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Islamic – पृष्ठ 6 – Net In Hindi.com

सच और झूठ की मिलावट कर देना

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 फ़रमाने नबवी है : जिसे माअकिल बिन यसार रज़ीअल्लाहो अन्हो ने रिवायत किया है कि लोगों पर ऐसा जमाना आएगा जब लोगों के दिलों में कुरआने मजीद बदन के कपड़ों की तरह पुराना हो जाएगा उन के तमाम अहकामात तुम्अ (लालच) पर मबनी होंगे, किसी के दिल में खौफे खुदा नहीं होगा, अगर उन में से कोई एक नेकी करेगा तो कहेगा : येह मुझ से कबूल कर ली जाएगी और अगर बुराई करेगा तो कहेगा : येह बख्श दी जाएगी। हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने बताया कि वोह खौफे खुदा की बजाए तम्अ-लालच  रखेंगे।

क्यूंकि कुरआने मजीद की उन तम्बीहात से जिन में इन्सानों को अज़ाब से खौफ़ दिलाया गया है, उन को बिल्कुल इल्म नहीं होगा, इसी आदत और इस जैसी दूसरी आदतों की वज्ह से अल्लाह तआला ने नसारा के मुतअल्लिक इन अल्फ़ाज़ में खबर दी है कि “पस उन की जगह उन के बुरे जा निशीन बैठे जो किताब के वारिस हुवे वोह नाक़िस या’नी हराम अस्बाब को लेते हैं और कहते हैं अलबत्ता हम को बख्श दिया जाएगा”। इस की तफ्सीर येह है कि उन के उलमा किताबे इलाही के वारिस हुवे मगर उन्हों ने दुन्या की ख्वाहिशात से मुरस्सअ माल कमाना शुरू कर दिया ख़्वाह वोह हलाल हो या हराम और येह कहा कि हमें अल्लाह बख़्श देगा हालांकि फ़रमाने इलाही है :

“और उस शख्स के लिये जो अपने रब के हुजूर खड़ा होने से डरा दो जन्नतें हैं।” मजीद फ़रमाया :

“येह (जन्नत) उस शख्स के लिये है जो मेरे हुजूर खड़ा होने से डरा और मेरी तहदीद से खौफ़ज़दा हुवा है।”

कुरआने मजीद में अव्वल से आखिर तक लोगों को ख़ौफ़ दिलाया गया है, उन्हें डराया गया है इस में जब कोई सोचने वाला गौरो फ़िक्र करता है तो उस का हुज्नो मलाल बढ़ता है, अगर वोह मोमिन है तो उस का इस में गौरो फ़िक्र करने से खौफ फुजू तर होता है मगर तुम लोगों को देखते हो, इसे जल्दी जल्दी पढ़ते हैं, इस के हुरूफ़ के मख़ारिज निकालते हैं, इस के ज़बर ज़ेर और पेश में झगड़ते हैं जैसे कि वोह अरब के अश्आर पढ़ रहे हों, वोह इस के मआनी में गौरो फ़िक्र नहीं करते और न ही इस के अहकामात पर अमल की सई करते हैं और दुन्या में इस जैसा या इस से बढ़ कर कोई धोका है कि लोग नेकियां और गुनाह करते हैं, उन के गुनाह नेकियों से जियादा होते हैं मगर वो इस के बा वुजूद बख्शिश की तमन्ना रखते हैं और गुनाहों के पलड़े को भारी समझते हुवे भी वोह नेकियों के पलड़े को भारी होने की उम्मीदें लगाए बैठे हैं, येह उन की जहालत की इन्तिहा नहीं तो और क्या है ?

हराम माल खैरात करने का कोई सवाब नहीं

तुम देखते हो आदमी चन्द हलालो हराम के मिले जुले रूपये  राहे खुदा में देता है और मुसलमानों के माल और मुश्तबा माल से उन के दो गुने चोगुने रूपे खरे कर लेता है और येह भी हो सकता है कि उस का राहे खुदा में खर्च किया हुवा माल भी मुसलमानों के माल से छीना हुवा हो।

और वोह येह गुमान करता है कि खाए हुवे हज़ार रूपये  का येह हराम या हलाल से कमाए दस रूपे जिन को मैं ने राहे खुदा में दिया है, बदला बन जाएंगे, ऐसे शख्स की मिसाल कुछ यूं है कि एक आदमी तराजू के एक पलड़े में दस रूपे और दूसरे में एक हज़ार रूपे रख कर येह तवक्कोअ रखे कि दस रूपे वाला पलड़ा भारी और हज़ार वाला हल्का हो जाएगा और येह उस की जहालत की इन्तिहा होगी, तुम को बा’ज़ ऐसे शख्स भी नज़र आएंगे जिन में से हर एक येह समझेगा कि उस की नेकियां गुनाहों से ज़ियादा हैं, ऐसा शख्स नफ्स का मुहासबा नहीं करता और अपने गुनाहों को तलाश नहीं करता लेकिन जब वोह कोई नेकी करता है, उस पर ए’तिमाद करता है उसे गिन लेता है, ऐसे शख्स की मिसाल ऐसी है जो ज़बान से इस्तिगफार करता है या दिन में सो मरतबा तस्बीह करता है। फिर मुसलमानों की गीबत करता है, उन की इज्जतें पामाल करता है और सारा दिन अन गिनत ऐसी बातें करता है जिन से अल्लाह तआला नाराज़ हो जाता है लेकिन उस की निगाह में वोह सो तस्बीहात गर्दिश करती रहती हैं और सो बार इस्तिगफार करना घूमता रहता है और सारे दिन की लगवियात से गाफ़िल हो जाता है जिन को अगर वोह लिखता तो वोह हर तस्बीह से सो गुना या हज़ार गुना ज़ियादा होतीं, जिन्हें मुहाफ़िज़ फ़िरिश्तों ने लिख लिया है और अल्लाह तआला ने भी हर ऐसे कलिमे पर इक़ाब का वादा किया है चुनान्चे, इरशादे इलाही है :

वोह शख्स तस्बीह व तहलील के फ़ज़ाइल में तो गौर करता है मगर उन वईदों से अपनी आंखें बन्द कर लेता है जो ग़ीबत करने वालों, झूटों, चुगुल खोरों और ऐसे लोगों के मुतअल्लिक वारिद हुई हैं जो ज़बान से कुछ और कहते हैं और दिल में कुछ और कहते हैं इस के इलावा भी तरह तरह की ऐसी बहुत सी बातें हैं जिन पर गिरिफ़्त होगी और यह दुन्या तो महज़ धोका ही धोका है।

मुझे ज़िन्दगी की कसम ! अगर मुहाफ़िज़ लिखने वाले फ़रिश्ते उस से उन लग़व बातों के तहरीर करने की उजरत तलब करते जो उस की तस्बीहात से ज़ियादा हैं तो वोह अपनी ज़बान को बन्द कर लेता और ऐसी अहम बातें भी न करता जो उस की ज़रूरियात में शामिल होती और न ही वोह ना तुवानी में कोई बात करता वोह हर बात को गिनता, उस का मुहासबा करता और अपनी तस्बीहात से उन का मुवाज़ना करता कि कहीं मेरी बातों की उजरत मेरी तस्बीहात से ज़ियादा न हो जाए, अफसोस तो इस अम्र का है कि इन्सान किताबत की उजरत के सबब तो अपने नफ्स का मुहासबा करे और बोलने में इन्तिहाई एहतियात को पेशे नज़र रखे मगर फ़िरदौसे आ’ला के न पाने और इस की ने’मतों के जवाल को कोई अहम्मिय्यत न दे।

हक़ीक़त तो येह है कि येह चीज़ हर उस इन्सान के लिये अज़ीम मुसीबत है जो गौरो फ़िक्र करने का आदी हो, हमें अल्लाह तआला की तरफ़ से ऐसे काम सोंपे गए हैं कि अगर हम इन का इन्कार कर दें तो ना फ़रमान काफ़िरों में से हो जाएं और अगर इन की तस्दीक करें बा वुजूद येह कि आ’माल का नामो निशान न हो तो हम फ़रेब खुर्दा बे वुकूफ़ कहलाएंगे क्यूंकि हमारे आ’माल वैसे नहीं जैसे आ’माल एक ऐसे शख्स के होने चाहिये जो कुरआने मजीद के अहकामात की तस्दीक करता है (और हम अल्लाह तआला से काफ़िरों में होने से बराअत चाहते हैं)।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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Haram maal, haram ki kamai,

 

 

 

मोहब्बत व नफ्स का मुहासबा

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 

हज़रते सुफ्यान रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है : मोहब्बत इत्तिबाए रसूल सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम है। एक और बुजुर्ग का कौल है कि मोहब्बत दाइमी जिक्र का नाम है, एक और कौल है कि मोहब्बत महबूब को खुद पर तरजीह देना है और बा’ज़ का कौल है कि मोहब्बत नाम है दुनिया के क़ियाम को बुरा समझने का, मजकूरए बाला सब अकवाल मोहब्बत के समरात की तरफ इशारा करते हैं, नफ़्से मोहब्बत को किसी ने नहीं छेड़ा, बा’ज़ ने येह कहा कि मोहब्बत नाम महबूब के उन कमालात का है जिस के इदराक से दिल मजबूर और जिस की अदाएगी से ज़बाने मसदूद हैं।

हज़रते जुनैद रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि अल्लाह तआला ने दुनिया से तअल्लुक रखने वालों पर मोहब्बत को हराम कर दिया है और फ़रमाया : हर मोहब्बत किसी इवज़ के जवाब में होती है, जब इवज़ ख़त्म हो जाता है मोहब्बत जाइल हो जाती है।

हज़रते जुन्नून रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि उस शख्स से जो अल्लाह की मोहब्बत का इज़हार करे, कह दो कि किसी गैर के सामने ज़लील होने से बचते रहना।

हज़रते शिब्ली रहमतुल्लाह अलैह से कहा गया कि हमें आरिफ़, मुहिब की तारीफ़ बतलाइये ! उन्हों ने कहा : आरिफ़ अगर बात करता है तो हलाक हो जाता है और मुहिब अगर चुप रहता है तो हलाक हो जाता है और आप ने येह अश्आर पढ़े :

ऐ मेहरबान सरदार ! तेरी मोहब्बत मेरे दिल की गहराइयों में मुकीम है। ऐ मेरी पलकों से नींद उड़ाने वाले ! जो कुछ मुझ पर बीती तू उसे जानता है।

किसी दूसरे शाइर का कौल है :

मुझे उस पर इन्तिहाई तअज्जुब होता है जो मुझ से कहता है तू ने मेरी मोहब्बत को याद किया है, क्या मैं उस की मोहब्बत भूल गया हूं जो उसे याद करूं ? जब मैं तुझे याद करता हूं तो मर जाता हूं फिर जिन्दा हो जाता हूं, अगर मेरा हुस्ने जन न होता तो मैं कभी जिन्दा न होता। पस मैं मौत में जिन्दगी पाता हूं और तेरे शौक में मौत पाता हूं, कितनी मरतबा मैं तेरे लिये जिन्दा होता हूं और मरता हूं। मैं ने मोहब्बत का जाम के बाद जाम पिया, न शराबे मोहब्बत कम हुई और न ही मैं सैर हुवा। ऐ काश ! उस का ख़याल मेरा नस्बुल ऐन हो, जब भी वोह मेरी नज़रों से दूर हो, मैं अन्धा हो जाता हूं।

हज़रते राबिआ अदविय्या रज़ीअल्लाहो अन्हा  ने एक दिन कहा : कौन है जो हमें अपने महबूब का पता बतलाए ? उन की ख़ादिमा बोली कि हमारा महबूब हमारे साथ है लेकिन दुनिया ने हमें उस से जुदा कर रखा है।

इब्नुल जला रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है, अल्लाह तआला ने हज़रते ईसा अलैहहिस्सलाम  की तरफ़ वही फ़रमाई कि जब मैं बन्दे के दिल को दुनिया और आखिरत की मोहब्बत से खाली पाता हूं तो उस के दिल को अपनी मोहब्बत से भर देता हूं और उसे अपनी हिफ़ाज़त में ले लेता हूं।

कहते हैं कि हज़रते जनाबे समनून रज़ीअल्लाहो अन्हो ने एक दिन मोहब्बत के मुतअल्लिक गुफ्तगू फ़रमाई तो उन के सामने एक परिन्दा उतरा और वोह अपनी चोंच ज़मीन पर मारने लगा यहां तक कि उस से खून बहने लगा और वोह मर गया।

हज़रते इब्राहीम बिन अदहम रज़ीअल्लाहो अन्हो ने कहा : ऐ अल्लाह तू जानता है कि जन्नत तेरे उन इन्आमात के मुकाबले में जो मुझे वदीअत हुवे हैं मेरे नज़दीक मच्छर के पर के बराबर वन नहीं रखती, तू ने मुझे अपनी मोहब्बत से सरफ़राज़ किया है, अपने ज़िक्र की उल्फ़त बख़्शी है और अपनी अज़मत में गौरो फ़िक्र करने के लिये फ़रागत मर्हमत फ़रमाई है।

हज़रते सीरी सकती रज़ीअल्लाहो अन्हो का क़ौल है कि जिस ने अल्लाह से मोहब्बत की वोह ज़िन्दए जावीद हुवा, जिस ने दुनिया से मोहब्बत की वोह बे आबरू हुवा, अहमक सुब्हो शाम ज़िल्लतो रुस्वाई से बसर करता है और अक्लमन्द अपने उयूब तलाश करता रहता है।

मुहासबा ए नफ्स – अपने नफ्स का हिसाब किताब रखना

अल्लाह तआला ने कुरआने मजीद में नफ्स के मुहासबे का हुक्म दिया है,

फ़रमाने इलाही है : ऐ ईमान वालो अल्लाह से डरो और हर नफ़्स येह देखे कि उस ने कल के लिये क्या भेजा है। इस आयते करीमा में इस बात की तरफ़ इशारा है कि इन्सान अपने गुज़श्ता आ’माल का मुहासबा करे इसी लिये हज़रते उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया : क़ब्ल इस के कि तुम्हारा मुहासबा हो, तुम खुद अपना मुहासबा करो और इस से पहले कि तुम्हारे आ’माल तोले जाएं तुम खुद अपने आ’माल तोल लो।

हदीस शरीफ़ में है कि एक आदमी ने हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से अर्ज किया : मुझे नसीहत कीजिये ! आप ने फ़रमाया : क्या तुम नसीहत की तलब में आए हो? अर्ज़ की : जी हां ! आप ने फ़रमाया : जब किसी काम का इरादा करो तो उस का अन्जाम सोच लो, अगर उस का अन्जाम अच्छा हो तो कर लो और अगर उस का बुरा अन्जाम हो तो उस से रुक जाओ।

हदीस शरीफ़ में है : अक्लमन्द के लिये मुनासिब है कि वोह चार घड़ियों में एक घड़ी अपने नफ्स के मुहासबे में खर्च करे ।

फ़रमाने इलाही है : और तौबा करो अल्लाह की तरफ़ मुकम्मल तौबा ऐ मोमिनो ताकि तुम फलाह पाओ। और तौबा ऐसा फेल है जो काम कर चुकने के बाद शर्मिन्दगी और पशेमानी से मुत्तसिफ़ होता है।

फ़रमाने नबवी है कि मैं दिन में सो मरतबा तौबा करता हूं और अल्लाह से बख्रिशश तलब करता हूं।

फ़रमाने इलाही है :

“बेशक वोह लोग जो परहेज़गार हैं जब उन्हें शैतान की तरफ़ से वस्वसा आता है तो वोह जिक्र करते हैं पस अचानक वोह देखने वाले होते हैं।”

हज़रते उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो जब रात तारीक होती तो अपने कदमों पर चाबुक मारते और अपने नफ्स से कहते कि तू ने आज क्या अमल किया ? हज़रते मैमून बिन मेहरान रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि आदमी उस वक्त तक मुत्तकी नहीं बन सकता जब तक वोह काम के बाद अपने शरीक या शरीकों के मुहासबे से भी अपने नफ्स का सख़्त मुहासबा न करे।।

हज़रते आइशा रज़ीअल्लाहो अन्हा से मरवी है कि हज़रते अबू बक्र रज़ीअल्लाहो अन्हो ने मुझ से वक्ते विसाल फ़रमाया कि मुझे लोगों में से कोई भी उमर से ज़ियादा महबूब नहीं है, फिर आप ने मुझ से पूछा कि मैं ने क्या कहा है ? मैं ने आप का फरमान दोहराया तो आप ने फ़रमाया कि मेरे नज़दीक उमर से ज़ियादा बा इज्जत कोई शख्स नहीं है, तो गोया आप ने एक बात कह कर इस पर गौर फ़रमाया और इसे दूसरे जुम्ले में तब्दील कर दिया।

हज़रते अबू तलहा  से मन्कूल है कि जब इन्हें इन के बाग के परन्दे ने नमाज़ से इन की तवज्जोह हटा दी तो इन्हों ने इस कोताही के बदले में इन्तिहाई पशेमानी के आलम में वोह सारा बाग अल्लाह की राह में वक्फ कर दिया।

हज़रते अब्दुल्लाह बिन सलाम रज़ीअल्लाहो अन्हो की हृदीस में है कि इन्हों ने लकड़ियों का गठ्ठा उठाया तो लोगों ने कहा : ऐ अबू यूसुफ़ ! तेरे घर में लकड़ियां मौजूद थीं और तेरे गुलाम भी इस काम के लिये मौजूद थे, तू ने येह काम क्यूं किया ? तो इन्हों ने जवाब दिया कि मैं अपने नफ्स का इम्तिहान ले रहा था कि कहीं येह इन कामों को बुरा तो नहीं समझता !

