अमल है जिस के सबब अल्लाह तआला बन्दे के सो दरजात बुलन्द करता है और हर दो दरजात का दरमियानी फ़ासिला ज़मीनो आस्मान के फ़ासिले के बराबर होगा, अबू सईद रज़ीअल्लाहो अन्हो ने अर्ज़ की : या रसूलल्लाह ! वोह कौन सा अमल है? आप ने फ़रमाया : राहे खुदा में जिहाद करना।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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हुकूके शोहर – शोहर के हक़ बीवी पर

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 

निकाह इताअत की एक किस्म है लिहाज़ा बीवी शोहर  की मुती है और उस पर लाज़िम है कि शौहर उस से जो कुछ तलब करे वोह उस की इताअत करे ब शर्त येह कि वोह उसे अल्लाह तआला की ना फ़रमानी का हुक्म न दे । बीवी पर शौहर के हुकूक के मुतअल्लिक बहुत सी अहादीस वारिद हुई हैं, इरशादे नबवी है कि जो औरत इस हालत में मरे कि उस का शौहर उस से राजी हो वोह जन्नत में जाएगी।

एक शख्स सफ़र पर रवाना हुवा और उस ने अपनी बीवी से अहद लिया कि वोह ऊपर से नीचे न उतरे, उस का बाप नीचे रहता था, वोह बीमार हो गया, उस औरत ने हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की खिदमत में आदमी भेज कर बाप के पास जाने की इजाज़त तलब की, हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया कि अपने शौहर की इताअत कर, फिर वोह मर गया और औरत ने फिर इजाज़त तलब की तो हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : अपने शौहर की इताअत कर, उस के बाप को दफ्न कर दिया गया और हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने उसे खबर दी कि अल्लाह तआला ने उस के शौहर की इताअत की वज्ह से उस के बाप को बख़्श दिया है।

नबिय्ये करीम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का फरमान है कि जब औरत ने पांच नमाजें पढ़ीं, माहे रमजान के रोज़े रखे, अपनी इस्मत की हिफाज़त की और अपने शोहर की इताअत की, वोह अपने रब की जन्नत में दाखिल हुई।

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और सरकार सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने शोहर की इताअत को इस्लाम की मबादियात में से करार दिया।

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की खिदमत में औरतों का तजकिरा हुवा तो आप ने फ़रमाया : हामिला, बच्चा जनने और दूध पिलाने वाली, अपनी औलादों पर मेहरबानी करने वाली

औरतें, अगर अपने शोहर की ना फ़रमानी न करें तो इन में जो नमाज़ पढ़ने वाली हैं वोह जन्नत में दाखिल होंगी।

रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का इरशाद है कि मैं ने जहन्नम को देखा उस में रहने वाली अक्सर औरतें थीं तो ख़वातीन में से बा’ज़ ने अर्ज किया : या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम किस की वज्ह से ? आप ने फ़रमाया : कसरत से ला’नत करती हैं और शौहर की ना फ़रमानी करती हैं।या’नी जो इन्हें ज़िन्दगी गुज़ारने में मदद देता है, उस के शुक्रिय्ये की बजाए कुफ्रान करती हैं।

दूसरी हदीस में आया है कि मैं ने जन्नत को देखा, उस में सब से कम औरतें थीं, मैं ने कहा : औरतें कहां हैं ? जिब्रील ने कहा : इन्हें दो सुर्ख चीज़ों ने मश्गूल कर दिया है, सोने और जा’फ़रान ने, या’नी जेवरात और रंगीन कपड़ों ने ।

शादी करने में भलाई है

हज़रते आइशा रज़ीअल्लाहो अन्हा रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की ख़िदमत में एक जवान औरत ने आ कर अर्ज़ की : या रसूलल्लाह ! मैं जवान औरत हूं मुझे निकाह के पैगाम आते हैं मगर मैं शादी को मकरूह समझती हूं, आप मुझे बताएं कि बीवी पर शौहर का क्या हक़ है ? आप ने फ़रमाया : अगर शौहर की चोटी से ऐड़ी तक पीप हो और वोह इसे चाटे तो शौहर का हक अदा नहीं कर पाएगी, उस ने पूछा : तो मैं शादी न करूं ? आप ने फ़रमाया कि तुम शादी करो क्यूंकि इस में भलाई है।

हज़रते इब्ने अब्बास रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि बनू खसअम की एक औरत हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की खिदमत में आई और कहा : मैं गैर शादी शुदा औरत हूं और शादी करना चाहती हूं, शौहर के क्या हुकूक हैं ? आप ने फ़रमाया : बीवी पर शौहर का येह हक़ है कि जब वोह उस का इरादा करे, अगर उस के इरादे के वक्त वोह ऊंट की पीठ पर हो तब भी उसे न रोके। शौहर का येह भी हक़ है कि बीवी उस के घर से उस की इजाज़त के बिगैर कोई चीज़ न दे, अगर उस ने बिला इजाज़त कुछ दे दिया तो गुनहगार होगी और शौहर को सवाब होगा, बीवी पर येह भी हक़ है कि शौहर की इजाज़त के बिगैर नफ़्ली रोजे न रखे, अगर उस ने ऐसा किया तो वोह भूकी प्यासी रही और उस का रोज़ा कबूल नहीं होगा और अगर घर से शौहर की इजाजत के बिगैर बाहर निकली तो जब तक वोह वापस न हो जाए या तौबा न करे, फ़िरिश्ते उस पर ला’नत करते रहते हैं।

शोहर का मर्तबा हदीसे पाक

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम फ़रमाते हैं कि अगर मैं किसी को किसी के लिये सजदे का हुक्म देता तो औरत को हुक्म देता कि वोह अपने शौहर को सजदा करे । क्यूंकि शौहर के बीवी पर बहुत हुकूक हैं।

फरमाने नबवी है : औरत उस वक्त रब तआला से जियादा करीब होती है जब वोह घर के अन्दर हो ।

