दुनिया की बुराई और उससे डरना

 (हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

हज़रते अबू उमामा बाहिली रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि साअलबा बिन हातिब ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की खिदमत में अर्ज़ किया : या रसूलल्लाह ! मेरे लिये दुआ करें अल्लाह तआला मुझे माल दे। आप ने फ़रमाया : ऐ साअलबा ! थोड़ा माल जिस का तू शुक्र अदा करता है उस माले कसीर से बेहतर है जिस का तू शुक्र अदा नहीं कर सकता, साअलबा ने अर्ज़ किया : या रसूलल्लाह ! मेरे लिये अल्लाह तआला से माल की दुआ कीजिये, आप ने फ़रमाया : ऐ साअलबा ! क्या तेरे पेशे नज़र मेरी ज़िन्दगी नहीं है, क्या तू इस बात पर राजी नहीं कि तेरी ज़िन्दगी नबी की ज़िन्दगी जैसी हो, ब खुदा ! अगर मैं चाहूं कि मेरे साथ सोने और चांदी के पहाड़ चलें तो चलेंगे।

 

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साअलबा ने अर्ज किया : उस ज़ात की क़सम जिस ने आप को नबिय्ये बर हक़ बना कर भेजा है ! अगर आप मेरे लिये अल्लाह से माल की दुआ करें तो मैं इस माल से हर हक़दार का हक पूरा करूंगा और मैं ज़रूर करूंगा, ज़रूर हुकूक अदा करूंगा, हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने दुआ की : ऐ अल्लाह ! साअलबा को माल अता कर ! चुनान्चे, उस ने बकरियां ली और वो ऐसे बढ़ीं कि जैसे हशरातुल अर्ज (कीड़े मकोड़े) बढ़ते हैं और उन के लिये मदीने में रहना मुश्किल हो गया।

चुनान्चे, साअलबा मदीने से निकल कर मदीने के करीब एक वादी में आ गया और तीन नमाजें छोड़ कर सिर्फ दो नमाजें जोहर और अस्र जमाअत के साथ पढ़ने लगा, बकरियां और बढ़ीं और वो कुछ और दूर हो गया यहां तक कि वो सिर्फ नमाजे जुमआ में शरीक होता और बकरियां बराबर बढ़ती गई यहाँ तक कि इन की मसरूफ़िय्यत की वज्ह से उस की जुमआ की जमाअत भी छूट गई और वो जुमआ के दिन मदीने से आने वाले सवारों से मदीने के हालात पूछ लेता और हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने उस के मुतअल्लिक पूछा कि साअलबा बिन हातिब का क्या बना ? अर्ज की गई कि या रसूलल्लाह ! उस ने बकरियां लीं और वो इतनी बढ़ीं कि उन का मदीने में रहना दुश्वार हो गया और उस के तमाम हालात बतलाए गए । आप ने सुन कर फ़रमाया : ऐ साअलबा ! अफसोस !…… ऐ साअलबा ! अफ्सोस !…..अफ्सोस !….. ऐ साअलबा ! रावी कहते हैं कि तब कुरआने मजीद की यह आयत नाज़िल हुई :

“उन के माल से सदका लीजिये उन के ज़ाहिर और बातिन को पाक कीजिये उन के सदक़ात और उन के लिये दुआ कीजिये बेशक आप की दुआ उन के लिये तस्कीन है। हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने जुहैना और बनू सुलैम के दो आदमियों को सदक़ात की वुसूलयाबी पर मुकर्रर फ़रमाया और इन्हें सदक़ात के अहकामात और सदक़ात वुसूल करने की इजाजत लिख कर रवाना फ़रमाया कि जाओ और मुसलमानों से सदक़ात वुसूल कर के लाओ और फ़रमाया कि साअलबा बिन हातिब और फुलां आदमी के पास जाना जो बनी सुलैम से तअल्लुक रखता है और उन से भी सदक़ात वुसूल करना । चुनान्चे, येह दोनों हज़रात सा’लबा के पास आए और उसे हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का फ़रमान पढ़वा कर सदक़ात (बकरियों की ज़कात) का सवाल किया। सा’लबा ने कहा : यह तो टेक्स है, यह तो टेक्स है, यह तो टेक्स ही की एक शक्ल है, तुम जाओ, जब तुम फ़ारिग हो चुको तो मेरे पास फिर आना।

फिर यह हज़रात बनू सुलैम के उस आदमी के पास आए जिस के मुतअल्लिक़ हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया था : जब उस ने सुना तो उस ने अपने आ’ला मर्तबा ऊंटों के पास जा कर उन में से सदके के लिये अलाहिदा कर दिये और उन्हें ले कर इन हज़रात की ख़िदमत में आया, इन हज़रात ने जब वो ऊंट देखे तो बोले : तुम्हारे लिये यह ऊंट देना ज़रूरी नहीं हैं और न ही हम तुम से उम्दा और आ’ला ऊंट लेने आए हैं, उस शख्स ने कहा : इन्हें ले लीजिये, मेरा दिल इन्हीं से खुश होता है और मैं यह आप ही को देने के लिये लाया हूं।