हज़रते हसन रज़ीअल्लाहो अन्हो का क़ौल है कि मोमिन अपने नफ़्स का हाकिम होता है और इस का मुहासबा करता रहता है, उन लोगों का कयामत में हिसाब आसान और हल्का होगा जो दुनिया में अपने नफ्सों का मुहासबा करते रहे हैं और क़ियामत में उन लोगों का सख़्त मुहासबा होगा जो दुनिया में अपने नफ्सों का मुहासबा नहीं करते।

फिर मुहासबा की तफ्सीर में फ़रमाया कि अचानक मोमिन को कोई चीज़ पसन्द आ जाती है और वोह इसे देख कर कहता है ब खुदा ! तू मुझे पसन्द है, तू मेरी ज़रूरत है लेकिन अफ़सोस येह है कि तेरे और मेरे दरमियान हिसाब हाइल है, येह हिसाब क़ब्ल अज़ अमल की मिसाल है और जब मोमिन से कोई लगज़िश सरज़द हो जाती है तो वोह खुद से कहता है तेरा इस फेल से क्या मतलब था ? ब खुदा ! मैं इस पर उज्र पेश नहीं करूंगा और ब खुदा ! अगर अल्लाह तआला ने चाहा तो मैं कभी भी ऐसा काम फिर नहीं करूंगा।

हज़रते अनस बिन मालिक रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि एक दिन हज़रते उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो और मैं मदीनए मुनव्वरा से बाहर निकले यहां तक कि वोह एक दीवार के करीब पहुंचे, मैं ने सुना वो कह रहे थे और मेरे और उन के दरमियान एक दीवार हाइल थी, वाह वाह ! उमर बिन खत्ताब अमीरुल मोमिनीन है ! ब खुदा ऐ नफ्स ! अल्लाह से डर, वरना वोह तुझे अज़ाब करेगा। हज़रते हसन रज़ीअल्लाहो अन्हो  इस फ़रमाने इलाही : और में मलामत करने वाले नफ़्स की कसम खाता हूं। की तफ्सीर में फ़रमाते हैं कि मोमिन से जब कोई गलती होती है तो वोह अपने नफ्स का तआकुब करता है कि तेरा इस बात से क्या इरादा था ? तेरा मेरे खाने और पीने से मन्शा क्या था ? और बदकार कदम ब कदम आगे बढ़ता रहता है मगर गुनाहों पर मुहासबए नफ्स नहीं करता।

हज़रते मालिक बिन दीनार रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है : अल्लाह तआला उस बन्दे पर रहम करे जिस ने अपने नफ्स से यह कहा कि तू ने ऐसा ऐसा काम अन्जाम नहीं दिया फिर उस की खिदमत की, उस की नाक में नकील डाल कर किताबुल्लाह की पैरवी को उस के लिये लाज़िमी करार दे दिया, ऐसा शख्स अपने नफ्स का काइद होगा और हक़ीक़त में येही नफ्स का मुहासबा है।

हज़रते मैमून बिन मेहरान रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि मुत्तकी शख्स अपने नफ्स का जालिम बादशाह और बखील हिस्सेदार से भी ज़ियादा मुहासबा करता है।

हज़रते इब्राहीम तैमी रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि मैं ने अपने नफ्स के सामने जन्नत की मिसाल पेश की, उस के फल खाना, उस की नहरों  से पानी पीना और उस की पाकीज़ा औरतों से मैल मिलाप रखने की तफ्सील बयान की, फिर मैं ने अपने नफ़्स को जहन्नम की तफ्सील सुनाई या’नी उस का थोहर खाना, उस की पीप पीना और उस के भारी जन्जीर और तौक़ गले में पहनने का बता कर कहा : तुझे इन दोनों में से कौन सी चीज़ पसन्द है? नफ़्स बोला मेरा इरादा है कि दुनिया में जा कर नेक अमल कर के आऊं, तब मैं ने उसे कहा कि फिलहाल तुझे मोहलत मिली हुई है, लिहाज़ा खूब नेक आ’माल कर ले।

हज़रते मालिक बिन दीनार रज़ीअल्लाहो अन्हो कहते हैं कि मैं ने हज्जाज को खिताब करते हुवे सुना, वोह कह रहा था : अल्लाह तआला उस बन्दे पर रहम फ़रमाए जिस ने अपना हिसाब दूसरे के पास जाने से पहले खुद ही अपने नफ्स का मुहासबा कर लिया, अल्लाह उस बन्दे पर रहम फ़रमाए जिस ने अपने अमल की लगाम पकड़ कर सोचा कि मैं ऐसा काम क्यूं कर रहा हूं ? अल्लाह तआला उस बन्दे पर रहम फ़रमाए जिस ने अपनी भरती को देखा, अल्लाह उस बन्दे पर रहम फ़रमाए जिस ने अपने आ’माल के मीज़ान को देखा वोह इसी तरह कहता रहा यहां तक कि मैं रो पड़ा, (लेकिन हज्जाज के मज़ालिम और सुलहा व अबरार पर उस की चीरा दस्तियों ने खुद उस को कभी अपने नफ्स के मुहासबे का मौक़अ नहीं दिया)।

हज़रते अहनफ़ बिन कैस रहमतुल्लाह अलैह के एक साथी की रिवायत है कि मैं उन के साथ रहता था, उन की रात की इबादत उमूमी तौर पर दुआओं पर मुश्तमिल होती थी और वोह चराग़ की तरफ़ आते उस की लौ में अपनी उंगली रख देते यहां तक कि उस पर आग का असर महसूस किया जाता, फिर अपने नफ़्स से मुखातब हो कर कहते : ऐ अहनफ़ ! तुझे फुलां फुलां दिन किस चीज़ ने ऐसे ऐसे काम करने पर उक्साया था, तुझे फुलां रोज़ कौन सी चीज़ ने ऐसे बुरे अमल पर आमादा किया था।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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शैतान की इन्सान से दुश्मनी और अदावत

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने इरशाद फ़रमाया : दिल में उतरने की दो जगहें हैं, एक जगह फ़रिश्ते के उतरने की वह है जो नेकी पर तम्बीह करती है और हक़ की तस्दीक की जानिब रगबत दिलाती है लिहाज़ा जो आदमी अपने अन्दर येह बात महसूस करे वो इसे अल्लाह तआला की रहमत समझे और खुदावन्द की तारीफ़ व तौसीफ़ करे, दूसरी जगह दुश्मन की है जो फ़ितना व फ़साद की जानिब मैलान पैदा करता, हक़ की तकज़ीब और नेकियों से मन्अ करता है, जो शख्स अपने दिल में येह बात महसूस करे वो अल्लाह तआला से शैताने रजीम की शरारतों से पनाह मांगे, फिर आप ने येह आयत तिलावत फ़रमाई : शैतान तुम्हें फ़क़र  का वा’दा देता है और बुरे काम करने का हुक्म देता है। हज़रते हसन बसरी रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि दो फ़िकरें  हैं जो इन्सान के दिल में गर्दिश करती रहती हैं, एक हक़ की फ़िक्र और दूसरी दुश्मनी की फ़िक्र होती है, अल्लाह तआला उस बन्दे पर रहम करे जो अपने अज़ाइम का कस्द करता है, जो काम उसे अल्लाह तआला की तरफ़ से नज़र आता है उसे पूरा करता है और जो उसे दुश्मन की तरफ़ से नज़र आता है उसे छोड़ देता है।

हज़रते जाबिर बिन उबैदा अदवी रज़ीअल्लाहो अन्हो कहते हैं : मैं ने हज़रते अला बिन ज़ियाद रज़ीअल्लाहो अन्हो से अपने दिल में पैदा होने वाले वस्वसों की शिकायत की तो उन्हों ने इरशाद फ़रमाया : दिल की मिसाल उस घर जैसी है जिस में चोरों का गुज़र होता है, अगर उस में कुछ मौजूद होता है तो वोह उसे निकाल ले जाने के बारे में सोचते हैं वरना उसे छोड़ देते हैं या’नी जो दिल ख्वाहिशात से खाली होता है उस में शैतान दाखिल नहीं होता।

फ़रमाने इलाही है : बेशक मेरे बन्दों पर तेरे लिये कोई गलबा नहीं।

लिहाज़ा हर वोह इन्सान जो ख्वाहिशात की पैरवी करता है वोह अल्लाह का नहीं बल्कि शहवत का बन्दा है इसी लिये अल्लाह तआला उस पर शैतान को मुसल्लत कर देता है, इरशादे इलाही है :

क्या तू ने उस को नहीं देखा जिस ने अपनी ख्वाहिश को मा’बूद बना लिया । इस आयत में इस अम्र की जानिब इशारा है कि जिस का मा’बूद और खुदा उस की ख्वाहिश हो वोह अल्लाह का बन्दा नहीं होता।

अलग अलग तरह के शैतान होते हैं

इसी लिये हज़रते अम्र बिन आस रज़ीअल्लाहो अन्हो ने नबिय्ये करीम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से अर्ज की : या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम शैतान मेरे और मेरी नमाज व किराअत के दरमियान हाइल हो जाता है। आप ने फ़रमाया : येह शैतान है जिसे खिन्जब कहा जाता है, तुम जब भी इस के वस्वास महसूस करो अल्लाह तआला से इस से पनाह मांगो और तीन मरतबा बाई जानिब थूक दो । रावी कहते हैं चुनान्चे, मैं ने ऐसा ही किया और अल्लाह तआला ने मुझे इस से दूर कर दिया ।

हदीस शरीफ़ में है वुजू (में नक्स पैदा करने) के लिये एक शैतान है जिस का नाम वल्हान है, अल्लाह तआला की रहमत से इस से बचने का सवाल करो। ।

दिल से शैतानी वसाविस इस सूरत में दूर हो सकते हैं कि इन्सान इन वसाविस के ख़िलाफ़ बातें सोचे या’नी जिक्रे इलाही करे क्यूंकि दिल में किसी चीज़ का ख़याल आता है तो पहले वाली चीज़ का खयाल मिट जाता है लेकिन हर उस चीज़ का ख़याल जो जाते रब्बानी और उस के फ़रामीन के इलावा हो, शैतान की जौलानगाह बन सकती है मगर ज़िक्रे खुदा ऐसी चीज़ है जिस की वज्ह से मोमिन का दिल मुतमइन हो जाता है और जान लेता है कि शैतान की ताक़त नहीं जो इस में ज़ोर आज़माई करे, चूंकि हर चीज़ का इलाज उस की ज़िद से किया जाता है, लिहाज़ा जान लीजिये कि तमाम शैतानी वसाविस की ज़िद ज़िक्रे इलाही है, शैतान से पनाह चाहना है और रिहाई पाना है और तुम्हारे इस कौल का कि मैं अल्लाह से शैताने रजीम से पनाह मांगता हूं और ला हौला वाला कुव्वता इल्ला बिल्लाहिल अलियिल अज़ीम”  का येही मन्शा है, इस मक़ाम पर वोही लोग सरफ़राज़ होते हैं जो मुत्तकी हों और ज़िक्रे खुदा जिन की रग रग में रच बस गया हो और शैतान ऐसे लोगों पर बे ख़बरी के आलम में अचानक हम्ले किया करता है, फ़रमाने इलाही है :  तहकीक वोह लोग जो परहेज़गार हैं जब उन को शैतान की तरफ़ से वस्वसा लगता है तो वोह  जिक्र करते हैं फिर अचानक वोह देखने लगते हैं। मुजाहिद रज़ीअल्लाहो अन्हो इस फ़रमाने इलाही : “खन्नास के वस्वसों के शर से”। की तफ्सीर में कहते हैं कि वोह दिल पर फैला हुवा होता है, जब इन्सान ज़िक्रे खुदा करता है तो वोह पीछे हट जाता है और सुकड़ जाता है और जब इन्सान ज़िक्र से गाफिल होता है तो वोह हस्बे साबिक़ दिल पर तसल्लुत जमा लेता है।

ज़िक्रे इलाही और शैतान के वसाविस का मुकाबला ऐसे है जैसे नूर और जुल्मत, रात और दिन और जिस तरह येह एक दूसरे की ज़िद हैं। चुनान्चे, फ़रमाने इलाही है :

। उन पर शैतान गालिब आया और उन्हें यादे – इलाही से गाफिल कर दिया। हज़रते अनस रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया कि शैतान इन्सान के दिल पर अपनी नाक लगाए हुवे है, जब इन्सान अल्लाह तआला को याद करता है तो वोह पीछे हट जाता है और जब वोह यादे इलाही से गाफ़िल हो जाता है तो शैतान उस के दिल को निगल लेता है।

इब्ने वज्जाह ने एक हदीस नक्ल की है जिस में कहा गया है कि जब आदमी चालीस साल को पहुंच जाता है और तौबा नहीं कर पाता तो शैतान उस के मुंह पर हाथ फेरता और कहता है कि मुझे अपने बाप की कसम ! येह उस का चेहरा है जो फलाह नहीं पाएगा।

शैतान इन्सान के वुजूद में खून की तरह गर्दिश करता है

और जैसे इन्सानी ख्वाहिशात व शहवात इन्सान के खून और गोश्त-पोस्त से जुदा नहीं होतीं, इसी तरह शैतान की सल्तनत भी इन्सानी दिल पर मुहीत है और इन्सान के खून और गोश्त व पोस्त पर जारी व सारी है चुनान्चे, फ़रमाने नबवी है :

शैतान इन्सान के वुजूद में खून की तरह गर्दिश करता है लिहाज़ा इस की गुज़रगाहों को भूक से बन्द करो ।

आप ने भूक का ज़िक्र इस लिये फ़रमाया है कि शहवत को ख़त्म कर देती है और शैतान के रास्ते भी शहवात हैं।

शहवाते नफ़्सानी के दिल का घेराव करने के मुतअल्लिक इरशादे इलाही है : जिस में शैतान के कौल की ख़बर दी गई है कि उस ने कहा : “फिर अलबत्ता मैं उन के पास उन के आगे से उन के पीछे से उन के दाएं से और उन की बाई तरफ़ से आऊंगा।”

इस से पहले वाली आयत में है कि शैतान ने कहा कि “मैं अलबत्ता तेरी सीधी राह पर उन के लिये बैठुंगा”

फ़रमाने नबवी है कि शैतान इन्सान के रास्तों पर बैठ गया, उस के इस्लाम के रास्ते में बैठ कर उसे कहा : क्या तू इस्लाम कबूल करता है और अपने और अपने बाप दादा के दीन को छोड़ता है मगर उस इन्सान ने उस का कहा मानने से इन्कार कर दिया और इस्लाम ले आया फिर वोह हिजरत के रास्ते में बैठ गया और बोला : क्या तू हिजरत करता है और अपने वतन को और उस के ज़मीनो आस्मान को छोड़ता है ? मगर उस इन्सान ने उस की बात मानने से इन्कार कर दिया और हिजरत कर गया फिर उस के जिहाद के रास्ते में बैठ कर बोला : क्या तू जिहाद करना चाहता है हालांकि इस में जानो माल का ज़ियाअ है, जब तू जंग में जाएगा तो कत्ल हो जाएगा और तेरी औरतों से लोग निकाह कर लेंगे, तेरा माल आपस में बांट लेंगे मगर उस बन्दए खुदा ने शैतान की बात मानने से इन्कार कर दिया और जिहाद में शरीक हुवा और हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : जिस किसी ने ऐसे किरदार का मुजाहरा किया, फिर उसे मौत आ गई तो अल्लाह तआला के ज़िम्मए करम पर होगा कि वोह उसे जन्नत में दाखिल करे ।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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मज़म्मते गीबत व चुगलखोरी का अज़ाब