औरतों का घर में नमाज़ पढना मस्जिद से अफज़ल है हदीस शरीफ

और औरत का घर के सहून में नमाज़ पढ़ना मस्जिद में नमाज़ पढ़ने से अफ़ज़ल है।

और घर के अन्दर नमाज़ पढ़ना सहन में नमाज़ पढ़ने से अफ़ज़ल है और घर के अन्दर वाले घर में उस की नमाज़ कमरे में नमाज़ से अफ़ज़ल है।

येह आप ने मजीद पर्दा नशीनी के लिये फ़रमाया, इसी लिये फ़रमाने नबवी है कि औरत सरासर बर्हनगी है, जब वोह निकलती है तो शैतान उसे झांकता है।

नीज़ फ़रमाया कि औरत के लिये दस बर्हनगियां हैं जब वोह शादी करती है तो शौहर उस की एक बहरनगी ढांप लेता है और जब वोह मरती है तो कब्र उस की तमाम उरयानियां छुपा लेती है ।

औरत पर शौहर के बहुत से हुकूक हैं, इन में से दो बातें अहम हैं, इन में से एक निगहबानी और पर्दा है, दूसरा हाजत के इलावा दीगर चीज़ों का मुतालबा न करना और मर्द की हराम की कमाई से हासिल कर्दा रिज्क से परहेज़, गुज़श्ता ज़माने में औरतों का येही किरदार था।

चुनान्चे, आदमी जब घर से बाहर निकलता तो उस की बीवी या बेटी उसे कहती कि हराम की कमाई से बचना क्यूंकि हम दुख दर्द और भूक बरदाश्त कर सकते हैं मगर जहन्नम की आग बरदाश्त नहीं कर सकते।

गुज़श्ता लोगों में से एक आदमी ने सफ़र का इरादा किया तो उस के हमसाइयों ने उस के सफ़र को अच्छा न समझा और उन्हों ने उस की बीवी से कहा : तू उस के सफ़र पर कैसे राजी हुई हालांकि उस ने तेरे लिये खर्च वगैरा नहीं छोड़ा, औरत ने कहा : मेरा शौहर जब से मैं उसे जानती हूं मैं ने उसे बहुत खाने वाला पाया है, रिज्क देने वाला नहीं पाया, मेरा रब रज्जाक है, खाने वाला चला जाएगा और रिज्क देने वाला बाकी रहेगा।

एक नेक बीवी का किस्सा 

हज़रते राबिआ बिन्ते इस्माईल ने हज़रते अहमद बिन अबिल हवारी को निकाह का पैगाम दिया मगर उन्हों ने अपनी इबादत गुज़ारी की वज्ह से शादी को ना पसन्द किया और उन से जवाब में कहा ब खुदा ! इबादत की मश्गूलिय्यत की वजह से मुझे औरतों से महब्बत और उन्स नहीं रहा। राबिआ ने कहा : मैं आप को अपने शग्ल से मुन्हरिफ़ करने और ख्वाहिशात की तक्मील के लिये निकाह का पैगाम नहीं दे रही हूं बल्कि मैं ने अपने साबिक़ शौहर के विरसा में से माले कसीर पाया है, मैं चाहती हूं कि येह माल आप के नेक भाइयों पर खर्च करूं और आप के सबब मुझे आप के भाइयों का पता चल जाएगा और मैं नेकों की खिदमत कर के अल्लाह तआला का रास्ता पा लूंगी। हज़रते अहमद रहमतुल्लाह अलैह ने कहा : मैं अपने शैख़ से इजाज़त ले लूं चुनान्चे, आप अपने शैख़ हज़रते अबू सुलैमान दारानी रहमतुल्लाह अलैह की खिदमत में आए, कहते हैं कि हज़रते अबू सुलैमान अपने मुरीदीन को शादी से मन्अ किया करते थे और कहते थे कि हमारे साथियों में से जिस ने भी शादी की है उस की हालत दिगर गूं हुई है, जब उन्हों ने राबिआ की बातें सुनी तो मुझ से फ़रमाया : उस से निकाह कर लो क्यूंकि येह वलिय्या है, ब खुदा ! ऐसी बातें सिद्दीक़ीन की होती हैं, हज़रते अहमद रहमतुल्लाह अलैह कहते हैं कि मैं ने राबिआ से निकाह कर लिया। हमारे घर में गच का सिर्फ एक कुंडा था जो खाना खाने के बाद जल्दी से हाथ धो कर बाहर जाने वालों की वज्ह से टूट गया, इश्नान (एक बूटी जो साबुन का काम देती है) से हाथ धोने वाले इस के इलावा होते थे। हज़रते अहमद कहते हैं कि मैं ने उस के बा’द तीन और औरतों से निकाह किया, राबिआ मुझे खूब खिलाती और खुश्बूएं वगैरा लगाती और कहा करती कि अपनी खुशी और कुव्वत के साथ अपनी बीवियों के पास जाओ और येह राबिआ शाम में ऐसी पहचानी जाती थी जैसे बसरा में राबिआ अदविय्या पहचानी जाती थीं।

 

बीवी पर येह भी लाज़िम है कि वोह शौहर के माल को जाएअ न करे बल्कि उस की हिफ़ाज़त करे, फ़रमाने नबवी है : औरत के लिये हलाल नहीं कि शौहर के घर से उस की इजाज़त के बिगैर कुछ खाए। हां ऐसा खाना खा सकती है जिस के खराब होने का अन्देशा हो, अगर बीवी, शौहर की रजामन्दी से खाएगी तो उसे शौहर के बराबर सवाब मिलेगा वरना शौहर की इजाज़त के बिगैर कुछ खाएगी तो शौहर को अज्र मिलेगा मगर बीवी पर गुनाह होगा।

वालिदैन पर हक़ है कि वोह लड़की की बेहतरीन तर्बिय्यत करें, उसे ऐसी तालीम दें जिस से वोह उम्दा रह्न सह्न और शौहर से बेहतर बरताव के आदाब सीख जाए