जब यह हज़रात सदक़ात की वुसूली से फ़ारिग हो चुके तो सा’लबा के पास आए और उस से फिर सदक़ात का सुवाल किया, सा’लबा ने कहा : मुझे खत दिखाओ और उस ने खत देख कर कहा : यह टेक्स ही की एक शक्ल है, तुम जाओ ताकि मैं इस बारे में कुछ गौर कर सकू, लिहाज़ा यह हज़रात वापस रवाना हो गए और हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की ख़िदमत में हाज़िर हुवे, हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने इन से बात चीत करने से पहले महज़ इन्हें देखते ही फ़रमाया : ऐ सा’लबा अफसोस ! और बनू सुलैम के उस शख्स के लिये दुआ फ़रमाई, फिर इन हज़रात ने आप को सा’लबा और सुलैमी के मुकम्मल हालात सुनाए, अल्लाह तआला ने सा’लबा के बारे में यह आयात नाज़िल फ़रमाई :

“और बा’ज़ उन में से वो है कि जिस ने अल्लाह से अहद किया कि अगर अल्लाह हमें अपने फज्ल से अता फ़रमाएगा तो अलबत्ता हम सदक़ा देंगे और

सालिहीन में से होंगे पस जब उन को अल्लाह तआला ने अपने फज्ल से अता किया तो उन्हों ने बुख़्ल किया माल के साथ और फिर गए और मुंह फेरने वाले हैं पस निफ़ाक़ उन के दिलों में कियामत के दिन तक असर दे गया ब सबब इस के कि उन्हों ने अल्लाह से किये हुवे वादे के खिलाफ किया और ब सबब इस के कि वो झूट बोलते थे। हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की खिदमत में उस वक्त सा’लबा का एक रिश्तेदार बैठा हुवा था, उस ने सा’लबा के मुतअल्लिक नाज़िल होने वाली आयात को सुना तो उठ कर सा’लबा के पास गया और उसे कहा : तेरी वालिदा मारी जाए ! अल्लाह तआला ने तेरे बारे में फुलां फुलां आयात नाज़िल की हैं, सा’लबा ने येह सुना तो हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की ख़िदमत में हाज़िर हुवा और सदका कबूल करने की दरख्वास्त की। हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : मुझे अल्लाह तआला ने तेरा सदक़ा लेने से मन्अ कर दिया है।

सा’लबा यह सुनते ही अपने सर में खाक डालने लगा । हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : तेरे येह करतूत ! मैं ने तुझ से पहले कह दिया था मगर तू ने मेरी बात नहीं मानी थी।

जब हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने सदका लेने से बिल्कुल इन्कार कर दिया तो वो अपने ठिकाने पर लौट आए, जब हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम विसाल फ़रमा गए तो वो अपने सदक़ात ले कर अबू बक्र रज़ीअल्लाहो अन्हो की खिदमत में हाज़िर हुवा मगर इन्हों ने भी लेने से इन्कार कर दिया, फिर हज़रते उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो के दौरे खिलाफ़त में हाज़िर हुवा मगर इन्हों ने भी इन्कार कर दिया, यहां तक कि हज़रते उस्मान रज़ीअल्लाहो अन्हो के खलीफ़ा बनने के बाद सा’लबा का इन्तिकाल हो गया।

एक इबरत अंगेज वाकिआ – ईसा अलैहहिस्सलाम और लालची आदमी का किस्सा

जरीर ने लैस से रिवायत की है कि एक शख्स हज़रते ईसा अलैहहिस्सलाम  की सोहबत में आया और कहने लगा : मैं आप की सोहबत में हमेशा आप के साथ रहूंगा, लिहाज़ा हज़रते ईसा अलैहहिस्सलाम  और वोह आदमी इकट्ठे रवाना हो गए। जब एक दरया के किनारे पहुंचे तो खाना खाने के लिये बैठ गए, उन के पास तीन रोटियां थीं, जब दो रोटियां खा चुके और एक रोटी बाक़ी रह गई तो हज़रते ईसा . दरया पर पानी पीने तशरीफ़ ले गए। जब आप पानी पी कर वापस तशरीफ़ लाए तो रोटी मौजूद नहीं थी, आप ने पूछा : रोटी किस ने ली है? वोह आदमी बोला कि मुझे मालूम नहीं।

रावी कहते हैं कि हज़रते ईसा . उसे ले कर आगे चल पड़े और आप ने हिरनी को देखा जो दो बच्चे साथ लिये जा रही थी। आप ने उस के एक बच्चे को बुलाया, जब वोह आया तो आप ने उसे ज़ब्ह किया और गोश्त भून कर खुद भी खाया और उस शख्स को भी खिलाया, फिर बच्चे से फ़रमाया : अल्लाह के हुक्म से खड़ा हो जा। चुनान्चे, हिरनी का बच्चा खड़ा हो गया और जंगल की तरफ़ चल दिया, तब आप ने उस आदमी से कहा : मैं तुझ से उस ज़ात के नाम पर सुवाल करता हूं जिस ने तुझे येह मो’जिज़ा दिखलाया, रोटी किस ने ली थी ? वोह आदमी बोला : मुझे मालूम नहीं है।

