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Islamic – पृष्ठ 5 – Net In Hindi.com

शराबी पर अजाब

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 अल्लाह तआला ने शराब के बारे में जो आयात नाज़िल फ़रमाई इन में से पहली यह है : आप से शराब और जूए के बारे में सुवाल करते हैं फ़रमा दीजिये इन दोनों में बड़ा गुनाह है और (ब ज़ाहिर) लोगों के वासिते फ़ाइदे हैं। यह आयत सुन कर कुछ लोगों ने शराब पीना छोड़ दिया और कुछ इसी तरह पीते रहे यहां तक कि एक आदमी शराब पी कर नमाज़ पढ़ने लगा तो उस की ज़बान से ना मुनासिब कलिमात निकले, तब अल्लाह तआला ने यह आयत नाज़िल फ़रमाई : ऐ मोमिनो नमाज़ के करीब मत जाओ इस हाल में कि तुम नशे में हो। पस यह आयत सुन कर जिस ने शराब पी उस ने पी और जिस ने उसे छोड़ दिया उस ने छोड़ दिया यहां तक कि हज़रते उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो ने एक बार शराब पी और ऊंट का जबड़ा उठा कर हज़रते अब्दुर्रहमान बिन औफ़ रज़ीअल्लाहो अन्हो के सर पर मारा और उन का सर फोड़ दिया, फिर बैठ कर बद्र के मक्तूलों पर रोने लगे, हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम को जब येह खबर मिली तो आप ने गुस्से की हालत में चादर घसीटते हुवे बाहर कदम रन्जा फ़रमाया और अपने पास जो चीज़ थी उस से इन्हें मारा, तब हज़रते उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो बोले कि मैं अल्लाह और उस के रसूल के गज़ब से पनाह मांगता हूं और अल्लाह तआला ने येह आयत नाज़िल फ़रमाई : सिवाए उस के नहीं कि शैतान इरादा करता है कि तुम्हारे दरमियान शराब और जूए की वज्ह  से बुग्ज व अदावत डाले।।

हज़रते उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो ने येह आयत सुन कर कहा : हम रुक गए, हम रुक गए।

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शराब ना पिने के बारे में हदीस शरीफ

शराब की हुरमत में मुत्तफ़िक अलैह अहादीस भी हैं चुनान्चे, फ़रमाने नबवी है कि आदी शराब खोर जन्नत में नहीं जाएगा।

नबिय्ये अकरम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया कि बुतों की इबादत की मुमानअत के बाद अल्लाह तआला ने मुझे सब से पहले शराब पीने और लोगों पर ला’नतें भेजने से रोका है।

फ़रमाने नबवी है कि कोई जमाअत ऐसी नहीं है जो दुनिया में किसी नशा आवर चीज़ पर जम्अ होते हैं मगर अल्लाह तआला उन्हें जहन्नम में जम्अ करेगा और वोह एक दूसरे को मलामत करना शुरू करेंगे, एक दूसरे को कहेगा : ऐ फुलां ! अल्लाह तआला तुझे मेरी तरफ़ से बुरी जज़ा दे तू ने ही मुझे इस मकाम तक पहुंचाया है और दूसरा इस से इसी तरह कहेगा।– हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया कि जिस ने दुनिया में शराब पी, अल्लाह तआला उसे जहन्नमी सांपों का ज़हर पिलाएगा जिसे पीने से पहले ही उस के चेहरे का गोश्त गल कर बरतन में गिर जाएगा और जब वोह उसे पियेगा तो उस का गोश्त और खाल उधड़ जाएगी जिस से जहन्नमी अजिय्यत पाएंगे।

शराब पीने वाले, कशीद करने वाले, निचोड़ने वाले, उठाने वाले, जिस के लिये लाई गई हो और इस की कीमत खाने वाले, सब के सब गुनाह में बराबर के शरीक हैं, अल्लाह तआला उन में से किसी का नमाज़, रोज़ा और हज कबूल नहीं करता यहाँ तक की वोह तौबा न करें, पस अगर वोह तौबा किये बिगैर मर गए तो अल्लाह तआला पर हक़ है कि उन्हें शराब के हर घूंट  के इवज़ जहन्नम की पीप पिलाए । याद रखिये हर नशा आवर चीज़ हराम है और हर शराब हराम है (ख्वाह वोह किसी किस्म की हो)।

इब्ने अबिद्दुन्या रज़ीअल्लाहो अन्हो से मन्कूल है कि उन की नशे में धुत एक ऐसे शख्स से मुलाकात हुई जो हाथ पर पेशाब कर रहा था और वुजू करने वाले की तरह पेशाब से हाथ धो रहा था और कह रहा था :

हम्द है अल्लाह तआला की जिस ने इस्लाम को नूर बख़्शा और पानी को पाक फ़रमाया।

अब्बास बिन मिरदास से ज़मानए जाहिलिय्यत में कहा गया कि तुम शराब क्यूं नहीं पीते, इस से तुम्हारे अन्दर तेज़ी बढ़ जाएगी, उस ने जवाब दिया : मैं अपने हाथों से जहालत को पकड़ कर खुद अपने पेट में दाखिल करने वाला नहीं हूं और न ही मैं इस बात पर राजी हूं कि मैं सुब्ह अपनी कौम के सरदार होने की हैसिय्यत से करूं और शाम उन में बे वुकूफ़ की सिफ़त से मुत्तसिफ़ हो कर करूं ।

 

शराब हर बुराई की जड़ है

बैहक़ी ने हज़रते इब्ने उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो से रिवायत की है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : शराब से बचो, तुम से पहले लोगों में एक इबादत गुज़ार शख्स था जो लोगों से अलाहिदा रहता था, एक औरत ने उस का पीछा किया और अपना एक खादिम भेज कर उसे बुलाया और कहा कि हम तुझे गवाही के लिये बुलाने आए हैं चुनान्चे, आबिद उन के घर में दाखिल हो गया, वोह जूही किसी दरवाजे से आगे बढ़ता वोह औरत उस दरवाजे को बन्द कर देती, यहां तक कि वोह औरत के पास पहुंचा, वोह बद किरदार औरत बैठी हुई थी, उस के पास एक लड़का था और एक बरतन था जिस में शराब रखी हुई थी। उस औरत ने कहा : मैं ने तुझे किसी गवाही के लिये नहीं बल्कि इस लड़के के क़त्ल और अपने साथ जिमाअ के लिये बुलाया है, या फिर शराब का येह प्याला पी ले, अगर तू ने इन्कार कर दिया तो मैं चिल्लाऊंगी और तुझे रुस्वा करूंगी।

जब उस आबिद ने कोई चारए कार न देखा तो कहा : अच्छा मुझे शराब पिला दे, चुनान्चे, उस ने शराब का प्याला पिला दिया। आबिद प्याला पी कर बोला : और दे दे, यहां तक कि शराब से बद मस्त हो कर उस ने औरत से जिना किया और लड़के को भी कत्ल कर दिया। लिहाज़ा शराब से बचो, पस ब खुदा ! ईमान और दाइमी शराब नोशी किसी शख्स के सीने में कभी भी जम्अ नहीं हो सकते अलबत्ता इन में से एक, दूसरे को निकाल देता है।

किस्सए हारूत व मारुत

अहमद और इब्ने हब्बान ने अपनी सहीह में हज़रते इब्ने उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो से रिवायत की है कि इन्हों ने हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम को येह फ़रमाते सुना कि जब आदम अलैहहिस्सलाम  को ज़मीन पर उतारा गया तो फ़िरिश्तों ने कहा : ।

“ऐ रब तू ज़मीन पर उस शख्स को अपना ख़लीफ़ा बना कर भेज रहा है जो फ़साद करेगा और खून बहाएगा और हम तेरी हम्द के साथ तस्बीह करते हैं और तेरी पाकी बयान करते हैं (लिहाज़ा हम इस मन्सब के ज़ियादा मुस्तहिक़ हैं) रब्बे जलील ने फ़रमाया : बेशक मैं जानता हूं जो तुम नहीं जानते।”

उन्हों ने अर्ज की : ऐ अल्लाह ! हम तेरी बनी आदम से ज़ियादा इताअत करते हैं। अल्लाह तआला ने फ़रमाया : तुम में से दो फ़िरिश्तें आएं ताकि हम देखें कि वोह कैसा अमल करते हैं ? उन्हों ने अर्ज की, कि हारूत व मारूत हाज़िर हैं।

रब तआला ने उन्हें हुक्म दिया कि तुम ज़मीन पर जाओ और अल्लाह तआला ने जोहरा सितारे को उन के सामने हसीनो जमील औरत के रूप में भेजा, वोह दोनों उस के यहां आए और उस से रफाकत का सवाल किया : मगर उस ने इन्कार कर दिया और कहा : ब खुदा ! उस वक्त तक नहीं जब तक तुम दोनों येह कलिमए शिर्क न कहो, उन्हों ने कहा : ब खुदा ! हम कभी भी अल्लाह तआला का शरीक नहीं ठहराएंगे, चुनान्चे, वोह औरत उन के पास से उठ कर चली गई और जब वापस आई तो वोह एक बच्चा उठाए हुवे थी। उन्हों ने उस से फिर वोही सुवाल किया मगर उस ने कहा : ब खुदा ! उस वक्त तक नहीं जब तक तुम दोनों इस बच्चे को क़त्ल न करो। उन्हों ने कहा : ब खुदा ! हम कभी भी इसे कत्ल नहीं करेंगे। फिर वोह शराब का प्याला ले कर लौटी और उन दोनों ने उसे देख कर फिर वोही सुवाल दोहराया, औरत ने कहा : ब खुदा ! उस वक्त तक नहीं जब तक तुम येह शराब न पी लो।

चुनान्चे, उन्हों ने शराब पी और नशे की हालत में उस से जिमाअ किया और बच्चे को कत्ल कर दिया। जब उन का नशा उतरा तो औरत ने कहा : ब खुदा ! तुम ने ऐसा कोई काम नहीं छोड़ा जिस के करने से तुम ने इन्कार कर दिया था, नशे की हालत में तुम सब काम कर

गुज़रे । तब उन्हें दुन्यावी अज़ाब और आखिरत के अज़ाब में से किसी एक को इख्तियार करने का हुक्म दिया गया और उन्हों ने दुन्यावी अज़ाब को पसन्द कर लिया।

हज़रते उम्मे सलमह रज़ीअल्लाहो अन्हा फ़रमाती हैं कि मेरी बेटी बीमार हो गई तो मैंने प्याले में नबीज़ बनाई, हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम मेरे हां तशरीफ़ लाए तो वोह उबल रही थी। आप ने फ़रमाया : उम्मे सलमह येह क्या है ? मैं ने अर्ज की, कि मेरी बेटी बीमार है, उस की दवाई बना रही हूं। आप ने फ़रमाया : अल्लाह तआला ने हराम कर्दा अश्या में मेरी उम्मत के लिये शिफ़ा नहीं रखी ।

एक रिवायत में है कि जब अल्लाह तआला ने शराब को हराम फरमा दिया तो इस में जितने भी फवाइद थे, सब छीन लिये।