बेटी को शादी के वक़्त नेक माँ की नसीहत

जैसा कि मरवी है कि अस्मा बिन्ते खारिजा फ़ज़ारी ने अपनी बेटी की शादी के वक्त उस से कहा : अब तुम उस नशेमन से निकल रही हो जो तुम्हारा मल्जा व मामन था लेकिन अब तुम ऐसे फ़राश पर जा रही हो जिस से तुम्हारा कभी वासिता न पड़ा और ऐसे शोहर के पास जिस से तुम ने कभी भी उल्फ़त नहीं की तो तुम उस के लिये ज़मीन बन जाओ वोह तुम्हारा आस्मान होगा तुम उस का बिछौना बन जाओ वोह तुम्हारे लिये इमारत होगा तुम उस की बांदी बनना वोह तुम्हारा खादिम होगा, उस से किनारा कश न रहना वरना वोह तुझ से दूर हो जाएगा, उस से दूर न होना वरना वोह तुझे भूल जाएगा, अगर वोह तेरा कुर्ब चाहे तो उस के करीब हो अगर वोह तुझ से दूर होना चाहे तो तू भी दूर हो जा, उस की नाक, कान और आंख की हिफ़ाज़त करना ताकि वोह तुझ से उम्दा खुश्बू के इलावा और कुछ न सूंघे, उम्दा बात के सिवा और कुछ न सुने और वोह तुझे हमेशा खूब सूरत ही देखे । एक शख्स ने अपनी बीवी से कहा :

मुआफ़ करना इख्तियार कर मेरी महब्बत दाइम रहेगी और जब मुझे गुस्सा आ जाए तो मेरी शान में न बोलना। मुझे दफ़ की तरह ठोकर न लगाना क्यूंकि तू नहीं जानती कि मैं कैसे गाइब हो जाता हूं। और शिकायात ज़ियादा न करना कि महब्बत ख़त्म हो जाएगी और मेरा दिल तेरा इन्कार कर देगा और दिल तो बदलते रहते हैं। मैं ने दिल में महब्बत और अदावत देखी है और जब दोनों जम्अ हों तो महब्बत नहीं रहती वोह चली जाती है।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

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शोहर पर बीवी के हुकूक

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 

बीवियों के शोहरों पर बहुत से हुकूक हैं, इन में से एक येह भी है कि वोह उन से हुस्ने सुलूक से पेश आएं, उन की अक्ल की कमजोरी को मद्दे नज़र रखते हुवे उन से मेहरबानी का सुलूक करें और उन के दुख दर्द को दूर करें और अल्लाह तआला ने उन के हुकूक की अजमत में फ़रमाया है: “और लिया है उन्हों ने तुम से कौले मुस्तहकम”

और मजीद फ़रमाया कि “और करवट के साथी पर” कहा गया है कि इस साथी से मुराद औरत है। हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने इन तीन बातों की उस वक्त वसिय्यत फ़रमाई जब कि आप की ज़बाने अक्दस विसाल शरीफ़ के वक़्त लड़ खड़ा रही थी और कलामे अन्वर में हल्कापन पैदा हो चला था। आप ने फ़रमाया : नमाज़, नमाज़ और वोह तुम्हारे हाथ जिन के मालिक हुवे उन्हें वो तक्लीफ़ न दो जिस के बरदाश्त करने की वोह ताकत नहीं रखते, औरतों के मुतअल्लिक अल्लाह तआला से डरो, अल्लाह से डरो, वोह तुम्हारे हाथों में कैद हैं, यानी वोह ऐसी कैदी हैं जिन्हें तुम ने अल्लाह तआला की अमानत के तौर पर लिया है और अल्लाह के कलाम से उन की शर्मगाहें तुम पर हलाल कर दी गई हैं।

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का इरशाद है कि जिस शख्स ने अपनी बीवी की बद खुल्की पर सब्र किया अल्लाह तआला उसे मसाइब पर हज़रते अय्यूब अलैहहिस्सलाम  के सब्र के अज्र के बराबर अज्र देगा और जिस औरत ने खाविन्द की बद खुल्की पर सब्र किया अल्लाह तआला उसे फ़िरऔन की बीवी आसिया के सवाब के मिस्ल सवाब अता फरमाएगा।

बीवी से हुस्ने सुलूक येह नहीं कि उस की तकालीफ़ को दूर किया जाए बल्कि हर ऐसी चीज़ को उस से दूर करना भी शामिल है जिस से तक्लीफ़ पहुंचने का ख़दशा (अंदेशा) हो और उस के गुस्से और नाराजी के वक्त हिल्म का मुजाहरा करना और इस मुआमले में हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम के उस्वए हसना को मद्दे नज़र रखना।

बीवी से अच्छा सुलूक करने का हुक्म

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की बा’ज़ अज़वाजे मुतहहरात आप की बात को (ब तकाज़ाए कुदरत) (सूरतन) न भी मानतीं और उन में से कोई एक रात तक गुफ्तगू न किया करती थी मगर आप उन से हुस्ने सुलूक ही से पेश आया करते थे।

एक मरतबा हज़रते उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो की बीवी ने आप की बात को न माना तो आप ने फ़रमाया कि ऐ लौंडी ! तू मेरे सामने बढ़ कर बात करती है ! उन्हों ने अर्ज की, कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की अज़वाजे मुतहहरात उन्हें दे लिया करतीं हालांकि वोह आप से बेहतर थे। हज़रते उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया : हफ्सा खाइबो ख़ासिर हुई अगर उस ने हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की बात रद्द कर दी फिर आप ने हज़रते हफ्सा से फ़रमाया : इब्ने अबी कुहाफ़ा (हज़रते सिद्दीके अक्बर) की बेटी पर गैरत न करना क्यूंकि वोह हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लमकी महबूबा हैं और फिर आप ने उन्हें हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की बात को रद्द करने से डराया।

औरत बीवी की गलतियों को दरगुज़र करना

मरवी है कि इन अज़वाजे मुतहहरात में से किसी ने हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम के सीनए अन्वर पर हाथ रख कर आप को पीछे हटाया तो उन की वालिदा ने इन्हें तहदीद की । हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने उन की मां की बातें सुन कर फ़रमाया कि इन से दर गुज़र करो येह इस से भी ज़ियादा कुछ किया करती हैं।