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 कुरआने मजीद में अल्लाह तआला ने गीबत की मज़म्मत फ़रमाई है और गीबत करने वाले को मुर्दार का गोश्त खाने वाले की मिस्ल करार दिया है चुनान्चे, फ़रमाने इलाही है:

और तुम एक दूसरे की गीबत न करो क्या तुम में से कोई एक येह बात पसन्द करता है कि वोह अपने मुर्दा भाई का गोश्त खाए पस तुम इसे बुरा समझोगे। फ़रमाने नबवी है कि हर मुसलमान का खून, माल और इज्जत हराम है।

गीबत इज्जत को खा जाती है गीबत के बारे में हदीसे पाक

गीबत इज्जत को खा जाती है और अल्लाह तआला ने इसे माल और खून के साथ यक्जा ज़िक्र किया है।

हज़रते अबू बरज़ा रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया कि एक दूसरे पर हसद न करो, बुग्ज़ न करो, धोका न दो, पीठ पीछे बुराइयां न करो और एक दूसरे की गीबत न करो, अल्लाह तआला के बन्दो ! भाई-भाई बन जाओ।

हज़रते जाबिर और अबू सईद रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया कि गीबत से बचो क्यूंकि गीबत ज़िना से भी बुरी है इस लिये कि आदमी ज़िना करता है और तौबा करता है तो अल्लाह तआला उस की तौबा क़बूल फ़रमा लेता है मगर गीबत करने वाले की तौबा उस वक्त तक क़बूल नहीं होती जब तक कि वो शख्स मुआफ़ न करे जिस की गीबत की गई है।

हज़रते अनस रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया कि मे’राज की रात मेरा ऐसी कौम पर से गुज़र हुवा जो अपने चेहरे नाखुनों से नोच रहे थे, मैं ने कहा : जिब्रील ! येह कौन हैं ? जिब्रील ने कहा : येह वोह लोग हैं कि जो लोगों की गीबत करते हैं और उन की इज्जत को पामाल करते हैं।

हज़रते सुलैमान बिन जाबिर रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि मैं ने हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की ख़िदमत में हाज़िर हो कर अर्ज किया : मुझे ऐसा भला काम बतलाइये जिस से मैं नफ्अ अन्दोज़ हो सकूँ, आप ने फ़रमाया कि भलाई के किसी काम को हक़ीर न समझ अगरचे  तुझे अपने डोल का पानी प्यासे के डोल में ही डालना पड़े और तेरा भाई तुझ से गर्म जोशी से मिले या तुझ से मुंह मोड़ ले, तू उस की गीबत न कर ।

हज़रते बरा रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने हमें खिताब फ़रमाया जिसे पर्दा नशीन औरतों ने अपने घरों में सुना, आप ने फ़रमाया : ऐ वोह लोगो ! जो ज़बान से ईमान लाए हो मगर दिलों में ईमान नहीं रखते हो ! मुसलमानों की गीबत न करो और इन की रुस्वाई की जुस्तजू में न रहो क्यूंकि जो किसी भाई की रुस्वाई के दरपे होता है, अल्लाह तआला उस की रुस्वाई के दरपे होता है और अल्लाह तआला जिस की रुस्वाई के दरपे होता है उसे उस के घर में बे इज्जत और रुस्वा कर देता है ।

कहा गया है कि अल्लाह तआला ने हज़रते मूसा अलैहहिस्सलाम  की तरफ़ वही फ़रमाई कि जो गीबत से ताइब हो कर मरा वोह आखिरी शख्स होगा जो जन्नत में जाएगा और जो ग़ीबत करते करते मर गया वोह पहला शख्स होगा जो जहन्नम में जाएगा।

लोगो का गोश्त खाना

हज़रते अनस रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने लोगों को एक दिन के रोजे का हुक्म दिया और फ़रमाया कि मेरी इजाज़त के बिगैर कोई भी रोजा इफ़तार न करे, यहां तक कि जब शाम हो गई तो लोग आना शुरूअ हुवे और हर शख्स हाज़िर हो कर अर्ज करता : या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम मैं ने दिन में रोज़ा रखा मुझे इजाज़त दीजिये कि मैं इसे इफ़तार करू, आप उसे इजाज़त फ़रमा देते । इसी तरह लोग आते गए और इजाज़त लेते गए ता आंकि एक आदमी ने आ कर अर्ज की : या रसूलल्लाह ! मेरे घर की दो जवान औरतों ने रोज़ा रखा है और वोह आप की ख़िदमत में आते हुवे शरमाती हैं, इजाज़त दीजिये ताकि वोह रोजा इफ़तार करें। हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने मुंह फेर लिया, उस ने फिर अर्ज़ किया : आप ने फिर मुंह फेर लिया, उस ने फिर अर्ज़ की तो आप ने फ़रमाया : उन्हों ने रोज़ा नहीं रखा वोह शख्स कैसे रोज़ादार हो सकता है जिस का दिन लोगों का गोश्त खाते गुज़र जाए तुम जाओ और उन्हें जा कर कहो कि अगर तुम रोज़ादार हो तो किसी तरह उलटी करो चुनान्चे, वोह उन के पास गया और उन्हें सारी बात बता कर उलटी करने को कहा। उन्हों ने उलटी की और हर एक ने खून के लोथड़े की उलटी की, वोह शख्स हुजूर की खिदमत में हाज़िर हुवा और सारी रू दाद सुनाई, आप ने उस की बात सुन कर फ़रमाया : ब ख़ुदा ! अगर येह चीज़ उन के पेट में मौजूद रहती तो उन्हें आग जलाती।

एक रिवायत के अल्फ़ाज़ येह हैं कि जब हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने उस से मुंह फेर लिया तो वोह कुछ देर बाद दोबारा हाज़िर हुवा और अर्ज की : या रसूलल्लाह ! वोह दोनों मर चुकी हैं या मरने के करीब हैं, हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : उन्हें मेरे पास लाओ, जब वोह आ गई तो आप ने प्याला मंगवा कर उन में से हर एक से फ़रमाया कि इस में कै करो चुनान्चे, एक ने पीप, खून और बदबू दार मवाद से प्याला भर दिया, फिर आप ने दूसरी से भी कै करने को कहा तो उस ने भी वैसी ही कै की। आप ने फ़रमाया : इन दोनों ने अल्लाह के हलाल कर्दा रिज्क से रोज़ा रखा और अल्लाह तआला की हराम कर्दा अश्या से इफ्तार किया, इन में से एक, दूसरी के पास जा बैठी और येह दोनों मिल कर लोगों का गोश्त खाती रहीं (या’नी गीबत करती रहीं)।

 

हज़रते अनस रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने हम से खिताब फ़रमाया और उस में सूद की बुराइयों और कबाहतों का ज़िक्र करते हुवे फ़रमाया कि एक सूदी दिरहम इन्सान के तेंतीस मरतबा ज़िना करने से बदतर है और सब से बड़ा सूद किसी मुसलमान की इज्जत पर डाका डालना है।

चुगुल खोरी येह एक इन्तिहाई बुरी सिफ़त है, फ़रमाने इलाही है : “गीबत करने वाला लोगों के साथ चुगली करने वाला है।”

फिर फ़रमाया : “मुतकब्बिर और इस के बाद बद नसीब ।”

हज़रते अब्दुल्लाह बिन मुबारक रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि ‘ज़नीम’ ऐसे वलदुज्जिना को कहते हैं जो बातें पोशीदा नहीं रखता और इन्हों ने इस जानिब इशारा किया है कि जो शख़्स बात मख्फी नहीं रखता और चुगुल खोरी करता है उस का येह फेल इस अम्र पर दलालत करता है कि वोह वलदुज्जिना है क्यूंकि फ़रमाने इलाही में इसी जानिब इशारा मिलता है : “गर्दन अकड़ा कर चलने वाला और इस के बाद वलदुज्जिना।” यहां ज़नीम से मुराद झूटे नसब का मुद्दई है।

और फ़रमाने इलाही है : वैल (हलाकत) है हर गीबत करने वाले हुमज़ह के लिये। एक तशरीह के मुताबिक़ हुमज़ह का मा’ना चुगुल खोर बताया गया है।

और इरशादे इलाही है : “जो लकड़ियों को उठाने वाली है।” कहते हैं कि यहां लकड़ियों से मुराद चुगलियां हैं क्यूंकि वोह बातें उठाए चुगलियां करती रहती थी।

एक और मक़ाम पर इरशादे इलाही है:

“पस उन दो औरतों ने उन की खियानत की और उन्हों ने अल्लाह की तरफ़ उन दोनों की किफ़ायत न की।”

कहते हैं कि इस आयत में दो औरतों का तजकिरा है : एक हज़रते लूत अलैहहिस्सलाम  की बीवी जो कौम को हज़रते लूत अलैहहिस्सलाम  के मेहमानों से ख़बरदार किया करती थी और नूह अलैहहिस्सलाम  की बीवी जो आप को मखबूतुल हवास कहा करती थी।

फ़रमाने नबवी है कि चुगुल ख़ोर जन्नत में नहीं जाएगा। दूसरी हदीस में है कि कत्तात जन्नत में नहीं जाएगा। कत्तात चुगुल खोर को कहते हैं।

हज़रते अबू हुरैरा रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया कि तुम में से अल्लाह तआला को सब से ज़ियादा महबूब वोह लोग हैं जो दुनिया में रहते हैं, वोह लोगों से महब्बत करते हैं और लोग उन्हें महबूब समझते हैं और अल्लाह तआला के यहां सब से बद तरीन वोह लोग हैं जो चुगुल खोरियां करते हैं, भाइयों को बाहम लड़ाते हैं और नेकों की लगजिशों के ख्वाहां होते हैं।

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : क्या मैं तुम्हें बद तरीन आदमियों के मुतअल्लिक न बताऊं ? सहाबा ने अर्ज की : बतलाइये या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम आप ने फ़रमाया : वोह चुगुल खोरी करने वाले, दोस्तों में फ़साद बरपा करने वाले और सालेह लोगों पर झूटी तोहमतें लगाने वाले हैं। (या’नी बद तरीन लोग येह हैं)।

हज़रते अबू ज़र रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : जो शख्स नाहक़ किसी मुसलमान के मुतअल्लिक झूटी बात फैलाता है कि उसे ज़लीलो रुस्वा करे तो अल्लाह तआला उसे कियामत के दिन जहन्नम में ज़लीलो रुस्वा करेगा।)

हज़रते अबुदरदा रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम  ने फ़रमाया : जो शख्स मुसलमान के लिये किसी ऐसी बात को फैलाता है जो बिल्कुल गलत हो और वोह इस से उस मुसलमान को दुनिया में रुस्वा करना चाहता है, अल्लाह तआला को हक़ है कि वोह उसे कियामत के दिन जहन्नम में रुस्वा करे ।

हज़रते अबू हुरैरा रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : जो किसी मुसलमान पर झूटी गवाही देता है वोह अपना ठिकाना जहन्नम में समझे ।

और येह भी कहा गया है कि क़ब्र में एक तिहाई अज़ाब सिर्फ चुगुल ख़ोरी की बदौलत होता है ।

हज़रते इब्ने उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया कि जब अल्लाह तआला ने जन्नत को पैदा फ़रमाया तो उसे हुक्म दिया कि मुझ से बात कर, वोह बोली कि जो मेरे अन्दर आ गया वोह सआदत मन्द हुवा, तब रब्बे जब्बार  ने फ़रमाया मुझे अपनी इज्जतो जलाल की कसम ! मैं तेरे अन्दर आठ किस्म के लोग दाखिल नहीं करूंगा, आदी शराबी, ज़ानी, चुगुल खोर, बे गैरत, रज़ील, हीजड़ा,कतए रेहमी करने वाला और वोह शख्स जो येह कहता है : मेरा खुदा से अह्द है कि फुलां फुलां बुरा अमल नहीं करूंगा मगर येह वादा पूरा नहीं करता।।

हिकायत – चुगलखोर की वजह से बारिश का ना होना

हज़रते का’ब अहबार रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि एक मरतबा बनी इस्राईल कहत में मुब्तला हो गए, मूसा अलैहहिस्सलाम  ने मुतअद्दिद बार बारिश की दुआ की मगर बारिश न हुई, तब अल्लाह तआला ने मूसा अलैहहिस्सलाम  की तरफ़ वहयी  फ़रमाई कि मैं तेरी और तेरे साथियों की दुआ कैसे क़बूल करूं ? हालांकि तुम में आदी चुगुल खोर मौजूद है ! हज़रते मूसा अलैहहिस्सलाम  ने अर्ज की : या इलाही ! मुझे वोह चुगुल खोर बता ताकि मैं उसे (अपनी जमाअत से) बाहर निकाल दूं ! रब तआला ने फ़रमाया ऐ मूसा ! मैं तुम्हें चुगुल खोरी से मन्अ कर रहा हूं और फिर खुद चुगुल खोरी करूं ? लिहाज़ा उन सब ने तौबा की और बारिश बरसने लगी।

और कहा गया है कि किसी आदमी ने सात सो फ़रसख का तवील सफ़र कर के एक दाना की मजलिस में हाज़िरी दी और उसे कहा कि मैं इतनी तवील मसाफ़त तै कर के आप से सात बातें पूछने आया हूं, अल्लाह तआला ने आप को इल्म दिया है, मुझे येह बतलाइये कि आस्मान से भारी चीज़ क्या है ? ज़मीन से फ़राख चीज़ क्या है ? चट्टान से सख्त चीज़, आग से गर्म चीज़, जमहरीर से भी ठन्डी चीज़, समन्दर से भी ज़ियादा बे नियाज़, यतीम से भी ज़ियादा ख्वार चीज़ क्या है ? उस दाना ने जवाब दिया कि पाक दामन पर बोहतान आस्मान से भी भारी है, हक़ ज़मीन से ज़ियादा फ़राख है, कनाअत पसन्द दिल समन्दर से ज़ियादा बे नियाज़ है, हिर्स और हसद आग से ज़ियादा गर्म हैं, किसी अज़ीज़ से काम, जब कि वोह पूरा न करे ज़महरीर से ज़ियादा सर्द है, काफ़िर का दिल चट्टान से ज़ियादा सख्त और चुगुल खोर, जब उस का किरदार ज़ाहिर हो जाए यतीम से भी ज़ियादा ज़लीलो रुस्वा होता है। किसी शाइर ने क्या खूब कहा है :

जो चुगुल खोर लोगों में चुगुल खोरियां करता है तो उस के दोस्त को भी उस के सांपों और बिच्छूओं से बे ख़ौफ़ न समझ (या’नी वोह दोस्तों की भी चुगलियां करेगा) रात को आने वाले सैलाब की तरह जिस के मुतअल्लिक़ कोई नहीं जानता कि कहां से आया है और किस किस तक पहुंचा है।उस के वादा के लिये हलाकत है वोह उसे कैसे पूरा करेगा और उस की दोस्ती के लिये हलाकत है, वोह कैसे इस की नफ़ी करेगा।

दूसरा शाइर कहता है :

वोह चुगुल खोर जिस तरह तेरी हिमायत करता है इसी तरह तेरी बुराइयां भी बयान करेगा दो चेहरों वाले के मक्रो फ़रेब से गाफ़िल न हो।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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तारीफे ईमान व ज़म्मे मुनाफ़क़त

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 

जान लीजिये कि ईमान अल्लाह तआला की वहदानिय्यत की तस्दीक़ और रसूलों के लाए हुवे अहकामात की ताईद व तस्दीक और आ’माल के मजमूए का नाम है, फ़रमाने इलाही है :

ईमानदार लोग वोही हैं जो अल्लाह और उस के रसूल पर ईमान लाए फिर उन्हों ने शक नहीं किया और राहे खुदा में अपने मालों और जानों के साथ जिहाद किया येही लोग सच्चे हैं। दूसरी आयत में इरशाद है :

लेकिन भलाई उस के लिये है जो अल्लाह और कयामत के दिन और फ़रिश्तों और किताबों और नबियों पर ईमान लाया। इसी तरह अल्लाह तआला ने बीस सिफ़ात मसलन वादा पूरा करना, मसाइब पर सब्र करना वगैरा, ईमाने कामिल की शर्ते रखी हैं,

फिर इरशाद फ़रमाया : “येही लोग हैं जिन्हों ने सच किया।” एक और आयत में फ़रमाने इलाही है :

“अल्लाह तआला उन लोगों को बुलन्द करेगा जो तुम में से ईमान लाए और जिन को इल्म दिया गया है उन्हें दरजात ।”

एक और मकाम पर इरशादे इलाही है:

“नहीं बराबर तुम में से वोह शख्स कि जिस ने फ़तहे मक्का से पहले खर्च किया और लड़ाई की।”

फ़रमाने इलाही है : “येह लोग अल्लाह तआला के नज़दीक मरातिब पर फ़ाइज़ हैं।” फ़रमाने नबवी है कि ईमान बरहना है और इस का लिबास तकवा है।

और इरशाद फ़रमाया कि ईमान के कुछ ऊपर सत्तर दरजे हैं और कम तरीन दरजा रास्ते से तक्लीफ़ देह चीज़ को दूर करना है।

मुनाफ़िक कौन होता है ?