फिर आप एक झील पर पहुंचे और उस शख्स का हाथ पकड़ा और दोनों सहे आब पर चल पड़े, जब पानी उबूर कर लिया तो आप ने उस शख्स से पूछा : तुझे उस ज़ात की क़सम ! जिस ने तुझे येह मो’जिज़ा दिखाया बता वोह रोटी किस ने ली थी ? उस आदमी ने फिर जवाब दिया कि मुझे मालूम नहीं है।

फिर आप रवाना हो गए और एक जंगल में पहुंचे, जब दोनों बैठ गए तो हज़रते ईसा अलैहहिस्सलाम  ने मिट्टी और रैत की ढेरी बना कर फ़रमाया कि अल्लाह के हुक्म से सोना हो जा, चुनान्चे, वोह सोना बन गई और आप ने उस की एक जैसी तीन ढेरियां बनाई और फ़रमाया : तिहाई मेरी, तिहाई तेरी और तिहाई उस शख्स की है जिस ने वोह रोटी ली थी, तब वोह आदमी बोला : वोह रोटी मैं ने ली थी, आप ने उस से फ़रमाया : येह सोना तमाम का तमाम तेरा है और उसे वहीं छोड़ कर आगे रवाना हो गए।

उस शख्स के पास दो आदमी आ गए, उन्हों ने जब जंगल में एक आदमी को इतने मालो मताअ के साथ देखा तो उन की निय्यत बदल गई और उन्हों ने इरादा किया कि उसे क़त्ल कर के माल समेट लें। उस आदमी ने जब उन की निय्यत भांप ली तो खुद ही बोल उठा कि येह माल हम तीनों ही आपस में बराबर बराबर तक्सीम कर लेते हैं, फिर उन्हों ने अपने में से एक शख्स को शहर की तरफ रवाना किया ताकि वोह खाना खरीद लाए । जिस शख्स को उन्हों ने शहर की तरफ़ खाना लाने के लिये भेजा था, उस के दिल में खयाल आया कि मैं इस माल में उन को हिस्सेदार क्यूं बनने दूं ? मैं खाने में ज़हर मिलाए देता हूं ताकि वोह दोनों ही हलाक हो जाएं और माल अकेला मैं ही ले लूं, चुनान्चे, उस ने ऐसा ही किया।

रावी कहते हैं कि इधर जो दो आदमी जंगल में बैठे हुवे थे, उन्हों ने इरादा कर लिया कि हम उसे एक तिहाई क्यूं दें ? जूही वोह आए हम उसे क़त्ल करें और दौलत हम दोनों आपस में तक्सीम कर लें, चुनान्चे, जब वोह आदमी खाना ले कर आया तो उन्हों ने उसे क़त्ल कर दिया और बाद में वोह खाना खाया जिसे खाते ही वोह दोनों भी मर गए और सोने की ढेरियां इसी तरह पड़ी रहीं और जंगल में तीन लाशें रह गई।

हज़रते ईसा अलैहहिस्सलाम  का फिर वहां से गुज़र हुवा और उन की येह हालत देख कर अपने साथियों से फ़रमाया : देखो येह दुनिया  है, इस से बचते रहना।

हिकायत – जुलकरनैन एक अजीब किस्सा

जुलकरनैन ऐसे लोगों के पास पहुंचे जिन के पास दुनिया वी मालो मताअ बिल्कुल नहीं था, उन्हों ने अपनी कब्रें तय्यार कर रखी थीं, जब सुब्ह होती तो वोह कब्रों की तरफ़ आते, उन की याद ताज़ा करते, उन्हें साफ़ करते और उन के करीब नमाजें पढ़ते और जानवरों की तरह कुछ घास पात खा लेते और उन्हों ने गुजर बसर सिर्फ ज़मीन से उगने वाली सब्जियों वगैरा पर महदूद कर रखी थी। जुलकरनैन ने उन के सरदार को एक आदमी भेज कर बुलाया लेकिन सरदार ने कहा : जुलकरनैन को जवाब देना कि मुझे तुम से कोई काम नहीं है, अगर तुम्हें कोई काम है तो मेरे पास आ जाओ। जुलकरनैन ने येह जवाब सुन कर कहा कि वाकेई उस ने सच कहा है : चुनान्चे, जुलकरनैन उस के पास आया और उस ने कहा : मैं ने तुम्हारी तरफ़ आदमी भेज कर तुम्हें बुलाया मगर तुम ने इन्कार कर दिया लिहाज़ा मैं खुद आया हूं। सरदार ने कहा : अगर मुझे तुम से कोई काम होता तो ज़रूर आता । जुलकरनैन ने कहा : मैं ने तुम्हें ऐसी हालत में देखा है कि किसी और कौम को इस हालत में नहीं देखा, सरदार ने कहा : आप किस हालत की बात कर रहे हैं ? जुलकरनैन ने कहा : येही कि तुम्हारे पास दुनिया वी मालो मताअ और मालो मनाल कुछ भी नहीं है.