(नोट : फ़िरिश्ते मासूम हैं इन से गुनाह नहीं होता। हारूत व मारूत  के बारे में इस तरह के वाकिआत की कोई हकीकत नहीं चुनान्चे, हारूत, मारूत दो फ़िरिश्ते हैं जिन्हें बनी इस्राईल की आजमाइश के लिये अल्लाह तआला ने भेजा था। इन के बारे में गलत किस्से बहुत मशहूर हैं और वोह सब बातिल हैं।आ’ला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान रहमतुल्लाह अलैह ने हारूत और मारूत के बारे में जो कलाम फरमाया उस का खुलासा येह है कि हारूत और मारूत का वाकिआ जिस तरह अवाम में मश्हर है आइम्मए किराम इस का शदीद और सख्त इन्कार करते हैं। इस की तफ्सील शिफ़ा शरीफ़ और इस की शुरूहात में मौजूद है, यहां तक कि इमामे अजल काज़ी इयाज़ रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया : हारूत और मारूत के बारे में येह खबरें यहूदियों की किताबों और इन की घड़ी हुई बातों में से हैं। और राजेह येही है कि हारूत और मारूत दो फिरिश्ते हैं जिन्हें अल्लाह तआला ने मख्लूक की आज़माइश के लिये मुकर्रर फरमाया कि जो जादू सीखना चाहे उसे नसीहत करें कि हम तो आज़माइश ही के लिये मुकर्रर हुवे हैं तो कुफ़ न कर। और जो इन की बात न माने वोह अपने पाउं पे चल के खुद जहन्नम में जाए, येह फ़िरिश्ते अगर उसे जादू सिखाते हैं तो वोह फ़रमां बरदारी कर रहे हैं न कि ना फरमानी कर रहे हैं।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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हुकुके के हमसाया और मसाकीन पर एहसान – पडोसी के हक

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 

हमसाएगी उखुव्वते इस्लामी से ज़ियादा कुछ और हुकूक की भी मुक्तज़ी है लिहाज़ा हर मुसलमान हमसाए के उखुव्वते इस्लामी के सुलूक के इलावा भी कुछ हुकूक हैं चुनान्चे, नबिय्ये करीम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का फ़रमान है कि हमसाए तीन हैं, एक हमसाए का एक हक, दूसरे के दो हक़ और तीसरे के तीन हुकूक हैं, जिस हमसाए के तीन हुकूक़ हैं वोह रिश्तेदार मुसलमान हमसाया है, इस का हमसाएगी का हक़, इस्लाम का हक़ और रिश्तेदारी का हक़ है, जिस हमसाए के दो हक़ हैं वोह मुसलमान हमसाया है उस के लिये हमसाएगी का हक़ और इस्लाम का हक़ है और जिस हमसाए का एक हक़ है वोह मुशरिक हमसाया है, गौर कीजिये कि इस्लाम ने मुशरिक हमसाए का भी हक्के हमसाएगी रखा है।

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फ़रमाने नबिय्ये करीम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम है कि अपने हमसाइयों के साथ अच्छा बरताव कर तब तू मुसलमान होगा ।

और फ़रमाया कि जिब्रील मुझे हमेशा हमसाए (पडोसी) के मुतअल्लिक वसिय्यत करते रहे यहां तक कि मैं समझा कि अन करीब हमसाए को भी वारिस बना दिया जाएगा।) – हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया कि जो शख्स अल्लाह और क़ियामत पर ईमान रखता है वोह अपने हमसाए की इज्जत करे ।

मजीद फ़रमाया कि बन्दा उस वक्त तक मुसलमान नहीं होता जब तक कि उस का हमसाया उस की आफ़तों से महफूज़ न हो।

एक और फ़रमान है कि क़ियामत के दिन सब से पहले झगड़ा करने वाले दो हमसाए होंगे।

और इरशाद फ़रमाया कि जब तू ने हमसाए के कुत्ते को मारा तो गोया तू ने हमसाए को तक्लीफ़ दी ।

मरवी है कि एक आदमी ने हज़रते इब्ने मसऊद रज़ीअल्लाहो अन्हो से आ कर कहा : मेरा एक हमसाया है जो मुझे तक्लीफ़ देता है, गालियां देता है और तंग करता है, आप ने येह सुन कर फ़रमाया : जाओ ! अगर वोह तुम्हारे मुतअल्लिक अल्लाह की ना फ़रमानी करता है तो तुम उस के बारे में अल्लाह की इताअत करो । हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से अर्ज की गई : या रसूलल्लाह ! फुलां औरत दिन को रोज़ा रखती है, रात को इबादत करती है मगर अपने हमसाइयों को दुख देती है, आप ने येह सुन कर फ़रमाया : वोह जहन्नम में जाएगी।

अल्लाह के रसूल स.अ.व. से पडोसी की शिकायत

एक शख्स ने हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की ख़िदमत में अपने हमसाए का शिक्वा किया, हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने उस से फ़रमाया : सब्र कर, तीसरी या चौथी बार आप ने फ़रमाया : अपना सामान रास्ते में फेंक दे। रावी कहते हैं कि लोगों ने जब उस के सामान को बाहर रास्ते पर पड़ा देखा तो पूछा : क्या बात है? उस ने कहा : मुझे हमसाया सताता है, लोग वहां से गुज़रते रहे, पूछते रहे और कहते रहे अल्लाह तआला इस हमसाए पर ला’नत करे, जब उस हमसाए ने येह बात सुनी तो आया, उसे कहा : अपना सामान वापस ले आओ, ब खुदा ! मैं फिर तुम्हें कभी तक्लीफ़ नहीं दूंगा।

जोहरी ने रिवायत किया है कि एक शख्स ने हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की खिदमत में हमसाए की शिकायत की। हजुर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने हुक्म फरमाया कि मस्जिद के दरवाजे पर खड़े हो कर ए’लान कर दो कि साथ के चालीस घर हमसाएगी (पड़ोस) में दाखिल हैं।

जोहरी ने कहा : चालीस इधर, चालीस उधर, चालीस इधर और चालीस उधर और चारों सम्तों की तरफ़ इशारा किया।

फ़रमाने नबवी है कि औरत, घर और घोड़े में बरकत और नुहसत है। औरत की बरकत थोड़ा महर, आसान निकाह और उस का हुस्ने खुल्क वाला होना है, उस की नुहूसत भारी महर मुश्किल निकाह और बद खुल्की है। घर की बरकत उस का कुशादा होना और उस के हमसाइयों का अच्छा होना है, उस की नुहूसत, उस का तंग होना और उस के हमसाइयों का बुरा होना है, घोड़े की बरकत उस की फ़रमां बरदारी और अच्छी आदतें हैं और उस की नुहूसत उस की बुरी आदतें और सुवार न होने देना है।

इस्लाम में पडोसी के हुकूक

हमसाए का हक़ सिर्फ येह नहीं कि आप उस से उस की तकलीफें दूर करें बल्कि ऐसी चीजें भी उस से दूर करनी चाहिये कि जिन से उसे दुख पहुंचने का एहतिमाल हो, हमसाए से दुख दूर करना, उसे दुख देने वाली चीज़ों से दूर रखने के इलावा कुछ और भी हुकूक हैं, उस से नर्मी और हुस्ने सुलूक से पेश आए, उस से नेकी और भलाई करता रहे इसी लिये कहा गया है कि क़यामत के दिन फ़क़ीर हमसाया मालदार हमसाए को पकड़ कर अल्लाह से कहेगा : ऐ अल्लाह ! इस से पूछ, इस ने अपने अताया मुझ से क्यूं रोके थे और अपना दरवाज़ा मुझ पर क्यूं बन्द किया था ?

इब्नुल मुक़फ्फ़अ से किसी ने कहा कि तुम्हारा हमसाया सुवारी के कर्ज की वज्ह से अपना घर बेच रहा है, इब्नुल मुक़फ्फ़अ उस शख्स की दीवार के साए में बैठता था, उस ने येह सुन कर कहा कि अगर उस ने तंगदस्ती की वज्ह से अपना घर बेच दिया तो गोया मैं ने उस की दीवार के साए की इज्जत नहीं की चुनान्चे, उस के पास रकम भेजी और कहला भेजा घर को न बेचो।

किसी शख्स ने घर में चूहों की कसरत की शिकायत की तो सुनने वाले ने कहा कि तुम एक बिल्ली रख लो, तो उस शख्स ने जवाब में कहा : मुझे इस बात का अन्देशा है कि चूहे बिल्ली की आवाज़ सुन कर हमसाइयों के घरों में भाग जाएंगे तो गोया मैं ऐसा आदमी बन जाऊंगा जो खुद तो एक तक्लीफ़ पसन्द नहीं करता मगर दूसरों को वोही दुख पहुंचाना चाहता है।

हमसाए के हुकूक में से येह भी है कि उसे देखते ही सलाम करे, उस से तवील गुफ्तगू न करे, उस से अक्सर मांगता न रहे, मरज़ में उस की इयादत करे, मुसीबत में उसे तसल्ली दे, अगर उस के यहां मौत हो जाए तो उस के साथ रहे, खुशी में उसे मुबारक बाद कहे और उस की खुशी में बराबर का शरीक रहे, उस की गलतियों से दर गुज़र करे, छत से उस के घर में न झांके, अपने घर की दीवार पर शहतीर वगैरा रखने से न रोके, उस के परनाले में पानी न उंडेले, उस के घर के सेहून में मिट्टी न फेंके, उस के घर के रास्ते को तंग न करे, वोह घर की तरफ़ जो कुछ ले कर जा रहा हो उसे न घूरे, उस की अमे मौजूदगी में उस के घर की देख भाल से गाफ़िल न हो, उस की गीबत न सुने, उस की इज्जत से आंख बन्द करे, उस की नोकरानी को अक्सर न देखता रहे, उस की औलाद से नर्मी से गुफ्तगू करे, जिन दीनी और दुन्यावी उमूर से वोह ना वाकिफ़ हो इन में उस की रहनुमाई करे, येह वोह हुकूक हैं जो आम व खास हर मुसलमान के लिये ज़रूरी हैं।

हुजूर रज़ीअल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया : जानते हो हमसाए का क्या हक़ है ? जब वोह तुझ से मदद तलब करे उस की मदद कर, अगर वोह तेरी इमदाद का तालिब हो उस की इमदाद कर, अगर वोह तुझ से कर्ज मांगे तो उसे कर्ज दे, अगर वोह मुफ्लिस हो जाए तो उस की हाजत रवाई कर, अगर वोह बीमार हो जाए तो उस की इयादत कर, अगर मर जाए तो उस का जनाज़ा उठा, अगर उसे खुशी हासिल हो तो मुबारक बाद कह, अगर उसे मुसीबत पेश आए तो उसे सब्र की तल्कीन कर, उस के मकान से अपना मकान ऊंचा न बना ताकि उस की हवा न रुके अगर वोह इजाज़त दे दे तो कोई हरज नहीं, उसे तक्लीफ़ न दे, जब मेवे खरीद कर लाए तो उस के घर बतौरे तोहफ़ा भेज वरना खुझ्या ले कर आ, मेवे अपनी अवलाद के हाथ में दे कर बाहर न भेज ताकि उस के बच्चे नाराज़ न हों, हांडी की खुश्बू से अपने हमसाए को ईज़ा न दे मगर येह कि एक चुल्लू शोरबा उसे भी भेज दे। फिर आप ने फ़रमाया : जानते हो हमसाए का हक़ क्या है ? ब खुदा ! हमसाए के हुकूक को कोई पूरा नहीं कर सकता मगर जिस पर अल्लाह तआला ने रहमत की हो।

इसी तरह अम्र बिन शोऐब रज़ीअल्लाहो अन्हो ने अपने बाप और दादा से और इन्हों ने नबिय्ये करीम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से रिवायत की है।

हज़रते मुजाहिद रज़ीअल्लाहो अन्हो का कहना है : मैं हज़रते अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो के पास बैठा था और आप का गुलाम बकरी की खाल उतार रहा था। आप ने कहा : ऐ गुलाम ! जब बकरी की खाल उतार ले तो सब से पहले हमारे यहूदी हमसाए को गोश्त देना, आप ने येही बात मुतअद्दिद बार कही तो गुलाम ने कहा : अब और कितनी मरतबा कहेंगे ? तब आप ने फ़रमाया : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम हमें बराबर हमसाइयों के मुतअल्लिक़ वसिय्यत फ़रमाया करते थे यहां तक कि हमें अन्देशा हुवा कि कहीं हमसाइयों को वारिस न बना दिया जाए ।