एक बार हज़रते आइशा रज़ीअल्लाहो अन्हा और हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम के दरमियान कुछ बात हो गई यहां तक कि हज़रते अबू बक्र रज़ीअल्लाहो अन्हो दाखिल हुवे और उन्हें फैसल बनाया गया जब उन्हों ने बात सुनना चाही तो हुजूर सरवरे काइनात सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने हज़रते आइशा से फ़रमाया : तुम बात करोगी या मैं, हज़रते आइशा रज़ीअल्लाहो अन्हा  बोली कि बात आप ही करें मगर दुरुस्त, यह सुन कर हज़रते अबू बक्र रज़ीअल्लाहो अन्हो ने उन के मुंह पर ऐसा तमांचा मारा कि उन के मुंह से खून जारी हो गया और आप ने कहा : ऐ अपनी जान की दुश्मन क्या हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ना हक़ बात कहेंगे? हज़रते आइशा रज़ीअल्लाहो अन्हो ने हुजूर की पनाह तलाश की और आप की पुश्ते मुबारक के पीछे बैठ गई । हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने हज़रते अबू बक्र रज़ीअल्लाहो अन्हो से फ़रमाया कि हम ने तुम्हें इस लिये नहीं बुलाया था और न ही हमारा येह इरादा था कि हम तुम से येह बात चाहें ।

एक मरतबा हज़रते आइशा रज़ीअल्लाहो अन्हा  किसी बात में हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से ख़फ़ा हो गई और कहा कि क्या आप वोही हैं जो समझते हैं कि मैं अल्लाह का नबी हूं आप सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम येह बात सुन कर मुस्कुरा दिये और हिल्मो करम की बिना पर येह बात बरदाश्त कर गए ।

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम हज़रते आइशा रज़ीअल्लाहो अन्हा  से फ़रमाया करते कि मैं तुम्हारी नाराज़ी और खुशी पहचानता हूं । हज़रते आइशा ने अर्ज की : हुजूर ! वोह कैसे ? आप ने फ़रमाया : जब तुम राज़ी होती हो तो कहती हो रब्बे मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की कसम ! हज़रते आइशा रज़ीअल्लाहो अन्हा ने अर्ज की : या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम आप ने सच फ़रमाया, मैं सिर्फ आप का नाम ही छोड़ती हूं।।

और येह भी कहा गया है कि इस्लाम में सब से पहली महब्बत हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की हज़रते आइशा रज़ीअल्लाहो अन्हा  से महब्बत थी।

और हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम हज़रते आइशा से फ़रमाया करते थे कि मैं तुम्हारे लिये ऐसा हूं जैसा अबू जुरआ, उम्मे जुरआ के लिये थे मगर मैं तुम को तलाक़ नहीं दूंगा।

और आप अपनी अज़वाजे मुतहहरात से येह भी फ़रमाते कि मुझे आइशा के बारे में तक्लीफ़ न दो, ब खुदा इस के सिवा तुम में से किसी के बिस्तर पर मुझ पर वहयी  नाज़िल नहीं होती।

औरतों पर नरमी और ज्यादा मेहरबानी

हज़रते अनस रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम औरतों और बच्चों पर सब लोगों से ज़ियादा मेहरबान थे ।हर इन्सान के लिये मुनासिब येह है कि वोह खुश तबई, मिज़ाह और मुलाअबत से अपनी औरतों से उन की तकालीफ़ को रफ्अ करे क्यूंकि इन चीजों से औरतों के दिल खुश हुवा करते हैं। – हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम अपनी अज़वाजे मुतहहरात से मिज़ाह भी फ़रमा लिया करते थे

और उन से उन की अक्लों के मुताबिक़ अक्वाल व अफ्आल फ़रमाया करते यहां तक कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम हज़रते आइशा रज़ीअल्लाहो अन्हा से दौड़ में मुकाबला करते, कभी हज़रते आइशा आप से आगे निकल जाती और कभी आप सबक़त ले जाते और फ़रमाते कि येह उस दिन का बदला है ।

हदीस शरीफ़ में है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम अपनी अज़वाजे मुतहहरात से सब से ज़ियादा खुश तबई फ़रमाने वाले थे।

बीवी की जायज़ ख्वाइशें पूरी करना

हज़रते आइशा रज़ीअल्लाहो अन्हा फ़रमाती हैं मैं ने हबशी और दूसरे लोगों की आवाजें सुनीं जो आशूरा के दिन खेल रहे थे, हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : ऐ आइशा ! क्या तुम इन का खेल देखना चाहती हो ? मैं ने अर्ज की : हां ! आप ने उन की तरफ़ आदमी भेजा, जब वोह आ गए तो हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम दो दरवाज़ों के दरमियान खड़े हो गए और अपना दस्ते अक्दस दरवाजे पर रख दिया और हाथ लम्बा कर लिया, मैं ने अपनी ठोड़ी आप के हाथ पर जमा दी, वोह लोग खेलते रहे और मैं देखती रही, रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम मुझ से पूछते :बस काफ़ी है ? मैं अर्ज करती : ज़रा चुप रहिये, आप ने दो या तीन मरतबा पूछा फिर फ़रमाया : आइशा ! अब बस करो, मैं ने अर्ज की : ठीक है, तब हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने उन्हें इशारा फ़रमाया तो वोह वापस चले गए।और हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : मोमिनों में कामिल तरीन ईमान वाला वोह है जिस का खुल्क उम्दा हो और जो अपने घर वालों पर निहायत मेहरबान हो ।

नबिय्ये अकरम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का इरशाद है कि तुम में से बेहतर वोह है जो अपनी औरतों से बेहतर है और मैं अपनी अज़वाज के साथ तुम सब से बेहतर सुलूक करने वाला हूं।

हज़रते उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि गुस्से के बा वुजूद इन्सान के लिये मुनासिब है कि वोह अपने घर वालों के साथ बच्चे जैसा हो और जब घर वाले उस से कुछ तलब करें जो उस के पास मौजूद हो तो वोह उसे मर्द पाएं (या’नी वोह मतलूबा शै में बुख़्ल न करे)।

हज़रते लुक्मान ने फ़रमाया : अक्लमन्द के लिये मुनासिब है कि वोह अपने घर वालों से बच्चे की तरह हो और जब कौम में हो तो जवानों की तरह हो ।

