SAD Shayari ग़म शायरी

SAD Shayari Gham Shayari
Gham Shayari SAD Shayari

SAD SHAYARI

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ग़म शायरी (Sad Shayari)

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Dard Shayari (Sad Shayari)

Aansoo Hindi Shayari (Sad Shayari)

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Judai Hindi Shayari (Sad Shayari)

Tanhai Hindi Shayari (Sad Shayari)

Yaad Hindi Shayari (Sad Shayari)

Bekarari Hindi Shayari (Sad Shayari)

Gham Hindi Shayari (Sad Shayari)

ग़म खुद ही ख़ुशी में बदल जायेंगे, सिर्फ मुस्कुराने की आदत होनी चाहिए।

***

ग़म में रोता हूँ तेरे सुब्ह कहीं शाम कहीं चाहने वाले को होता भी है आराम कहीं

***

बाटने के लियें दोस्त हजारो रखना, जब ग़म बांटना हो तो हमें याद करना..

***

मेरा हर पल आज खूबसूरत ह दिल में जो सिर्फ तेरी ही सूरत है कुछ भी कहे ये दुनिया ग़म नहीं दुनिया से ज्यादा हमें तेरी ज़रूरत है

***

मेरे हबीब मेरी मुस्कुराहटों पे न जा ख़ुदा-गवाह मुझे आज भी तेरा ग़म है

*** (Sad Shayari)

लज़्ज़ते ग़म बढ़ा दीजिये .. आप फिर मुस्कुरा दीजिये

***

मेरी फ़ितरत में नहीं की अपना ग़म बायाँ करू.

..अगर तेरे दिल का हिस्सा हु तो महसूस कर तकलीफ़ मेरी.

***

बिछड़ी हुई राहों से जो गुज़रे हम कभी हर ग़म पर खोयी हुई एक याद मिली है

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ख़ुशियाँ तो गिन चुके उँगलियों पे कई बार हम… पर ग़म तो हैं बेशुमार, ईन ग़मों का हिसाब क्या…

***

अगर वो पूछ लें हमसे, तुम्हें किस बात का ग़म है तो फिर किस बात का ग़म है,अगर वो पूछ लें हमसे

***

तुम्हारे जाने का ग़म ही कम नहीं यूं तो.. तकलीफ़ और भी होती है जब लोग..मुझसे वजह पूछते हैं..!!

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हद से बढ़ जाये ताल्लुक तो ग़म मिलते है. हम इसी वास्ते अब हर शख्स से कम मिलते है..!!

*** (Sad Shayari)

बहुत दिन हुए तुम्हें ठीक से सोचा नहीं पर जब तुम अपने नहीं तो तुम्हें सोचूँ क्यों थोड़ी ख़ुशी मिलेगी और ढेर सारा ग़म

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मंज़िलों के ग़म में रोने से मंज़िलें नहीं मिलती; हौंसले भी टूट जाते हैं अक्सर उदास रहने से

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दो जवाँ दिलों का ग़म दूरियाँ समझती हैं कौन याद करता है हिचकियाँ समझती हैं।

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कोई तेरे साथ नहीं है तो भी ग़म ना कर; ख़ुद से बढ़ कर दुनिया में कोई हमसफ़र नही होता

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हमें कोई ग़म नहीं था„ ग़म-ए-आशिकी से पहले… न थी दुश्मनी किसी से„ तेरी दोस्ती से पहले…!!!

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ग़म–ए–हयात ने आवारा कर दिया वर्ना , थी आरज़ू कि तिरे दर पे सुब्ह ओ शाम करें!

*** (Sad Shayari)

हंसती हुई आंखों में भी ग़म पलते है कौन मग़र झांके इतनी गहराई में

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कोई लश्कर है के बढ़ते हुए ग़म आते हैं… शाम के साये बहुत तेज़ कदम आते हैं…. Bashir Badr

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ग़म-ए-हस्ती का ‘असद’ किस से हो जुज़ मर्ग इलाज शम्अ हर रंग में जलती है सहर होते तक Mirza Ghalib

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शायद खुशी का दौर भी आ जाए एक दिन, ग़म भी तो मिल गये थे तमन्ना किये बगैर…

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ग़म अगरचे जाँ-गुसिल है पे कहाँ बचें कि दिल है ग़म-ए-इश्क़ गर न होता ग़म-ए-रोज़गार होता Mirza Ghalib

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दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया तुझ से भी दिल-फ़रेब हैं ग़म रोज़गार के  Faiz

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भीड़ है बर-सर-ए-बाज़ार कहीं और चलें; आ मेरे दिल मेरे ग़म-ख़्वार कहीं और चलें।

*** (Sad Shayari)

ग़म बढे आते हैं क़ातिल की निगाहों की तरह तुम छिपा लो मुझे ऐ दोस्त गुनाहों की तरह

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मेरी सुबह हो के न हो मुझे..है फिराक़ यार से वास्ता.. शबे ग़म से मेरा मुकाबला..दिले बेकरार से वास्ता..