कुर्बानी का गोश्त पडोसी को देना

हज़रते हिशाम रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि हज़रते हसन रज़ीअल्लाहो अन्हो इस बात में कोई हरज नहीं समझते थे कि तुम अपनी कुरबानी का गोश्त यहूदी या नस्रानी हमसाए को खिलाओ।

हज़रते अबू ज़र रज़ीअल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया : मुझे मेरे हबीब सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने वसिय्यत फ़रमाई कि जब तुम हांडी पकाओ तो उस में ज़ियादा पानी डाल दो, फिर अपने हमसाइयों के घरों पर निगाह दौड़ाओ और उन्हें चुल्लू भर शोरबा भेज दिया करो ।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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औलाद और वालिदैन के हुकूक

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

येह बात जेह्न नशीन रखनी चाहिये कि जहां अज़ीज़ो अकारिब के हुकूक की ताकीद की गई है वहां ज़विल अरहाम को खुसूसिय्यत से जिक्र किया गया है।

फ़रमाने नबवी है कि कोई बेटा अपने बाप का हक अदा नहीं कर सकता यहां तक कि वह बाप को गुलाम पाए और फिर उसे खरीद कर आज़ाद कर दे।

फ़रमाने नबवी है कि वालिदैन से नेकी, नमाज़, रोज़ा, सदक़ा, हज, उमरह और राहे खुदा में जिहाद करने से अफ़ज़ल है।

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हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का इरशाद है कि जिस शख्स ने इस हाल में सुब्ह की, कि उस के वालिदैन उस से राजी हों उस के लिये जन्नत के दरवाजे खोल दिये जाते हैं और जो इसी हालत में शाम करता है उस के लिये भी इसी तरह के दो दरवाजे खोल दिये जाते हैं, अगर वालिदैन में से एक जिन्दा हो तो एक दरवाजा खोला जाता है अगर्चे वालिदैन ज़ियादती करें, अगर्चे वोह ज़ियादती करें और जिस ने इस हाल में सुबह की, कि उस के वालिदैन उस पर नाराज़ हों तो उस के लिये जहन्नम के दो दरवाजे खुल जाते हैं और जो शाम इसी हालत में करता है उस के लिये भी जहन्नम के दो दरवाजे खुल जाते हैं, अगर वालिदैन में से एक हो तो एक दरवाजा खुलता है अगर्चे वोह ज़ियादती करें, अगर्चे वोह ज़ियादती करें, अगर्चे वोह ज़ियादती करें।

फ़रमाने नबवी है कि जन्नत की खुश्बू पांच सो साल के सफ़र की दूरी से पाई जाती है मगर वालिदैन का ना फ़रमान और क़तए रेहमी करने वाला इस खुश्बू को नहीं पाएगा।

फ़रमाने नबवी है कि अपने मां, बाप, बहन और भाई से एहसान कर, फिर करीबी पस करीबी (शख्स इस का मुस्तहिक) है।

मरवी है कि अल्लाह तआला ने मूसा अलैहहिस्सलाम  से फ़रमाया : ऐ मूसा ! जिस ने वालिदैन की फ़रमां बरदारी की और मेरी ना फ़रमानी की, मैं ने उसे नेकों में लिखा है और जो वालिदैन की ना फरमानी करता है मगर मेरा फ़रमां बरदार होता है मैं ने उसे ना फ़रमानों में लिख दिया है।

रिवायत है कि जब हज़रते या’कूब , हज़रते यूसुफ़ अलैहहिस्सलाम  के यहां तशरीफ़ लाए तो वोह उन के इस्तिक्बाल के लिये खड़े न हुवे चुनान्चे, अल्लाह तआला ने हज़रते यूसुफ़ अलैहहिस्सलाम  की तरफ़ वहयी की, कि क्या तुम अपने वालिद के लिये खड़े होने को बहुत बड़ी बात समझते हो ? मुझे अपने इज्जतो जलाल की कसम ! मैं तुम्हारे सुल्ब में से नबी पैदा नहीं करूंगा।

फरमाने नबवी है कि जब कोई शख्स अपने मुसलमान वालिदैन की तरफ से सदका करता है तो उस के वालिदैन को उस का अज्र मिलता है और उन के अज्र में कमी किये बिगैर उस आदमी को भी उन के बराबर अज्र मिलता है।

हज़रते मालिक बिन रबीआ रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि हम रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम के साथ बैठे हुवे थे कि बनू सलमह के एक आदमी ने आ कर अर्ज़ की : या रसूलल्लाह ! कोई ऐसी नेकी है जो मैं अपने वालिदैन के लिये उन की वफ़ात के बाद करूं? आप ने फ़रमाया : हां ! उन के लिये दुआ करो, बख्शिश तलब करो, उन के किये हुवे वा’दों को पूरा करो, उन के दोस्तों की इज्जत करो और उन के रिश्तेदारों से सिलए रेहमी करो।

फरमाने नबवी है की सब से बड़ी नेकी येह है कि इन्सान अपने बाप की वफ़ात के बाद उस के दोस्तों से हुस्ने

सुलूक करे ।

मजीद इरशाद हुवा कि बेटे का मां से नेकी करना दोहरा अज्र रखता है।एक और इरशाद है कि मां की दुआ जल्द क़बूल होती है, पूछा गया : या रसूलल्लाह ! सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ऐसा क्यूं है ? आप ने फ़रमाया : इस लिये कि मां, बाप से ज़ियादा मेहरबान होती है और रहम की दुआ कभी जाएअ नहीं होती।

एक शख्स ने हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से सुवाल किया कि मैं किस से नेकी करूं ? आप ने फ़रमाया : अपने वालिदैन से नेकी कर, उस ने अर्ज की : या रसूलल्लाह ! मेरे वालिदैन नहीं है, आप ने फ़रमाया : अपनी औलाद से नेकी कर क्यूंकि जिस तरह वालिदैन का तुझ पर हक़ है इसी तरह औलाद भी तुझ पर हक़ है।

नबिय्ये करीम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का फ़रमान है कि अल्लाह तआला उस बाप पर रहम फ़रमाए जिस ने अपने बेटे से नेकी में तआवुन किया (उसे नेक अमल पर उभारा) और अमले बद की सूरत में अदाएगिये हुकूक का बार इस पर नहीं है।

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम फ़रमाते हैं कि औलाद को अतिय्यात में बराबर का शरीक करो।

और येह भी कहा गया है कि तेरे लिये तेरा बेटा गुले नाज़ बू है, सात बरस तक वोह तेरा खादिम है, उस की खुश्बू सूंघ, फिर वोह तेरा शरीक है या तेरा दुश्मन है।

बच्चे का अकीका सातवें रोज किया जाना चाहिये

हज़रते अनस रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया कि सातवें दिन बच्चे का अक़ीक़ा किया जाए, उस का नाम रखा जाए और उस के बाल वगैरा दूर किये जाएं और जब वोह छे साल का हो तो बाप उसे अदब सिखाए, जब वोह नव साल का हो तो उस का बिछौना अलाहिदा कर दे, जब तेरह बरस का हो तो उसे नमाज़ के लिये मारे और जब वोह सोलह साल का हो तो बाप उस की शादी कर दे, फिर आप ने हज़रते अनस रज़ीअल्लाहो अन्हो का हाथ पकड़ कर फ़रमाया कि मैं ने तुझे अदब सिखाया, ता’लीम दी और तेरी शादी कर दी, मैं दुन्या के फ़ितने और आख़िरत के अज़ाब से तेरे लिये अल्लाह की पनाह चाहता हूं।

नबिय्ये अकरम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का इरशाद है कि बाप पर औलाद  का येह हक़ है कि वोह उन्हें बेहतरीन अदब सिखाए और उन के उम्दा नाम रखे ।

एक और फ़रमान है कि हर लड़का और लड़की अक़ीके से गिरवी है, सातवें दिन इन के लिये कोई जानवर ज़ब्ह किया जाए और इस का सर मुन्डा जाए।

एक आदमी ने हज़रते अब्दुल्लाह बिन मुबारक रज़ीअल्लाहो अन्हो के सामने अपने किसी लड़के की शिकायत की, आप ने फ़रमाया : क्या तुम ने उस पर बद दुआ की है ? उस ने कहा : हां ! आप ने फ़रमाया : तू ने उसे बरबाद कर दिया है, औलाद के साथ नेक सुलूक और नर्मी करनी चाहिये।

हज़रते अकरअ बिन हाबिस रज़ीअल्लाहो अन्हो ने हुजूर को अपने नवासे हज़रते हसन रज़ीअल्लाहो अन्हो को चूमते हुवे देखा तो कहा कि मेरे दस बेटे हैं मगर मैं ने कभी किसी को नहीं चूमा, हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : बेशक जो रहम नहीं करता उस पर रहम नहीं किया जाता ।

हज़रते आइशा रज़ीअल्लाहो अन्हा  से मरवी है कि एक दिन हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने मुझ से फ़रमाया कि उसामा का मुंह धो डालो, मैं ने कराहत से उस का मुंह धोना शुरू किया तो हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने मेरे हाथ पर हाथ मारा और उसामा को पकड़ कर उन का मुंह धोया फिर उसे चूमा ।

हज़रते हसन रज़ीअल्लाहो अन्हो (कमसिनी में) लड़ खड़ाते हुवे मस्जिद में दाखिल हुवे और हुजूर रज़ीअल्लाहो अन्हो मिम्बर पर तशरीफ़ फ़रमा थे, आप ने मिम्बर से उतर कर उन्हें उठाया और येह आयए मुबारका तिलावत फ़रमाई :

सिवाए उस के नहीं कि तुम्हारे माल और औलाद

फितना हैं। हज़रते अब्दुल्लाह बिन शद्दाद रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम लोगों को नमाज़ पढ़ा रहे थे कि अचानक हज़रते इमामे हुसैन रज़ीअल्लाहो अन्हो सजदे की हालत में आप की गर्दन पर सुवार हो गए, आप ने सजदा तवील कर दिया, लोगों ने समझा शायद कोई बात हो गई है, जब आप ने नमाज़ पूरी कर ली तो सहाबा ने अर्ज की : या रसूलल्लाह ! आप ने बहुत तवील सजदा किया, यहां तक कि हम समझे कोई बात वाकेअ हो गई है, आप ने फ़रमाया : मेरा बेटा मुझ पर सुवार हो गया तो मैं ने जल्दी करना मुनासिब न समझा ताकि वोह अपनी खुशी (हाजत) पूरी कर ले ।

इस हदीस में कई फ़वाइद हैं, एक येह कि जब तक आदमी सजदे में रहता है उसे अल्लाह तआला का कुर्ब हासिल रहता है । इस हदीस से औलाद से नर्मी और भलाई और उम्मत की तालीम, सब बातें साबित होती हैं।

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का इरशाद है कि औलाद की खुश्बू जन्नत की खुश्बू है।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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फजीलते जकात व सलात

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

यह बात समझ लीजिये कि अल्लाह तआला ने ज़कात को इस्लाम की बुन्यादों में से शुमार किया है और इस का ज़िक्र नमाज़ के ज़िक्र के साथ है, नमाज़ जो कि इस्लाम का बुलन्द तरीन शिआर है चुनान्चे, फ़रमाने इलाही है :

“और नमाज़ काइम करो और ज़कात अदा करो”। फ़रमाने नबवी है कि इस्लाम की बुन्याद पांच चीजों पर है, अल्लाह की वहदानिय्यत, मोहम्मद की रिसालत की शहादत, नमाज़ कायम करना और ज़कात अदा करना ।

“और अल्लाह तआला ने दो में तक़सीर करने वालों की वईदे शदीद की है चुनान्चे”|

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है : “पस हलाकत है उन नमाजियों के लिये जो अपनी नमाज़ से बे खबर हैं”। इस बारे में पहले ही मुकम्मल बहूस गुज़र चुकी है और अल्लाह तआला ने अपने कलाम में इरशाद फ़रमाया है :  “और जो लोग सोना चांदी जम्अ करते हैं और इसे अल्लाह की राह में खर्च नहीं करते पस उन्हें दर्दनाक अज़ाब की खुश खबरी दीजिये”। इस आयते करीमा में राहे खुदा में खर्च करने से मुराद ज़कात अदा करना है।

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सदका-खैरात किसे दिया जाए?

