मोहब्बत व नफ्स का मुहासबा

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 

हज़रते सुफ्यान रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है : मोहब्बत इत्तिबाए रसूल सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम है। एक और बुजुर्ग का कौल है कि मोहब्बत दाइमी जिक्र का नाम है, एक और कौल है कि मोहब्बत महबूब को खुद पर तरजीह देना है और बा’ज़ का कौल है कि मोहब्बत नाम है दुनिया के क़ियाम को बुरा समझने का, मजकूरए बाला सब अकवाल मोहब्बत के समरात की तरफ इशारा करते हैं, नफ़्से मोहब्बत को किसी ने नहीं छेड़ा, बा’ज़ ने येह कहा कि मोहब्बत नाम महबूब के उन कमालात का है जिस के इदराक से दिल मजबूर और जिस की अदाएगी से ज़बाने मसदूद हैं।

हज़रते जुनैद रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि अल्लाह तआला ने दुनिया से तअल्लुक रखने वालों पर मोहब्बत को हराम कर दिया है और फ़रमाया : हर मोहब्बत किसी इवज़ के जवाब में होती है, जब इवज़ ख़त्म हो जाता है मोहब्बत जाइल हो जाती है।

हज़रते जुन्नून रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि उस शख्स से जो अल्लाह की मोहब्बत का इज़हार करे, कह दो कि किसी गैर के सामने ज़लील होने से बचते रहना।

हज़रते शिब्ली रहमतुल्लाह अलैह से कहा गया कि हमें आरिफ़, मुहिब की तारीफ़ बतलाइये ! उन्हों ने कहा : आरिफ़ अगर बात करता है तो हलाक हो जाता है और मुहिब अगर चुप रहता है तो हलाक हो जाता है और आप ने येह अश्आर पढ़े :

ऐ मेहरबान सरदार ! तेरी मोहब्बत मेरे दिल की गहराइयों में मुकीम है। ऐ मेरी पलकों से नींद उड़ाने वाले ! जो कुछ मुझ पर बीती तू उसे जानता है।

किसी दूसरे शाइर का कौल है :

मुझे उस पर इन्तिहाई तअज्जुब होता है जो मुझ से कहता है तू ने मेरी मोहब्बत को याद किया है, क्या मैं उस की मोहब्बत भूल गया हूं जो उसे याद करूं ? जब मैं तुझे याद करता हूं तो मर जाता हूं फिर जिन्दा हो जाता हूं, अगर मेरा हुस्ने जन न होता तो मैं कभी जिन्दा न होता। पस मैं मौत में जिन्दगी पाता हूं और तेरे शौक में मौत पाता हूं, कितनी मरतबा मैं तेरे लिये जिन्दा होता हूं और मरता हूं। मैं ने मोहब्बत का जाम के बाद जाम पिया, न शराबे मोहब्बत कम हुई और न ही मैं सैर हुवा। ऐ काश ! उस का ख़याल मेरा नस्बुल ऐन हो, जब भी वोह मेरी नज़रों से दूर हो, मैं अन्धा हो जाता हूं।

हज़रते राबिआ अदविय्या रज़ीअल्लाहो अन्हा  ने एक दिन कहा : कौन है जो हमें अपने महबूब का पता बतलाए ? उन की ख़ादिमा बोली कि हमारा महबूब हमारे साथ है लेकिन दुनिया ने हमें उस से जुदा कर रखा है।

इब्नुल जला रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है, अल्लाह तआला ने हज़रते ईसा अलैहहिस्सलाम  की तरफ़ वही फ़रमाई कि जब मैं बन्दे के दिल को दुनिया और आखिरत की मोहब्बत से खाली पाता हूं तो उस के दिल को अपनी मोहब्बत से भर देता हूं और उसे अपनी हिफ़ाज़त में ले लेता हूं।

कहते हैं कि हज़रते जनाबे समनून रज़ीअल्लाहो अन्हो ने एक दिन मोहब्बत के मुतअल्लिक गुफ्तगू फ़रमाई तो उन के सामने एक परिन्दा उतरा और वोह अपनी चोंच ज़मीन पर मारने लगा यहां तक कि उस से खून बहने लगा और वोह मर गया।

हज़रते इब्राहीम बिन अदहम रज़ीअल्लाहो अन्हो ने कहा : ऐ अल्लाह तू जानता है कि जन्नत तेरे उन इन्आमात के मुकाबले में जो मुझे वदीअत हुवे हैं मेरे नज़दीक मच्छर के पर के बराबर वन नहीं रखती, तू ने मुझे अपनी मोहब्बत से सरफ़राज़ किया है, अपने ज़िक्र की उल्फ़त बख़्शी है और अपनी अज़मत में गौरो फ़िक्र करने के लिये फ़रागत मर्हमत फ़रमाई है।

हज़रते सीरी सकती रज़ीअल्लाहो अन्हो का क़ौल है कि जिस ने अल्लाह से मोहब्बत की वोह ज़िन्दए जावीद हुवा, जिस ने दुनिया से मोहब्बत की वोह बे आबरू हुवा, अहमक सुब्हो शाम ज़िल्लतो रुस्वाई से बसर करता है और अक्लमन्द अपने उयूब तलाश करता रहता है।

मुहासबा ए नफ्स – अपने नफ्स का हिसाब किताब रखना

अल्लाह तआला ने कुरआने मजीद में नफ्स के मुहासबे का हुक्म दिया है,

फ़रमाने इलाही है : ऐ ईमान वालो अल्लाह से डरो और हर नफ़्स येह देखे कि उस ने कल के लिये क्या भेजा है। इस आयते करीमा में इस बात की तरफ़ इशारा है कि इन्सान अपने गुज़श्ता आ’माल का मुहासबा करे इसी लिये हज़रते उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया : क़ब्ल इस के कि तुम्हारा मुहासबा हो, तुम खुद अपना मुहासबा करो और इस से पहले कि तुम्हारे आ’माल तोले जाएं तुम खुद अपने आ’माल तोल लो।