इस हदीस की तफ्सीर में जिस में हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया है कि अल्लाह तआला हर जा’ ज़री जव्वाज़ से बुग्ज़ रखता है। कहा गया है कि इस से मुराद अपने घर वालों से सख्ती करने वाला और खुद बीनी में मुब्तला है और येह इन्हीं मआनी में से एक माना है जो फ़रमाने इलाही की तफ्सीर में कहा गया है कि इस से मुराद बद खुल्क, ज़बान दराज़, अपने घर वालों पर तशढुद करने वाला है। हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने हज़रते जाबिर रज़ीअल्लाहो अन्हो से फ़रमाया : तुम ने बाकिरा से शादी क्यूं न की वोह तुम से खेलती और तुम उस से खुश तबई करते ।

 

एक बदविय्या ने अपने मुर्दा शोहर की इन अल्फ़ाज़ में तारीफ़ की, ब खुदा ! जब वोह घर में दाखिल होता तो सदा हंसता रहता, जब वोह बाहर निकलता तो चुप रहता, जो कुछ मिलता खा लेता और जो कुछ मौजूद न होता उस के मुतअल्लिक़ सुवाल न करता।

इन्सान के लिये येह भी ज़रूरी है कि वोह मुलाअबत, हुस्ने खुल्क और इस की ख्वाहिशात की मुवाफ़क़त में इस हद तक न बढ़े कि उस की आदतें बिगड़ जाएं और उस के दिल से मर्द की हैबत बिल्कुल उठ जाए बल्कि हर मुआमले में ए’तिदाल को मल्हूज़ रखे और अपनी हैबत और दबदबा बिल्कुल्लिया ख़त्म न करे।

बीवी पर नरमी के साथ थोड़ी सख्ती करना ज़रूरी है

मर्द पर लाज़िम है कि उस से कोई ना मुनासिब बात न सुने और उसे बुरे कामों में दिलचस्पी न लेने दे बल्कि जब भी उसे शरीअत व मुरव्वत के ख़िलाफ़ गामज़न पाए उस की सरज़निश करे और उसे राहे रास्त पर लाए।

हज़रते हसन रज़ीअल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि अल्लाह की कसम ! जो भी मर्द अपनी बीवी की नफ़्सानी ख्वाहिशात की पैरवी करता है तो अल्लाह तआला उसे औंधा जहन्नम में डालेगा।

हज़रते उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया : औरतों की मुखालफ़त करो क्यूंकि इन की मुखालफ़त में बरकत है।

और येह भी कहा गया है कि इन से मश्वरा करो और इन की मुखालफ़त करो। हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : औरत का गुलाम हलाक हुवा।

और आप ने येह इस लिये फ़रमाया क्यूंकि मर्द जब औरत की ख्वाहिशाते नफ़्सानी की पैरवी करता है तो वोह उस का गुलाम और बन्दा बन जाता है क्यूंकि अल्लाह तआला ने उसे औरत का मालिक बनाया मगर उस ने औरत को अपना मालिक बना दिया, गोया उस ने बर अक्स काम किया और खुदाई फैसले के खिलाफ़ शैतान की इताअत की जैसा कि उस ने कहा :

“और अलबत्ता हुक्म करूंगा उन को पस फेर डालेंगे खुदा की पैदाइश को।”

और मर्द का हक़ येह है कि वोह मतबूअ हो, ताबेए मोहमल न बने चुनान्चे, अल्लाह तआला ने मर्दो को येह नाम दिया है कि

मर्द औरतों पर हुक्मरान हैं। और शोहर को सरदार का नाम दिया गया है चुनान्चे, फ़रमाने इलाही है : इन दोनों ने इस के सरदार (शोहर) को दरवाजे

के करीब पाया। और जब सरदार ताबेए फरमान हो जाए तो गोया उस ने नेमते इलाही का कुफ्रान किया।

औरत का नफ्स भी तेरे नफ़्स की तरह है अगर तू उसे मामूली सी ढील दे देगा तो वोह बहुत ज़ियादा सरकश हो जाता है, अगर तू उसे भरपूर ढील दे देगा तो वोह बिल्कुल तेरे हाथ से निकल जाएगा।

इमाम शाफेई रज़ीअल्लाहो अन्हो का क़ौल है कि तीन हस्तियां ऐसी हैं कि अगर तू उन की इज्जत करेगा तो वोह तुझे जलील करेंगे और अगर तू उन की इहानत करेगा तो वोह तेरी इज्जत करेंगे, औरत, खादिम और घोड़ा।

इन की मुराद येह है कि अगर तू ने इन से सिर्फ नर्मी का बरताव किया और नर्मी को सख्ती से न मिलाया और मेहरबानी से सरज़निश को न मिलाया तो येह तुझे नुक्सान देंगे।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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जुम्मे के दिन की फज़िलतें और बरकतें

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

जुम्मे का दिन एक अज़ीम दिन है, अल्लाह तआला ने इस के साथ इस्लाम को अज़मत दी और येह दिन मुसलमानों के लिये ख़ास कर दिया, फ़रमाने इलाही है : जब जुम्मे के दिन नमाज के लिये पुकारा जाए पस जल्दी करो अल्लाह के ज़िक्र की तरफ़ और खरीदो फरोख्त छोड़ दो। इस आयत से मालूम हुवा कि अल्लाह तआला ने जुम्मे के वक्त दुन्यावी शगल हराम करार दिये हैं और हर वो चीज़ जो जुमा के लिये रुकावट बने ममनूअ करार दे दी गई है। हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का फरमान है कि तहक़ीक़ अल्लाह तआला ने तुम पर मेरे इस दिन और इस मकाम में जुमा को फ़र्ज़ करार दे दिया है। एक और इरशाद है कि जो शख्स बिगैर किसी उज्र के तीन जुम्मे की नमाजें छोड़ देता है अल्लाह तआला उस के दिल पर मोहर लगा देता है।

एक रिवायत के अल्फ़ाज़ येह हैं कि “उस ने इस्लाम को पसे पुश्त डाल दिया।”

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जुम्मे की नमाज़ छोड़ देने पर अज़ाब