जिस से तुम बहरा अन्दोज़ हो सको । सरदार ने कहा : हम सोना चांदी का जम्अ करना बहुत बुरा समझते हैं क्यूंकि जिस शख्स को येह चीजें मिलती हैं वोह इन में मगन हो जाता है और उस चीज़ को जो इन से कहीं बेहतर है, भूल जाता है। जुलकरनैन ने कहा : तुम ने कब्र क्यूं तय्यार कर रखी हैं ? हर सुब्ह इन की जियारत करते हो, इन्हें साफ़ करते हो और इन के करीब खड़े हो कर नमाज़ पढ़ते हो । सरदार ने कहा : येह इस लिये कि जब हम कब्रों को देखेंगे और दुनिया  की आरजू करेंगे तो येह क़बें हमें दुनिया  से बे नियाज़ कर देंगी और हमें हिर्स व हवा से रोक देंगी। जुलकरनैन ने पूछा : मैं ने देखा है कि ज़मीन के सब्जे के इलावा तुम्हारी कोई गिज़ा नहीं है, तुम जानवर क्यूं नहीं रखते ताकि तुम इन का दूध दोहो, इन पर सुवारी करो और इन से बहरा अन्दोज़ हो सको, सरदार ने कहा : हम इस चीज़ को अच्छा नहीं समझते कि हम अपने पेटों को इन की कब्रे बनाएं और हम ज़मीन के सब्जे से काफ़ी गिजा हासिल कर लेते हैं और येह इन्सान की गुज़र अवकात के लिये काफ़ी है, जब खाना हल्क से उतर जाता है (चाहे वोह कैसा ही हो) फिर इस का कोई मज़ा बाक़ी नहीं रहता।

फिर उस काइद (सरदार) ने जुलकरनैन के पीछे हाथ बढ़ा कर के एक खोपड़ी उठाई और कहा : जुलकरनैन ! जानते हो येह कौन है ? जुलकरनैन ने कहा : नहीं ! येह कौन है ? काइद ने कहा : येह दुनिया  के बादशाहों में से एक बादशाह था, अल्लाह तआला ने इसे दुनिया  वालों पर शाही अता फ़रमाई थी लेकिन इस ने जुल्मो सितम किया और सरकश बन गया। जब अल्लाह तआला ने इस की येह हालत देखी तो इसे मौत दे दी और येह एक गिरे पड़े पथ्थर की मानिन्द बे वक्अत हो गया, अल्लाह तआला ने इस के आ’माल शुमार कर लिये हैं ताकि इसे आख़िरत में सजा दे।

फिर उस ने एक और खोपड़ी उठाई जो बोसीदा थी और कहा : जुलकरनैन ! जानते हो येह कौन है ? जुलकरनैन ने कहा : नहीं, बताओ कौन है ? काइद ने कहा : येह एक बादशाह है जिसे पहले बादशाह के बाद हुकूमत मिली, येह अपने पीशर व बादशाह का मख्लूक पर जुल्मो सितम और ज़ियादतियां देख चुका था लिहाज़ा इस ने तवाज़ोअ की, अल्लाह का खौफ़ किया और मुल्क में अद्लो इन्साफ़ करने का हुक्म दिया, फिर येह भी मर कर ऐसा हो गया, जैसा तुम देख रहे हो और अल्लाह तआला ने इस का शुमार फ़रमा लिया है, यहां तक कि इसे आख़िरत में इन का बदला देगा। फिर वोह जुलकरनैन की खोपड़ी की तरफ़ मुतवज्जेह हुवा और कहने लगा : येह भी इन्ही की तरह है, जुलकरनैन ! ख़याल रखना कि तुम कैसे आ’माल कर रहे हो ? जुलकरनैन ने उस की बातें सुन कर कहा : क्या तुम मेरी दोस्ती में रहना चाहते हो ? मैं तुम्हें अपना भाई और वज़ीर या जो कुछ अल्लाह तआला ने मुझे मालो मनाल दिया है, उस में अपना शरीक बना लूंगा। सरदार ने कहा : मैं और आप सुल्ह नहीं कर सकते और न ही हम इकठे रह सकते हैं, जुलकरनैन ने कहा : वोह क्यूं ? सरदार ने कहा : इस लिये कि लोग तुम्हारे दुश्मन और मेरे दोस्त हैं, जुलकरनैन ने पूछा : वोह कैसे ? सरदार ने कहा : वोह तुम से तुम्हारा मुल्क, माल और दुनिया  की वज्ह से दुश्मनी रखते हैं और चूंकि मैं ने इन चीज़ों को छोड़ दिया है लिहाज़ा कोई एक भी मेरा दुश्मन नहीं है और इसी लिये मुझे किसी चीज़ की हाजत नहीं है और न मेरे पास किसी चीज़ की कमी है। रावी कहता है कि जुलकरनैन येह बातें सुन कर इन्तिहाई मुतअस्सिर हुवा और हैरान वापस लौट आया।

किसी शाइर ने क्या ही अच्छा कहा है :

ऐ वोह शख्स ! जो दुनिया  और इस की जीनत से नफ्अ अन्दोज़ होता है और दुनिया वी लज्जतों से उस की आंखें नहीं सोतीं। खुद को ना मुमकिन चीज़ों के हुसूल में मश्गूल कर दिया है, जब तू अल्लाह की बारगाह में हाज़िर होगा तो क्या जवाब देगा ?