हदीस शरीफ़ में है कि एक आदमी ने हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से अर्ज किया : मुझे नसीहत कीजिये ! आप ने फ़रमाया : क्या तुम नसीहत की तलब में आए हो? अर्ज़ की : जी हां ! आप ने फ़रमाया : जब किसी काम का इरादा करो तो उस का अन्जाम सोच लो, अगर उस का अन्जाम अच्छा हो तो कर लो और अगर उस का बुरा अन्जाम हो तो उस से रुक जाओ।

हदीस शरीफ़ में है : अक्लमन्द के लिये मुनासिब है कि वोह चार घड़ियों में एक घड़ी अपने नफ्स के मुहासबे में खर्च करे ।

फ़रमाने इलाही है : और तौबा करो अल्लाह की तरफ़ मुकम्मल तौबा ऐ मोमिनो ताकि तुम फलाह पाओ। और तौबा ऐसा फेल है जो काम कर चुकने के बाद शर्मिन्दगी और पशेमानी से मुत्तसिफ़ होता है।

फ़रमाने नबवी है कि मैं दिन में सो मरतबा तौबा करता हूं और अल्लाह से बख्रिशश तलब करता हूं।

फ़रमाने इलाही है :

“बेशक वोह लोग जो परहेज़गार हैं जब उन्हें शैतान की तरफ़ से वस्वसा आता है तो वोह जिक्र करते हैं पस अचानक वोह देखने वाले होते हैं।”

हज़रते उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो जब रात तारीक होती तो अपने कदमों पर चाबुक मारते और अपने नफ्स से कहते कि तू ने आज क्या अमल किया ? हज़रते मैमून बिन मेहरान रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि आदमी उस वक्त तक मुत्तकी नहीं बन सकता जब तक वोह काम के बाद अपने शरीक या शरीकों के मुहासबे से भी अपने नफ्स का सख़्त मुहासबा न करे।।

हज़रते आइशा रज़ीअल्लाहो अन्हा से मरवी है कि हज़रते अबू बक्र रज़ीअल्लाहो अन्हो ने मुझ से वक्ते विसाल फ़रमाया कि मुझे लोगों में से कोई भी उमर से ज़ियादा महबूब नहीं है, फिर आप ने मुझ से पूछा कि मैं ने क्या कहा है ? मैं ने आप का फरमान दोहराया तो आप ने फ़रमाया कि मेरे नज़दीक उमर से ज़ियादा बा इज्जत कोई शख्स नहीं है, तो गोया आप ने एक बात कह कर इस पर गौर फ़रमाया और इसे दूसरे जुम्ले में तब्दील कर दिया।

हज़रते अबू तलहा  से मन्कूल है कि जब इन्हें इन के बाग के परन्दे ने नमाज़ से इन की तवज्जोह हटा दी तो इन्हों ने इस कोताही के बदले में इन्तिहाई पशेमानी के आलम में वोह सारा बाग अल्लाह की राह में वक्फ कर दिया।

हज़रते अब्दुल्लाह बिन सलाम रज़ीअल्लाहो अन्हो की हृदीस में है कि इन्हों ने लकड़ियों का गठ्ठा उठाया तो लोगों ने कहा : ऐ अबू यूसुफ़ ! तेरे घर में लकड़ियां मौजूद थीं और तेरे गुलाम भी इस काम के लिये मौजूद थे, तू ने येह काम क्यूं किया ? तो इन्हों ने जवाब दिया कि मैं अपने नफ्स का इम्तिहान ले रहा था कि कहीं येह इन कामों को बुरा तो नहीं समझता !

हज़रते हसन रज़ीअल्लाहो अन्हो का क़ौल है कि मोमिन अपने नफ़्स का हाकिम होता है और इस का मुहासबा करता रहता है, उन लोगों का कयामत में हिसाब आसान और हल्का होगा जो दुनिया में अपने नफ्सों का मुहासबा करते रहे हैं और क़ियामत में उन लोगों का सख़्त मुहासबा होगा जो दुनिया में अपने नफ्सों का मुहासबा नहीं करते।

फिर मुहासबा की तफ्सीर में फ़रमाया कि अचानक मोमिन को कोई चीज़ पसन्द आ जाती है और वोह इसे देख कर कहता है ब खुदा ! तू मुझे पसन्द है, तू मेरी ज़रूरत है लेकिन अफ़सोस येह है कि तेरे और मेरे दरमियान हिसाब हाइल है, येह हिसाब क़ब्ल अज़ अमल की मिसाल है और जब मोमिन से कोई लगज़िश सरज़द हो जाती है तो वोह खुद से कहता है तेरा इस फेल से क्या मतलब था ? ब खुदा ! मैं इस पर उज्र पेश नहीं करूंगा और ब खुदा ! अगर अल्लाह तआला ने चाहा तो मैं कभी भी ऐसा काम फिर नहीं करूंगा।