एक शख्स हज़रते इब्ने अब्बास रज़ीअल्लाहो अन्हो के पास मुतअद्दिद बार आता रहा और एक ऐसे शख्स के मुतअल्लिक़ पूछता रहा जो मर गया और नमाजे जुमा और जमाअतों में शरीक नहीं होता था। हज़रते इब्ने अब्बास रज़ीअल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया : वोह जहन्नम में है, वोह शख्स पूरा एक महीना येही पूछता रहा और आप येही कहते रहे कि वोह जहन्नम में है।

हदीस शरीफ़ में है कि अहले किताब को जुम्मे का दिन दिया गया मगर उन्हों ने इस में इख्तिलाफ़ किया लिहाजा येह दिन, उन से वापस ले लिया गया, अल्लाह तआला ने हमें इस की हिदायत की, उसे इस उम्मत के लिये मुअख्खर किया और इन के लिये इसे ईद का दिन बनाया लिहाज़ा येह लोग सब लोगों से सबक़त ले जाने वाले हैं और अहले किताब इन के ताबेअ हैं।

हज़रते अनस रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है, हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : मेरे पास जिब्रील आए, उन के हाथ में सफ़ेद आईना था, उन्हों ने कहा : येह जुमा है, अल्लाह तआला इसे आप पर फ़र्ज़ करता है ताकि येह आप के और आप के बाद आने वाले लोगों के लिये ईद हो, मैं ने पूछा : इस में हमारे लिये क्या है ? जिब्रील ने कहा : इस में एक उम्दा साअत है, जो शख्स इस में भलाई की दुआ मांगता है अगर वोह चीज़ उस शख्स के मुक़द्दर में हो तो अल्लाह तआला उसे अता फ़रमाता है वरना उस से बेहतर चीज़ उस के लिये ज़ख़ीरा कर दी जाती है या कोई शख्स इस साअत में ऐसी मुसीबत से पनाह मांगता है जो इस का मुक़द्दर हो चुकी है तो अल्लाह तआला इस मुसीबत से भी बड़ी मुसीबत को टाल देता है और वोह हमारे नज़दीक सब दिनों का सरदार है और हम आख़िरत में एक यौम मजीद मांगते हैं, मैं ने कहा : वोह क्यूं ? जिब्रील ने अर्ज़ की : आप के रब ने जन्नत में एक ऐसी वादी बनाई है जो सफ़ेद है और मुश्क की खुश्बू से लबरेज़ है, जब जुम्मे का दिन होता है तो अल्लाह तआला इल्लिय्यीन से कुरसी पर (अपनी शान के लाइक) नुजूले इजलाल फ़रमाता है यहां तक कि सब उस के दीदार से मुशर्रफ़ होते हैं।हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम फ़रमाते हैं कि सब से उम्दा दिन जिस में सूरज तुलूअ होता है, जुम्मे का दिन है, इसी दिन आदम अलैहहिस्सलाम  की पैदाइश हुई, इसी दिन वोह जन्नत में दाखिल किये गए, इसी दिन वोह जन्नत से जमीन की तरफ़ उतारे गए, इसी दिन उन की तौबा क़बूल हुई, इसी दिन उन का विसाल हुवा।

इसी दिन क़ियामत काइम होगी और वोह अल्लाह के नज़दीक यौमे मज़ीद है, आस्मानी फ़रिश्तों में इस दिन का येही नाम है और येही जन्नत में अल्लाह तआला के दीदार का दिन है ।

जुम्मे के दिन जहन्नम से आजादी नसीब होती है

हदीस शरीफ़ में है कि अल्लाह तआला हर जुम्मे के दिन छ लाख इन्सानों को जहन्नम से आज़ाद करता है।

हज़रते अनस रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है, हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया कि जब तू ने जुम्मे को सालिम कर लिया तो गोया तमाम दिनों को सालिम कर लिया। ।

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया कि जहन्नम हर रोज़ ज़हूवए कुब्रा (निस्फुन्नहार) में जवाल से पहले भड़काया जाता है या’नी सूरज जब ऐन आस्मान के दिल में होता है लिहाज़ा इस साअत में नमाज़ मत पढ़ो मगर जुम्मे के दिन येह कैद नहीं है क्यूंकि जुमा सारे का सारा नमाज़ है और इस दिन जहन्नम नहीं भड़काया जाता।

हज़रते का’ब रज़ीअल्लाहो अन्हो का फ़रमान है कि अल्लाह तआला ने सब शहरों से मक्कए मुअज्जमा को फजीलत बख़्शी है, सब महीनों में रमज़ान को फ़ज़ीलत अता की है, सब दिनों में जुम्मे के दिन को फजीलत दी है और सब रातों में लैलतुल कद्र को फ़ज़ीलत अता फरमाई है।

कहा गया है कि जुम्मे के दिन हशरातुल अर्ज़ और परीन्दे एक दूसरे से मुलाकात करते हैं और कहते हैं कि इस नेक दिन में सलाम हो, सलाम हो।

नबिय्ये अकरम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम फ़रमाते हैं कि जो शख्स जुमा के दिन और जुम्मे की रात को फ़ौत हुवा, अल्लाह तआला उस के लिये सो शहीदों का सवाब लिखता है और उसे क़ब्र के फ़ितने से बचा लेता है।

शैख अब्दुल हक़ मुहद्दिसे देहलवी ‘अशिअतुल लम्आत’ में फ़रमाते हैं कि इस हदीस के दो रावियों, अबुल खलील और अबू क़तादा की मुलाक़ात साबित नहीं ।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