सदक़ा देते वक़्त ऐसे नेक अफराद फुकरा तलाश किये जाएं जो दुनिया से तर्के तअल्लुक कर चुके हों और आखिरत से लौ लगाए हुवे हों क्यूंकि ऐसे फुकरा को सदका देना माल को बढ़ाना है, फ़रमाने नबवी है कि परहेज़गार का खाना खा और परहेज़गार को खाना खिला।

आप ने येह बात इस लिये फ़रमाई कि परहेज़गार इस तआम से परहेज़गारी में बढ़ेगा तू भी इस इआनत की वज्ह से उस की इबादतो रियाज़त में शरीक गिना जाएगा।

एक आलिम का कौल है कि सदक़ा देते वक्त सूफ़ी फुकरा को तरजीह दे, किसी ने उस आलिम से कहा कि अगर आप तमाम फुकरा का कहते तो बेहतर होता, आलिम ने कहा : नहीं ! यह सूफ़ी फ़क़ीर एक ऐसा गुरौह हैं जिन की तमाम तर तवज्जोह अल्लाह तआला की तरफ़ मब्जूल रहती है, जब उन में से किसी को फ़ाका से वासिता पड़ता है तो उन की हिम्मतें परागन्दा हो जाती हैं, मुझे उन में से किसी एक फ़क़ीर की तवज्जोह फ़ाक़ा से हटा कर अल्लाह तआला की तरफ़ कर देना उन हज़ार फ़कीरों को देने से ज़ियादा पसन्द है जिन की दिल चस्पियों का मर्कज़ दुनिया है। किसी ने हज़रते जुनैद रज़ीअल्लाहो अन्हो को येह बात सुनाई तो उन्हों ने उसे बहुत पसन्द फ़रमाया और कहा कि येह शख्स अल्लाह के औलिया में से एक वली है। मैं ने काफ़ी मुद्दत से इस जैसी बेहतरीन बात नहीं सुनी थी। कुछ मुद्दत के बाद हज़रते जुनैद से अर्ज की गई कि उस शख्स का हाल दिगर गू हो गया है और वोह दुकान छोड़ने का इरादा रखता है। हज़रते जुनैद ने उस शख्स की तरफ़ कुछ माल भेजा और कहला भेजा कि इसे अपने मसरफ़ में लाओ और दुकान न छोड़ो क्यूंकि तुम जैसे लोगों को तिजारत नुक्सान नहीं देती। येह आदमी जिस का तजकिरा हुवा है दुकानदार था और फुकरा उस से जो कुछ ख़रीदते वोह उन से उन चीज़ों की कीमत नहीं लेता था।

हज़रते इब्ने मुबारक अपने अतियात सिर्फ उलमा को देते।

हज़रते इबनुल मुबारक रज़ीअल्लाहो अन्हो अपने अताया को उलमा के लिये खास करते थे, किसी ने कहा : आप अपनी खैरात व सदक़ात अगर आम कर देते तो बेहतर होता, उन्हों ने कहा : मैं नबुव्वत के मर्तबे के बा’द उलमा के मर्तबे से अफ्ज़ल कोई मर्तबा नहीं जानता, अगर उन में से किसी का दिल अपनी ज़रूरतों की तरफ़ मुतवज्जेह हो जाए तो उन के इल्मी मश्गले में खलल पड़ जाता है, फिर वोह तालीम व तअल्लुम पर कमा-हक्कुहू तवज्जोह नहीं दे सकेंगे लिहाज़ा उन के लिये हुसूले इल्म की राहों को आसान करना अफ़्ज़लो आ’ला है।

अपने सदक़ात में मुसीबत ज़दा लोगों, खुसूसन अज़ीज़ो अकारिब को तरजीह देनी चाहिये क्यूंकि येह सदका भी है और सिलए रेहमी भी है और सिलए रेहमी का अज्र बे इन्तिहा है जैसा कि सिलए रेहमी के बाब में इस के फ़ज़ाइल मजकूर हुवे हैं।

यह भी ज़रूरी है कि इन्सान ख़ुफ़िया तरीके पर सदक़ात दे ताकि रिया (दिखावा)  की नुहूसत से पाक रहे और लोगों के सामने लेने वाला रुस्वाई से बचे।फरमाने नबवी है कि खुपया सदका अल्लाह तआला के गजब को बुझा देता है।

और इस हदीस शरीफ़ में जिस में उन सात आदमियों का ज़िक्र है जिन्हें अल्लाह तआला अर्श के साए में जगह देगा जब कि अर्श के साए के सिवा कोई साया न होगा. येह भी इरशाद है कि वोह आदमी जिस ने रुपया सदका दिया यहां तक कि उस का बायां हाथ येह नहीं जानता कि दाएं ने क्या दिया है।

हां अगर सदके के इज़हार में येह फ़ाइदा हो कि और लोग भी सदक़ा देंगे तो इस के इज़हार में कोई मुजाअका नहीं बशर्त येह कि रिया और एहसान जताने का इस में दखल न हो जैसा कि फ़रमाने खुदावन्दी है : अपने सदक़ात को एहसान और रिया से बातिल न करो।। सदका दे कर एहसान जताना बहुत बड़ी मुसीबत है, इसी लिये सदके के ख़ुफ़िया रखने को तरजीह दी गई है और अपनी नेकी को भूल जाने का कहा गया है जैसा कि उस शख्स के लिये शुक्र और नेक जज्बात के इज़हार को ज़रूरी करार दिया गया है जिस पर किसी ने एहसान और नेकी की हो जैसा कि हदीस शरीफ़ में है :

किसी ने क्या खूब कहा है :

नेकी और सदक़ात का हाथ जहां भी हो गनीमत है ख्वाह इसे बन्दए शाकिर उठाता है या कुफ्राने नेमत वाला उठाता है। शुक्र गुज़ार के शुक्र में उस के लिये जज़ा है और अल्लाह तआला के यहां काफ़िर के कुफ्र का बदला है।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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कुरआन, इल्म और उलमा

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 नबिय्ये अकरम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का इरशाद है कि जिस ने कुरआने मजीद की तिलावत की फिर येह समझा कि किसी को इस से भी उम्दा चीज़ दी गई है तो गोया उस ने अल्लाह तआला की अज़मत को मामूली समझा है ।

इरशादे नबवी है कि अल्लाह तआला के पास कुरआने मजीद से ज़ियादा मर्तबे वाला कोई शफ़ीअ नहीं है।

एक और फ़रमान है कि मेरी उम्मत की बेहतरीन इबादत कुरआने मजीद की तिलावत है।

एक और इरशाद है कि तुम में से ज़ियादा बेहतर वोह है जो कुरआने मजीद पढ़े और पढ़ाए ।

मजीद फ़रमाया कि दिलों को जंग इस तरह लग जाता है जैसे लोहे को, अर्ज़ किया गया : इस की चमक-दमक फिर कैसे लौटती है ? आप ने फ़रमाया : तिलावते कुरआन और मौत को याद करने से

हज़रते फुजल बिन इयाज़ रज़ीअल्लाहो अन्हो का क़ौल है कि कुरआने करीम का इल्म रखने वाला इस्लाम का झन्डा उठाने वाला है लिहाज़ा उस के लिये येह मुनासिब नहीं कि वोह लह्वो लइब में मश्गूल लोगों के साथ मिल कर लह्वो लड़ब में मश्गूल हो जाए, भूलने वाले के साथ भूले नहीं और बेहूदा लोगों के साथ मिल कर बेहूदगी न करे क्यूंकि येह कुरआने मजीद की ता’ज़ीम के खिलाफ़ है, आप ने मजीद फ़रमाया : जो सुब्ह करते ही सूरए हश्र की आखिरी आयात की तिलावत करता है, अगर वोह उसी दिन मर जाए तो उसे शुहदा में लिखा जाता है और उस पर शहीदों की मोहर लगाई जाती है और जो शख्स इन को रात की इब्तिदा में तिलावत करता है और अगर वोह उसी रात मर जाए तो उस पर शहीदों की मोहर लगाई जाती है।

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इल्म और उलमा की फजीलत ।

इस सिलसिले में बहुत ही कसरत से अहादीस वारिद हैं चुनान्चे, हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम फ़रमाते हैं कि अल्लाह तआला जिस शख्स से भलाई का इरादा फ़रमाता है उसे दीन की समझ देता है और उसे राहे रास्त की हिदायत फ़रमाता है।

नीज़ इरशादे गिरामी है कि उलमा, अम्बियाए किराम अलैहिमुसलाम के वारिस हैं।

और येह बदीही बात है कि अम्बियाए किराम से बढ़ कर किसी का रुत्बा नहीं और अम्बियाए किराम के वारिसों से बढ़ कर किसी वारिस का मर्तबा नहीं है।

फ़रमाने नबवी है कि सब लोगों से अफ़्ज़ल वोह मोमिन आलिम है कि जब उस की तरफ़ रुजूअ किया जाए तो वोह नफ्अ दे और जब उस से बे नियाज़ी बरती जाए तो वोह भी बे नियाज़ हो जाए ।

नीज़ इरशाद फ़रमाया कि मर्तबए नुबुव्वत से सब से ज़ियादा करीब, आलिम और मुजाहिद हैं।

उलमा इस लिये कि इन्हों ने रसूलों के पैगामात लोगों तक पहुंचाए और मुजाहिद इस लिये कि इन्हों ने अम्बियाए किराम के अहकामात को ब ज़ोरे शम्शीर पूरा किया और उन के अहकामात की पैरवी की, मजीद इरशाद है कि पूरे कबीले की मौत एक आलिम की मौत से आसान है।

और फ़रमाया कि क़ियामत के दिन उलमा की सियाही की दवातें शुहदा के खून के बराबर तोली जाएंगी।

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम फरमान है कि आलिम इल्म से कभी सैर नहीं होता यहां तक कि जन्नत में पहुंच जाता है ।

मजीद फरमाया कि मेरी उम्मत की हलाकत दो चीजों में है, इल्म का छोड़ देना और माल का जम्अ करना ।

एक और इरशाद है कि आलिम बन या मुतअल्लिम, या इल्मी गुफ्तगू सुनने वाला या इल्म से महब्बत करने वाला बन और पांचवां या’नी इल्म से बुग्ज़ रखने वाला न बन कि हलाक हो जाएगा ।

और फ़रमाया कि तकब्बुर इल्म के लिये बहुत बड़ी मुसीबत है।

हुकमा का कौल है कि जो सरदारी के हुसूल के लिये इल्म हासिल करता है वोह तौफ़ीक़ और रइय्यत दारी का एहसास खो देता है। फ़रमाने इलाही है : अलबत्ता मैं अपनी निशानियों से ऐसे लोगों को फेर दूंगा जो दुनिया  में तकब्बुर करते हैं। हज़रते शाफ़ेई रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि जिस ने कुरआन का इल्म सीखा उस की कीमत बढ़ गई, जिस ने इल्मे फ़िक़ह सीखा उस की क़द्र बढ़ गई, जिस ने हदीस सीखी उस की दलील कवी हुई, जिस ने हिसाब सीखा उस की अक्ल पुख्ता हुई, जिस ने नादिर बातें सीखीं उस की तबीअत नर्म हुई और जिस शख्स ने अपनी इज्जत नहीं की उसे इल्म ने कोई फ़ाइदा न दिया।