येही हदीस इस अम्र पर दलालत करती है कि कामिल ईमान अमल से मशरूत व मरबूत है और ईमान का निफ़ाक़ से बराअत और शिर्के खफ़ी से अलाहिदगी पर मरबूत होना हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम के इस फ़रमान से साबित है, इरशाद होता है चार चीजें जिस में हों वोह नमाज़ी व रोज़ादार होने के बा वुजूद ख़ालिस मुनाफ़िक़ है अगर्चे वोह खुद को मोमिन ही समझता रहे, जब वोह बात करे तो झूट बोले वा’दा कर के वादा ख़िलाफ़ी करे, उस के यहां अमानत रखी जाए तो खियानत करे और जब झगड़ा करे तो बेहूदापन पर उतर आए।

बा’ज़ रिवायतों में है कि जब मुआहदा करे तो उसे तोड़ डाले ।

हज़रते अबू सईद खुदरी रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी हदीस में है : दिल चार हैं : दुन्यावी ख्वाहिशात से मुनज्जा दिल जिस में मा’रिफ़त का चराग रोशन है और येही मोमिन का दिल है। ऐसा दिल जिस में ईमान और निफ़ाक़ दोनों हों ऐसे दिल में ईमान सब्जे की तरह है जो मीठे पानी से नश्वो नुमा पाता है और निफ़ाक़ ऐसे ज़ख्म की तरह है जो पीप और गन्दे खून से फैलता जाता है, इन में से जो चीज़ गालिब आ जाती है दिल पर उसी का हुक्म चलता है।

दूसरी रिवायत के अल्फ़ाज़ हैं कि जो इन में से गालिब हो जाता है वोह दूसरे को ले जाता है । फ़रमाने नबवी है कि मेरी उम्मत के अक्सर मुनाफ़िक कारी हैं।

एक हदीस में है कि मेरी उम्मत में शिर्क, सफा पहाड़ पर चलने वाली च्यूटी से भी ज़ियादा पोशीदा है ।

हज़रते हुजैफ़ा सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम फ़रमाया करते थे कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम के अहदे मुबारक में आदमी एक बात ऐसी करता था जिस के सबब मरते वक़्त तक वोह मुनाफ़िक हो जाता था और मैं तुम से वैसी दस बातें रोज़ाना सुनता हूं।

बा’ज़ उलमा का कहना है कि वोह शख्स निफ़ाक़ से बहुत करीब है जो खुद को निफ़ाक़ से बरी समझता है।

हज़रते हुजैफ़ा रज़ीअल्लाहो अन्हो फ़रमाते हैं कि आज हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम के अहदे मुबारक से ज़ियादा मुनाफ़िक़ हैं तब मुनाफ़िक़ अपना निफ़ाक़ पोशीदा रखते थे और अब ज़ाहिर करते हैं, येही निफ़ाक़ कमाले ईमानी और सिद्के ईमान की ज़िद है क्यूंकि येह पोशीदा है, जो इस से खौफ़ज़दा होता है वोह इस से दूर होता है और इस से करीब वोही होता है जो खुद को इस से बरी समझता है चुनान्चे, हज़रते हसन रज़ीअल्लाहो अन्हो से कहा गया कि लोग कहते हैं : आज निफ़ाक़ बाकी नहीं रहा है, आप ने फ़रमाया : ऐ भाई ! अगर मुनाफ़िक हलाक हो जाएं तो तुम रास्तों पर वहशत ज़दा हो जाओ और आप ने या किसी और ने कहा कि अगर मुनाफ़िकों के खुर पैदा हो जाएं तो हम जमीन पर क़दमों से न चल पाएं (इन की कसरत के बाइस राह चलना दुश्वार हो जाए)।।

दिल में निफ़ाक़ और मुनाफ़िक

हज़रते इब्ने उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो ने एक आदमी को हज्जाज को बुरा भला कहते सुन कर फ़रमाया कि अगर हज्जाज मौजूद होता तो तुम येह बातें करते ? उस ने कहा : नहीं ! आप ने येह सुन कर फ़रमाया कि हम इस चीज़ को हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम के ज़माने में निफ़ाक़ में शुमार करते थे।

नबिय्ये करीम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम फ़रमाते हैं कि जो शख्स दुन्या में दो ज़बानों वाला होता है आख़िरत में अल्लाह तआला उसे दो ज़बानों वाला बनाएगा, मजीद फ़रमाया : बदतरीन आदमी दो चेहरों वाला है जो इस के पास एक चेहरे से और दूसरे के पास दूसरे चेहरे से जाता है (या’नी मुनाफ़क़त करता है)।

हज़रते हसन बसरी रज़ीअल्लाहो अन्हो से कहा गया : कुछ लोग कहते हैं कि आप को निफ़ाक़ का ख़ौफ़ नहीं है ? आप ने फ़रमाया : ब खुदा ! मुझे ज़मीन की हर बुलन्दी के बराबर सोने के मालिक होने से येह बात ज़ियादा पसन्द है कि मुझे मालूम हो जाए कि मैं निफ़ाक़ से बरी हूं।

हज़रते हसन रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है : निफ़ाक़ की वज्ह से ज़बान और दिल मुख्तलिफ़ होते हैं, पोशीदा और जाहिर का इख़्तिलाफ़ होता है और आने जाने में फ़र्क होता है, दाखिल होने का रास्ता और, और निकलने का और होता है। किसी ने हज़रते हुजैफ़ा रज़ीअल्लाहो अन्हो से कहा कि मैं निफ़ाक़ से डरता हूं, आप ने फ़रमाया : अगर तुम मुनाफ़िक होते तो तुम्हें निफ़ाक़ का ख़ौफ़ न होता क्यूंकि मुनाफ़िक निफ़ाक़ से बे परवा होता है।

हज़रते इब्ने अबी मुलैका रज़ीअल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि मैं ने एक सो तीस और एक रिवायत में एक सो पचास सहाबए किराम को पाया है जो सब के सब निफ़ाक़ से डरते थे।

मरवी है : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम सहाबा की एक जमाअत में तशरीफ़ फ़रमा थे, सहाबए किराम ने एक आदमी का तजकिरा किया और उस की बहुत ज़ियादा तारीफ़ की, सब हज़रात इसी तरह तशरीफ़ फ़रमा थे कि वोह शख्स आया उस के चेहरे से वुजू का पानी टपक रहा था, जूता उस के हाथ में था और उस की आंखों के दरमियान सजदों का निशान था, सहाबए किराम ने अर्ज की : या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम येह वोही शख्स है जिस की हम ने आप के सामने तारीफ़ की है, हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : मुझे इस के चेहरे पर शैतान का असर नज़र आता है। वोह आदमी आ कर सहाबा के साथ बैठ गया और हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम को सलाम किया। आप ने उसे देख कर फ़रमाया : मैं तुझे अल्लाह की कसम देता हूं, बता कि जब तू ने इन लोगों को देखा तो तेरे दिल में येह ख़याल आया था कि तू इन से अच्छा है ? वोह बोला : ऐ अल्लाह के रसूल ! हां, तब आप ने अपनी दुआ में फ़रमाया : ऐ अल्लाह ! मैं तुझ से हर उस बात से जिसे जानता हूं या नहीं जानता, बख्रिशश तलब करता हूं। अर्ज किया गया : या रसूलल्लाह ! आप भी ख़ौफ़ज़दा हैं ? आप ने फ़रमाया : मैं कैसे बे खौफ़ हो जाऊं हालांकि मख्लूक के दिल अल्लाह तआला की दो उंगलियों के दरमियान हैं, वोह जैसे चाहता है उन्हें फेरता रहता है।

फ़रमाने खुदाए बुजुर्ग व बरतर है :

और ज़ाहिर हो जाएगा उन के वासिते अल्लाह

की तरफ़ से जिस को वोह गुमान नहीं करते थे। इस की तफ्सीर में कहा गया है कि उन्हों ने ऐसे आ’माल किये जिन्हें वोह अपने गुमान के ब मूजिब नेकियां समझते थे मगर वोह गुनाहों के पलड़े में जा पड़े।

हज़रते सिरी सकती रहमतुल्लाह अलैह  क़ौल है कि अगर कोई इन्सान ऐसे बाग में जाए जिस में हर किस्म के दरख्त हों और उन दरख्तों पर हर किस्म के परन्दे हों जो उसे देख कर यक ज़बान हो कर कहें : “ऐ अल्लाह के वली ! तुझ पर सलाम हो” और उस का दिल येह बात सुन कर मुतमइन हो जाए तो गोया वोह उन परिन्दों का असीर है।

येह तमाम अक्वाल व अहादीस तुझे उन खतरात से रू शनास कराएंगे जो पोशीदा निफ़ाक़ और शिर्के खफ़ी पर मुन्तहा होते हैं और कोई भी अक्लमन्द इस से गाफ़िल नहीं रहता यहां तक कि हज़रते उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो हज़रते हुजैफ़ा रज़ीअल्लाहो अन्हो से अपने मुतअल्लिक़ पूछा करते । (येह रिवायत पहले भी गुज़र चुकी है)।

हज़रते सुलैमान दारानी रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि मैं ने एक अमीर से ऐसी बात सुनी जो मुझे ना गवार गुज़री और मैं ने उसे टोकने का इरादा किया मगर मुझे अन्देशा हुवा कि कहीं येह मुझे कत्ल करने का हुक्म न दे दे, मैं मौत से नहीं बल्कि इस बात से डरा कि क़त्ल के वक़्त लोगों के सामने मेरे दिल में येह बात न आ जाए कि मैं ने कैसा उम्दा काम किया है लिहाज़ा मैं उसे टोकने से रुक गया।

येह निफ़ाक़ की वोह किस्म है जो ईमान की अस्ल के नहीं बल्कि इस की सफ़ाई, कमाल, हक़ीक़त और सिद्क़ के ख़िलाफ़ है। निफ़ाक़ की दो किस्में हैं : एक किस्म वोह है जो दीन से निकाल कर काफ़िरों में शामिल कर देती है और उन लोगों के साथ मुन्सलिक कर देती है जो हमेशा हमेशा के लिये जहन्नम में रहेंगे, दूसरी किस्म वोह है जो अपने रखने वाले को कुछ मुद्दत जहन्नम में पहुंचाएगी या उस के बुलन्द मरातिब को कम कर देगी और उसे सिद्दीकों के बुलन्द तरीन मक़ाम से नीचे गिरा देगी।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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रियाजत व फजीलते असहाबे करामत

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 

यह बात अच्छी तरह जेह्न नशीन कर लेनी चाहिये कि अल्लाह तआला जब किसी बन्दे की भलाई चाहता है तो वोह बन्दा अपने उयूब पर निगाह डालता है, जिस की बसीरत कामिल हो जाती है उस से कोई गुनाह पोशीदा नहीं रहता लिहाज़ा वोह जूही अपने उयूब पर मुत्तल होता है उस के लिये इन का इलाज मुमकिन हो जाता है लेकिन अक्सर जाहिल अपने उयूब से ना वाकिफ़ होते हैं, वोह दूसरे की आंख का तिन्का तो देख लेते हैं मगर उन्हें अपनी आंख का शहतीर नज़र नहीं आता, जो शख्स अपने उयूब पर मुत्तलअ होना चाहे उस के लिये चार तरीके हैं :

अपने एब दूर करने के तरीके

पहला तरीका : ऐसे शैखे कामिल की सोहबत इख़्तियार करे जो अपने उयूब का आश्ना हो और पोशीदा नफ़्सानी ख्वाहिशात खबासतों से कमा हक्कुहू वाकिफ़ हो, वोह उसे अपने नफ्स का हाकिम बनाए, इबादात में उस के इशारों पर चले, येही कुछ मुरीद को शैख के हुक्म पर और शागिर्द को उस्ताद के हुक्म पर करना चाहिये ताकि उस का शैख और उस्ताद उस के बातिनी उयूब और इन के इलाज की तश्खीस कर सकें, हमारे ज़माने में इस तरीके की बहुत इज्जत है।

दूसरा तरीका : ऐसे दोस्त का हम मजलिस बने जो सादिक़, साहिबे बसीरत और दीनदार हो, आदमी उसे अपने नफ्स का निगहबान बनाए ताकि वोह दोस्त उस के अहवाल व अफआल पर नज़र रखे और इन में से जो आदत और जाहिरी व बातिनी ऐब नज़र आए वोह उसे उस पर तम्बीह करे । अक्लमन्द और अकाबिर उलमाए दीन का येही तरीक़ था, हज़रते उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो फ़रमाया करते थे कि अल्लाह तआला उस जवान पर रहम फ़रमाए जो मुझे मेरे उयूब पर मुत्तल करे और आप हज़रते सलमान रज़ीअल्लाहो अन्हो से अपने उयूब पूछा करते थे, वोह जब भी आते आप उन से फ़रमाते क्या आप ने मेरे अन्दर कोई ऐसी चीज़ पाई है जिसे आप बुरा समझते हों ? हज़रते सलमान रज़ीअल्लाहो अन्हो ने मा’ज़िरत चाही मगर हज़रते उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो ने जब बहुत इस्रार किया तो उन्हों ने कहा : मुझे मालूम हुवा है कि तुम एक दस्तर ख्वान पर दो सालन जम्अ करते हो और तुम्हारा रात और दिन का अलाहिदा अलाहिदा लिबास है, हज़रते उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया क्या आप ने इस के सिवा कोई और बात भी सुनी है? उन्हों ने कहा : नहीं ! तब आप ने फ़रमाया कि मैं ने इन को तर्क किया। और हज़रते हुजैफ़ा रज़ीअल्लाहो अन्हो से फ़रमाया करते (आप मुनाफ़िकों के बारे में नबिय्ये करीम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम के राज़दान थे) फ़रमाइये ! कहीं मेरे अन्दर आप को मुनाफ़क़त की अलामतें तो नज़र नहीं आई ? आप अपने जलीलुल क़द्र और अज़ीमुश्शान मर्तबे के बा वुजूद अपने नफ़्स की देख भाल और सरज़निश से गाफ़िल न होते।

जिस किसी में अक्ल वाफ़िर और बुलन्द होती है वोह तकब्बुर से किनारा कशी कर लेता है और अपने नफ्स की सरज़निश से गाफ़िल नहीं होता और इसी वज्ह से वोह बुलन्द मरातिब पर सरफ़राज़ हुवा।

ऐसे शख्स को दोस्त न रखो जो चश्मपोशी से काम लेते हुवे तुम्हें तुम्हारे उयूब न बतलाए और एक मुकर्रर हद से बढ़ने की कोशिश न करते हुवे तुम्हें अपने मुतअल्लिक अन्धेरे में रखे, नीज़ ऐसे लोगों को दोस्त बनाओ जो हासिद और मतलब परस्त हों ताकि वोह तुम्हारी नेकियां भी ऐबों की सूरत में दिखाएं और तुम उन से सबक़ हासिल करो और ऐसे चश्मपोशी करने वाले दोस्त से बचो जो तुम्हारी बुराइयों को खूबियां कहे।

इसी लिये कहते हैं कि जब हज़रते दावूद ताई अलैहहिस्सलाम  ने लोगों से उजलत नशीनी इख्तियार फ़रमाई तो किसी ने पूछा आप लोगों से मेल जोल क्यूं नहीं रखते ? आप ने फ़रमाया : मैं ऐसी कौम से कैसे तअल्लुकात रखू जो मुझ से ऐब छुपाते हैं।

दीनदार लोग इब्तिदाए हाल ही से इस बात के मुतमन्नी होते थे कि लोग उन्हें उन के उयूब पर मुत्तुलअ करें और वोह अपनी इस्लाह कर लें लेकिन हमारी हालत येह है कि जो हमें नसीहत करता है और हमें हमारे उयूब बताता है, हम उसे अपना सब से बड़ा दुश्मन समझते हैं और येही बात इन्सान के ईमान को कमजोर कर देती है क्यूंकि बुरी आदतें सांप बिच्छू की तरह डसने वाली हैं, अगर हम से कोई शख्स येह कह दे कि तुम्हारे कपड़ों में बिच्छू है तो हम उस के एहसान मन्द होते हैं, उस का शुक्रिय्या अदा करते हैं, बिच्छू से बचाव की सूरत और उसे मारने की तदबीर करने लगते हैं हालांकि इस की तकलीफ़ सिर्फ बदन महसूस करता है और एक दो दिन से ज़ियादा इस का दुख भी बाकी नहीं रहता मगर बुरे खसाइल की तक्लीफ़ दिल की गहराइयों में महसूस की जाती है और मुझे अन्देशा है कि येह दुख मौत के बाद भी बाकी रहेगा, अगर हमेशा बाक़ी न रहा तब भी हज़ारों बरस इस की पादाश में दुख दर्द झेलने पड़ेंगे।