हज़रते अनस बिन मालिक रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि एक दिन हज़रते उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो और मैं मदीनए मुनव्वरा से बाहर निकले यहां तक कि वोह एक दीवार के करीब पहुंचे, मैं ने सुना वो कह रहे थे और मेरे और उन के दरमियान एक दीवार हाइल थी, वाह वाह ! उमर बिन खत्ताब अमीरुल मोमिनीन है ! ब खुदा ऐ नफ्स ! अल्लाह से डर, वरना वोह तुझे अज़ाब करेगा। हज़रते हसन रज़ीअल्लाहो अन्हो  इस फ़रमाने इलाही : और में मलामत करने वाले नफ़्स की कसम खाता हूं। की तफ्सीर में फ़रमाते हैं कि मोमिन से जब कोई गलती होती है तो वोह अपने नफ्स का तआकुब करता है कि तेरा इस बात से क्या इरादा था ? तेरा मेरे खाने और पीने से मन्शा क्या था ? और बदकार कदम ब कदम आगे बढ़ता रहता है मगर गुनाहों पर मुहासबए नफ्स नहीं करता।

हज़रते मालिक बिन दीनार रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है : अल्लाह तआला उस बन्दे पर रहम करे जिस ने अपने नफ्स से यह कहा कि तू ने ऐसा ऐसा काम अन्जाम नहीं दिया फिर उस की खिदमत की, उस की नाक में नकील डाल कर किताबुल्लाह की पैरवी को उस के लिये लाज़िमी करार दे दिया, ऐसा शख्स अपने नफ्स का काइद होगा और हक़ीक़त में येही नफ्स का मुहासबा है।

हज़रते मैमून बिन मेहरान रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि मुत्तकी शख्स अपने नफ्स का जालिम बादशाह और बखील हिस्सेदार से भी ज़ियादा मुहासबा करता है।

हज़रते इब्राहीम तैमी रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि मैं ने अपने नफ्स के सामने जन्नत की मिसाल पेश की, उस के फल खाना, उस की नहरों  से पानी पीना और उस की पाकीज़ा औरतों से मैल मिलाप रखने की तफ्सील बयान की, फिर मैं ने अपने नफ़्स को जहन्नम की तफ्सील सुनाई या’नी उस का थोहर खाना, उस की पीप पीना और उस के भारी जन्जीर और तौक़ गले में पहनने का बता कर कहा : तुझे इन दोनों में से कौन सी चीज़ पसन्द है? नफ़्स बोला मेरा इरादा है कि दुनिया में जा कर नेक अमल कर के आऊं, तब मैं ने उसे कहा कि फिलहाल तुझे मोहलत मिली हुई है, लिहाज़ा खूब नेक आ’माल कर ले।

हज़रते मालिक बिन दीनार रज़ीअल्लाहो अन्हो कहते हैं कि मैं ने हज्जाज को खिताब करते हुवे सुना, वोह कह रहा था : अल्लाह तआला उस बन्दे पर रहम फ़रमाए जिस ने अपना हिसाब दूसरे के पास जाने से पहले खुद ही अपने नफ्स का मुहासबा कर लिया, अल्लाह उस बन्दे पर रहम फ़रमाए जिस ने अपने अमल की लगाम पकड़ कर सोचा कि मैं ऐसा काम क्यूं कर रहा हूं ? अल्लाह तआला उस बन्दे पर रहम फ़रमाए जिस ने अपनी भरती को देखा, अल्लाह उस बन्दे पर रहम फ़रमाए जिस ने अपने आ’माल के मीज़ान को देखा वोह इसी तरह कहता रहा यहां तक कि मैं रो पड़ा, (लेकिन हज्जाज के मज़ालिम और सुलहा व अबरार पर उस की चीरा दस्तियों ने खुद उस को कभी अपने नफ्स के मुहासबे का मौक़अ नहीं दिया)।

हज़रते अहनफ़ बिन कैस रहमतुल्लाह अलैह के एक साथी की रिवायत है कि मैं उन के साथ रहता था, उन की रात की इबादत उमूमी तौर पर दुआओं पर मुश्तमिल होती थी और वोह चराग़ की तरफ़ आते उस की लौ में अपनी उंगली रख देते यहां तक कि उस पर आग का असर महसूस किया जाता, फिर अपने नफ़्स से मुखातब हो कर कहते : ऐ अहनफ़ ! तुझे फुलां फुलां दिन किस चीज़ ने ऐसे ऐसे काम करने पर उक्साया था, तुझे फुलां रोज़ कौन सी चीज़ ने ऐसे बुरे अमल पर आमादा किया था।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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नफ्स की इता अत करना ख्वाइशों और इच्छाओं की बात मानना

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है :

क्या तू ने उस को नहीं देखा कि जिस ने अपनी ख्वाहिश को मा‘बूद बना लिया है और उसे अल्लाह ने इल्म पर गुमराह बना दिया है। हज़रते इब्ने अब्बास रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि इस से मुराद वोह काफ़िर है जिस ने अल्लाह तआला की जानिब से अताकर्दा किसी हिदायत और दलील के बिगैर ख्वाहिशात को अपना दीन बना लिया है। इस का मतलब येह है कि वोह ख्वाहिशाते नफ़्सानी का पैरो  है और वोह हर ऐसा काम करने पर तय्यार हो जाता है जिस की तरफ़ उस की ख्वाहिशात इशारा करती हैं और अल्लाह तआला की किताब के मुताबिक़ अमल नहीं करता गोया कि वोह अपनी ख्वाहिशात की इबादत करता है। फ़रमाने इलाही है :

और उन की ख्वाहिशात की इत्तिबाअ न कर। और इरशादे रब्बानी है : “और ख्वाहिश की पैरवी न कर येह तुझे अल्लाह के रस्ते से हटा देगी।”

इसी लिये हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम इन अल्फ़ाज़ में अल्लाह से दुआ मांगा करते : ऐ अल्लाह मैं तुझ से पनाह मांगता हूं उस ख्वाहिश से जिस की इताअत की जाती है और उस बुख़्ल से जिस का इत्तिबाअ किया जाता है। और आप ने फ़रमाया कि तीन बातें इन्सान के लिये मोहलिक हैं, इताअत कर्दा ख्वाहिश, इत्तिबाअ कर्दा बुख़्ल और इन्सान का अपने आप को बहुत बड़ा समझना और येह इस लिये है कि हर गुनाह का बाइस नफ़्सानी ख्वाहिशात हैं और येही इन्सान को जहन्नम की तरफ ले जाती हैं। अल्लाह तआला हमें इन से पनाह दे। आमीन !