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है ये मेरी बदनसीबी तेरा क्या कुसूर इसमें,

तेरे ग़म ने मार डाला मुझे ज़िन्दग़ी से पहले।

***

ज़िन्दगी लोग जिसे मरहम-ए-ग़म जानते हैं;

जिस तरह हम ने गुज़ारी है वो हम जानते हैं।

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मेरा भी और कोई नहीं है तेरे सिवा ऐ शाम-ए-ग़म तुझे मैं कहाँ छोड़ जाऊँगा !

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ग़म वो मय-ख़ाना कमी जिस में नहीं दिल वो पैमाना है भरता ही नहीं

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अपनी तबाहियों का मुझे कोई ग़म नहीं तुम ने किसी के साथ मोहब्बत निभा तो दी . Sahir

***

ग़म-ए-ज़माना ने मजबूर कर दिया वर्ना ये आरज़ू थी कि बस तेरी आरज़ू करते

***

किनारों पर रात के.. उभरता है एक ग़म.. लोग कहते चाँद हैं.. मैं कहता बे-रहम..

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खुशीयों की मंजिल ढुंढी तो ग़म की गर्द मिली चाहत के नगमें चाहे तो आहें सर्द मिली दिल के बोझ को दुना कर गया, जो ग़मखार मिला…

*** (Sad Shayari)

न किसी का फेंका हुआ मिले, न किसी से छीना हुआ | मुझे बस मेरे नसीब मे लिखा हुआ मिले, ना मिले ये भी तो कोई ग़म नही | मुझे बस मेरी मेहनत का मिले

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तुम्हें देख न पाने का ग़म नहीं पढ़ लेती हूँ तुम्हें शयरी की तरह

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लोग लेते है यूँ ही………? शमाँ और परवाने का नाम  कुछ नहीं है इस जहाँ में……? ग़म के अफ़साने का नाम_

***

दयार-ए-ग़म में दिल-ए-बेक़रार छूट गया सम्भल के ढूंढने जाओ बहुत अँधेरा है Firaq

***

वो बड़े ताज्जुब से पूछ बैठा मेरे ग़म की वजह… फिर हल्का सा मुस्कुराया और कहा…. तुमने मोहब्बत की है कभी।

***

कभी आह लब पे मचल गई कभी अश्क़ आँख से ढल गए, ये ग़म के चिराग है,कभी बुझ गए कभी जल गए…

***

न खुशियों से मोहब्बत की न ग़म से दुश्मनी रखी… मेरे दिल ने मेरे हालात से बस दोस्ती रखी…

***

दिल को ग़म ए हयात गवारा है इन दिनों, दिल को जो दर्द था,वही प्यारा है

***

शाख से कट कर अलग होने का हम को ग़म नहीं
फूल  हैं ख़ुश्बू लुटा कर ख़ाक हो जाएंगे हम

*** (Sad Shayari)

आपकी याद आती रही रात-भर” चाँदनी दिल दुखाती रही रात-भर, . गाह जलती हुई, गाह बुझती हुई शम-ए-ग़म झिलमिलाती रही रात भर

***

जिससे दुर हो जाए मेरे ग़म ! मौन रह कर भी तेरे दिल की गहराई तक फैली उस तन्हाई से बात कर सकूं !

***

हम पर ग़म – ऐ – जहाँ हैं, ये और बात है…

हम फिर भी बेज़ुबान हैं, ये और बात है …!!

***

बीते दिन अब कभी लौट कर ना आयेंगे,

हम कौन से ज़िन्दा हैं कि इस ग़म में मर जायेंगे।

***

वो जब याद आये, बहोत याद आये

ग़म-ए-जिन्दगी के, अँधेरे में हम है चिराग-ए-मोहब्बत जलाए बुझाए …

***

ग़म की गर्मी से दिल पिघलते रहे तजर्बे आँसुओं में ढलते रहे

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क्या जानू सजन होती है क्या ग़म की शाम जल उठे सौ दिए,जब लिया तेरा नाम.

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आँसुओ थोड़ी मदद मुझ को तुम्हारी चाहिए ग़म चले जाएँगे वर्ना दिल को बंजर छोड़ कर

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निकला हूँ मैं तलाश में शायद वफ़ा मिले, इस दर्द-ओ-ग़म के वास्ते कोई दवा मिले!