दूसरी बात येह है कि हम बजाए इस के कि नासेह की नसीहत सुन कर अपने इन उयूब के इज़ाले की फ़िक्र करें, अपने मोहसिन का शुक्रिय्या अदा करें, उलटा उस के मुकाबले में उतर आते हैं और उस की बातों के जवाब में यूं कहते हैं कि तुम भी ऐसा ऐसा काम कर चुके हो हमें उस की दुश्मनी सच्ची बातों पर अमल करने से रोक देती है और येह सब कुछ दिल की सख्ती का नतीजा होता है जो कसरते गुनाह से पथ्थर से भी ज़ियादा सख्त हो जाता है, इन का मम्बअ व मर्कज़ ईमान की कमजोरी है लिहाज़ा हम अल्लाह तआला से दुआ करते हैं कि ऐ रब्बे जुल जलाल ! हमें राहे रास्त पर चलने की तौफ़ीक़ दे, हमें अपने ऐब देखने, इन का इलाज करने की हिम्मत दे और हमें अपनी रहमत के तुफैल हर शख्स का शुक्रिय्या अदा करने की तौफ़ीक़ दे, जो हमें हमारे ऐबों पर मुत्तल करे ।

तीसरा तरीका : अपने दुश्मनों से अपने उयूब सुने क्यूंकि दुश्मन की आंख हर ऐब को जाहिर कर देती है, अक्लमन्द इन्सान कीना परवर दुश्मन से अपने उयूब सुन कर ऐसे चश्मपोशी करने वाले दोस्त से ज़ियादा नफ्अ हासिल कर सकता है जो उस की तारीफ़ो तौसीफ़ करता रहता है और उस के ऐब छुपाता रहता है मगर मुसीबत येह है कि इन्सानी तबाएअ दुश्मन की बात को झूट और हसद पर मन्नी खयाल करती हैं लेकिन अक्लमन्द दुश्मनों की बातों से भी सबक सीखते हैं और अपने उयूब की तलाफ़ी करते हैं कि आख़िर कोई ऐब तो ज़रूर है जो उस के दुश्मनों की निगाह में है।

चौथा तरीका : लोगों से घुल मिल जाए, उन का जो फेल उसे अच्छा लगे उसे अपनाए और जो फ़े’ल उसे बुरा लगे उस में गौरो फ़िक्र करे कि कहीं ऐसा तो नहीं कि उसे अपने उयूब दूसरे के आईने में नज़र आ रहे हैं क्यूंकि मोमिन मोमिन का आईना होता है लिहाज़ा दूसरों के उयूब के आईने में अपने ऐब तलाश करे और वोह जानता है कि नफ्सानी ख्वाहिश में तबीयतें एक दूसरे के करीब हैं, जो चीज़ एक ज़माने के लोगों में होगी वोह दूसरे जमाने के लोगों में भी होगी लिहाज़ा इसे अपने नफ्स में तलाश करना चाहिये और अपने नफ्स को बुरी चीज़ों से पाक करना चाहिये। मैं समझता हूं कि अदब सिखाने के लिये येह गुर काफ़ी है, अगर लोग उन तमाम चीज़ों को तर्क कर दें जिन को वोह दूसरों से महबूब समझते हैं तो उन्हें किसी दूसरे अदब के सिखाने की ज़रूरत ही न पड़े।

खुद की इस्लाह करना

हज़रते ईसा अलैहहिस्सलाम  से पूछा गया कि आप को अदब किस ने सिखाया ? आप ने फ़रमाया मुझे किसी ने अदब नहीं सिखाया बल्कि मैं ने जाहिल की जहालत को बुरा समझते हुवे उस से किनारा कशी इख़्तियार कर ली।

मजकूरए बाला तमाम तरीके उन लोगों के लिये हैं जिसे शैखे कामिल, अक्लमन्द, साहिबे बसीरत, उयूबे नफ्स पर इन्तिहाई मुश्फिकाना तरीके से नसीहत करने वाला, दीन के मुआमलात को समझाने वाला, अपने नफ़्स की तक्मीले इस्लाह करने वाला और बन्दगाने खुदा की इस्लाह का बीड़ा उठाने वाला रहबर न मिले, जिस ने ऐसे शैखे कामिल को पा लिया उस ने तबीबे हाज़िक को.पा लिया लिहाज़ा उसे उस की सोहबत लाज़िम करनी चाहिये क्यूंकि येही वोह शख्सिय्यत है जो उसे उस की बीमारी से नजात दिलाएगी और इस मोहलिक मरज़ से नजात देगी जो उसे ब तदरीज हलाकत की तरफ़ ले जा रही है।

समझ लो कि हम ने जो कुछ जिक्र किया है अगर तुम इसे इब्रत की निगाह से देखो तो तुम्हारी बसीरत कमाल पर पहुंचेगी और इल्म व यक़ीन की वज्ह से तुम पर दिल की तमाम बीमारियां, तक्लीफें और इन के इलाज ज़ाहिर हो जाएंगे, अगर तुम इस दरजए कमाल को न पा सके तब भी ज़रूरी है कि तुम्हारा ईमान और तस्दीके कल्बी फ़ौत न होने पाए और हर उस शख्स की तक्लीद करो जो काबिले तक्लीद हो क्यूंकि इल्म की तरह ईमान के भी दरजात हैं और इल्म ईमान के बाद हासिल होता है चुनान्चे, फ़रमाने इलाही है : अल्लाह तआला उन लोगों को जो तुम में से ईमान लाए बुलन्द मर्तबा देगा और जिन्हें इल्म दिया गया है उन्हें दरजात दिये जाएंगे। लिहाज़ा जिस शख्स ने येह जान लिया कि नफ्स व शहवाते नफ़्सानी की मुखालफ़त ही अल्लाह तआला की तरफ़ जाने का रास्ता है और वो इन के अस्बाब व इलल तक कमा हक्कुहू रसाई हासिल न कर सका, वोह ईमानदारों में से है और जब कोई शख्स शहवात के इन मुआविनीन पर मुत्तलअ हो गया जिन का हम ने ज़िक्र किया है वोह उन लोगों में से है जिन्हें अल्लाह तआला ने इल्म दिया है और जिन से अल्लाह तआला ने भलाई का वादा किया है। और जो शख्स इन उमूर को मद्दे नज़र रखते हुवे कुरआनो सुन्नत और उलमाए किराम के अक्वाल से दीन की हकीकत को समझता है और ईमान की पुख्तगी चाहता है उस का मर्तबा बुलन्दो बाला है, फ़रमाने इलाही है : और जिस ने नफ्स को ख़्वाहिश से रोक दिया पस बेशक जन्नत ही उस का ठिकाना है। और मजीद इरशाद फ़रमाया : येही वोह लोग हैं कि अल्लाह तआला ने जिन के दिलों को तक्वा के लिये खालिस कर लिया है।

 

फ़रमाने नबवी है कि मोमिन पांच मसाइब में घिरा होता है, मोमिन उस से हसद करता है, मुनाफ़िक़ उस से अदावत रखता है, काफ़िर उसे क़त्ल करने की कोशिशों में होता है, शैतान उसे गुमराह करता है और नफ़्स उस से झगड़ा करता है, लिहाज़ा साबित हुवा कि नफ्स झगड़ालू दुश्मन है जिस से मुकाबला करना इन्तिहाई ज़रूरी है।

मरवी है कि अल्लाह तआला ने हज़रते दावूद अलैहहिस्सलाम  की तरफ़ वहयी फ़रमाई : ऐ दावूद ! खुद बचो और दोस्तों को भी ख्वाहिशात की पैरवी करने से डराओ क्यूंकि दिल दुन्यावी ख्वाहिशात में मगन होते हैं, उन की अक्ल मुझ से दूर हो जाती है।

हज़रते ईसा अलैहहिस्सलाम  ने फ़रमाया : उस शख्स के लिये बिशारत है जिस ने इन वा’दा कर्दा इन्आमात की ख़ातिर जो अभी नज़रों से गाइब हैं, ज़ाहिरी चीजों की ख्वाहिशात तर्क कर दी हैं। हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने सहाबा की ऐसी जमाअत से जो जिहाद से आ रहे थे फ़रमाया : खुश आमदीद ! तुम जिहादे असगर से जिहादे अक्बर की तरफ़ वापस आए हो, अर्ज किया गया : या रसूलल्लाह ! जिहादे अक्बर क्या है ? आप ने फ़रमाया : नफ्स से जिहाद करना ।

फ़रमाने नबवी है कि मुजाहिद वोह है जो अल्लाह तआला की इबादत में नफ्स से मुक़ाबला करता है।

फ़रमाने नबवी है कि अपने नफ्स के मसाइब को रोक, इस की ख्वाहिशात की पैरवी में अल्लाह तआला की ना फ़रमानी न कर, जब कियामत के दिन तेरा नफ्स तुझ से झगड़ा करेगा तो तेरे वुजूद का एक हिस्सा दूसरे पर ला’नत करेगा, अल्लाह तआला अगर तुझे बख़्श दे और तेरे ऐबों को ढांप ले तो येह और बात है।

हज़रते सुफ्यान सौरी रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि मैं ने नफ्स से बढ़ कर किसी चीज़ का मुश्किल इलाज नहीं किया जिस में कभी मुझे फाइदा और कभी नुक्सान हुवा। हज़रते अबू अब्बास मौसिली रज़ीअल्लाहो अन्हो फ़रमाया करते थे : ऐ नफ़्स ! न तो तू दुन्यादारों के साथ रह कर ऐशो इशरत के मजे लेता है और न ही तू आखिरत की तलब में नेकों के साथ रह कर इबादतो रियाज़त करता है, गोया तू मुझे जन्नत और दोज़ख़ के दरमियान रोक रहा है तुझे शर्म नहीं आती ?

हज़रते हसन रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि नफ्स सरकश जानवर से भी ज़ियादा लगाम का मोहताज है, हज़रते यहया बिन मुआज़ रज़ीअल्लाहो अन्हो का क़ौल है कि नफ़्स का रियाज़त की तल्वारों से मुकाबला कर । रियाज़त की चार किस्में हैं : मामूली खाना, मा’मूली सोना, हाजत के वक्त बोलना और तमाम लोगों से दुख उठाना, कम खाने से शहवात मर जाती हैं, कम सोने से इरादे पाकीजा होते हैं, कम बोलने से सलामती अता होती है और लोगों से दुःख  उठाने की वज्ह से इन्सान आ’ला मरातिब तक पहुंच जाता है। किसी इन्सान के लिये जुल्म के वक्त हौसले से बढ़ कर उम्दा चीज़ और कोई नहीं है, तकालीफ़ में सब्र करना भी इसी तरह है, जब भी नफ़्स गुनाहों और ख्वाहिशात की तरफ़ मैलान करे, फुजूल गुफ्तगू करने के खुश गवार तसव्वुर करने लगे, इस पर कम खाने, कम सोने और बेदारी की तल्वारें खींच कर इसे कम बोलने की सजा दे. पोशीदगी में इस पर वार कर ! यहां तक कि तू जुल्म और इन्तिकाम से महफूज हो जाए, तमाम लोगों को इस की आफ़ात से अम्न हासिल हो, इस की शहवात की तारीकियों को ज़ाइल कर, ताकि इस की गुमराही की मुसीबत से नजात पा ले, तब तू पाकीज़ा और रूहानी व नूरानी असरार का मालिक बन जाएगा फिर तू उस तेज़ रफ़्तार घोड़े की तरह जो मैदान में अपनी तेज़ रफ्तारी के जोहर दिखाता है नेकियों और इबादत की राहों में अपनी सुबुक रवी और तेज़गामी के जोहर दिखाना और बाग के मालिक की तरह बाग की रविशों पर चहल कदमी करना।

आप सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने मजीद फ़रमाया कि इन्सान के तीन दुश्मन हैं : दुनिया,शैतान और नफ्स, दुनिया को छोड़ कर इस से महफूज रह, शैतान की मुखालफ़त कर और ख्वाहिशात छोड़ कर नफ़्स के शर से महफूज़ हो जा।

किसी हकीम का कौल है कि जिस शख्स पर उस का नफ्स गालिब आ जाता है वो शहवात की महब्बत का असीर हो जाता है और ख्वाहिशात की जेल का कैदी बन जाता है, नफ़्स के हाथ में उस की बागें होती हैं, वोह उस पर जुल्म व तशहद करता है और जहां चाहता है. उसे घसीट कर ले जाता है लिहाजा उस का दिल तमाम दीनी फवाइद से महरूम कर दिया जाता है।

हज़रते जा’फ़र बिन हमीद रज़ीअल्लाहो अन्हो फ़रमाते हैं कि मैं ने उलमा व हुकमा को इस अम्र पर मुत्तफ़िक पाया है कि दुन्यावी ने’मतें छोड़े बिगैर उख़रवी ने मते हासिल नहीं हो सकतीं।

हज़रते अबू यहूया अल वर्राक़ रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि जिस शख्स ने अपने आ’ज़ा की ख्वाहिशात को पूरा किया, उस ने गोया दिल में पशेमानियों के बीज बोए । हज़रते वहब बिन वर्द रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि जो कुछ कूते-ला-यमूत (इस कदर खूराक जिस से ज़िन्दगी काइम रहे) से ज़ाइद है वोह शहवत है, मजीद फ़रमाया कि जिस ने दुन्यावी ख्वाहिशात को महबूब रखा वोह रुस्वाई के लिये तय्यार हुवा।

हिकायत

अजीजे मिस्र की बीवी ने हज़रते यूसुफ़ अलैहहिस्सलाम  को जब सल्तनते मिस्र पर फ़ाइज़ पाया और खुद यूसुफ़ की गुज़रगाह पर एक बुलन्द टीले के ऊपर बैठी हुई थी, हज़रते यूसुफ़ अलैहहिस्सलाम  तकरीबन बारह हज़ार उमराए ममलुकत के साथ वहां से गुज़र रहे थे तो उस ने कहा : पाक है वोह जात जो गुनाहों के सबब बादशाहों को गुलाम बना देती है, बेशक हिर्स और ख्वाहिशाते नफ़्सानी ने बादशाहों को गुलाम बना दिया है और येही मुसिदीन की जज़ा है और सब्र व तकवा ने गुलामों को बादशाह कर दिया है, हज़रते यूसुफ़ अलैहहिस्सलाम  को अल्लाह तआला ने जब अज़ीज़े मिस्र की बीवी की चालीस बातें बतलाईं तो वोह बे साख्ता कह उठे जैसा कि फ़रमाने इलाही है :

“बेशक जो तक्वा और सब्र इख्तियार करता है अल्लाह तआला नेकियां करने वालों के अज्र को जाएअ नहीं करता है।”

हज़रते जुनैद रज़ीअल्लाहो अन्हो का कहना है कि एक मरतबा मैं रात को बेदार हो कर इबादत में मश्गूल हुवा मगर मुझे इबादत में मज़ा न आया, तब मेरा इरादा हुवा कि जा कर सो जाऊं लेकिन नींद मुझ से कोसों दूर, मैं उठ कर बैठ गया फिर भी मुझे चैन न आया चुनान्चे, मैं बाहर निकल गया, रास्ते में मैं ने एक आदमी को कम्बल में लिपटा पड़ा देखा जब उस ने मेरी आहट महसूस की तो कहा ऐ अबल कासिम ! ज़रा मेरी तरफ़ तशरीफ़ लाइये ! मैं ने कहा : आका ! बिगैर किसी के बुलाए के आ जाऊं? वोह कहने लगा : हां ! मैं ने अल्लाह तआला से सुवाल किया था कि आप के दिल में मेरे लिये तहरीक पैदा करे । मैं ने कहा : अल्लाह तआला ने ऐसे ही किया है, बतलाइये ! आप की हाजत क्या है ? वोह शख्स कहने लगा : नफ्स की बीमारी उस के लिये इलाज कब बनती है ? मैं ने कहा : जब आप अपने नफ्स की ख्वाहिशात की मुखालफ़त करें। तब वोह अपने आप से कहने लगा : सुन लिया ! मैं ने सात मरतबा तुझे येही बात बतलाई थी मगर तू ने जुनैद के सिवा किसी की बात सुनने से इन्कार कर दिया था, अब सुन लिया कि जुनैद क्या कहता है ? फिर वोह चल दिया और जाने कहां गाइब हो गया।