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क्या करे क्या ना करें जब दो कामों में से एक चुनना हो तो

एक आरिफ़ का कौल है कि जब दो बातें तेरे सामने हों और तुझे पता न चले कि उन में से कौन सी बात उम्दा होगी तो येह देख कि उन दो में से कौन सी बात तेरी ख्वाहिश के करीब है तू उसी को छोड़ दे और दूसरी को पायए तक्मील तक पहुंचा।

इसी नुक्ते की तरफ़ इशारा करते हुवे इमामे शाफेई रज़ीअल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया है :

जब तेरा काम दो बातों के दरमियान हाइल हो और तुझे उन में से अच्छे और बुरे की खबर न लगे। तो उस बात के मुताबिक़ काम कर जो तेरी ख्वाहिश के मुखालिफ़ हो क्यूंकि ख्वाहिशात इन्सान को बुरे कामों की तरफ़ ले जाती हैं।

हज़रते अब्बास रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि जब तू दो सोचों में घिर जाए तो जो सोच तुझे ज़ियादा पसन्द हो उसे छोड़ दे और जो ना पसन्द हो उसे पसन्द कर ले, इस की वज्ह येह है कि मा’मूली काम आसानी से हो जाएगा, इस में मेहनत मशक्कत नहीं करनी पड़ती, किसी से तआवुन की दरख्वास्त नहीं करनी पड़ती, इस लिये नफ़्से इन्सानी इस के करने का हुक्म देता है और इसी की तरफ इसे उकसाता है मगर मुश्किल काम मुश्किल ही से सर अन्जाम दिया जाता है. तक्लीफ उठानी पड़ती है, कोई तआवुन नहीं करता, खुद बड़ी मुश्किल से इन्सान इसे पूरा करता है इस लिये नफ़्से इन्सानी इसे करने में पसो पेश करता है और मेहनतो मशक्कत को बुरा समझता है (पस तुझे येही काम इख्तियार करना चाहिये)।

हज़रते उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो का इरशाद है कि अपने नफ्सों को रोको क्यूंकि येह ऐसा हरावल दस्ता हैं जो तुम्हें बुराई की आखिरी सरहद तक ले जाता है, हक़ कड़वा और गिरां है, बातिल सुबुक और तबाह कुन है, तौबा के इलाज से बेहतर येही है कि इन्सान गुनाहों ही को छोड़ दे बहुत सी निगाहों ने शहवत की काश्त की और एक लम्हे की लज्जत उन को तवील गम की मीरास दे गई।

लुकमान अलैहिस्सलाम की नसीहते

हज़रते लुकमान अलैहिस्सलाम  अपने बेटे से कहा कि ऐ बेटे ! मैं सब से पहले तुझे तेरे नफ्स से डराता हूं क्यूंकि हर नफ़्स की ख्वाहिशात और आरजूएं हैं, अगर तू उन को पूरा कर देगा तो वोह अपनी ख्वाहिशात को तवील कर देगा और तुझ से तमाम ख़्वाहिशात को पूरा करने की तलब करेगा, बिला शुबा शहवत दिल में इस तरह पोशीदा होती है जैसे पथ्थर में आग ! अगर तू पथ्थर पर चक्माक मारेगा तो आग निकलेगी वरना नहीं।

किसी शाइर का कौल है:

जब तू ने नफ्स की हर पुकार पर लब्बैक कहा तो वोह तुझे मनहिय्यात की तरफ़ बुलाएगा।

एक और शाइर कहता है :

जब तू ख्वाहिशाते नफ़्सानी की मुखालफ़त नहीं करेगा तो येह तुझे हर उस काम के लिये कहेंगी जो तेरे लिये बाइसे आर हो।

एक और शाइर कहता है :

अगर तू ने अपनी ख्वाहिशात की पैरवी की तो न तुझे सीधा रास्ता मिलेगा और न तू सरदारी हासिल कर सकेगा।

एक और शाइर कहता है:

जब तू तमाम अवसाफ़े हमीदा का हुसूल और अल्लाह की रहमत से अपनी मुरादों का बर आना चाहता है। तो इस बुरे नफ़्स की ख्वाहिशात की मुखालफ़त कर क्यूंकि येह इश्क से भी ज़ियादा दुश्मन और मोहलिक है। वोह दोनों ख्वाहिशात को हलाक करने का सबब हैं अलबत्ता आशिक जब पाक दामन हो तो गुनाह से बच जाता है। और नफ़्सानी ख्वाहिशात पूरा होने की आरजूओं को तर्क कर दे, अगर तू अक्लमन्द है तो वोह काम कर जो तेरे नफ़्स की ख्वाहिशात के ख़िलाफ़ हो ।

एक और शाइर कहता है:

ख्वाहिशात की पैरवी में अक्ल का नूर छुप जाता है और ख्वाहिशात की मुखालफ़त करने वाले की अक्ल की नूरानिय्यत बराबर बढ़ती रहती है।

फ़ज़्ल बिन अब्बास रज़ीअल्लाहो अन्हो का कहना है :

ज़माना जाहिल को बुलन्द मक़ाम दे देता है और ख्वाहिशात की पैरवी अक्लमन्द, जी राए को उस के मकाम से फेर देती है।