हज़रते हसन बिन अली रज़ीअल्लाहो अन्हो का इरशाद है कि जो शख्स उलमा की महफ़िल में अक्सर हाज़िर होता है उस की ज़बान की रुकावट दूर होती है, जेह्न की उलझनें खुल जाती हैं और जो कुछ वोह हासिल करता है उस के लिये बाइसे मसर्रत होता है। उस का इल्म उस के लिये एक विलायत है और फ़ाइदामन्द होता है।

फ़रमाने नबवी है कि अल्लाह तआला जिस बन्दे को रद्द कर देता है, इल्म को उस से दूर कर देता है ।

एक और इरशाद में है कि जहालत से बढ़ कर कोई फर्क नहीं है।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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खन्दा व गिर्या जारी हँसना और रोना

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

बा’ज़ मुफस्सिरीन ने इस फ़रमाने इलाही : “क्या पस इस बात से तअज्जुब करते हो और  हंसते हो और रोते नहीं हो, और तुम गफलत में हो”। की तफ्सीर में फ़रमाया कि  से मुराद कुरआन है या’नी तुम इस कुरआन पर तअज्जुब करते हो और झुटलाते हो और बा वुजूद इस के कि येह अल्लाह की तरफ़ से है फिर भी तुम इस का ठठ्ठा करते हो और इस में जो वईदें हैं इन को पढ़ कर तुम ख़ौफ़ से रोते नहीं और तुम से जो मुतालबा है उस से गाफ़िल हो।

इस आयत के नुजूल के बाद हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम कभी नहीं हंसे, सिर्फ तबस्सुम फ़रमाया करते थे।

एक रिवायत में है कि इस आयत के नुजूल के बाद हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम को हंसते और मुस्कुराते हुवे नहीं देखा गया यहां तक कि आप दुनिया से तशरीफ़ ले गए।

हज़रते इब्ने उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है : एक दिन हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम मस्जिद से बाहर तशरीफ़ लाए तो आप ने लोगों की ऐसी जमाअत देखी जो हंस हंस कर बातें कर रहे थे आप उन के पास ठहर गए, उन्हें सलाम कहा और फ़रमाया : दुन्यावी लज्ज़तों को मुन्कतेअ करने वाली (मौत) को अक्सर याद किया करो।

फिर एक मरतबा आप का गुज़र एक ऐसी जमाअत से हुवा जो हंस रहे थे, आप ने उन्हें देख कर फ़रमाया : ब खुदा अगर तुम वोह जानते जो मैं जानता हूं तो तुम कम हंसते और ज़ियादा रोते ।

जब हज़रते खिज्र अलैहहिस्सलाम  से हज़रते मूसा अलैहहिस्सलाम  ने अलाहिदा होना चाहा तो उन्हों ने कहा : मुझे नसीहत कीजिये ! हज़रते खिज्र ने कहा : ऐ मूसा खुद को झगड़ों से बचाइये ! ज़रूरत के बिगैर क़दम न उठाइये ! तअज्जुब के बिगैर मत हंसिये ! गुनाहगारों को उन की खताओं के सबब शर्मिन्दा न करो और अपनी तरफ़ से रब के हुजूर रोते रहो।

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया कि ज़ियादा हंसना दिल को मौत से हम किनार कर देता है।

मजीद इरशाद फ़रमाया कि जो शख्स जवानी में हंसता है, मौत के वक़्त रोता है ।

इरशादे नबवी है कि कुरआन पढ़ो और रोओ, अगर रोना न आए तो रोने वाले शख्स जैसा चेहरा बनाओ। हज़रते हसन रज़ीअल्लाहो अन्हो ने इस फ़रमाने इलाही :

पस चाहिये कि थोड़ा हंसो और जियादा रोओ।

की तफ्सीर में फ़रमाया है कि दुनिया में कम हंसो वरना आख़िरत में बहुत रोना पड़ेगा और येह तुम्हारे आ’माल की जज़ा होगी।

मजीद फ़रमाया कि मुझे उस हंसने वाले पर तअज्जुब होता है जिस के पीछे जहन्नम है और उस मसरूर व शादां पर तअज्जुब होता है जिस के पीछे मौत लगी हुई है।

अल्लाह और दोज़ख के खौफ से ग़मगीन रहना

आप सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का एक ऐसे जवान के करीब से गुजर हवा जो हंस रहा था। आप ने पूछा : ऐ बेटे ! क्या तू ने पुल सिरात को उबूर कर लिया है ? उस ने कहा : नहीं ! आप ने फ़रमाया : तो क्या तुझे येह मालूम हो गया है कि तू जन्नत में जाएगा? आप ने फिर पूछा : वोह जवान न बोला, आप ने फरमाया : फिर किस लिये हंस रहे हो? इस के बाद उस जवान को कभी भी हंसते हुवे नहीं देखा गया।

हज़रते इब्ने अब्बास रज़ीअल्लाहो अन्हो का फ़रमान है कि जो हंसते हुवे गुनाह करता है वोह रोते हुवे जहन्नम में जाएगा।

अल्लाह तआला ने रोने वालों की तारीफ की है चुनान्चे, इरशादे इलाही है :

और वोह रोते हुवे ठोड़ियों के बल गिर

पडते हैं। हज़रते औज़ाई रज़ीअल्लाहो अन्हो इस आयत : क्या है इस किताब को कि नहीं छोड़ती छोटी बात और न बड़ी बात मगर इस को गिन लिया है। की तशरीह में फ़रमाते हैं कि छोटी बात से मुराद तबस्सुम और बड़ी बात से मुराद कहकहा लगाना है।

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम फ़रमाते हैं कि क़ियामत के दिन सब आंखें रोने वाली होंगी मगर तीन आंखें नहीं रोएंगी, जो खौफे खुदा से रोई, जो अल्लाह तआला की हराम कर्दा चीज़ों से बन्द हो गई और जो राहे खुदा में बेदार हुई।

कहा गया है कि तीन चीजें दिल को सख्त करती हैं, बिगैर किसी तअज्जुब के हंसना, भूक के बिगैर खाना और बिगैर किसी ज़रूरत के बातें करना।

हुजूर मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का लिबास केसा था ?

लिबास – हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम को तहबन्द, चादर, कमीस या जुब्बा वगैरा से जो कपड़ा भी मुयस्सर आ जाता, पहन लेते थे और आप को सब्ज़ लिबास पसन्द था लेकिन अक्सर अवक़ात आप सफ़ेद लिबास जेबे तन फ़रमाया करते थे और फ़रमाते येही लिबास अपने ज़िन्दों को पहनाओ और इसी में अपने मुर्दो को कफ़न दो ।

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की रेशमी कबा थी, आप के जिस्मे अतहर पर इस का सब्ज रंग बहुत भला लगता था। आप के तमाम कपड़े टख्नों के ऊपर होते थे और आप का तहबन्द इन से ऊपर निस्फ़ साक़ (पिन्डली) तक होता था। 1)

आप के पास एक सियाह कम्बल था जो आप ने किसी को बख्श दिया, हज़रते उम्मे सलमह रज़ी अल्लाहो अन्हा  ने अर्ज की : या रसूलल्लाह ! मेरे मां-बाप आप पर कुरबान हों, सियाह कम्बल का क्या हुवा ? आप ने फ़रमाया : वो मैं ने पहना दिया, हज़रते उम्मे सलमह रज़ीअल्लाहो अन्हा  बोलीं : या रसूलल्लाह ! मैं ने आप के सफ़ेद जिस्म पर उस काले कम्बल से ज़ियादा हसीन चीज़ नहीं देखी ।हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम लिबास को दाहिनी तरफ़ से पहनना शुरूअ फ़रमाते और पढ़ते : हम्द है उस अल्लाह को जिस ने मुझे लिबास दिया जिस से मैं अपना जिस्म ढांपता हूं और लोगों में जीनत के साथ जाता हूं।

आप अपना लिबास हमेशा बाई तरफ़ से उतारते थे, जब नया कपड़ा ज़ेबे तन फ़रमाते तो पुराना कपड़ा किसी मिस्कीन को दे देते और फ़रमाते : जो किसी मुसलमान को अपना पुराना कपड़ा रजाए इलाही के हुसूल के लिये पहनाता है वोह अपने इस अमल की बदौलत ज़िन्दगी और मौत दोनों में अल्लाह तआला की अमान, पनाह और रहमत में होता है। हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का एक जुब्बा मुबारक था, आप जहां आराम फ़रमाते उसे नीचे दो तहों में बिछा देते ।

आप चटाई पर आराम फ़रमाया करते थे, चटाई के बिगैर और कोई चीज़ आप के जिस्मे अतहर व अक्दस के नीचे नहीं होती थी।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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फजीलते हुस्ने खुल्क – अच्छे अखलाक – अच्छा व्यवहार

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 

अल्लाह तआला ने अपने नबी और हबीब सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की तारीफ़ फ़रमाते हुवे और अपनी नेमतों का इन के लिये इज़हार करते हुवे इरशाद फ़रमाया :

बेशक आप साहिबे खुल्के अज़ीम हैं। हज़रते आइशा सिद्दीका रज़ीअल्लाहो अन्हा से मरवी है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का खुल्क कुरआन था।

एक शख्स ने हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से हुस्ने खुल्क के मुतअल्लिक़ सवाल किया तो आप ने यह आयते मुबारका पढ़ी : “दर गुज़र करना इख़्तियार करो, नेकी का हुक्म करो और जाहिलों से मुंह फेर लो। फिर हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : हुस्ने खुल्क येह है कि तू कत ए तअल्लुक करने वालों से सिलए रहमी करे, जो तुझे महरूम करे तू उसे अता करे और जो तुझ पर जुल्म करे तू उसे मुआफ कर दे। हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया कि मैं इस लिये मबऊस किया गया हूं कि उम्दा अख़्लाक़ को पायए तक्मील तक पहुंचाऊं ।

मजीद इरशाद फ़रमाया कि क़ियामत के दिन मीज़ाने आ’माल में सब से भारी चीज़ खौफे खुदा और हुस्ने खुल्क होगा।

एक शख़्स हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की खिदमत में हाज़िर हुवा और अर्ज की : या रसूलल्लाह ! दीन क्या है ? आप ने फ़रमाया : हुस्ने खुल्क, फिर दाईं तरफ़ से आया और अर्ज़ की : दीन क्या है ? आप ने फ़रमाया : हुस्ने खुल्क, फिर वोह बाई तरफ़ से आया और अर्ज की : या रसूलल्लाह ! दीन क्या है ? आप ने फ़रमाया : हुस्ने खुल्क, फिर वोह शख्स आप के अकब से आया और अर्ज की : या रसूलल्लाह ! दीन क्या है ? आप ने उस की तरफ़ तवज्जोह फ़रमाई और फ़रमाया : क्या तू नहीं समझता ? दीन येह है कि तू गुस्सा न करे।

सरकारे दो आलम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से पूछा गया कि नुहूसत क्या है ? आप ने फ़रमाया : बद खुल्की ।

एक शख्स ने हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से अर्ज की, कि मुझे वसिय्यत कीजिये ! आप ने फ़रमाया : जहां भी रहो अल्लाह तआला से डरते रहो, उस ने अर्ज की : मजीद इरशाद फ़रमाइये !