हजरते यजीदुर्रक्काशी रज़ीअल्लाहो अन्हो ने कहा कि तुम मझे दुनिया में ठन्डे पानी से बचाओ. कहीं मैं आखिरत में इस से महरूम न हो जाऊं । किसी ने हजरते उमर बिन अब्दुल अजीज रज़ीअल्लाहो अन्हो से पूछा : मैं कब बोलूं ? उन्हों ने कहा : जब तुझे चुप रहने की ख्वाहिश हो, उस ने कहा : और चुप कब रहूं ? आप ने फ़रमाया : जब तुझे गुफ्तगू करने की ख्वाहिश हो।

हज़रते अली रज़ीअल्लाहो अन्हो का फरमान है कि जो जन्नत का मुश्ताक हो वो दुन्यावी ख्वाहिशात से किनारा कश हो जाए।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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मस्जिद की बरकतें और फज़िलतें

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 फ़रमाने इलाही है : अल्लाह की मसाजिद को सिर्फ वोही लोग आबाद करते हैं जो अल्लाह और आख़िरत के

दिन पर ईमान लाते हैं। फ़रमाने नबवी है कि जिस शख्स ने अल्लाह की रज़ाजूई के लिये मस्जिद बनाई अगर वो मस्जिद भट-तीतर के बिल के बराबर ही क्यूं न हो, अल्लाह तआला उस शख्स के लिये जन्नत में महल बना देता है।

फ़रमाने नबवी है : जब तुम में से कोई मस्जिद से महब्बत रखता है अल्लाह तआला उस से महब्बत रखता है।

फ़रमाने नबवी है कि जब तुम में से कोई शख्स मस्जिद में दाखिल हो तो बैठने से पहले दो रक्अत नमाज़ अदा करे ।

फ़रमाने नबवी है कि मस्जिद के हमसाए की नमाज़ मस्जिद के सिवा जाइज़ नहीं

एक और इरशादे नबवी है कि तुम में से कोई फ़र्द जब तक जाए नमाज़ पर रहता है फ़रिश्ते उस के लिये मगफिरत व बख्शिश की दुआएं करते हैं और कहते हैं : “ऐ अल्लाह ! इस पर सलामती नाज़िल फ़रमा, ऐ अल्लाह ! इस पर रहम फ़रमा और ऐ अल्लाह ! इसे बख़्श दे।” यह दुआएं उस वक्त तक जारी रहती हैं जब तक कि वह किसी से बात न करे या मस्जिद से निकल न जाए।

फ़रमाने नबवी है कि आख़िर ज़माने में मेरी उम्मत के कुछ ऐसे लोग होंगे जो मस्जिदों में आएंगे और गिरोह  बना कर दुन्यावी बातें करते रहेंगे और दुनिया की महब्बत के किस्से बयान करेंगे, उन के साथ न बैठना, अल्लाह तआला को उन की कोई ज़रूरत नहीं है।

फ़रमाने नबवी है कि अल्लाह तआला का येह इरशाद बा’ज़ इल्हामी किताबों में मौजूद है कि ज़मीन पर मस्जिदें मेरा घर हैं और इन की ता’मीर व आबादी में हिस्सा लेने वाले मेरे जाइर हैं, पस खुश खबरी है मेरे उस बन्दे के लिये जो अपने घर में तहारत हासिल कर के मेरे घर में मेरी ज़ियारत को आता है लिहाज़ा मुझ पर हक़ है कि मैं आने वाले जाइर को इज्जत व वकार अता करूं ।

सरवरे काइनात सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का इरशाद है कि जब तक तुम किसी ऐसे आदमी को देखो जो मस्जिद में आने का आदी है तो उस के ईमान की गवाही दो।

जनाबे सईद बिन मुसय्यब रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है : जो शख्स मस्जिद में बैठता है, गोया वोह अल्लाह की मजलिस में बैठता है लिहाजा उसे भलाई के सिवा कोई और बात नहीं करना चाहिये।

एक हदीस में येह भी आया है कि मस्जिद में दुन्यावी बातें नेकियों को इस तरह खा जाती हैं जैसे जानवर चारा खा जाते हैं ।

इमाम नखई रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है : सलफ़े सालिहीन ने फ़रमाया कि रात की तारीकी में मस्जिद में आने वाले के लिये जन्नत वाजिब होती है।

हज़रते अनस बिन मालिक रज़ीअल्लाहो अन्हो का फ़रमान है कि जो शख्स मस्जिद में चराग जलाता है, जब तक उस चराग की रोशनी से मस्जिद मुनव्वर रहती है, हामिलीने अर्श और तमाम फ़िरिश्ते उस के लिये मगफिरत की दुआ करते रहते हैं।

नमाज़ी के मरने पर ज़मीन रोती है

हज़रते अली रज़ीअल्लाहो अन्हो फ़रमाते हैं कि जब आदमी मर जाता है तो उस की नमाज़ पढ़ने की जगह और आस्मान की जगह, जहां से उस के अमल चढ़ा करते हैं, उस पर रोते हैं फिर आप ने येह आयत पढ़ी :

“पस उन पर न ज़मीनो आस्मान रोए और न ही उन्हें ढील दी गई।”

(या’नी जब ऐसा शख्स मरता है जिस की नमाज़ पढ़ने की जगह नहीं होती तो उस पर जमीनो आस्मान नहीं रोते)

हज़रते इब्ने अब्बास रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि नमाज़ी पर चालीस सुव्हें ज़मीन रोती है।

हज़रते अता अल खुरासानी रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि बन्दा जब ज़मीन के किसी टुकड़े पर सजदा करता है तो वोह टुकड़ा कियामत के दिन उस के अमल की गवाही देगा और उस बन्दे की मौत के दिन वोह टुकड़ा रोता है।

हज़रते अनस बिन मालिक रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि ज़मीन का हर वोह टुकड़ा जिस पर नमाज़ अदा की जाती है या ज़िक्रे खुदा किया जाता है वोह इर्द गिर्द के तमाम कतआत पर फ़खर करता है और ऊपर से नीचे सातवीं ज़मीन तक वोह मसर्रत व शादमानी महसूस करता है और जब बन्दा किसी ज़मीन पर नमाज़ पढ़ता है वोह ज़मीन उस पर फ़खर करती है।

और येह भी कहा गया है कि कोई जमाअत ऐसी नहीं है जो कहीं जा कर ठहरे मगर जमीन का वोह टुकड़ा जो उन की क़ियाम गाह है, या तो उन पर सलामती भेजता है या उन पर ला’नत करता है।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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Masjid hadees, masjid ki fazilat, masjid ka maqam, masjid ki barkate, masjid me dene ka sawab

तवक्कुल की फज़िलत

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

फ़रमाने इलाही है :

बेशक अल्लाह तआला तवक्कुल करने वालों को महबूब रखता है। .

और उस से बुलन्द मकाम जिस का फ़ाइल अल्लाह तआला की महब्बत से मौसूम है और जिस का लिबास वगैरा अल्लाह तआला की किफ़ायत से आरास्ता है, कौन सा है ? बस वोह शख्स जिसे अल्लाह काफ़ी हो, निगहबानी करने वाला हो, अलबत्ता वोह अज़ीम कामयाबी पर फ़ाइजुल मराम हुवा क्यूंकि महबूब को न तो अज़ाब दिया जाता है और न उसे धुतकारा जाता है और न उसे दूर किया जाता है।

अहादीस में भी तवक्कुल और मुतवक्किलीन की फजीलत मरवी है : चुनान्चे, हज़रते इब्ने मसऊद रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : मैं ने तमाम उम्मतों को मक्के में हज के मौक़अ पर जम्अ होने की जगह देखा और मैं ने अपनी उम्मत को देखा, उस ने हर बुलन्दी व पस्ती को घेर रखा था, मुझे उन की कसरते ता’दाद और सूरतों ने बहुत मुतअज्जिब किया तब मुझ से कहा गया, क्या अब तुम राजी हो ? मैं ने कहा : हां ! फिर कहा गया : इन के साथ सत्तर हज़ार अफराद बिला हिसाब जन्नत में जाएंगे। आप से कहा गया : या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम! वोह कौन लोग हैं जो बिला हिसाब जन्नत में दाखिल होंगे? आप ने फ़रमाया : वोह लोग जो जिस्मों को नहीं दागते, फ़ालें नहीं लेते, चोरी छुपे लोगों की बातें नहीं सुनते और अपने रब पर तवक्कुल करते हैं । हज़रते अक्काशा रज़ीअल्लाहो अन्हो खड़े हो गए और अर्ज की : या रसूलल्लाह ! अल्लाह से दुआ कीजिये कि अल्लाह तआला मुझे इन में से कर दे, आप ने फ़रमाया : ऐ अल्लाह ! अक्काशा को इन में से कर दे ! फिर एक सहाबी ने खड़े हो कर अर्ज की : ऐ अल्लाह के नबी ! मेरे लिये भी दुआ कीजिये कि अल्लाह तआला मुझे भी इन में से कर दे ! आप ने फ़रमाया : अक्काशा तुम से सबक़त ले गए।

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अल्लाह पर तवक्कुल की हदीसे मुबारक

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का फरमान है कि अगर तुम सहीह मा‘नों में अल्लाह पर तवक्कुल करते तो अल्लाह तआला तुम्हें परन्दों की तरह रिज्क देता जो सुब्ह भूके निकलते हैं और शाम को सैर हो कर आते हैं ।

फ़रमाने नबवी है : जो सब से कतए तअल्लुक कर के अल्लाह तआला से तअल्लुक जोड़ लेता है, अल्लाह तआला हर मुश्किल में उसे काफ़ी होता है और उसे ऐसे तरीके से रिज्क देता है जो उस के वहमो गुमान में भी नहीं होता और जो शख़्स दुनिया का हो जाता है अल्लाह तआला उसे दुनिया  के सिपुर्द कर देता है।

फ़रमाने नबवी है : जो शख्स इस चीज़ को पसन्द करता है कि वोह सब लोगों से ज़ियादा मालदार हो, उसे चाहिये कि मौजूद रिज्क से ज़ियादा ए’तिमाद उस रिज्क पर करे जो अल्लाह के यहां मौजूद है।

मरवी है : हुज़र सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम के अहले खाना जब फ़ाके से होते तो आप फ़रमाते कि नमाज़ के लिये खड़े हो जाओ और मेरे रब ने मुझे येही हुक्म दिया है।

और अपने घर वालों को नमाज़ का हुक्म करो

और इस पर सब्र करो। फ़रमाने नबवी है कि जिस शख्स ने जन्तर मन्तर किया और जिस्म को दागा, उस ने तवक्कुल नहीं किया।

मरवी है कि जब हज़रते जिब्रील अलैहहिस्सलाम  ने हज़रते इब्राहीम अलैहहिस्सलाम  को मुन्जनीक से आग में फेंके जाने के वक्त कहा : क्या तुम्हारी कोई हाजत है ? आप ने फ़रमाया कि तुम से मेरी कोई हाजत वाबस्ता नहीं है। आप अपने उस अहद को पूरा कर रहे थे जो इन्हों ने आग में फेंके जाने के लिये गरिफ़्तारी के वक्त किया था कि “मुझे मेरा रब काफ़ी है और वोह अच्छा कारसाज़ है” और अल्लाह तआला ने यह आयत नाज़िल फ़रमाई :  और इब्राहीम जिस ने अपना कौल पूरा किया।

अल्लाह तआला ने हज़रते दावूद अलैहहिस्सलाम  पर वहयी  नाज़िल फ़रमाई : ऐ दावूद ! मेरा ऐसा कोई बन्दा नहीं जो मख्लूक को छोड़ कर मेरा दामने रहमत थाम लेता है और ज़मीनो आस्मान उस पर सख्तियां लाते हैं मगर मैं उस की सब दुश्वारियां दूर कर देता हूं और उस के लिये रास्ता निकाल देता हूं।

हज़रते सईद बिन जुबैर रज़ीअल्लाहो अन्हो कहते हैं कि मुझे बिच्छू ने डंग मारा तो मेरी वालिदा ने मुझे कसम दी कि मैं किसी झाड़ फूंक करने वाले के पास जा कर दम कराऊं, चुनान्चे, मन्तर पढ़ने वाले ने मेरा वोह हाथ पकड़ा जो नहीं डसा गया था और येह आयत पढ़ी :

और उस जिन्दा पर तवक्कुल कर जिसे मौत नहीं आएगी। और कहा कि इस आयत को सुनने के बाद किसी आदमी के लिये येह मुनासिब नहीं है कि वोह अल्लाह तआला के सिवा किसी और की पनाह तलाश करे ।

एक आलिम से ख्वाब में कहा गया कि जिस ने अल्लाह पर ए’तिमाद किया उस ने अपना रिज्क जम्अ कर लिया। बा’ज़ उलमा का कौल है कि मुकर्रर कर्दा रिज्क का हुसूल तुझे फ़र्ज़ कर्दा आ’माल से गाफ़िल न कर दे क्यूंकि इस तरह तेरी आक़िबत खराब हो जाएगी और तुझे वोही रिज्क मिलेगा जो तेरा मुक़द्दर हो चुका है।

यहूया बिन मुआज़ रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि बन्दे का बिगैर तलब किये रिज्क पा लेना इस बात की दलील है कि रिज्क को बन्दे की तलाश का हुक्म दिया गया है।

इब्राहीम बिन अदहम रज़ीअल्लाहो अन्हो फ़रमाते हैं कि मैं ने एक राहिब से पूछा : तुम कहां से खाते हो ? उस ने कहा मुझे इस की खबर नहीं है, रब्बे जलील से पूछ कि वोह मुझे कहां से खिलाता है।

हज़रते हरिम बिन हय्यान ने हज़रते उवैस करनी रज़ीअल्लाहो अन्हो से कहा : आप मुझे कहां जाने का हुक्म देते हैं ? उन्हों ने शाम की तरफ़ इशारा किया, हरिम बोले : वहां गुज़र अवकात कैसे होगी ? हज़रते उवैस ने फ़रमाया : हलाक हो जाएं वोह दिल जिन में खुदा पर ए’तिमाद नहीं है और वोह शक में पड़ गए हैं, ऐसे दिलों को नसीहत कोई फ़ाइदा नहीं देती है।

एक बुजुर्ग का कौल है कि जब से मैं अल्लाह तआला को अपना कारसाज़ बनाने पर राजी हुवा हूं, मुझे हर भलाई का रास्ता मिल गया है। ऐ अल्लाह ! हमें भी हुस्ने अदब अता फ़रमा दे। (आमीन)

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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Allah par tawakkul, allah par bharosa,

 

 

 

बन्दे को सब्र, अल्लाह की रज़ा और कनाअत रखना चाहिए

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 

रज़ा  की फजीलत आयाते कुरआनी से साबित है चुनान्चे, इरशादे इलाही है :

अल्लाह तआला उन से राजी हुवा और वह अल्लाह से राजी हुवे।

नीज़ इरशाद होता है :

नहीं है बदला एहसान का मगर एहसान ।

एहसान का मुन्तहा यह है कि अल्लाह तआला अपने बन्दे से राजी हो और यह मकाम बन्दे को राजी ब रज़ाए इलाही होने से मिलता है।

नीज़ इरशादे इलाही होता है : अदन के बागों में पाकीज़ा रहने की जगहें हैं और अल्लाह की तरफ़ से बहुत बड़ी रजामन्दी है। अल्लाह तआला ने इस आयत में रज़ा  को जन्नते अदन से बाला ज़िक्र किया है जैसे कि ज़िक्र को नमाज़ पर फ़ौकिय्यत दी है, चुनान्चे, फ़रमाया  बेशक नमाज़ बे हयाई और ना मा’कूल बातों से मन्अ करती है और अल्लाह की याद बहुत बडी चीज़ है।

पस जैसा कि नमाज़ से मा’बूदे हक़ीक़ी (अल्लाह तआला) की शान बहुत बुलन्द है इसी तरह जन्नत से रब्बे जन्नत की रज़ा  आ’ला व अरफ़अ है बल्कि यही चीज़ हर जन्नती का मक्सूद व मतमहे नज़र होगी चुनान्चे, हदीस शरीफ़ में है कि अल्लाह तआला मोमिनों पर तजल्ली फ़रमाएगा और कहेगा कि मुझ से मांगो तो मोमिन कहेंगे ऐ अल्लाह ! हम तुझ से तेरी रज़ा  चाहते हैं। तो गोया कमाले फ़ज़ीलत को पा कर भी वोह रब की रज़ा  चाहेंगे।