La ilaha il lal la ho Muhammadur Rasool lal lah - Jumma Mubarak greeting

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मेराज शरीफ का वक़ेआ

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 

बुखारी ने क़तादा से, इन्हों ने अनस बिन मालिक रज़ीअल्लाहो अन्हो से, इन्हों ने मालिक बिन सा’सआ रज़ीअल्लाहो अन्हो से रिवायत की है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने इन्हें मे’राज की रात का वाकिआ सुनाया और फ़रमाया कि मैं हतीमे का’बा में था और येह भी फ़रमाया कि मैं मकामे हजर में लैटा हुवा था कि यकायक मेरे पास एक आने वाला आया और उस ने कुछ कहा, मैं ने सुना वोह कह रहा था फिर इस जगह और उस जगह के दरमियान चाक किया गया (रावी कहता है मैं ने जारूद रज़ीअल्लाहो अन्हो से पूछा, वोह मेरे करीब बैठे हुवे थे कि इस जगह और उस जगह से क्या मुराद है ? उन्हों ने कहा : हल्कूम से नाफ़ तक) फिर उन्हों ने मेरा दिल निकाला और मेरे पास एक सोने का तश्त लाया गया जो ईमान से लबरेज़ था, इस के बाद मेरा दिल धोया गया फिर इसे इल्म व ईमान से लबरैज़ कर के वापस रख दिया गया।

 

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मेराज के दौरान बुर्राक का ज़िक्र

फिर मेरे पास एक सफ़ेद जानवर लाया गया जो खच्चर से पस्त और गधे से ऊंचा था (जारूद ने हज़रते अनस रज़ीअल्लाहो अन्हो से पूछा कि ऐ अबू हम्जा क्या वोह बुराक था ? हज़रते अनस रज़ीअल्लाहो अन्हो ने जवाब दिया : हां ! वोह अपना क़दम मुन्तहाए नज़र पर रखता था) मैं उस पर सुवार हुवा और जिब्रील मुझे ले कर चले यहां तक कि आस्माने दुन्या तक पहुंचे, जिब्रील ने उस का दरवाज़ा खुलवाया, पूछा गया : कौन है ? उन्हों ने कहा : जिब्रील, कहा गया : और तुम्हारे साथ कौन है? जिब्रील ने कहा : मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम पूछा गया : वोह बुलाए गए हैं ? जिबील ने कहा : हां ! कहा गया : उन्हें खुश आमदीद हो, उन का आना मुबारक हो, फिर दरवाज़ा खोल दिया गया।

जब मैं वहां पहुंचा तो वहां आदम अलैहहिस्सलाम  मौजूद थे। जिब्रील ने कहा : यह आप के बाप आदम हैं, इन्हें सलाम कीजिये ! लिहाज़ा मैं ने सलाम किया, उन्हों ने सलाम का जवाब दिया और कहा : सालेह बेटे और सालेह नबी को खुश आमदीद हो।

फिर जिब्रील मेरे साथ ऊपर चढ़े यहां तक कि दूसरे आस्मान पर पहुंचे और जिब्रील ने दरवाज़ा खुलवाया, पूछा गया : कौन है ? कहा : जिब्रील, पूछा गया : तुम्हारे हमराह कौन है ? उन्हों ने कहा : मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम पूछा गया : क्या वोह बुलवाए गए हैं ? जिब्रील बोले : हां ! कहा गया : उन का आना मुबारक हो और दरवाज़ा खोल दिया।

जब मैं वहां पहुंचा तो मैं ने हज़रते ईसा अलैहहिस्सलाम  और हज़रते यहयाअलैहहिस्सलाम  : को वहां पाया और वोह दोनों आपस में ख़ालाज़ाद भाई हैं, जिब्रील ने कहा कि येह यहया और ईसा ! अलैहहिस्सलाम  हैं, इन्हें सलाम कीजिये ! मैं ने उन्हें सलाम किया, उन्हों ने सलाम का जवाब दिया और कहा : सालेह भाई और सालेह नबी को खुश आमदीद हो।।

फिर जिब्रील मुझे तीसरे आस्मान पर ले गए और दरवाजा खुलवाना चाहा, पूछा गया कौन ? कहा : जिब्रील, पूछा गया : तुम्हारे साथ और कौन है ? कहा : मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम कहा गया : क्या वोह बुलाए गए हैं ? जिबील ने कहा : हां ! कहा गया : खुश आमदीद, इन का आना बहुत अच्छा और मुबारक है और दरवाज़ा खोल दिया गया।

जब मैं वहां पहुंचा तो मुझे यूसुफ़ अलैहहिस्सलाम  मिले, जिब्रील ने कहा : येह यूसुफ़ अलैहहिस्सलाम  हैं, इन्हें सलाम कीजिये ! मैं ने उन्हें सलाम किया, उन्हों ने सलाम का जवाब दिया और कहा : सालेह भाई और सालेह नबी को खुश आमदीद हो।

फिर जिबील मुझे चौथे आस्मान पर ले गए और दरवाज़ा खुलवाना चाहा, पूछा गया कि कौन है ? इन्हों ने कहा : जिब्रील ! पूछा गया : तुम्हारे साथ और कौन है ? जिब्रील बोले मोहम्मद कहा गया : क्या उन्हें बुलाया गया है ? जिब्रील ने कहा : हां ! दरबान ने कहा : खुश आमदीद, उन का आना बहुत मुबारक है और दरवाज़ा खोल दिया गया।

जब मैं वहां पहुंचा तो मैं ने हज़रते इदरीस अलैहहिस्सलाम  को देखा, जिब्रील ने कहा : यह इदरीस अलैहहिस्सलाम  हैं, इन्हें सलाम कीजिये ! मैं ने उन्हें सलाम किया उन्हों ने सलाम का जवाब दिया और कहा : सालेह भाई और सालेह नबी को खुश आमदीद हो ।

फिर मुझे जिब्रील साथ ले कर ऊपर चढ़े यहां तक कि पांचवें आस्मान पर पहुंचे, उन्हों ने दरवाजा खुलवाया, पूछा गया : कौन है ? कहा : जिब्रील, पूछा गया : तुम्हारे साथ कौन है ? कहा : मोहम्मद पूछा गया : क्या उन्हें बुलाया गया है ? जिब्रील ने कहा : हां ! कहा गया उन्हें खुश आमदीद हो, उन का आना मुबारक हो ।

जब मैं वहां पहुंचा तो हज़रते हारून मिले, जिब्रील ने कहा : येह हारून अलैहहिस्सलाम  हैं, इन्हें सलाम कीजिये ! मैं ने उन्हें सलाम किया, उन्हों ने सलाम का जवाब दिया और कहा : सालेह भाई और सालेह नबी को खुश आमदीद हो ।