दूसरे शाइर का कौल है :

मैं ने दुनिया  के जाहिलों को बहुत मरतबा अता करने और अहले फ़ज़ल से किनारा कशी करने पर मलामत की तो उस ने मुझ से कहा कि मेरी मजबूरी सुनिये।

जाहिल मेरे बेटे हैं लिहाज़ा मैं उन्हें सर बुलन्दी देती हूं और मुत्तकी अहले फ़ज़्ल मेरी सोकन आखिरत के फ़रज़न्द हैं (लिहाज़ा मैं इन से गुरैज़ करती हूं)।

हज़रते महमूद बाहिली का कौल है :

बेशक दुनिया  आए या जाए इन्सान के लिये हर हाल में फ़ितना व आज़माइश है। जब दुनिया  आती है तो दाइमी शुक्र साथ लाती है (तो शुक्र अदा कर) और जब जाए तो सब्र और साबित कदमी का मुजाहरा कर ।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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दुनिया के धोके और फ़रेब

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 

दुनिया के तमाम हालात खुशी और गम के इर्द गिर्द गर्दिश करते रहते हैं, दुनिया अपने चाहने वालों की ख्वाहिशात के मुताबिक़ नहीं रहती बल्कि वो हकीमे मुतलक अल्लाह तआला की हिक्मत के मुताबिक़ रंग बदलती रहती है, फ़रमाने इलाही है :

वह हमेशा मुख्तलिफ़ रहेंगे मगर वो जिस पर तेरे रब ने रहम किया (वो इस से महफूज़ रहेंगे)। बा’ज़ मुफस्सिरीन का कहना है कि यहां ‘इख़्तिलाफ़’ से मुराद रिज्क का इख़्तिलाफ़ है या’नी बा’ज़ गनी हैं और बा’ज़ फ़क़ीर हैं लिहाज़ा हर शख्स के लिये ज़रूरी है जिसे दुनिया का माल मिल जाए और रब्बे जुल जलाल दुनिया को उस का ख़ादिम बना दे तो वो शुक्र अदा करता रहे और नेक कामों में उसे सर्फ करे क्यूंकि अच्छे आ’माल बुराइयों को ज़ेर कर लेते हैं और अपनी दुनिया पर गुरूर न करे और येह फ़रमाने इलाही इस बात को समझने के लिये काफ़ी है “तुम्हें दुनिया की ज़िन्दगी फ़रेब न दे और न तुम्हें कोई फ़रेब देने वाला अल्लाह से फरेब दे। और फ़रमाने इलाही है :

“लेकिन तुम ने अपने आप को फ़ितने में डाला और तुम मुन्तज़िर रहे और तुम ने शक किया और तुम्हें आरजूओं ने फ़रेब में डाला।”

दुनिया के फ़रेब से गुरेज़ के लिये येह आयात अक्लमन्द इन्सान को बहुत कुछ बसीरत सिखाती हैं। उन अक्लमन्दों की नींद और बेदारी कैसी अजीब है जो बे वुकूफों की शब बेदारी और कोशिशों पर रश्क करते हैं हालांकि खुद कुछ भी नहीं कर पाते। ।

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दानिशमन्द कौन ? समझदार कौन?

फ़रमाने नबवी है कि अक्लमन्द वोह है जिस ने अपने नफ्स का मुहासबा किया और मौत के बाद के लिये अमल किये और अहमक़ वोह है जिस ने नफ़्सानी ख्वाहिशात की पैरवी की और अल्लाह तआला से ढेरों दुनियावी तमन्नाएं रखीं ।

शाइर कहता है:

और जो शख़्स किसी पसन्दीदा चीज़ की वज्ह से दुनिया की तारीफ़ करता है मुझे ज़िन्दगी की कसम अन क़रीब वोह उसे बुरा भला कहेगा। .जब दुनिया चली जाती है तो इन्सान के दिल में हसरत छोड़ जाती है और जब आती है तो बे शुमार दुख ले कर आती है।

एक और शाइर कहता है :

ब खुदा ! अगर दुनिया अपनी तमाम तर मालो मता के बा वुजूद हमारे लिये परहेज़गारी का निशान होती और लगातार उस का रिज्क आता रहता। तब भी किसी मर्दे आज़ाद के लिये उस की तरफ़ रुजूअ मुनासिब न होता चे जाए कि येह माल ही ऐसा बनाया गया हो जो कल ख़त्म हो जाए।

इब्ने बस्साम कहता है:

दुनिया और इस के अय्याम पर हैफ़ है, बेशक येह दुखों के लिये पैदा की गई है। इस के दुख एक लम्हा भी ख़त्म नहीं होते चाहे इस में कोई बादशाह है या फ़क़ीर है। इस पर और इस के अजीब हालात पर तअज्जुब है, येह लोगों की जान लेवा मा’शूका है।

एक और शाइर कहता है:

मैं देखता हूं कि जमाना बखील तरीन लोगों को बे इन्तिहा माल देने पर आमादा रहता है। और साहिबे इज्जत व फजीलत से ज़माना दुनिया को रोक देता है, मैं ने इसे कहा : तुम अस्ल बात में गौर करो। ख़बीस हराम कमाई से माल इकठ्ठा करते हैं लिहाज़ा ख़बीस माल और ख़बीस लोगों में जम्अ होते हैं।

दूसरा शाइर कहता है :