आप ने फ़रमाया : हर बुराई के बाद नेकियां करो, वोह इसे मिटा देंगी, उस ने फिर अर्ज की : कुछ और फ़रमाइये !

आप ने फ़रमाया : लोगों से हुस्ने सुलूक करो और हुस्ने खुल्क से पेश आओ।

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से पूछा गया कि कौन सा अमल अफ़ज़ल है ? आप ने फ़रमाया : हुस्ने खुल्क।

फ़रमाने नबवी है कि अल्लाह तआला ने जिस बन्दे की पैदाइश और खुल्क को बेहतरीन बनाया है उसे वोह जहन्नम में नहीं डालेगा।

हज़रते फुजेल रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से अर्ज की गई कि फुलां औरत रात को इबादत करती है, दिन को रोजा रखती है मगर वोह बद खुल्क है, अपनी बातों से हमसायों को तक्लीफ़ देती है, आप ने फ़रमाया : उस में भलाई नहीं है वोह जहन्नमियों में से है।

हज़रते अबुद्दरदा रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि मैं ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम को येह फ़रमाते सुना कि सब से पहले मीज़ाने अमल में हुस्ने खुल्क और सखावत रखी जाएगी, जब अल्लाह तआला ने ईमान को पैदा फ़रमाया तो उस ने अर्ज की : ऐ अल्लाह ! मुझे कुव्वत अता फ़रमा, तो अल्लाह तआला ने उसे हुस्ने खुल्क और सखावत से तकविय्यत बख़्शी और जब अल्लाह तआला ने कुफ़्र को पैदा फ़रमाया तो उस ने अर्ज की : ऐ अल्लाह ! मुझे कुव्वत बख़्श तो उस ने उसे बुख़्ल और बद खुल्की से तकविय्यत बख़्शी ।।

फ़रमाने नबवी है कि अल्लाह तआला ने इस दीन को अपने लिये पसन्द फ़रमा लिया है, तुम्हारा येह दीन सखावत और हुस्ने खुल्क के बिगैर सहीह नहीं होता, होशयार ! अपने आ’माल को इन दो चीज़ों से जीनत बख्शो ।

फ़रमाने नबवी है कि हुस्ने खुल्क अल्लाह तआला की अज़ीम तरीन मख्लूक है।

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से अर्ज की गई कि कौन से मोमिन का ईमान अफ़ज़ल है ? आप ने फ़रमाया : जिस का खुल्क सब से बेहतर होगा।

हुजूरे पुरनूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का इरशाद है कि बिला शुबा तुम लोगों की मालो दौलत के जरीए इमदाद नहीं कर सकते लिहाज़ा उन की खन्दा पेशानी और हुस्ने खुल्क से मदद करो।

फ़रमाने नबवी है कि बद खुल्की आ’माल को इस तरह जाएअ कर देती है जैसे सिर्का शहद को खराब कर देता है।

हज़रते जरीर बिन अब्दुल्लाह रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : बेशक तुम ऐसे जवान हो कि अल्लाह तआला ने तुम्हारी खिल्क़त को बेहतरीन किया है लिहाज़ा तुम अपना खुल्क बेहतरीन करो ।

हज़रते बरा बिन आज़िब रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम लोगों से ज़ियादा खूब सूरत और बेहतरीन खुल्क वाले थे।

हज़रते अबू मसऊद बदरी रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लमअपनी दुआ में यूं अर्ज करते :

ऐ अल्लाह ! जैसे तू ने मेरी तख्लीक को बेहतरीन किया है वैसे ही मेरी खुल्क को बेहतरीन फ़रमा ।

हज़रते अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम अक्सर येह दुआ फ़रमाया करते :

तर्जमा : ऐ अल्लाह ! मैं तुझ से सेहत  सलामती और हुस्ने खुल्क का सवाल करता हूं।

हज़रते अबू हुरैरा रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : इन्सान की शराफ़त उस का दीन है, उस की नेकी हुस्ने खुल्क है और उस की मुरुव्वत उस की अक्ल है।

हज़रते उसामा बिन शरीक रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि मैं आ’राबियों की मजलिस में हाज़िर हुवा, वोह हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से पूछ रहे थे कि इन्सान को अताशुदा भलाइयों में से कौन सी भलाई उम्दा है ? आप ने फ़रमाया : हुस्ने खुल्क।

फ़रमाने नबवी है कि कियामत के दिन मुझे सब से ज़ियादा महबूब और मुझ से करीब तर वोह लोग होंगे जो तुम में से बेहतरीन खुल्क रखते हैं।

हज़रते इब्ने अब्बास रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : तीन ख़स्लतें हैं जिस शख्स में वोह तीनों या उन में से कोई एक न पाई जाए, उस के किसी अमल को शुमार में न लाओ !

परहेज़गारी जो उसे अल्लाह तआला की ना फ़रमानी से बाज़ रखती है, हिल्म जिस से वोह बेवुकूफ़ को रोक देता है, हुस्ने खुल्क जिस से मुत्तसिफ़ हो कर वोह ज़िन्दगी बसर करता है।

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम नमाज़ की इब्तिदा में येह दुआ फ़रमाया करते थे कि ऐ अल्लाह ! मुझे बेहतरीन खुल्क की हिदायत फ़रमा, तेरे सिवा कौन है जो हुस्ने खुल्क की हिदायत दे, मुझे बद खुल्की से नजात दे, बद खुल्की से बचाने वाला तेरे सिवा कौन है ?सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम

आप से दरयाफ़्त किया गया कि इन्सान की जेबो जीनत किस बात में है ? आप ने फ़रमाया : कलाम में नर्मी, कुशादा रूई और खन्दा पेशानी का इज़हार ।।

जो शख्स लोगों से एहसान करता है और हुस्ने खुल्क से मुआमला रखता है, ऐसा इन्सान लोगों को गवारा होता है और लोग उस की तारीफें करते हैं।

जैसा कि एक शाइर कहता हैं।

जब तू ने भलाई की तमाम आदात को जम्अ कर लिया और सब लोगों से अच्छा बरताव किया,

तो तू साहिबे अर्श से अपनी जम्अ कर्दा नेकी को गुम नहीं पाएगा और न ही अल्लाह तआला की मख्लूक से सामने और पीठ पीछे अपनी तारीफ़ों को गुम पाएगा।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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बुरे उलमा का अंजाम – उकूबते उलमा ए सू

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 उलमाए सू से हमारी मुराद वो उलमा हैं जो इल्म के हुसूल से दुन्यावी ने’मतों के कमाने का इरादा रखते हैं, दुन्यावी कद्रो मन्ज़िलत चाहते हैं और दुन्यादारों के हम पल्ला बनना चाहते हैं।

सय्यिदे दो आलम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का इरशाद है कि क़यामत के दिन सख्त तरीन अज़ाब उस आलिम को होगा जिसे अल्लाह तआला ने उस के इल्म से नफ्अ अन्दोज़ नहीं होने दिया।

फ़रमाने नबवी है कि आदमी उस वक्त तक आलिम नहीं होता जब तक कि अपने इल्म के मुताबिक़ अमल न करे ।

फ़रमाने नबवी है इल्म की दो किस्में हैं : ज़बानी इल्म, जो लोगों पर अल्लाह की हुज्जत है, कल्बी इल्म और येही इल्म लोगों को नफ्अ देने वाला है।

फ़रमाने नबवी है कि आखिर ज़माने में जाहिल इबादत गुज़ार और फ़ासिक आलिम होंगे ।

फ़रमाने नबवी है कि उलमा पर तफ़ाखुर जताने, बे वुकूफ़ों से जंगो जिदाल करने और लोगों को अपनी तरफ़ मुतवज्जेह करने के लिये इल्म हासिल न करो, जो भी ऐसा करेगा जहन्नम में जाएगा।

फ़रमाने नबवी है कि जो अपना इल्म छुपाता है अल्लाह तआला उसे आग की लगाम देगा ।

नीज़ इरशाद फ़रमाया कि मैं दज्जाल से ज़ियादा और लोगों पर तुम्हारे लिये डरता हूं, पूछा गया : वोह कौन हैं ? आप ने फ़रमाया : गुमराह कुन इमाम ।

मजीद फ़रमान होता है कि जो शख्स इल्म को बढ़ाता मगर हिदायत में नहीं बढ़ता, अल्लाह तआला से उस की दूरी बढ़ती रहती है।

हज़रते ईसा अलैहहिस्सलाम  ने फ़रमाया : तुम जो हैरानो परेशान लोगों के साथ बैठने वाले हो, अन्धेरी रात में आने वालों के लिये इल्मो हिक्मत के रास्ते कैसे साफ़ करोगे।

येह और इन जैसी और भी बहुत सी अहादीस हैं जो इल्म के ख़तरात से आगाही बख्शती हैं, क्यूंकि आलिम या तो दाइमी हलाकत पाता है या फिर दाइमी सआदत से सरफ़राज़ होता है और अगर आलिम इल्म की जुस्त्जू में सलामती से महरूम हो जाए तो सआदत को कभी भी नहीं पा सकता।

हज़रते उमर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : मैं इस उम्मत पर सब से ज़ियादा मुनाफ़िक आलिम से खौफ़ज़दा होता हूं, लोगों ने कहा : मुनाफ़िक आलिम कैसा होता है ? आप ने फ़रमाया : उस की ज़बान आलिम होती है मगर उस का दिल और अमल जाहिल होता है।

हज़रते हसन रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि उन लोगों में से न हो जो उलमा का इल्म और दानिशमन्दों की हकीमाना बातें जम्अ करता है मगर अमल बे वुकूफों जैसे करता है।

किसी शख्स ने हज़रते अबू हुरैरा रज़ीअल्लाहो अन्हो से कहा : मैं इल्म सीखना चाहता हूं और इस बात से डरता हूं कि कहीं मैं इसे जाएअ न कर दूं, आप ने कहा : इल्म का छोड़ देना ही बहुत बड़ा जिया है।

हज़रते इब्राहीम बिन उयैना रज़ीअल्लाहो अन्हो से कहा गया लोगों में से तवील शर्मिन्दगी पाने वाला शख्स कौन है ? इन्हों ने फ़रमाया : दुन्या में तो ऐसे शख्स से भलाई करने वाला जो कुफ्राने ने’मत का आदी है और मौत के वक्त गुनहगार आलिम।

हज़रते खलील बिन अहमद रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि चार किस्म के आदमी हैं :

एक वोह जो जानता है और यह भी जानता है कि वोह इल्म रखता है वोह आलिम है, उस की इत्तिबाअ करो।

दूसरा वोह जो इल्म रखता है मगर उसे मालूम नहीं कि वोह इल्म रखता है, वोह सोया हुवा है उसे जगाओ।

तीसरा वोह जो नहीं जानता और वोह समझता है कि वोह कुछ नहीं जानता वोह राहनुमाई चाहने वाला है उस की रहनुमाई करो।

चौथा वोह जो नहीं जानता और समझता येह है कि वोह बहुत कुछ जानता है वोह जाहिल है, उस से दूर रहो।

हज़रते सुफ्यान रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि इल्म अमल से बोलता है अगर इन्सान अमल करे तो सहीह वरना इल्म कूच कर जाता है।

हज़रते इब्ने मुबारक रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि आदमी जब तक इल्म की तलाश में रहता है वो आलिम होता है और जूही वो खुद को आलिम समझने लगता है, जहालत की तारीकियों में चला जाता है।

हज़रते फुजैल बिन इयाज़ का कौल है कि मुझे तीन शख्सों पर बहुत रहम आता है, कौम का सरदार जो ज़लील हो जाए, कौम का गनी जो मोहताज हो जाए और वो आलिम जिसे दुन्यादारी से फुरसत नहीं होती।