कभी लोग ऐसे जवान की तारीफ़ करते हैं जो खताकार होता है और एहसान करने वाले शख्स को मलामत की जाती है हालांकि वो बा मुराद होता है।

नबिय्ये अकरम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का फरमान है कि अल्लाह तआला ने अक्ल को पैदा फ़रमाया और उसे फ़रमाया : सामने आ ! तो वोह सामने हुई, फिर फ़रमाया : पीछे हट ! तो वोह पीछे हट गई। रब तआला ने फ़रमाया : मुझे अपनी इज्जतो जलाल की क़सम ! मैं तुझे अपनी सब से ज़ियादा पसन्दीदा मख्लूक में रखूगा। फिर अल्लाह तआला ने हमाकत को पैदा फ़रमाया और आगे आने का हुक्म दिया चुनान्चे, वो आगे हुई, फिर फ़रमाया : पीछे हट ! तो वोह पीछे हट गई । तब अल्लाह तआला ने फ़रमाया : मुझे अपनी इज्जत और जलाल की कसम ! मैं तुझे बद तरीन मख्लूक में रखूगा । येह तिर्मिज़ी की रिवायत है।

किसी ने क्या खूब कहा है :

उस शख्स की राए जो हर बात में अक्ल से मश्वरा करता है सवाब को पा लेती है। और उस ने देखा कि जब भी ख्वाहिशात की पैरवी की जाए वोह बुरे अन्जाम और अज़ाब में मुब्तला करती है।

एक दूसरा शाइर कहता है:

जब तू चाहे कि उम्मीदों से बहरा वर हो तो नफ़्स को ख्वाहिशात की पैरवी से बचा। और इस की ख्वाहिशात पूरी न कर और गुमराह और बागियों की रौनक़ न बन । नफ्स और इस की ख्वाहिशात को तर्क कर दे क्यूंकि येह हर उस शख्स को जो इस की तरफ कदम बढ़ाता है, बुराइयों का हुक्म देता है। शायद कि तू इस तरह जहन्नम से नजात पा ले जो आंतें काटने वाली और खाल उतारने वाली है।

नफ्स की मुखालफत बहुत ज़रूरी है

दानाओं का कौल है कि ख्वाहिश एक बुरी सुवारी है जो तुझे मुसीबतों की तारीकियों में ले जाती है और ना मुवाफ़िक चरागाह है जो तुझे दुखों का वारिस बनाती है लिहाज़ा ख़बरदार हो कि तुझे नफ़्स की ख्वाहिश बुराइयों पर सुवार न करे और गुनाहों की अन्धेर नगरी में खैमाजन न करे।

किसी दाना से कहा गया कि अगर तुम शादी कर लेते तो खूब था, तो उस ने बरजस्ता जवाब दिया अगर मैं तलाक़ दे सकता तो अपने नफ़्स को तलाक दे देता, और येह शे’र पढ़ा :दुनिया से तन्हा हो जा क्यूंकि तू तन्हा ही दुनिया में भेजा गया था।

दुनिया नींद और आख़िरत बेदारी है और इन का दरमियानी फ़ासिला मौत है और हम परागन्दा ख्वाबों में हैं, जिस ने ख्वाहिश की आंख से देखा वोह तुन्दो तेज़ हो गया, जिस ने ख्वाहिश की पैरवी की उस ने जुल्म किया और जिस ने तवील उम्मीदें रखीं उस ने इन्तिहा को न पाया और न ही किसी देखने वाले के लिये निहायत है। (तूले अमल की कोई इन्तिहा नहीं)

किसी दाना ने एक शख्स को वसिय्यत की, कि मैं तुझे ख्वाहिशाते नफ्सानी से मुकाबला करने का हुक्म देता हूं क्यूंकि ख्वाहिशात बुराइयों की कुंजी और नेकियों की दुश्मन हैं, तेरी हर ख्वाहिश तेरी दुश्मन है और सब से बुरी ख्वाहिश येह है जो गुनाहों को तेरे सामने बतौरे नेकी पेश करती है। जब येह दुश्मन तुझ से झगड़ा करेंगे तो तू इन के पंजे से बच, सुस्ती से मुबर्रा होशयारी, झूट से मुबर्रा सच, तसाहिल से पाक मश्गूलिय्यत, जज्अ फ़जअ से पाक सब्र और ऐसी निय्यत जो बेकारी से आलूदा न हो, की मौजूदगी ही में नजात पा सकेगा।

ऐ रब्बे जुल जलाल ! हमारी अक्ल को हमारी ख्वाहिशात पर गालिब फ़रमा दे, हमें नुक्सान और सबुक सारी से बचा, हमें आख़िरत की बजाए दुनिया में मश्गूल न कर और हमें अपना ज़िक्र करने वाला और अपनी नेमतों का शुक्र करने वाला बना दे, सय्यिदुना व मौलाना मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की नबुव्वत के तुफैल हमें सआदते दारैन अता फ़रमा ! वाल हम्दो लिल्लाहे रब्बिल आलमीन

फ़रमाने नबवी है कि तुम्हारा दीन बेहतरीन परहेज़गारी है।और फ़रमाया : परहेज़गारी आ’माल की सरवरी है। और फ़रमाया : परहेज़गार बन, सब लोगों से ज़ियादा इबादत गुज़ार बन जाएगा और कनाअत कर कि सब लोगों से ज़ियादा शुक्र गुज़ार बन जाएगा।

फ़रमाने नबवी है कि जिस में परहेज़गारी मौजूद नहीं (जो उसे अल्लाह तआला की ना फ़रमानी से रोके तो) उस के किसी अमल की अल्लाह तआला को परवा नहीं है।