ज़माने से पूछ तू ने किस्रा, कैसर, उन के महल्लात और उन में रहने वालों से क्या किया ? .क्या इन सब ने तुझ से जुदाई की इस्तिद्आ की थी कि तू ने किसी अक्लमन्द और किसी बे वुकूफ़ को नहीं छोड़ा।

कहते हैं कि एक बदवी किसी कबीले में आया, लोगों ने उसे खाना खिलाया और वोह खाना खा कर उन के खेमे के साए में लैट गया, फिर उन्हों ने खैमा उखेड़ लिया और बदवी को जब भूक लगी तो उस की आंख खुल गई और वोह कहता हुवा वहां से चल दिया

बा खबर हो जाओ येह दुनिया इमारत के साए की तरह है और ला महाला एक दिन इस का साया जाइल हो जाएगा। बिला शुबा दुनिया सुवार के लिये कैलूला करने की जगह है, उस ने अपनी हाजत पूरी की और फिर इसे छोड़ दिया।

किसी दाना ने अपने दोस्त से कहा : तुझे दावेदार  ने सब कुछ सुना दिया और बुलाने वाले ने सब कुछ वज़ेह  कर दिया, उस शख्स से बढ़ कर और कोई मुसीबत में मुब्तला नहीं जिस ने यक़ीने कामिल को गंवा दिया और गलत कारियों में मश्गूल हुवा।

हज़रते इब्ने मसऊद रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि खौफे इलाही के लिये इल्म और तकब्बुर व गुरूर के लिये जहालत काफ़ी है।

फ़रमाने नबवी है कि जिस ने दुनिया से महब्बत रखी और इस की जैबो जीनत से मसरूर हुवा, उस के दिल से आख़िरत का ख़ौफ़ निकल गया।

बा’ज़ उलमा का कौल है कि बन्दे से मालो दौलत के चले जाने पर रन्जो गम करने और मालो दौलत की फ़रावानी में खुशी पर मुहासबा किया जाएगा।

बा’ज़ सलफ़े सालिहीन जिन्हें अल्लाह तआला ने दुनिया दी थी, वोह हराम कर्दा बातों से तुम से ज़ियादा बचने वाले थे और जो काम करना तुम्हें मुनासिब नज़र नहीं आता वोह उन के नज़दीक मोहलिक तरीन समझे जाते थे।

हज़रते उमर अब्दुल अज़ीज़ रज़ीअल्लाहो अन्हो बसा अवकात मिसअर बिन किदाम रज़ीअल्लाहो अन्होके येह अश्आर पढ़ा करते थे:

1)……ऐ फ़रेब खुर्दा ! तेरा दिन नींद और गफलत में और तेरी रात सोने में पूरी होती है और मौत तेरे लिये लाज़िमी है। (2)……ज़ाइल शुदा माल तुझे फ़रेब में डालता है और उम्मीदें पा कर तू बहुत खुश होता है जैसे ख्वाब देखने वाला ख्वाब में लुत्फ़ अन्दोज़ होता है। (3)……अन करीब तू अपनी इस दुनियावी मश्गूलिय्यत को बुरा समझेगा, ऐसी ज़िन्दगी तो दुनिया में जानवरों की होती है।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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गफ़लत- दुनिया और आखिरत की ज़िन्दगी  

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

Color Codes –  कुरआन मजीदहदीसे पाककौल (Quotes). 

गफ़लत से शर्मिंदगी बढती है और नेमत मिटती है, खिदमत का जज़्बा फीका पड़ जाता है. हसद ज्यादा हौता है और मलामत व पछतावे की हालत ज्यादा होती है.

सबसे बड़ी हसरत – एक नेक आदमी ने अपने उस्ताद को ख्वाब में देखा और पुछा आप के नज़दीक सब से बड़ी हसरत कौन सी है? उस्ताद ने जवाब दिया गफ़लत की हसरत सब से बड़ी है.

रिवायत है की किसी शख्श ने हजरते जुन्नून मिस्री रहमतुल्लाह अलैह को ख्वाब में देखा और सवाल किया की अल्लाह ताआला ने आप के साथ क्या सुलूक किया? तो उन्होंने जवाब दिया की अल्लाह ने मुझे अपनी बारगाह में खड़ा किया और फ़रमाया की ऐ झूठे दावेदार! तूने मेरी मोहब्बत का दावा किया और फिर मुझ से गाफिल रहा- शेर

“तू गफ़लत में मुब्तला है और तेरा दिल भूलने वाला है, उम्र ख़त्म हो गयी और गुनाह वेसे के वेसे ही मौजूद हैं”.

हिकायत – एक नेक आदमी ने अपने वालिद को ख्वाब में देख कर पुछा ए अब्बा जान! आप कैसे हैं और क्या हाल है? वालिद ने जवाब दिया हमने गफ़लत में ज़िन्दगी गुज़री और गफ़लत में ही मर गए.