बन्दे की रज़ा  तलबी की हक़ीक़त का हम ज़िक्र ज़रूर करते, बन्दे से अल्लाह तआला की खुशनूदी का जो मतलब है वो इस मा’ना से ज़ियादा करीब है जिस का ज़िक्र हम बन्दे के लिये खुदा की महब्बत के ज़िमन में कर चुके हैं, चूंकि लोगों के फ़हम इस मा’ना की हक़ीक़त को नहीं पा सकते इस लिये इस हक़ीक़त के जिक्र का कोई जवाज़ नहीं है और कौन है जो अपने नफ़्स के इदराक से इस हक़ीक़त को पा ले।

हक़ीक़त तो यह है कि दीदारे इलाही से बढ़ कर कोई और चीज़ नहीं है मगर मोमिनों की दीदार के वक्त रज़ाए इलाही की ख्वाहिश इस वज्ह से होगी कि यही चीज़ दाइमी दीदार का सबब है पस गोया जब उन्हों ने इन्तिहाई बुलन्द मरातिब और उम्मीदों की आखिरी हृदों को छू लिया और दीदार की लज्जत से लुत्फ़ अन्दोज़ हो गए तो उन्हों ने मजीद कुछ सवाल करने के जवाब में दाइमी दीदार को ही मांग लिया और यह जान गए कि रज़ाए इलाही ही दाइमी तौर पर हिजाबात के उठ जाने का सबब है और फ़रमाने इलाही है :

हमारे नज़दीक इस से भी ज़ियादा है। बा’ज़ मुफस्सिरीन का कहना है, इस से ज़ियादा के यह माना हैं कि जन्नतियों को रब्बुल आलमीन की जानिब से तीन तोहफे मिलेंगे, पहले यह कि इन्हें जन्नत में ऐसा तोहफा दिया जाएगा जो पहले से इन के पास मौजूद नहीं होगा, चुनान्चे, फ़रमाने इलाही है :

पस कोई नफ्स नहीं जानता कि उस के लिये कौन सी आंखों की ठन्डक छुपाई गई है। दूसरे यह कि इन्हें इन के रब की तरफ़ से सलाम होगा जो इस तोहफ़े से ज्यादा होगा, जैसा कि इरशादे इलाही है :

रब्बे रहीम की तरफ से उन्हें सलाम कहा जाएगा। तीसरा येह कि अल्लाह तआला फ़रमाएगा : मैं तुम से राज़ी हूं और यह बात सलाम और तोहफे से भी बेहतर और आ’ला है, चुनान्चे, फ़रमाने इलाही है :

और अल्लाह की तरफ़ से बहुत बड़ी खुशनूदी है। या’नी उन ने मतों से भी अफ्ज़ल है जिन को इन्हों ने हासिल कर लिया है, पस येही अल्लाह तआला की मुक़द्दस रज़ा  है जो बन्दे की रज़ाजूई का फल है।

मुसीबतों पर सब्र करना और अल्लाह से राज़ी रहना

अब रही अहादीसे मुक़द्दसा से रज़ा  की फ़ज़ीलत तो इस सिलसिले में बहुत सी अहादीस वारिद हुई हैं चुनान्चे, हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से मरवी है कि आप ने सहाबा की एक जमाअत से पूछा : तूम कौन हो ? उन्हों ने कहा : मोमिन, आप ने फ़रमाया : तुम्हारे ईमान की क्या अलामत है ? उन्हों ने कहा : हम मसाइब पर सब्र करते हैं, फ़राखी में शुक्र अदा करते हैं और अल्लाह की कजा पर राज़ी रहते हैं। आप ने फ़रमाया : रब्बे का’बा की कसम तुम मोमिन हो ।

फ़रमाने नबवी है कि हुकमा और उलमा अपनी फ़िकह की वज्ह से इस अम्र के करीब हुवे कि नबी हो जाएं ।

कम रिज्क पर राज़ी होना

हदीस शरीफ़ में है कि उस शख्स के लिये खुश खबरी है जिसे इस्लाम की हिदायत मिली और वोह अपनी मा’ मूली गुज़र अवकात पर राजी रहा ।

फ़रमाने नबवी है कि जो शख्स अल्लाह तआला से मा’मूली रिज्क पर राजी हो गया अल्लाह तआला उस के आ’माल पर राजी हो जाता है।

और फ़रमाया : जब अल्लाह तआला किसी बन्दे पर राजी हो जाता है तो उस को आज़माइश में डाल देता है अगर वोह सब्र करे तो अल्लाह तआला उस बन्दे को पसन्द कर लेता है और अगर वोह आजमाइश पर राजी हो जाए तो अल्लाह उसे (अपने ख़ास बन्दों में) चुन लेता है।

फ़रमाने नबवी है : जब कियामत का दिन होगा अल्लाह तआला मेरी उम्मत के एक गुरौह के पर पैदा फ़रमाएगा और वोह इन परों से उड़ कर कब्रों से निकलते ही सीधे जन्नत में जा पहुंचेंगे, वोह जन्नत की ने मतों से लुत्फ़ अन्दोज़ होंगे और जहां चाहेंगे आराम करेंगे, फ़िरिश्ते उन से कहेंगे : क्या तुम हिसाब देख आए हो ? वोह कहेंगे कि हम ने हिसाब नहीं देखा, फ़रिश्ते पूछेगे : क्या तुम पुल सिरात पार कर आए हो? वोह कहेंगे : हम ने सिरात को नहीं देखा। फ़रिश्ते कहेंगे : क्या तुम ने जहन्नम को देखा है ? वो कहेंगे : हम ने किसी चीज़ को नहीं देखा।

तब फ़िरिश्ते कहेंगे : तुम किस की उम्मत में से हो ? वोह कहेंगे हम मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की उम्मत हैं, फ़रिश्ते कहेंगे : हम तुम्हें अल्लाह की कसम देते हैं येह बताओ तुम दुनिया में क्या अमल किया करते थे ? वोह कहेंगे कि हम में दो आदतें थीं जिन्हों ने हमें इस मन्ज़िल तक पहुंचाया है और अल्लाह का फज्ल व रहमत हमारे शामिले हाल है, फ़रिश्ते कहेंगे : वो दो आदतें कौन सी थीं ? वोह कहेंगे : हम जब तन्हा होते तो गुनाह करते हमें शर्म आती थी चे जाए की हम अलल ए’लान गुनाह करते और हम अल्लाह तआला के अता कर्दा मा’मूली रिज्क पर राजी हो गए थे, फ़रिश्ते येह सुन कर कहेंगे, तब तो तुम्हारा यही बदला होना चाहिये था ।

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : ऐ गिरौहे फुकरा ! तुम दिल की गहराइयों से अल्लाह की अता पर राजी हो जाओ तो अपने फ़क्र (गरीबी) का सवाब पा लोगे वरना नहीं

मूसा अलैहहिस्सलाम  के वाक़िआत में है कि बनी इस्राईल ने इन से कहा : अल्लाह तआला से हमारे लिये कोई ऐसा अमल दरयाफ़्त कीजिये जिस के बाइस वोह हम से राजी हो जाए । मूसा अलैहहिस्सलाम  ने बारगाहे इलाही में अर्ज की : ऐ अल्लाह तू ने इन की गुजारिश सुन ली, इन्हों ने क्या कहा है ? रब तआला ने फ़रमाया : ऐ मूसा ! इन से कह दो कि येह मुझ से राजी हो जाएं या’नी मेरे दिये हुवे कमो बेश पर राजी हो जाएं, मैं इन से राजी हो जाऊंगा।

सब्र के फायदे और फ़ज़ाइल

रहे सब्र के फ़ज़ाइल तो रब तआला ने कुरआने मजीद में नव्वे से ज़ियादा मकामात पर सब्र का ज़िक्र फ़रमाया है और अकसर दरजात और भलाइयों को सब्र से मन्सूब किया है और इन्हें सब्र का फल करार दिया है और साबिरों के लिये ऐसे इन्आमात रखे हैं जो किसी और के लिये नहीं रखे, चुनान्चे, इरशादे इलाही है :

उन लोगों पर उन के रब की तरफ से दुरूद हैं और रहमत है और येही लोग हिदायत पाने वाले हैं। लिहाज़ा साबित हुवा कि हिदायत, रहमत और सलवात तीन चीजें साबिरीन के लिये मख्सूस हैं।

चूंकि इस में तमाम आयाते रब्बानी का लाना ना मुमकिन है लिहाज़ा इस से सिर्फ़ नज़र करते हुवे सिर्फ चन्द अहादीस दर्ज की जाती हैं । फ़रमाने नबवी है कि सब्र आधा ईमान है।

मजीद फ़रमाया कि थोड़ी सी वोह चीज़ जो तुम्हें यक़ीन और पुख्ता सब्र से मिल जाए और जिस शख्स को इन में से कुछ हिस्सा मरहमत कर दिया जाए उस से अगर रात की इबादत और दिन के रोजे फ़ौत हो जाएं तो कोई परवा नहीं। (वाज़ेह रहे कि यहां इबादत और रोजों से मुराद नफ़्ल इबादत और रोजे हैं)। और तुम्हारा मामूली रिज्क पर सब्र करना मुझे इस बात से ज़ियादा पसन्द है कि तुम में से हर एक तमाम के आ माल पर कारबन्द हो कर आए लेकिन मैं तुम पर ख़ौफ़ करता हूं कि मेरे बाद तुम पर दुनिया खोल दी जाएगी, पस तुम एक दूसरे को अच्छा न समझने लगो और इस सबब से फ़रिश्ते तुम्हें अच्छा न समझने लगें, जिस ने सब्र किया और सवाब की उम्मीद रखी उस ने सवाब के कमाल को पा लिया, फिर आप ने येह आयत पढ़ी :  जो कुछ तुम्हारे पास है तमाम हो जाता है और जो कुछ अन्लाह के यहां है बाकी रहने वाला है. और अलबत्ता हम सब्र करने वालों को जज़ा देंगे।

हज़रते जाबिर रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से ईमान के मुतअल्लिक पूछा गया, आप ने फ़रमाया : ईमान, सब्र और सखावत का नाम है।

और फ़रमाया : सब्र, जन्नत के खज़ानों में से एक खज़ाना है। एक मरतबा आप से दरयाफ़्त किया गया कि ईमान क्या है ? आप ने फ़रमाया : सब्र ।

और येह बात हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम के इस फरमान के मिस्ल है जिस में हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से दरयाफ्त किया गया था कि हज क्या है ? तो आप ने फ़रमाया : वुकूफे अरफ़ा ।या’नी अहम रुक्न वुकूफे अरफ़ात है।

फ़रमाने नबवी है कि सब से उम्दा अमल वोह है जिसे नफ्स बुरा समझता है।

मरवी है कि अल्लाह तआला ने हज़रते दावूद अलैहहिस्सलाम  को वही फ़रमाई कि मेरे अख़्लाक़ जैसे अपने अख़्लाक़ बनाओ और मेरे अख़्लाक़ में से येह है कि मैं सबूर हूं।

अता रज़ीअल्लाहो अन्हो ने इब्ने अब्बास रज़ीअल्लाहो अन्हो से रिवायत की है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम जब अन्सार में तशरीफ़ लाए तो फ़रमाया : क्या तुम मोमिन हो ? वोह चुप रहे, हज़रते उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो बोले : हां या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ! आप ने फ़रमाया : तुम्हारे ईमान की अलामत क्या है ? उन्हों ने अर्ज की : हम फ़राख दस्ती में अल्लाह का शुक्र अदा करते हैं, मसाइब में सब्र करते हैं और क़ज़ाए इलाही पर राज़ी रहते हैं, आप ने येह सुन कर फ़रमाया : रब्बे का’बा की क़सम ! तुम मोमिन हो ।)

फ़रमाने नबवी है : अपनी ना पसन्दीदा चीज़ों पर तुम्हारा सब्र बहुत उम्दा चीज़ है।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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Sabr hadees, allah ki raza, allah se razi, kanaat, kam rizk, musibaton par sabr

जन्नत और मरातिबे अहले जन्नत

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

कब्ल अज़ी आप जिस घर के गम व अन्दोह और मेहनत व आलाम का हाल पढ़ चुके हैं, उस घर के मुकाबले में एक और घर है, पहले घर को जहन्नम का नाम दिया गया था और इस दूसरे घर का नाम जन्नत है, अब ज़रा इस घर की ने’मतों और मसर्रतों पर नज़र डालिये क्यूंकि येह बात तो तै शुदा है कि जो एक घर से महरूम होगा उसे दूसरे घर में जाना होगा ख्वाह वोह जन्नत हो या जहन्नम, लिहाज़ा ज़रूरी है कि जहन्नम की हलाकत खैजियों से बचने के लिये अपने दिल में तवील गौरो फ़िक्र कीजिये ताकि किसी तरह इस से नजात हासिल हो जाए और दिल को खौफे खुदा का गहवारा बनाइये और जन्नत की दवामी नेमतों के मुतअल्लिक तवील सोच बिचार करते हुवे अल्लाह तआला की रहमत से उम्मीद रखिये कि वोह हमें भी इस का मकीन बनाएगा जिस का उस ने अपने सालेह बन्दों से वा’दा फ़रमाया है।

अपने नफ़्स को खौफ़े इलाही का चाबुक मारिये और उम्मीद की महार डाल कर सीधे रास्ते पर गामज़न रखिये, इसी सूरत में ही तो आप मुल्के अज़ीम (जन्नत) को पाएंगे और दर्दनाक अज़ाब से महफूज रहेंगे।

जन्नती किस हाल में रहेंगे

अब ज़रा अहले जन्नत के बारे में गौर कीजिये, उन के चेहरों पर अताए रब्बानी की ताज़गी और शगुफ्तगी होगी मोहर कर्दा शराबे तहूर के जाम उन के हाथों में होंगे और वो सुर्ख याकूत के मिम्बरों पर जल्वा अफ़रोज़ होंगे जिन के ऊपर सफ़ेद बराक मोतियों के साइबान तने होंगे, नीचे बे मिसाल सब्ज़ रेशम के फर्श होंगे, वोह शहद व शराब की नहरों के किनारे नसब शुदा तख्तों पर टेक लगाए होंगे जिन्हें गिलमान व नौनिहालाने बिहिश्त और इन्तिहाई हसीनो जमील हूराने बिहिश्ती ने, जो मोती और मूंगों की तरह होंगी (जिन्हें इस से पहले किसी इन्सान और जिन्न ने हाथ नहीं लगाया होगा) येह सब उन्हें घेरे होंगे, जो हरें जन्नत के दरजात में सबुक खिरामी कर रही होंगी, जब उन में से कोई एक चलने पर माइल होगी तो सत्तर हज़ार बिहिश्ती बच्चे उस के लिबास उठाए होंगे, उन पर सफेद रेशमी लिबास होगा जिस को देख कर लोग शशदर रह जाएंगे, लुअ लुअ और मरजान से मुरस्सअ ताज उन के ज़ेबा सर होंगे, वोह इन्तिहाई नाज़ो अन्दाज़ वाली शीरीं अदा इत्रबीज़ और बुढ़ापे और दुख से बे नियाज़ होंगी, वोह याकूत से तय्यार कर्दा महल्लात में फरोकश होंगी और जन्नत के बागों के दरमियान आंखें नीची किये आराम फरमा होंगी, फिर उन जन्नतियों और हूरों पर आब खूरे आफ़्ताबे और शराबे तहूर के प्याले लिये गिलमान फिरेंगे जिन में इन्तिहाई सफेद, लज्जत बख़्श मशरूब होगा और उन के इर्द गिर्द जन्नती ख़ादिम और अमरद , मोतियों की तरह फिर रहे होंगे येह उन के आ’माल की जज़ा होगी कि वोह अम्न वाले मकाम में चश्मों, बागों और नहरों  के दरमियान रब्बे क़दीर के नज़दीक सच्चे मकाम में होंगे, वोह इन में बैठ कर रब्बे करीम का दीदार करेंगे, उन के चेहरों पर अल्लाह की नेमतों की ताज़गी के आसार नुमायां होंगे, उन के चेहरे जिल्लतो रुस्वाई से आलूदा नहीं होंगे बल्कि वोह अल्लाह के मुअज्जज बन्दे होंगे, रब्बे करीम की जानिब से उन्हें तोहफे अता होंगे, वोह अपनी इस पसन्दीदा जगह में हमेशा रहने वाले होंगे, न इस में उन्हें कोई ख़ौफ़ होगा न गम, वोह मौत की तक्लीफ़ से बे खौफ़ होंगे, वोह जन्नत में ने’मतें पाएंगे, जन्नत के लज़ीज़ खाने खाएंगे, दूध, शराब, शहद और साफ़ पानी की ऐसी नहरों से अपनी प्यास बुझाएंगे जिन की ज़मीन चांदी की, कंकरियां मोतियों की और मिट्टी मुश्क की होगी, जिस से तेज़ खुश्बू आएगी, वहां का सब्ज़ा जा’फ़रान का होगा, वोह काफूर के टीलों पर बैठेंगे, और उन पर फूलों के इत्र की बारिश होगी और उन की ख़िदमत में चांदी के प्याले जिन पर मोती जड़े होंगे और जो याकूत व मरजान से मुरस्सअ होंगे, लाए जाएंगे, किसी प्याले में सल-सबील के ठन्डे और मीठे पानी में मुहरबन्द शराब मिली होगी और ऐसा प्याला जिस की सफाई की वज्ह से उस में मौजूद शराब का रंगो रूप बाहर से नज़र आ रहा होगा, आदमी उस जैसा मुरस्सअ मुसफ्फा बरतन बनाने का तसव्वुर ही नहीं कर सकता, वोह प्याला ऐसे खादिम के हाथ में होगा कि आदमी उस के चेहरे की चमक दमक को याद करेगा लेकिन सूरज में उस की दिलकश सूरत, हसीन चेहरा और बे नज़ीर आंखें कहां ?