हज़रते हसन रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है : उलमा का अज़ाब दिल की मौत है और दिल की मौत आखिरत के बदले दुन्या का हुसूल है।

किसी शाइर ने क्या खूब कहा है :

मुझे हिदायत के बदले जलालत खरीदने वाले पर तअज्जुब हुवा और जो दीन के बदले दुनिया ख़रीदता है वोह इस से ज़ियादा तअज्जुब खेज़ बात करता है। और इन से ज़ियादा तअज्जुब खेज़ बात येह है कि इन्सान गलत दीन के बदले में अपना सहीह दीन बेच देता है।

फ़रमाने नबवी है कि आलिम को जहन्नम में ऐसा अज़ाब दिया जाएगा जिस की शिद्दत से वोह जहन्नमियों में घूमता रहेगा, हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की मुराद ऐसे आलिम से फ़ाजिरो फ़ासिक आलिम थी।

बेअमल आलिम का अन्जाम

हज़रते उसामा बिन जैद रज़ीअल्लाहो अन्हो से रिवायत है कि मैं ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से सुना, आप फ़रमा रहे थे : क़ियामत के दिन एक आलिम को लाया जाएगा और उसे जहन्नम में डाला जाएगा, उस की आंतें निकल आएंगी और जहन्नम में आंतों के बल ऐसे घूमेगा जैसे गधा चक्की के गिर्द घूमता है, जहन्नम वाले उसे अपने गिर्द घूमता देख कर उस से उस के अमल पूछेगे : तब वोह आलिम कहेगा कि मैं औरों को तो नेकी का हुक्म देता था मगर खुद इस पर अमल नहीं करता था, लोगों को बुराइयों से रोकता था मगर खुद नहीं रुकता था।

आलिम को गुनाहों के सबब दोहरा अज़ाब इस लिये दिया जाएगा क्यूंकि वोह इल्म के बा वुजूद गुनाह करता रहा, इसी लिये फ़रमाने इलाही है कि

मुनाफ़िक़ीन बेशक जहन्नम के निचले तबके में होंगे

मुनाफ़िक़ीन बेशक जहन्नम के निचले तबके में होंगे। इस लिये कि उन्हों ने इल्म के बा वुजूद हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की नबुव्वत व सदाक़त का इन्कार किया।

अल्लाह तआला ने नसारा को अल्लाह का बेटा और उसे तीन में से तीसरा कहने के बा वुजूद यहूद को उन से बदतर करार दिया क्यूंकि यहूद ने इल्म के बा वुजूद हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की नबुव्वत का इन्कार कर दिया था चुनान्चे, फ़रमाने इलाही है :

वोह (यहूद) आप को पहचानते हैं जैसे के अपने

बेटों को पहचानते हैं। मजीद इरशाद फ़रमाया :

पस जब उन के पास वोह कुछ आया जिसे वोह पहचानते थे तो उन्हों ने उस से कुफ्र किया पस काफिरों पर अल्लाह की ला’नत है।

अल्लाह तआला ने बलअम बिन बाऊरा के किस्से में इरशाद फ़रमाया : “और इन लोगों पर उस शख्स का किस्सा बयान ” कर जिसे हम ने अपनी निशानियां दी पस वोह उन में से निकल गया और शैतान ने उसे पीछे

लगाया पस वोह गुमराहों में से हो गया”। और येह भी इरशाद फ़रमाया कि “पस उस की मिसाल कुत्ते की मिसाल जैसी है अगर तू उस पर बोझ डाल दे तो वोह ज़बान लटकाता है और अगर उसे छोड़ दे तो भी ज़बान

लटकाता है”।

इसी तरह फ़ासिको फ़ाजिर आलिम का अन्जाम होता है क्यूंकि बलअम को किताबुल्लाह का इल्म दिया गया था मगर उस ने ख्वाहिशाते नफ़्सानी को अपना लिया लिहाज़ा उस के लिये कुत्ते की मिसाल दी गई या’नी उसे चाहे हिक्मत व इल्म दिया गया या नहीं वोह हर हालत में शहवात की तरफ़ ज़बान लटकाता रहता है।

हज़रते ईसा अलैहहिस्सलाम  ने फ़रमाया बुरे उलमा की मिसाल ऐसी चट्टान की सी है जो नहर के मुंह पर गिर गई हो, न वोह खुद सैराब होती है और न ही वोह पानी को रास्ता देती है कि उस से खेतियां सैराब हों।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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तहज्जुद की नमाज़ की बरकतें और फ़ज़ीलतें

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 

कुरआने मजीद की मुतअद्दिद आयात से इस नमाज़ की फ़ज़ीलत साबित है, इरशादे इलाही है :

बेशक तेरा रब जानता है कि तू दो तिहाई रात के

करीब खड़ा होता है। फ़रमाने इलाही है :

तहकीक रात का उठना नफ्स को कुचलने के लिये बहुत सख्त है और काम का बहुत दुरुस्त करने वाला है। फ़रमाने इलाही है:

उन की करवटें (पहलू) बिछोनों से दूर होती हैं। मज़ीद फ़रमान होता है:

क्या जो शख्स कि वोह रात के वक़्त बन्दगी

करता है। इरशादे इलाही है:

और वोह लोग जो अपने रब के लिये रात को सजदा करते हुवे और कियाम करते हुवे गुज़ारते हैं। मजीद इरशाद होता है:

ऐ ईमान वालो सब्र और नमाज़ से मदद चाहो।

कहा गया है कि इस नमाज़ से मुराद रात की नमाज़ है जिस पर मुदावमत कर के नफ्स से जिहाद किया जा सकता है।

अहादीस में भी इस नमाज़ की फ़ज़ीलत वारिद है चुनान्चे फ़रमाने नबवी है कि “जब तुम में से कोई एक सो जाता है तो शैतान उस की गुद्दी में तीन गांठें देता है और हर गांठ में वोह कहता है कि बहुत तवील रात बाकी है अभी कुछ देर और सो ले, पस अगर इन्सान बेदार हो कर ज़िक्रे खुदा करता है तो एक गांठ खुल जाती है, जब वुजू करता है तो दूसरी गांठ खुल जाती है और जब इन्सान नमाज़ में मसरूफ़ हो जाता है तो तीसरी गांठ खुल जाती है और इन्सान इस हाल में सुबह करता है कि वोह खुशी व मसर्रत का पाने वाला और हल्का फुलका होता है वरना वोह सुस्त और बद मिज़ाज हो कर उठता है”

हदीस शरीफ़ में है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की खिदमत में ऐसे शख्स का तजकिरा किया गया जो सारी रात सोता है यहां तक कि सुब्ह हो जाती है, आप ने फ़रमाया : येह वोह शख्स है कि जिस के कान में शैतान ने पेशाब कर दिया है।

हदीस शरीफ़ में है कि शैतान के पास नाक की दवा, चाटने की चीज़ और छिड़कने की चीजें हैं, जब वोह किसी इन्सान के नाक में दवाई डालता है तो वोह बद खुल्क बन जाता है जब किसी इन्सान को चाटने की दवा देता है तो वोह इन्सान बद ज़बान हो जाता है और जब किसी इन्सान पर दवाई छिड़कता है तो वोह सुब्ह तक सोता रहता है।- हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का इरशाद है कि आधी रात में बन्दे का दो रक्अतें नमाज़ पढ़ना, दुनिया और इस की तमाम अश्या से बेहतर है, अगर मेरी उम्मत पर दुश्वार न होता तो मैं येह दो रक्अतें इन पर फ़र्ज़ कर देता

रात की वह घडी जब बन्दे की दुआएं कुबूल होती हैं 

सहीह बुख़ारी में हज़रते जाबिर रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया कि रात में एक ऐसी साअत है कि जब उस में बन्दा अल्लाह तआला से भलाई का सुवाल करता है तो अल्लाह तआला उसे अता कर देता है।

एक रिवायत है कि वोह दुन्या और आख़िरत की जो भलाई मांगता है और येह साअत हर रात में होती है।

हज़रते मुगीरा बिन शो’बा रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम (शब में नमाज़ के लिये) खड़े हुवे यहां तक कि आप के पाए मुबारक रात में खड़े हो कर इबादत करने के सबब सूज गए, आप से कहा गया : या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम क्या अल्लाह तआला ने आप की अगली पिछली ख़िलाफ़े औला बातों को मुआफ़ नहीं फ़रमा दिया ? आप ने येह सुन कर इरशाद फ़रमाया : क्या मैं अल्लाह तआला का शुक्र गुज़ार बन्दा न बनूं ? इस हदीस शरीफ़ से येह मतलब निकलता है कि इस से आप की मुराद मजीद इन्आमाते इलाहिय्या की तलब और जुस्तजू थी क्यूंकि शुक्र ज़ियादतिये ने मत का सबब है, फ़रमाने इलाही है :

अगर तुम शुक्र करो तो मैं अलबत्ता तुम्हें ज़ियादा दूंगा। हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने हज़रते अबू हुरैरा रज़ीअल्लाहो अन्हो से फ़रमाया कि क्या तुम इस बात को पसन्द करते हो कि तुम पर ज़िन्दगी, मौत, क़ब्र और हश्र में अल्लाह तआला की रहमत का नुजूल हो, रात का कुछ हिस्सा बाकी हो और तुम रब की रज़ा के हुसूल के लिये उठ कर इबादत करो ! ऐ अबू हुरैरा ! घर के कोनों में नमाज़ पढ़ा करो, तुम्हारा घर आस्मान से ऐसा चमकता नज़र आएगा जैसे कि जमीन वालों को चमकदार सितारे नजर आया करते हैं।

जिस्मानी बिमारियों को दूर करने के लिए रात की नमाज़ तहज्जुद 

फ़रमाने नबवी है : तुम्हारे लिये लाज़िम है कि रात को इबादत किया करो क्यूंकि येह गुज़श्ता नेक लोगों का तरीका है, बेशक रात का कियाम अल्लाह तआला के कुर्ब का सबब, गुनाहों का कफ्फ़ारा, जिस्मानी बीमारियों को दूर करने वाला और गुनाहों से रोकने वाला है।

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का इरशादे गिरामी है कि हर वोह शख्स जो रात को इबादत का आदी हो और उसे नींद आ जाए तो उस के नामए आ’माल में रात की इबादत का सवाब लिख दिया जाता है और नींद को उस पर बख़्श दिया जाता है।

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने हज़रते अबू ज़र रज़ीअल्लाहो अन्हो से फ़रमाया : ऐ अबू ज़र ! जब तुम सफ़र का इरादा करते हो तो जादेराह (रस्ते का खर्च) तय्यार करते हो ? अर्ज की : जी हां ! आप ने फ़रमाया : कियामत के तवील रास्ते का सफ़र कैसे करोगे? ऐ अबू ज़र ! मैं तुम्हें ऐसी चीज़ बतलाऊं जो तुम को कियामत के दिन नफ्अ दे ? अबू जर रज़ीअल्लाहो अन्हो ने अर्ज की : मेरे मां-बाप आप पर कुरबान, ज़रूर बतलाइये ! आप ने फ़रमाया : क़ियामत के दिन के लिये सख्त गर्मी के दिन रोज़ा रख, कब्र की वहशत को दूर करने के लिये अन्धेरी रात में नफ्ल दो रक्अत पढ़, अहम उमूरे कियामत की हुज्जत के लिये हज कर, मिस्कीन पर सदक़ा कर या हक़ बात कह और बुरी बात कहने से खामोश रह।।