हज़रते इब्राहीम बिन अदहम रज़ीअल्लाहो अन्हो का फरमान है कि जोहद के तीन मर्तबे हैं, एक जोह्द फ़र्ज़ है और वोह अल्लाह तआला की हराम कर्दा चीज़ों से रुकना, दूसरा ज़ोह्द सलामती के लिये है और वोह है मुश्तबा चीज़ों को तर्क कर देना, तीसरा जोहद  फ़ज़ीलत के हुसूल के लिये है और वोह है अल्लाह तआला की हलाल कर्दा अश्या को भी छोड़ देना और येह जोहद  का बहुत ही आ’ला मर्तबा है।

इब्ने मुबारक रज़ीअल्लाहो अन्होका कौल है कि जोह्द, जोहद को छुपाने का नाम है, जब ज़ाहिद लोगों से दूर रहे तो उस की जुस्त्जू रखो और जब ज़ाहिद लोगों की तलाश में सरगर्दा हो तो उस से किनार कशी इख्तियार कर लो।

किसी ने क्या ही खूब कहा है :

मैं ने इस राज़ को पा लिया है, इस के सिवा और कुछ नहीं है कि परहेज़गारी दुनिया और दौलते दुनिया को छोड़ देने का नाम है। .जब तू दौलत पा कर इसे तर्क कर दे तो समझ ले कि तेरा तक्वा ऐसे है जैसे एक मुसलमान का तक्वा है।

जाहिद वोह नहीं है जो दुनिया के न होते हुवे इस से किनारा कश हुवा बल्कि ज़ाहिद वोह है कि जिस के पास दुनिया अपनी तमाम तर हश्र सामानियों के साथ आई मगर उस ने इस से मुंह फेर लिया और भाग गया, जैसा कि अबू तमाम कहता है :

जब आदमी ने जोह्द इख़्तियार न किया और दुनिया अपनी तमाम तर रा’नाइयों के साथ जल्वागर हुई तो वोह ज़ाहिद नहीं कहलाएगा।

दुनिया से किनारा कशी

बा’ज़ हुकमा का कौल है कि क्या वज्ह है कि हम दुनिया से किनारा कशी नहीं करते हालांकि इस की उम्र गिनी चुनी, इस की भलाई मा’मूली, इस की सफ़ा में तिलछट, इस की उम्मीदें धोका और फ़रेब हैं, आती है तो दुख ले कर आती है और जब जाती है तो गमों का बोझ छोड़ जाती है,

शाइर कहता है:

दुनिया के तालिब के लिये हलाकत है, इस को बका नहीं और इस की गर्दिश ख्वाबो ख़याल है। इस का साफ़ गदला, इस की खुशी नुक्सान, इस की उम्मीदें पुर फरेब और इस की रोशनियां तारीकी हैं। इस की जवानी बुढ़ापा, इस की राहत बीमारी, इस की लज्जतें शर्मिन्दगी और इस को पाना न पाने के बराबर है। दुन्यादार अगर्चे शद्दाद की बिहिश्त (आराम देह मक़ाम) जितनी ने’मतें पा लें, तब भी इस के मसाइब से नहीं छूटेगा। इस से रू गर्दानी कर, इस की रौनक को बा वकार न समझ क्यूंकि इस की ने’मतें ऐसी हैं जिन में इताब मुज़मिर है। उस दाइमी इन्आमात के घर के लिये अमल कर जिस की ने’मतें कभी न मिटेंगी और जिस में मौत और बुढ़ापे का कोई अन्देशा न होगा।

यहूया बिन मुआज़ रज़ीअल्लाहो अन्हो का एक दानिशमन्दाना कौल है कि दुनिया को इब्रत की निगाह से देख, इसे अपनी पसन्द से छोड़, इस के हुसूल में मजबूरी से कोशिश कर और आख़िरत को तवज्जोह से तलब कर।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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रियाज़त और नफ्स की ख्वाइशें

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

Color Codes –  कुरआन मजीदहदीसे पाककौल (Quotes). 

मूसा अलैहहिसलाम  को दुरुद पढने का हुक्म

अल्लाह ताआला ने हज़रत मूसा अलैहहिसलाम  पर वह्यी नाज़िल फरमाई की ऐ मूसा अगर तुम चाहते हो की मै तुम्हारी ज़बान पर तुम्हारे कलाम से, तुम्हारे दिल में ख़यालात से, तुम्हारे बदन में तुम्हारी रूह से, तुम्हारी आँखों में नूर ए बसारत से, और तुम्हारे कानों में तुम्हारी सुनने की ताक़त से ज्यादा करीब रहूँ तो फिर मोहम्मद स.अ.व. पर कसरत से दरूद भेजो. अस्स्लातो  वास्सलामो अलैका या रसूलल्लाह!

फरमाने खुदा है –

“हर नफ्स यह देखे की क़यामत के लिए उसने क्या अमल किये हैं.”

ऐ इन्सान अच्छी तरह समझ ले की तुझे बुराई की तरफ ले जाने वाला तेरा नफ्स, तेरा शैतान से भी बड़ा दुश्मन है और शैतान को तुझ पर तेरी ख्वाइशात की बदौलत गलबा हांसिल हौता है, लिहाज़ा तुझे तेरा नफ्स झूटी उम्मीदों और धोके में डाले है, जो शख्श बे खौफ हुआ और गफ़लत में गिरिफ्तार हुआ, अपने नफ्स की पैरवी करता है उस इन्सान का हर दावा झूठा है, अगर तू  नफ्स की रज़ा में उस की ख्वाइशों  की पैरवी करेगा तो हालाक हो जायेगा और अगर उस के मुहासबा से गाफिल होगा तो गुनाहों के समंदर में डूब जायेगा.