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ग़म-ए-दौरां में टूट-टूटकर बिखरी है हस्ती मेरी कर कुछ और सितम मेरा वजूद अभी बाकी है

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है अब इस मामूरे में, क़हत-ए-ग़म-ए-उल्फ़त असद, हमने ये माना के, दिल्ली में रहे खावेंगे क्या? Mirza Ghalib

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आसूओं में चाँद डूबा रात मुरझाई जिन्दगी में दूर तक, फ़ैली है तनहाई जो गुजरे हम पे वो कम है, तुम्हारे ग़म का मौसम है …!!

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उन लोगों का क्या हुआ होगा; जिनको मेरी तरह ग़म ने मारा होगा; किनारे पर खड़े लोग क्या जाने; डूबने वाले ने किस-किस को पुकारा होगा।

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अगर खो गया एक नशेमन तो क्या ग़म? मकामात-ए-आह-ओ-फुगाँ और भी हैं

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ग़म में डूबे ही रहे दम न हमारा निकला बहर-ए-हस्ती का बहुत दूर किनारा निकला

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तुम्हारे वास्ते ये ग़म उठाने वाला हूँ

रुको ए आंसुओ मैं मुस्कुराने वाला हूँ .

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हंस हंस के मेरी हालते ग़म देखनेवाले

ये दौलते ग़म तेरी बदौलत ही मिली है….!

***

हँसने पर आँसू आते हैं रोना है फरेबी आँखों का,

उस दिन से ग़म है मेरे दिल में जिस दिन से उल्फ़त है सीने में,,,

***

झूठ कहते हैं लोग कि मोहब्बत सब कुछ छीन लेती है

. . मैंने तो मोहब्बत करके, ग़म का खजाना पा लिया…!!!

***

एक शख़्स ही बहुत है ग़म बाँटने के लिये

महफ़िलों में तो बस तमाशे बनते हैं

***

ज़िन्दगी में सारा झगड़ा ही ख़्वाहिशों का है…..

ना तो किसी को ग़म चाहिए और ना ही किसी को कम चाहिए………

***

मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया, ग़म और ख़ुशी में फर्क ना महसूस हो जहा, मैं दिल को उस मक़ाम पे लाता चला गया।

***

चले आते हैं ग़म बार-बार..क्या तरीका है..

कोई कह दो जिंदगी से भी…”ये हो चुका है”..!!

***

घर में था क्या जो तेरा ग़म उसे ग़ारत करता?

वो जो हम रखते थे इक हसरत-ए तामीर,सो है! Mirza Ghalib

***

तू देख या मत देख , इस बात का ग़म नहीं !

पर ये मत कह की हम तेरे कुछ नहीं !!

***

ये जो अपनी जां के हरीफ़ हम, तेरी बेरुखी का शिकार थे

जो गिला करें भी तो क्या करें, तेरे अपने ग़म ही हज़ार थे..!

***

मुसलसल ग़म उठाने से ये बेहतर है,

अगर मानो किनारा करने वालों से किनारा कर लिया जाए….!

***

कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब आज तुम याद बेहिसाब आए …. !!

***

शाम-ए-ग़म है तेरी यादों को सजा रक्खा है

मैं ने दानिस्ता चराग़ों को बुझा रक्खा है

***

वो जो तुमने एक दवा बतलाई थी ग़म के लिए,

ग़म तो ज्यूं का त्यूं रहा बस हम शराबी हो गये

***

मयखाने में आऊंगा मगर पियूँगा नहीं साकी ।।

ये शराब मेरा ग़म मिटाने की ताकत नहीं रखती।

***

दर्द में लज़्ज़त बहुत अश्कों में रानाई बहुत

ग़म-ए-हस्ती हमें दुनिया पसंद आई बहुत,

***

गुजर जाएगा ये दौर भी ज़रा इत्मीनान तो रख जब ख़ुशी ही ना ठहरी

तो ग़म की क्या औकात है।

***

पी लेता हूँ यु हैं कभी-कभी ग़म भुलाने को

के डगमगाना ज़रूरी है संभलने के लिए

***

महब्बत में करें क्या हाल दिल का ख़ुशी ही काम आती है न ग़म

भरी महफ़ि‍ल में हर इक से बचा कर तेरी आँखों ने मुझसे बात कर ली

***

वही मैं हूँ वही है तेरे ग़म की कार-फ़रमाई* //

कभी तन्हाई में महफ़िल कभी महफ़िल में तन्हाई

***

जो ग़म-ए-हबीब से दूर थे वो ख़ुद अपनी आग में जल गए

जो ग़म-ए-हबीब को पा गए वो ग़मों से हँस के निकल गए।

***

तुमसे क्या कहें .. कितने ग़म सहे हमने बेवफ़ा ..