 

मौत के पैगम्बर और याकूब अलैहिसलाम का किस्सा  

ज़हरुर रियाज़ में है की हज़रते याकूब अलैहिसलाम का मलकुल मौत से भाई चारा दोस्ती थी. एक दिन मलकुल मौत हाज़िर हुए तो हज़रत याकूब अलैहिसलाम ने पुछा तुम मुलाकात के लिए आये हो या रूह कब्ज़ करने को? इजराईल ने कहा सिर्फ मुलाक़ात के लिए आया हूँ. आपने फ़रमाया मुझे एक बात कहनी है. मल्कुल्मौत बोले कहिये कौन सी बात है? हज़रत याकूब अलैहिसलाम ने फ़रमाया जब मेरी मौत करीब आ जाये और तुम रूह कब्ज़ करने को आने वाले हो तो मुझे पहले से आगाह कर देना – मलकुल मौत ने कहा मैं अपने आने से पहले आप के पास दो तीन कासिद भेजूंगा

जब हज़रत याकूब अलैहिसलाम का आखिरी वक़्त आया और मलकुल मौत रूह कब्ज़ करने को पहुंचे तो आप ने कहा की तुम ने तो वादा किया था की अपने आने से पहले मेरी तरफ कासीद भेजोगे! इजराईल ने कहा मैंने ऐसा ही किया था, पहले तो आप के काले बाल सफ़ेद हुए, यह पहला कासिद था, फिर बदन की चुस्ती और ताक़त ख़त्म हुयी यह दूसरा कासिद था, फिर आप का बदन झुक गया यह तीसरा कासिद था. ए याकूब अलैहिसलाम, हर इन्सान के पास मेरे भी तीन कासिद आते हैं.

शेर

ज़माना गुज़र गया और गुनाहों को छोड़ गया, मौत का कासिद आ पहुंचा और दिल गाफिल ही रहा.

तेरी दुनियावी नेमते धोका और फ़रेब हैं, और तेरा दुनिया में हमेशा रहना मुहाल और धोका है.

 

शैख़ अबू अली दक्काक  रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं की में एक ऐसे बीमार नेक मर्द की अयादत को गया जिन की गिनती बड़े मशाईख में हौती थी, मैंने उन के पास उन के शागिर्दों को बैठे हुए देखा, शैख़ अबू अली रहमतुल्लाह अलैह रो रहे थे मैंने कहा ऐ शैख़ क्या आप दुनिया पर रो रहे हैं? उन्होंने फ़रमाया नहीं, मैं अपनी नमाज़ों के कज़ा होने पर रो रहा हूँ, मैंने कहा आप तो इबादत गुज़र शख्श थे फिर नमाज़ें किस तरह कज़ा हुई? उन्होंने फ़रमाया मैंने हर सजदा गफ़लत में किया और हर सजदे से गफ़लत में सर उठाया और अब गफ़लत की हालत में मर रहा हूँ, फिर एक आह भरी और यह अशआर पढ़े

मैंने अपने हश्र, कयामत के दिन और कब्र में रहने के बारे में सोचा

जो इज्ज़त और वकार वाले वजूद के साथ मिटटी का गिरवी होगा और मिटटी ही उस का तकिया होगा.

मैंने हिसाब के दिन की तवालत के बारे में सोचा और उस वक़्त की रुसवाई का ख्याल किया जब नामा ए आमाल मुझे दिया जायेगा.

मगर ऐ रब्बे ज़ुल्जलाल! मेरी उम्मीदें तेरी रहमत के साथ हैं, तू ही मेरा खालिक और मेरे गुनाहों को बख्शने वाला है.

 

महज़ दावा बेकार है

महज़ दावा बेकार हैउयुनुल अखबार में है हज़रत शकीक बल्खी रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं, लोग तीन बातें महज़ जबानी करते हैं मगर अमल उस के खिलाफ करते हैं

1 यह कहते हैं की हम अल्लाह ताआला के बन्दे हैं लेकिन काम गुलामों जैसे नहीं करते बल्कि आज़ादों की तरह अपनी मर्ज़ी पर चलते हैं.

2 यह कहते हैं की अल्लाह ताआला ही हमें रिज्क रोज़ी देता है लेकिन उन के दिल दुनिया और दुनिया की दौलत जमा किये बगैर मुतमईन नहीं होते और यह उन के इकरार के सरासर खिलाफ है.

3 तीसरा यह की कहते हैं की आखिर हमें मर जाना है लेकिन काम ऐसे करते हैं जैसे उन्हें कभी मरना ही नहीं.

ऐ मुखातब! ज़रा सोच तो सही, अल्लाह के सामने तु कौनसा मुंह लेकर जाएगा और कौन सी ज़बान से जवाब देगा? जब वह तुझ से हर छोटी-बड़ी चीज़ के बारे में सवाल करेगा, उन सवालों के लिए अभी से अच्छा जवाब तलाश कर ले !

अल्लाह का फरमान है

“और अल्लाह से डरो! बेशक तुम जो कुछ करते हो, अल्लाह उससे आगाह है और खबर रखता है.”

फिर अल्लाह ने मोमिनों को समझाया की वह उस के अहकामात को ना छोड़ें और हर हालत में उस की वहदानियत (एक होने) का इकरार करते रहें.

अल्लाह की इताअत

 हदीस शरीफ में आया है की “अर्शे इलाही के पाए पर तहरीर है की जो मेरी इताअत करेगा, मैं उसकी बात मानूंगा, जो मुझसे मोहब्बत करेगा मै उसे अपना महबूब बनाऊंगा, जो मुझ से मांगेगा में उसे अता करूँगा और बख्शिश की तलब करेगा उसे बख्श दूंगा.”