अगर तू उसकी मुखालफत से आज़िज़ आकर उसकी ख्वाइशों की पैरवी करेगा तो यह तुझे जहन्नम की तरफ खीच ले जायेगा. नफ्स का लौटना भलाई की तरफ नहीं है बल्कि यह मुसीबतों की जड़, शर्मिंदगी की कान, इब्लीस का खजाना, और बुराई का ठिकाना और इस की फितना अन्गेज़ियों को सिवाय आलिमे खैर व शर के यानी अल्लाह ताआला के सिवा कोई नहीं जानता.

फरमाने इलाही है

“और अल्लाह से डरो, बेशक अल्लाह तुम्हारे तमाम आमाल से बाखबर है.”

तफसीर अबिल्लैस रहमतुल्लाह अलैह में है, जब कोई बंदा आखिरत की चाहत की वजह से अपनी गुजरी हुई ज़िन्दगी पर गौर और फ़िक्र करता है तो यह फ़िक्र करना उस के दिल के लिए ग़ुस्ल का काम देता है, जैसा की फरमाने नबवी है,

“एक घडी का तफ़क्कुर साल भर की इबादत से बेहतर है.”

लिहाज़ा हर अक़लमंद के लिए ज़रूरी है की अपने पिछले गुनाहों की मगफिरत तलब करे, जिन चीज़ों का इकरार करता है उन में तफ़क्कुर करे और क़यामत के दिन के लिए तोशा बनाये, उम्मीदों को कम करे, तौबा में जल्दी करे, अल्लाह ताआला का ज़िक्र करता रहे, हराम चीज़ों से बचे और नफ्स को सब्र पर आमादा करे. नफ्स की ख्वाइशों की पैरवी ना करे क्यों की नफ्स एक बुत की तरह है जो नफ्स की पैरवी करता है वह गोया बुत की इबादत करता है और जो इख्लास से अल्लाह की इबादत करता है, वह अपने नफ्स पर जब्र करता है.

हजरते मालिक बिन दीनार ने इन्जीर खाना चाहा

जनाबे मालिक इब्ने दीनार रहमतुल्लाह अलैह एक दिन बसरा के बाज़ार से गुज़र रहे थे की आप को इन्जीर नज़र आये, दिल में उन्हें खाने की ख्वाइश हुयी, दुकानदार के पास पहुंचे और कहा मेरे इन जूतों के बदले अंजीर दे दो, दुकानदार ने जूतों को पुराना देखकर कहा इन के बदले में कुछ नहीं मिल सकता, आप यह जवाब सुन  कर चल पड़े, किसी ने दुकानदार से कहा, जानते हो यह बुज़ुर्ग कौन थे? वह बोला नहीं, उस ने कहा यह मशहूर मदनी हज़रते मालिक बिन दीनार रज़िअल्लाहो अन्हो थे, दुकानदार ने जब यह सुना तो अपने गुलाम को एक टोकरी अंजीरों से भर कर दी और कहा अगर जनाब मालिक बिन दीनार रज़िअल्लाहो अन्हो तुझ से यह टोकरी कबूल कर लें तो इस खिदमत के बदले तू आज़ाद है, गुलाम भागा भागा आप की खिदमत में आया और अर्ज़ किया हुज़ूर यह कुबूल फरमाइए, आप ने कहा की में नहीं लेता, गुलाम बोला अगर आप इसे कुबूल कर लें तो में आज़ाद हो जाऊंगा, आप ने जवाब दिया इस में तेरे लिए तो आज़ादी है मगर मेरे लिए हलाक़त है, जब गुलाम ने इसरार किया तो आप ने फ़रमाया की में ने कसम खाई है की दीन के बदले में मैं अंजीर नहीं खाऊंगा और मरते दम तक कभी भी अंजीर नहीं लूँगा.

ज़िन्दगी की आखिरी घडी में सब्र

हज़रते मालिक बिन दीनार रज़िअल्लाहो अन्हो को मर्ज़े वफ़ात में इस बात की इच्छा हुई की मैं गर्म रोटी का सरीद बनाकर खाऊ जिस में दूध और शहद शामिल हो चुनाचे आपके हुक्म से खादिम यह तमाम चीज़ें लेकर हाज़िर हुआ. आप कुछ देर उन चीज़ों को देखते रहे, फिर बोले ए नफ्स! तूने तीस साल लगातार सब्र किया अब ज़िन्दगी की इस आखिरी घडी में क्या सब्र नहीं कर सकता?यह कहा और प्याला छोड़ दिया और उसी तरह सब्र करते हुए वासिले बा हक़ हो गए. हकीक़त यह है की अल्लाह के नेक बन्दों में यानि अम्बिया, औलिया, सिद्दिकीन, आशिकीन और ज़हिदीन के हालात ऐसे ही थे.

हज़रात सुलेमान अलैहिस्सलाम का कौल है की “जिस शख्श ने अपने नफ्स पर काबू पाया,वह उस शख्श से ज्यादा ताक़तवर है जो तने तनहा एक शहर को फ़तह कर लेता है.”

हजरते अली रज़िअल्लाहो अन्हो का कौल है की “मैं अपने नफ्स के साथ बकरियों के झुण्ड पर एक ऐसे जवान की तरह हूँ की जब वह एक तरफ उन्हें इकठ्ठा करता है तो वह दूसरी तरफ फ़ैल जाती हैं.”

जो शख्श अपने नफ्स को फ़ना कर देता है उसे रहमत के कफ़न में लपेट कर करामत की ज़मीन में दफ़न किया जाता है,और जो शख्श अपने ज़मीर (क़ल्ब) को ख़त्म कर देता है उसे लानत के कफ़न में लपेट कर आजाब की ज़मीन में दफ़न किया जाता है.