तअज्जुब है ऐसे शख्स पर जो उस घर पर ईमान रखता है, उस की तारीफ़ों को सच्चा जानता है और इस बात का यक़ीने कामिल रखता है कि उस में रहने वाले कभी भी मौत से हम किनार नहीं होंगे, जो उस में आ जाएगा उसे दुख दर्द नहीं सताएंगे, उस में रहने वालों पर कभी भी तगय्युर नहीं आएगा और वोह हमेशा अम्न व सुकून से रहेंगे, येह सब कुछ जानने के बा वुजूद वोह ऐसे घर में दिल लगाता है जो आखिरे कार उजड़ने वाला है, जिस का ऐश ज़वाल पज़ीर है, ब खुदा ! अगर जन्नत में सिर्फ मौत से बे खौफ़ी होती, इन्सान भूक, प्यास और तमाम हवादिसात से बे ख़ौफ़ ही रह सकता और दीगर इन्आमात न होते तब भी वोह जन्नत इस लाइक़ थी कि उस के लिये दुन्या को छोड़ दिया जाए और उस पर ऐसी चीज़ को तरजीह न दी जाती जो लुट जाने वाली और मिट जाने वाली है चे जाएकि जन्नत में रहने वाले बे ख़ौफ़ बादशाहों की तरह हों, रंगा रंग मसर्रतों, राहतों से हम किनार हों, हर ख्वाहिश को पाने वाले हों, हर रोज़ अर्शे आ ज़म के कुर्ब में जाने वाले हों, रब्बे जुल मिनन का दीदार करने वाले हों, अल्लाह तआला को ऐसी बे मिसाल निगाहों से देखने वाले हों कि जिस निगाह से वोह जन्नत की ने’मतों को नहीं देखा करते थे वोह इन ने’मतों से फिरने वाले न हों, हमेशा इन्हीं ने’मतों में रहें और इन के जवाल से अम्न में हों।

हज़रते अबू हुरैरा रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : मुनादी पुकारेगा : ऐ जन्नत के रहने वालो ! तुम हमेशा तन्दुरुस्त रहोगे, कभी बीमार नहीं होगे, हमेशा जिन्दा रहोगे कभी मौत नहीं आएगी, हमेशा जवान रहोगे, कभी बुढ़ापा नहीं आएगा और तुम हमेशा इन्आमो इकराम में रहोगे, कभी ना उम्मीद नहीं होगे। और येही फ़रमाने इलाही है : और पुकारे जाएंगे कि येह बिहिश्त है जिस के  तुम अपने आ माल के सबब वारिस हुवे हो। और तुम जब जन्नत की सिफ़ात जानना चाहो तो कुरआने मजीद पढ़ो क्यूंकि अल्लाह तआला के बयान से उम्दा किसी का बयान नहीं है और अल्लाह तआला के इस फरमान से कि  जो अपने रब के हुजूर खड़ा होने से डरता है उस के लिये दो जन्नतें हैं। सूरए रहमान के आखिर तक पढ़ो, सूरए वाकिआ और दूसरी सूरतों का मुतालआ करो (इन में जन्नत की ने मतों का तजकिरा है)।

और अगर तुम अहादीसे मुक़द्दसा से जन्नत की तफ्सीलात जानना चाहते हो तो मजकूरए बाला इजमाल के बाद अब इस की तफ्सील पर गौरो फिक्र करो, सब से पहले जन्नतों की तादाद जेह्न नशीन कर लो, हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाने इलाही : “और उस शख्स के लिये जो अपने रब के हुजूर खड़ा होने से डरा, दो जन्नतें हैं।” की तफ्सीर में फ़रमाया : दो जन्नतें चांदी की हैं, इन की तमाम अश्या और जुरूफ़ वगैरा चांदी के हैं और दो जन्नतें सोने की हैं, इन की तमाम चीजें और जुरूफ़ वगैरा सोने के हैं और जन्नते अदन में लोग और तजल्लिये इलाही के दरमियान सिर्फ रब की किब्रियाई का पर्दा होगा।

रहे जन्नत के दरवाजे तो वोह बहुत बे शुमार होंगे जिस तरह गुनाहों की अक्साम के मुताबिक़ जहन्नम के अलाहिदा अलाहिदा दरवाज़े हैं, इसी तरह इबादत की अक्साम के मुताबिक़ जन्नत के अलाहिदा अलाहिदा दरवाज़े होंगे चुनान्चे, हज़रते अबू हुरैरा रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया कि जिस ने अपने माल से राहे खुदा में खर्च किया, वोह जन्नत के तमाम दरवाज़ों से बुलाया जाएगा और जन्नत के आठ दरवाज़े हैं जो शख्स नमाज़ी होगा वोह नमाज़ के दरवाजे से बुलाया जाएगा, रोज़ादार रोजे वाले दरवाजे से, सदका करने वाला सदके के दरवाजे से और मुजाहिद जिहाद के दरवाजे से बुलाया जाएगा। हज़रते अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ीअल्लाहो अन्हो ने अर्ज की : या रसूलल्लाह ! सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ब खुदा !अल्लाह पर दुश्वार नहीं कि बन्दे को किस दरवाजे पर बुलाया जाए, क्या मख्लूक में से कोई शख्स ऐसा भी होगा जिसे तमाम दरवाज़ों से बुलाया जाए ? आप ने फ़रमाया : हां ! और मुझे उम्मीद है कि तुम उन्ही में से होगे।

हज़रते आसिम बिन ज़मरह, हज़रते अली रज़ीअल्लाहो अन्हो से रिवायत करते हैं, इन्हों ने जहन्नम का बहुत ज़ियादा तजकिरा किया जिसे मैं भूल गया हूं, फिर इन्हों ने कहा :

और जो लोग अपने रब से डरे वोह जन्नत की

तरफ़ जूक दर जूक ले जाए जाएंगे। जब वोह जन्नत के दरवाजों में से एक दरवाजे पर पहुंचेंगे तो वोह ऐसा दरख्त पाएंगे जिस के नीचे पानी के दो चश्मे जारी होंगे वोह हुक्म के मुताबिक़ एक चश्मे पर जाएंगे और पानी पियेंगे जिस के पीते ही उन के जिस्म से तमाम दुख-दर्द और तक्लीफें जाइल हो जाएंगे, फिर वोह दूसरे चश्मे पर जा कर उस से तहारत हासिल करेंगे, तब उन पर अल्लाह तआला की ने मतों की ताज़गी आ जाएगी, इस के बाद कभी भी उन के बाल मुन्तशिर नहीं होंगे और न ही उन के सर कभी दर्द मन्द होंगे, जैसे उन्हों ने तेल लगा लिया हो, फिर वोह जन्नत के दरवाजे पर पहुंचेंगे तो जन्नत के दरबान उन्हें कहेंगे : “तुम पर सलामती हो तुम खुश हाल हुवे लिहाज़ा इस में हमेशा रहने के लिये दाखिल हो जाओ।”

जन्नत में दाखिल होने का हैरत अंगेज़ बयान

जन्नत में दाखिल होते ही उन्हें बच्चे घेर लेंगे जैसे दुन्या में अपने किसी दूर से आने वाले किसी रिश्तेदार को बच्चे  घेर लेते हैं और वोह उस से कहेंगे तुझे खुश खबरी हो, अल्लाह तआला ने तेरे लिये फुलां फुलां इज्जत व करामत रखी है, फिर उन बच्चों में से एक लड़का  उस जन्नती की बीवियों में से किसी बीवी की तरफ़ जो कि जन्नत की हूर होगी, जाएगा और उसे कहेगा कि फुलां आदमी जो दुन्या में फुलां नाम से बुलाया जाता था, आया है। हूर कहेगी : तू ने उसे देखा है, वोह लड़का कहेगा : हां ! मैं उसे देख के आ रहा हूं और वोह भी मेरे अकब में आ रहा है, तब वोह खुशी से अज़रफ़्ता हो कर दरवाजे की देहलीज़ पर फ़र्ते इश्तियाक से खड़ी हो जाएगी। जब वोह जन्नती वहां पहुंचेगा और उस घर की बुन्यादें देखेगा जो मोतियों की होंगी और दीवारें सुर्ख, सब्ज़ और पीले हर रंग के मोतियों से बनी हुई होंगी, तब वोह छत को देखेगा, वोह बिजली की तरह ऐसी ख़ीरा कुन होगी कि अगर अल्लाह तआला उसे कुदरत न देता तो उस की आंखें जाइल हो जातीं, फिर सर झुका कर नीचे नज़र करेगा तो उसे हूरें कितार दर कितार आबखूरे लिये, सफ़ बांधे तक्ये और सजी हुई मस्नदें नज़र आएंगी और वोह उन से तक्या लगा कर कहेगा : “सब तारीफें अल्लाह तआला के लिये हैं जिस ने हमें इस की हिदायत की अगर अल्लाह हमें येह राह न दिखाता तो हम हिदायत न पाते।”

फिर पुकारने वाला पुकारेगा कि तुम ज़िन्दा रहो कभी नहीं मरोगे, इस में हमेशा रहो कभी कूच नहीं कराए जाओगे और सलामत व तन्दुरुस्त रहो कभी बीमार नहीं होगे और हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : मैं कियामत के दिन जन्नत के दरवाजे पर आ कर उसे खुलवाना चाहूंगा, जन्नत का दरबान (रिज़वान) पूछेगा : कौन हो ? मैं कहूंगा मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम दरबान कहेगा : मुझे येही हुक्म दिया गया है कि आप से पहले किसी के लिये दरवाज़ा न खोलूं।

जन्नत के बालाखाने

फिर जन्नत के बालाख़ानों, और बुलन्दो बाला मुख़्तलिफ़ तबकात के मुतअल्लिक गौर करो बेशक आखिरत बहुत बड़े दरजात और बहुत बड़ी अज़मत देने वाली है, जैसा कि लोगों की जाहिरी इबादात और इन की बातिनी सिफ़ात ब ज़ाहिर मुख्तलिफ़ हैं इसी तरह दारुल जज़ा में जन्नत के भी मुख़्तलिफ़ दरजात हैं, अगर तुम जन्नत का आ’ला दरजा हासिल करना चाहते हो तो कोशिश करो कि कोई दूसरा इबादत करने में तुम से सबक़त न ले जाए, अल्लाह तआला ने भी अपनी इताअत में मुक़ाबले और एक दूसरे से सबक़त ले जाने का हुक्म फ़रमाया है चुनान्चे,

फ़रमाने इलाही है:

अपने रब की बख्शिश की तरफ़ सबक़त हासिल करो। एक और मकाम पर इरशाद फ़रमाया : और इसी में चाहिये कि रगबत करने वाले रगबत करें। तअज्जुब की बात तो येह है कि अगर तुम्हारे दोस्त या हमसाए तुम से रूपे पैसे या मकानात की ता’मीर में तुम से सबक़त ले जाएं तो तुम को बहुत अफ्सोस होता है, तुम्हारा दिल तंग होता है हसद की वज्ह से ज़िन्दगी में बे कैफ़ी पैदा हो जाती है मगर तुम ने कभी जन्नत के हुसूल के मुतअल्लिक़ नहीं सोचा, बस अपने हालात को जन्नत के हुसूल के लिये बेहतर बनाओ और तुम जन्नत में ऐसे लोगों को पाओगे जो तुम से सबक़त ले गए होंगे, ऐसे मकामात पर रोनक अफ़रोज़ होंगे कि तमाम दुन्या भी जिस के बराबर नहीं हो सकती।

हज़रते अबू सईद खुदरी रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : बिला शुबा जन्नती अपने ऊपर बुलन्दो बाला बालाख़ानों में रहने वालों को ऐसे देखेंगे, जैसे तुम दूर मशरिको मगरिब के उफ़क़ में बहुत नीचे किसी चमकदार सितारे को देखते हो, येह उन के दरमियान बुलन्दियों की वज्ह से होगा। सहाबए किराम ने अर्ज किया : या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम क्या येह अम्बियाए किराम के मकामात होंगे जहां और लोग नहीं पहुंच पाएंगे ? आप ने फ़रमाया : हां कसम है उस जात की जिस के कब्जए कुदरत में मेरी जान है वहां वोह लोग होंगे जो अल्लाह पर ईमान लाए और जिन्हों ने रसूलों की तस्दीक की और आप सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने इरशाद फ़रमाया : जन्नत के बुलन्द दरजात वाले नीचे से ऐसे दिखाई देंगे जैसे तुम दूर मशरिक या मगरिब में आस्मान के उफ़क़ पर तुलूअ होने वाला सितारा देखते हो और अबू बक्र व उमर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम इन्ही जन्नतियों में से हैं और दोनों खूब हैं।

 

हज़रते जाबिर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम कहते हैं : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने हम लोगों से फ़रमाया कि क्या मैं तुम्हें जन्नत के बालाख़ानों के मुतअल्लिक न बताऊं ? मैं ने अर्ज किया : आप पर हमारे मां-बाप कुरबान हों या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ज़रूर इरशाद फ़रमाइये ! आप ने फ़रमाया : जन्नत में मोतियों जैसे बालाखाने हैं जिन के अन्दर वाला हिस्सा बाहर से और बाहर का हिस्सा अन्दर से देखा जा सकता है और इन में ऐसी ने’मतें, लज्जतें और मसर्रतें हैं जिन्हें न किसी आंख ने देखा, न किसी कान ने सुना और न किसी आदमी के दिल में इन का तसव्वुर गुज़रा । मैं ने पूछा : या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम येह बालाखाने किन लोगों के लिये होंगे ? आप ने फ़रमाया : उस शख्स के लिये जो सलाम को फैलाता है, खाना खिलाता है, हमेशा रोजे से रहता है और रात में जब कि लोग सोते हैं वोह नमाज़ पढ़ता है। मैं ने अर्ज की : या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम इन आ’माल को पूरा करने की ताकत कौन रखता है ? आप ने फ़रमाया : मेरे उम्मती इस की ताकत रखते हैं और मैं तुम को इस की तफ्सील बताता हूं, जो शख्स अपने मुसलमान भाई से मिला और उसे सलाम किया तो गोया उस ने सलाम को फैलाया, जिस ने अपने अहलो इयाल को खूब सैर करा कर खाना खिलाया तो उस ने खाना खिलाया, जिस ने माहे रमजान के मुकम्मल और हर महीने में तीन रोजे रखे उस ने दाइमी रोजे रखे, जो नमाजे इशा पढ़ कर सोया और उस ने सुब्ह की नमाज़ जमाअत से अदा की तो गोया उस ने सारी रात इबादत की और लोग या’नी यहूद, नसारा और मजूसी सोते रहे।हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से इस फ़रमाने इलाही : अदन के बाग में पाकीज़ा रहने की जगहें हैं। की तफ्सीर पूछी गई तो आप ने फ़रमाया कि वोह मोतियों के महल्लात होंगे, हर महल में सुर्ख याकूत के सत्तर घर होंगे, हर घर में सब्ज़ जुमर्रद के सत्तर मकान होंगे, हर मकान में एक तख्त होगा, हर तख्त पर किस्म किस्म के सत्तर बिछौने होंगे, हर बिछौने पर उस की बीवी हूरे ऐन होगी, हर मकान में सत्तर दस्तर ख्वान होंगे, हर दस्तर ख्वान पर सत्तर किस्म के खाने होंगे, हर मकान में सत्तर खादिम होंगे और मोमिन हर सुब्ह इन तमाम दस्तर ख्वानों पर बैठ कर खाएंगे।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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