फिर जिब्रील मुझे ऊपर ले गए यहां तक कि हम छटे आस्मान पर पहुंचे, उन्हों ने दरवाज़ा खुलवाया, पूछा गया : कौन है ? कहा : जिब्रील, पूछा गया : तुम्हारे साथ और कौन है ? कहा : मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम कहा गया : क्या वोह बुलाए गए हैं ? जिब्रील ने कहा : हां ! उस फ़िरिश्ते ने कहा : उन्हें खुश आमदीद हो, उन का आना मुबारक है।

जब मैं वहां पहुंचा तो हज़रते मूसा अलैहहिस्सलाम  से मुलाकात हुई, जिब्रील ने कहा : येह मूसा अलैहहिस्सलाम  हैं इन्हें सलाम कीजिये, मैं ने उन्हें सलाम किया, उन्हों ने सलाम का जवाब दिया और कहा : सालेह भाई और सालेह नबी को खुश आमदीद हो, फिर हम जब आगे बढ़े तो वोह रोए, उन से कहा गया : आप क्यूं रोते हैं ? तो उन्हों ने कहा : मैं इस लिये रोया हूं कि मेरे बाद एक नौजवान मबऊस किया गया है जिस की उम्मत के लोग मेरी उम्मत से ज़ियादा जन्नत में जाएंगे।

फिर जिबील मुझे सातवें आस्मान पर चढ़ा ले गए और उस का दरवाज़ा खुलवाया, पूछा गया : कौन ? कहा : जिब्रील, पूछा गया : तुम्हारे साथ और कौन है ? कहा : मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम पूछा गया : क्या वोह बुलाए गए हैं ? कहा : हां ! कहा गया : उन्हें खुश आमदीद हो, उन का आना मुबारक है।

जब मैं वहां पहुंचा तो हज़रते इब्राहीम मिले, जिब्रील ने कहा : यह आप के वालिदे गिरामी इब्राहीम हैं, इन्हें सलाम कीजिये, मैं ने उन्हें सलाम किया, उन्हों ने सलाम का जवाब दिया और कहा : सालेह बेटे और सालेह नबी को खुश आमदीद हो ।

सिदरतुल मुन्तहा की कैफिय्यत

फिर मुझे सिद्रतुल मुन्तहा तक ले जाया गया, उस के फल मकामे हजर के मटकों की तरह और उस के पत्ते हाथी के कानों जैसे थे, वहां चार नहरें थीं, दो ज़ाहिर और दो पोशीदा, मैं ने जिब्रील से पूछा : येह नहरें कैसी हैं ? उन्हों ने कहा : जो दो पोशीदा हैं वोह जन्नत की नहरें हैं और जो दो नहरें ज़ाहिर हैं वोह नील और फुरात हैं।

फिर बैतुल मा’मूर मेरे सामने जाहिर किया गया जिस में सत्तर हज़ार फ़िरिश्ते हर रोज़ दाखिल होते हैं । फिर मुझे एक शराब (शरबत) का बरतन, एक दूध का और एक शहद का बरतन दिया गया, मैं ने दूध का इन्तिखाब कर लिया, जिब्रील ने कहा : येही फ़ितरत है। आप और आप की उम्मत इस पर काइम रहेंगे, इस के बाद मुझ पर हर रोज़ की पचास पचास नमाजें फ़र्ज़ करार दे दी गई।

मूसा अलैहहिस्सलाम का पचास नमाज़ों को कम करवाने का अर्ज़ करना

फिर जब मैं वापस हुवा तो मूसा अलैहहिस्सलाम  ने कहा : आप को किस बात का हुक्म दिया गया है ? मैं ने कहा : हर दिन में पचास नमाज़ों का, मूसा अलैहहिस्सलाम  ने कहा : आप की उम्मत रोज़ाना पचास नमाजें नहीं पढ़ सकेगी, मैं आप से पहले लोगों को आजमा चुका हूं और मैं ने बनी इस्राईल से सख्त बरताव किया है लिहाज़ा अपने रब के पास लौट जाइये और अपनी उम्मत के लिये तख़्फीफ़ कराइये, चुनान्चे, मैं लौटा और (दो बारियों में) दस नमाजे मुआफ़ कर दी गई।

फिर मैं मूसा अलैहहिस्सलाम  के पास आया, उन्हों ने पहले की तरह कहा, मैं फिर लौट गया और फिर दस नमाजें मुआफ़ कर दी गई, । मैं फिर मूसा .. के पास आया, उन्हों ने पहले की तरह कहा : मैं फिर लौट गया और फिर दस नमाजें मुआफ़ कर दी गई। मैं फिर मूसा अलैहहिस्सलाम  के पास आया तो उन्हों ने इसी तरह कहा : मैं फिर वापस लौट गया और मुझे रोज़ाना दस नमाज़ों का हुक्म दिया गया मैं फिर मूसा अलैहहिस्सलाम  के पास आया तो उन्हों ने इसी तरह कहा : मैं फिर वापस लौट गया और मुझे हर रोज़ पांच नमाज़ों का हुक्म दिया गया।

मैं जब मूसा अलैहहिस्सलाम  के पास लौट कर आया तो उन्हों ने पूछा कि आप को क्या हुक्म मिला है ? मैं ने कहा : रोज़ाना पांच नमाज़ों का हुक्म मिला है, उन्हों ने कहा कि आप की उम्मत रोज़ाना पांच नमाजें भी नहीं पढ़ सकेगी, मैं ने आप से पहले लोगों का तजरिबा किया है और बनी इस्राईल पर सख्त बरताव कर चुका हूं लिहाज़ा आप फिर अपने रब के हुजूर जाएं और अपनी उम्मत के लिये तख्फीफ़ की दरख्वास्त करें।

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया कि मैं अपने रब से कई बार दरख्वास्त कर चुका हूं, अब मुझे शर्म आती है लिहाज़ा अब मैं राजी हूं और रब के हुक्म को तस्लीम करता हूं।

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम फ़रमाते हैं कि जब मैं आगे बढ़ा तो किसी पुकारने वाले ने आवाज़ दी कि मैं ने अपना हुक्म जारी कर दिया और अपने बन्दों से तख़्फ़ीफ़ कर दी है।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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