इस फरमाने नबवी सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की रौशनी में हर समझदार और अक्लमंद के लिए ज़रूरी है की वह खौफ और भरपूर खुलूस के साथ अल्लाह ताआला की इबादत करता रहे और राज़ी बकज़ा रहे, उस की दी हुई मुसीबतों पर सब्र करे, उस की नेमतों का शुक्र करते हुए कम व ज्यादा पर राज़ी हो जाए. अल्लाह ताआला फरमाता है जो मेरी कज़ा पर राज़ी, मसाइब पर साबिर नहीं और नेमतों का शुक्र अदा नहीं करता और कम व ज्यादा पर कनाअत नहीं करता, वह मेरे सिवा कोई और रब तलाश कर ले.

 

हज़रत हसन बसरी का एक दिलनशीं जवाब

एक शख्श ने जनाब हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह से कहा की ताज्जुब है की मै इबादत में लुत्फ़ नहीं पाता! आप ने जवाब दिया “शायद तूने किसी ऐसे शख्श को देख लिया है जो अल्लाह से नहीं डरता.”

बंदगी का हक़ यह है की अल्लाह की रज़ा के लिए तमाम चीज़ों को छोड़ दिया जाये.

किसी शख्श ने जनाब अबी यज़ीद रहमतुल्लाह अलैह से कहा की मै इबादत में कैफ और सुरूर नहीं पाता!  उन्होंने जवाब दिया की यह इसलिए है की तू इबादत की बंदगी करता है, अल्लाह ताआला की बंदगी नहीं करता! तू अल्लाह की बंदगी कर फिर देख इबादत में कैसा मज़ा आता है.

 

अल्लाह की इबादत या मखलूक की इबादत

एक शख्श ने नमाज़ शुरू की, जब “इय्याका नाअ बोदू” पढ़ा तो उसके दिल में ख्याल आया की में खालिसतन (केवल) अल्लाह की इबादत कर रहा हूँ, गैब से आवाज़ आई तूने झूठ बोला है! तू तो मखलूक की इबादत करता है, तब उसने मखलूक से नाता तोड़ लिया और नमाज़ शुरू की, जब फिर उसी आयत तक पहुंचा तो वही दिल में गुज़रा, फिर निदा आई की तू अपने माल की इबादत करता है, उसने सारा माल राहे खुदा में खर्च कर दिया, और नमाज़ की नियत की, जब उसी आयत तक पहुंचा तो फिर ख्याल आया की मै हक़ीक़त में अल्लाह की इबादत करने वाला हूँ, निदा आई की तुम झूठे हो, तुम अपने कपड़ों की इबादत करते हो! उस वक़्त उस अल्लाह के बन्दे ने बदन के कपड़ों के अलावा सब कपडे अल्लाह के रास्ते में लुटा दिए, अब जो नमाज़ में उस आयत पर पहुंचा तो आवाज़ आई की अब तुम अपने दावे में सच्चे हो.

 

नसीहत पर गुलाम को आज़ाद कर दिया

रौनक उल मजालिस में है की एक शख्श की अबायें (लिबास) गुम हो गईं, और यह नहीं पता चल रहा था की उन्हें कौन ले गया, जब उस शख्श ने नमाज़ शुरू की तो उसे याद आ गया, ज्यों ही नमाज़ से फारिग हुआ, गुलाम को आवाज़ दी की जाओ फलां आदमी से मेरी अबायें ले आओ! गुलाम ने कहा की आप को यह कब याद आया? उसने कहा मुझे नमाज़ में याद आया गुलाम ने फ़ौरन जवाब दिया तब तो आपने नमाज़ अबा के लिए पढ़ी, अल्लाह के लिए नहीं, यह बात सुनते ही उस शख्श ने उस गुलाम को आज़ाद कर दिया.

इसलिए हर समझदार के लिए ज़रूरी है की वह दुनिया को तर्क कर दे और अल्लाह की इबादत करता रहे, आइन्दा के बारे में गौर व फ़िक्र करता रहे और अपनी आखिरत संवारता रहे जैसा की फरमाने इलाही है-

“जो शख्श आखिरत की खेती की फ़िक्र करता है तो हम उसकी खेती ज्यादा करते हैं और जो शख्श दुनिया की खेती का इरादा करता है हम उसे उस में से कुछ देंगे और आखिरत में उस का कुछ हिस्सा नहीं.”

यानी उसके दिल से आखिरत की मोहब्बत निकाल दी जाती है, इसीलिए हज़रते अबू बकर सिद्दीक़ रज़िअल्लाहो अन्हो ने हुज़ूरे अकरम मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की ज़ात पर चालीस हज़ार दीनार एलानिया और चालीस हज़ार दीनार पोशीदा तौर पर खर्च कर दिए थे यहाँ तक की उनके पास कुछ भी बाकी ना रहा. हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम और आप के अलहे बैत दुनिया और उसकी ख्वाइश से मुकम्मल परहेज़ करते थे, इसीलिए हज़रते फ़ातिमा रज़िअल्लाहो अन्हा का जहेज़ सिर्फ मेंढे की एक रंगी हुई खाल और एक चमड़े का तकिया था जिस में खजूर की छाल भरी हुई थी.

*** हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ.-किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

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