 

जनाब याह्या बिन मआज़ राज़ी रहमतुल्लाह अलैह कहते हैं की अपने नफ्स का इताआत और बंदगी कर के मुकाबला करो. रियाज़त, शब बेदारी (रात में जागना)क़लील गुफ्तगू (कम बोलना), लोगों की तकलीफों को बर्दाशत करना और कम खाने का नाम है, कम सोने से ख़यालात पाकीज़ा होते हैं, कम बोलने से इन्सान आफतों से महफूज़ रहता है, तकलीफे बर्दाश्त करने से दर्जे बुलंद होते हैं और कम खाने से शहवत ए नफसानी ख़त्म हो जाती है, क्यों की बहुत खाना दिल की स्याही और उसे गिरफ्तारे ज़ुल्मत करना है. भूक हिकमत का नूर है, और सैर होना अल्लाह ताआला से दूर कर देता है.

फरमाने नबी सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम है की

अपने दिलों को भूक से रोशन करो,  अपने नफ्स का भूक प्यास से मुकाबला करो, और हमेशा भूक के वसीले से जन्नत का दरवाज़ा खटखटाते रहो, भूके रहने वाले को अल्लाह के रास्ते में लड़ने वाले के सवाब के बराबर सवाब मिलता है,और अल्लाह ताआला के नज़दीक भूखे प्यासे रहने से बेहतर कोई अमल नहीं, आसमान के फ़रिश्ते उस इन्सान के पास बिलकुल नहीं आते जिसने अपना पेट भर कर इबादत का मज़ा खो दिया हो.

मिन्हाजुल आबेदीन में हजरते अबू बकर सिद्दीक रज़िअल्लाहो अन्हो  का यह कौल मजकूर है की मै जब से ईमान लाया हूँ, कभी पेट भर कर खाना नहीं खाया ताकि में अपने रब की इबादत का मज़ा हांसिल कर सकूँ, और अपने रब के शौक ए दीदार की वजह से कभी सैर हो कर पानी नहीं पिया है इसलिए की बहुत खाने से इबादत में कमी वाकेअ हो जाती है, क्यों की जब इन्सान खूब सैर हो कर खा लेता है तो उस का जिस्म भरी और आँखें नींद से बोझल हो जाती हैं, उस के बदन के आज़ा ढीले पड़ जाते हैं फिर वह कोशिश के बावजूद  सिवाए नीद के कुछ भी हांसिल नहीं कर पाता और इस तरह वह उस मुरदार की तरह बन जाता है जो रास्ते में पड़ा हो.

मुन्यतुल मुफ़्ती में है की जनाब लुकमान हकीम ने अपने बेटे से कहा खाना और सोना कम करो क्यों की जो शख्श ज्यादा खाता और ज्यादा सोता है वह क़यामत के दिन नेक कामों से खाली हाथ होगा.

नबीए करीम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का फरमान है की “अपने दिलों को ज्यादा खाने पीने से हलाक ना करो, जिस तरह ज्यादा पानी से खेती तबाह हो जाती है उसी तरह ज़्यादा खाने पीने से दिल हलाक हो जाता है.”

नेक लोगों ने मैदा (पेट ) को एसी हांड़ी से मिसाल दी है जो उबलती रहती है और उस के बुखारात भांप बराबर दिल पर पहुँचते रहते हैं, फिर उन्ही भांपों की ज्यादती दिल को गन्दा और मैला बना देती है, ज़्यादा खाने से इल्म व फ़िक्र में कमी वाकेअ हो जाती है और शिकम पुरी (पेट भरना) अक़ल्मंदी, व ज़हानत को बर्बाद कर देती है.

हिकायत – हज़रत याह्या बिन ज़कारिया अलैहिस्सलाम ने शैतान को देखा वह बहुत से जाल उठाये हुए था, आपने पुछा यह क्या है? शैतान ने कहा यह ख्वाइशात हैं जिन से मै इब्ने आदम को कैद करता हूँ. आप ने फ़रमाया मेरे लिए भी कोई फंदा है? शैतान बोला नहीं मगर एक रात आपने पेट भर कर खाना खा लिया था जिस से आप को नमाज़ में सुस्ती पैदा हो गयी थी, तब हजरते याह्या अलैहहिससलाम बोले, आइन्दा में कभी पेट भर कर खाना नहीं खाऊंगा, शैतान बोला अगर यह बात है तो में भी आइन्दा किसी को नसीहत नहीं करूंगा.

यह उस मुक़द्दस हस्ती का हाल है जिस ने सारी उम्र में सिर्फ एक रात पेट भर कर खाना खाया था, उस शख्श का क्या हाल होगा जो उम्र भर कभी भूका नहीं रहता और पेट भर कर खाना खाता है और उस पर वह चाहता है की वह इबादत गुज़ार बन जाये.

हिकायत – हजरते याह्या अलैहहिससलाम ने एक रात  जौ की रोटी पेट भर कर खा ली और इबादत ए इलाही में हाज़िर ना हुए अल्लाह ताआला ने वह्यी की ऐ याह्या क्या तू ने इस दुनिया को आखिरत से बेहतर समझा है या मेरे जवारे रहमत से बेहतर तू ने कोई और जवार पा लिया है. मुझे इज्ज़त व जलाल की क़सम अगर तु जन्नतुल फिरदौस का नज़ारा कर ले और जहन्नम को देख ले तो आंसुओं के बदले खून रोये और इस अच्छे लिबास की जगह लोहे का लिबास पहने.

*** हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ.-किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

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