रिवायत है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम के ज़मानए मुबारक में एक आदमी था, जब लोग अपने बिस्तरों पर सो जाते और आंखें सुकून हासिल करने के लिये बन्द हो जाती तो वोह खड़ा हो कर नमाज़ पढ़ता कुरआने मजीद की तिलावत करता और कहता : ऐ खालिके जहन्नम ! मुझे जहन्नम से बचा ! हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की बारगाह में उस शख्स का तजकिरा किया गया तो आप ने फ़रमाया : जब वोह ऐसी हालत में हो तो मुझे ख़बर कर देना, चुनान्चे, आप वहां तशरीफ़ लाए और उस की तिलावत व दुआएं सुनी, सुब्ह हुई तो आप ने उस से फ़रमाया : ऐ फुलां ! तू ने अल्लाह तआला से जन्नत का सुवाल क्यूं नहीं नहीं किया ? वोह आदमी बोला : या रसूलल्लाह ! मैं जन्नत का सवाल कैसे करूं, अभी तो मेरे आ’माल इस की तलब के लाइक नहीं हुवे। इस गुफ्तगू को थोड़ी ही देर गुज़री थी कि जिब्रीले अमीन नाज़िल हुवे और अर्ज की : या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम फुलां आदमी को बतला दीजिये कि अल्लाह तआला ने उसे जहन्नम से महफूज़ फ़रमा लिया और उसे जन्नत में दाखिल कर दिया है।

रिवायत है कि हज़रते जिब्रीले अमीन ने हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से अर्ज की, कि इब्ने उमर उम्दा आदमी है, काश वोह रात को इबादत करता । हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने हज़रते इब्ने उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो को इस बात की खबर दी, इस के बाद हज़रते इब्ने उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो हमेशा रात को इबादत किया करते ।

हज़रते नाफेअ रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि आप रात को इबादत करते हुवे मुझ से कहा करते : देखो कहीं सुब्ह तो नहीं हो गई ? मैं कहता : नहीं, आप फिर इबादत में मश्गूल हो जाते, फिर फ़रमाते : ऐ नाफेअ ! देखो सुब्ह हुई ? मैं कहता : हां तो आप बैठ जाते और इस्तिग़फ़ार फ़रमाते यहां तक कि सुब्ह खूब रोशन हो जाती।

हज़रते अली करमअल्लाहो वज हहु से मरवी है कि हज़रते यहूया बिन जकरिय्या अलैहहिस्सलाम  ने एक रात जव की रोटी पेट भर कर खा ली, रात को उन की आंख लग गई और वोह सुब्ह तक सोते रहे, अपने वज़ाइफ़ व इबादात में मश्गूल न हो सके, तब अल्लाह तआला ने आप की तरफ़ वहूय फ़रमाई : ऐ यहूया ! क्या तू ने मेरे तय्यार कर्दा घर से उम्दा घर या मेरे पड़ोस से उम्दा पड़ोस पा लिया है ? मुझे मेरे इज्जतो जलाल की क़सम ! ऐ यहूया ! अगर तू ने जन्नतुल फ़िरदौस को देख लिया होता तो इस के शौक़ में तेरी चर्बी पिघल जाती और रूह निकल जाती और अगर तू जहन्नम को देख लेता तो तेरी चर्बी पिघल जाती और आंखों से पीप बहती। – हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से अर्ज की गई : या रसूलल्लाह ! फुलां आदमी रात को नमाज़ पढ़ता है, सुब्ह हुई तो उस ने चोरी कर ली। आप ने फ़रमाया : अन करीब उस का नेक अमल उस को इन बुराइयों से रोक देगा।

मजीद इरशाद फ़रमाया कि अल्लाह तआला उस बन्दे पर रहम फ़रमाए जो रात को खड़ा हो कर इबादत करता रहा, फिर उस ने अपनी औरत को जगाया और उस ने भी उस के साथ खड़े हो कर इबादत की, अगर औरत ने इन्कार किया तो उस बन्दे ने उस के मुंह पर पानी के छींटे मारे और आप ने फ़रमाया : अल्लाह ने उस औरत पर रहम फ़रमाया जो रात को खड़ी हो कर इबादत करती रही फिर उस ने अपने शौहर को जगाया और वोह भी उस के साथ इबादत में मश्गूल हो गया वगरना उस औरत ने अपने ख़ावन्द के मुंह पर पानी के छींटे मारे ।

फ़रमाने नबवी है : जो रात को खुद बेदार हुवा और अपनी औरत को भी जगाया फिर दोनों ने खड़े हो कर दो रक्अत नमाज अदा की, अल्लाह तआला उन्हें ज़िक्र करने वाले मर्दो और औरतों में से लिख देता है।

फ़रमाने नबवी है कि फ़राइज़ के बाद सब से अफ़्ज़ल नमाज़ रात की है।

हज़रते उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया कि अपने वज़ाइफ़ या इबादत करने के लिये जिस की रात को आंख न खुली और उस ने वोह वज़ाइफ़ और इबादत सुबह की नमाज़ और जोहर की नमाज़ के दरमियान अदा किये तो उसके लिए पूरी रात की इबादत का सवाब लिख दिया जाता है

कहते हैं की इमाम बुखारी रज़ीअल्लाहो अन्हो अक्सर यह अशआर पढ़ा करते

फरागत के औकात में रुकुअ व सुजूद को गनीमत जान जल्द ही तुझे मौत आ जाएगी

मेने कितने ऐसे तंदरुस्त देखे हैं जिन्हें कोई बीमारी नहीं थी और अचानक उनकी रूहें परवाज़ कर गई.

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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नमाजे बा जमाअत की फजीलत

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 

नबिय्ये करीम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम फ़रमाते हैं कि तन्हा नमाज़ पढ़ने से नमाजे बा जमाअत को सत्ताईस दरजे फ़ज़ीलत हासिल है।)

हज़रते अबू हुरैरा सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से मरवी है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने बा’ज़ लोगों को चन्द नमाज़ों में जमाअत में न देख कर फ़रमाया : मेरा येह इरादा हुवा कि मैं किसी आदमी को नमाज़ पढ़ाने का हुक्म दूं और मैं उन लोगों के यहां जाऊं जो जमाअत से रह गए हैं और उन को और उन के घरों को जला दूं ।

दूसरी रिवायत में है कि फिर मैं उन लोगों के घरों को लकड़ियों के गठ्ठों के साथ उन पर जलाने का हुक्म दूं जो जमाअत में शरीक नहीं हुवे, अगर उन में से किसी को इल्म होता कि मोटी हड्डी या जानवर के दो हाथ (जमाअत में शरीक होने से) मिलेंगे तो वोह ज़रूर जमाअत में शामिल होते ।

हज़रते उस्मान रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरफूअन मरवी है कि जो इशा की जमाअत में हाज़िर हुवा पस गोया उस ने आधी रात इबादत में गुजारी और जो सुबह की जमाअत में भी शामिल हुवा गोया उस ने सारी रात इबादत में गुज़ारी ।

रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का इरशाद है कि जिस ने नमाजे बा जमाअत अदा की पस गोया उस ने अपने सीने को इबादत से भर लिया ।

हज़रते सईद बिन मुसय्यिब रज़ीअल्लाहो अन्हो का क़ौल है कि बीस बरस से मुतवातिर मैं उस वक़्त मस्जिद में होता हूं जब मुअज्जिन अज़ान देता है । हज़रते मुहम्मद बिन वासे रज़ीअल्लाहो अन्हो फ़रमाते हैं कि मैं दुनिया से तीन चीज़ों की ख्वाहिश रखता हूं, ऐसा भाई कि अगर मैं टेढ़ा हो जाऊं तो वोह मुझे सीधा कर दे, बिगैर काविश के मुख़्तसर रिज्क जिस की बाज़ पुर्स न हो और नमाजे बा जमाअत जिस की गलतियां मेरे लिये मुआफ़ कर दी जाएं और जिस की फ़ज़ीलत मुझे बख़्श दी जाए।

हज़रते अबू उबैदा बिन जर्राह रज़ीअल्लाहो अन्हो ने एक मरतबा कुछ लोगों की इमामत की, जब नमाज़ से फ़ारिग हुवे तो शैतान के मुतअल्लिक़ फ़रमाया कि वोह मुझे बहकाता रहा यहां तक कि मैं ने भी खुद को दूसरे से अफ्ज़ल समझ लिया, मैं आज के बाद इमामत नहीं करूंगा।

हज़रते हसन रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि ऐसे शख्स के पीछे नमाज़ न पढ़ो जो उलमा की मजलिस में न जाता हो । हज़रते नखई रज़ीअल्लाहो अन्हो का क़ौल है कि जो बिगैर किसी इल्म के लोगों की इमामत करता है वोह उस शख्स की तरह है जो समन्दर में रह कर उस का पानी नापता है और उस की कमी ज़ियादती को नहीं समझता।

हज़रते हातिमे असम रज़ीअल्लाहो अन्हो का क़ौल है कि मेरी एक नमाजे बा जमाअत फ़ौत हो गई तो सिर्फ अबू इस्हाक़ बुखारी मेरी ताज़िय्यत को आए, अगर मेरा बच्चा फ़ौत हो जाता तो दस हज़ार से भी ज़ियादा लोग ता’ज़िय्यत के लिये आते क्यूंकि लोग दीन के नुक्सान को दुनिया के नुक्सान से बहुत हल्का जानते हैं।

हज़रते इब्ने अब्बास रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि जिस शख्स ने अजान सुन कर इस का जवाब न दिया उस ने भलाई का इरादा नहीं किया और न ही उसे भलाई नसीब होगी।

हज़रते अबू हुरैरा रज़ीअल्लाहो अन्हो का क़ौल है कि पिघले हुवे सीसे से इन्सान के कानों का भर दिया जाना इस से बेहतर है कि वोह अज़ान सुन कर इस का जवाब न दे।

मन्कूल है कि हज़रते मैमून बिन मेहरान रज़ीअल्लाहो अन्हो मस्जिद में आए तो आप से कहा गया कि लोग तो वापस लौट गए हैं (या’नी नमाज़ हो चुकी है) आप ने येह सुन कर फ़रमाया : “इन्ना लिल्लाहे व इना इलयहे राजेऊन”   और कहा कि इस नमाज़ के पा लेने की फजीलत मुझे इराक की हुकूमत से ज़ियादा पसन्द थी।

चालीस नमाजें जमाअत के साथ अदा करने वाले पर इनाम ए  इलाही

फ़रमाने नबवी है कि जिस ने चालीस दिन तमाम नमाजे बा जमाअत अदा की और उस की तक्बीरे तहरीमा फ़ौत नहीं हुई, अल्लाह तआला उस की ख़ातिर दो बराअतें लिख देता है, एक निफ़ाक़ से बराअत और दूसरी बराअत जहन्नम से ।

येह भी कहा गया है कि जब कियामत का दिन होगा तो कब्रों से एक ऐसी जमाअत उठेगी जिन के चेहरे चमकदार सितारे की तरह होंगे, फ़िरिश्ते उन से कहेंगे कि तुम्हारे आ’माल क्या थे ? वोह जवाब देंगे कि जब हम अज़ान सुनते थे तो वुजू के लिये खड़े हो जाया करते थे और किसी और काम में मश्गूल नहीं होते थे। फिर एक ऐसी जमाअत आएगी जिन के चेहरे चांद की तरह होंगे, वोह फ़िरिश्तों के सुवाल के बाद कहेंगे कि हम वक्त से पहले वुजू किया करते थे, फिर एक ऐसी जमाअत आएगी जिन के चेहरे आफ़्ताब की तरह दरख-शिन्दा होंगे और वोह कहेंगे कि हम अज़ान मस्जिद में सुना करते थे (या’नी अज़ान से पहले मस्जिद में पहुंच जाते थे)।

मरवी है कि सलफे सालिहीन तक्बीरे ऊला के फ़ौत होने पर तीन दिन तक अपनी ता’ज़िय्यत किया करते थे।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

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