तेरे प्यार में ……! दिन गुज़र गया ऐतबार में रात कट गयी इंतज़ार में ……..


Hinglish

gam hindi shayari

(sad shayari)gam khud hee khushee mein badal jaayenge, sirph muskuraane kee aadat honee chaahie.***

gam mein rota hoon tere subh kaheen shaam kaheen chaahane vaale ko hota bhee hai aaraam kaheen***

baatane ke liyen dost hajaaro rakhana, jab gam baantana ho to hamen yaad karana..***

mera har pal aaj khoobasoorat ha dil mein jo sirph teree hee soorat hai kuchh bhee kahe ye duniya gam nahin duniya se jyaada hamen teree zaroorat hai***

mere habeeb meree muskuraahaton pe na ja khuda-gavaah mujhe aaj bhee tera gam hai*** (sad shayari)lazzate gam badha deejiye .. aap phir muskura deejiye***

meree fitarat mein nahin kee apana gam baayaan karoo…agar tere dil ka hissa hu to mahasoos kar takaleef meree.***

bichhadee huee raahon se jo guzare ham kabhee har gam par khoyee huee ek yaad milee hai***

khushiyaan to gin chuke ungaliyon pe kaee baar ham… par gam to hain beshumaar, een gamon ka hisaab kya…***

agar vo poochh len hamase, tumhen kis baat ka gam hai to phir kis baat ka gam hai,agar vo poochh len hamase***

tumhaare jaane ka gam hee kam nahin yoon to.. takaleef aur bhee hotee hai jab log..mujhase vajah poochhate hain..!!***

had se badh jaaye taalluk to gam milate hai. ham isee vaaste ab har shakhs se kam milate hai..!!***

(sad shayari)bahut din hue tumhen theek se socha nahin par jab tum apane nahin to tumhen sochoon kyon thodee khushee milegee aur dher saara gam***

manzilon ke gam mein rone se manzilen nahin milatee; haunsale bhee toot jaate hain aksar udaas rahane se***

do javaan dilon ka gam dooriyaan samajhatee hain kaun yaad karata hai hichakiyaan samajhatee hain.***

koee tere saath nahin hai to bhee gam na kar; khud se badh kar duniya mein koee hamasafar nahee hota***

hamen koee gam nahin tha„ gam-e-aashikee se pahale… na thee dushmanee kisee se„ teree dostee se pahale…!!!***

gam–e–hayaat ne aavaara kar diya varna , thee aarazoo ki tire dar pe subh o shaam karen!***

(sad shayari)hansatee huee aankhon mein bhee gam palate hai kaun magar jhaanke itanee gaharaee mein***

koee lashkar hai ke badhate hue gam aate hain… shaam ke saaye bahut tez kadam aate hain…. bashir badr***

gam-e-hastee ka asad kis se ho juz marg ilaaj sham har rang mein jalatee hai sahar hote tak mirz ghalib****

shaayad khushee ka daur bhee aa jae ek din, gam bhee to mil gaye the tamanna kiye bagair…***

gam agarache jaan-gusil hai pe kahaan bachen ki dil hai gam-e-ishq gar na hota gam-e-rozagaar hota mirz ghalib***

duniya ne teree yaad se begaana kar diya tujh se bhee dil-fareb hain gam rozagaar ke faiz***

bheed hai bar-sar-e-baazaar kaheen aur chalen; aa mere dil mere gam-khvaar kaheen aur chalen.***

(sad shayari)gam badhe aate hain qaatil kee nigaahon kee tarah tum chhipa lo mujhe ai dost gunaahon kee tarah***

meree subah ho ke na ho mujhe..hai phiraaq yaar se vaasta.. shabe gam se mera mukaabala..dile bekaraar se vaasta..***

hai ye meree badanaseebee tera kya kusoor isamen,tere gam ne maar daala mujhe zindagee se pahale.***

zindagee log jise maraham-e-gam jaanate hain;jis tarah ham ne guzaaree hai vo ham jaanate hain.***

mera bhee aur koee nahin hai tere siva ai shaam-e-gam tujhe main kahaan chhod jaoonga !***

gam vo may-khaana kamee jis mein nahin dil vo paimaana hai bharata hee nahin***apanee tabaahiyon ka mujhe koee gam nahin tum ne kisee ke saath mohabbat nibha to dee . sahir***

gam-e-zamaana ne majaboor kar diya varna ye aarazoo thee ki bas teree aarazoo karate***

kinaaron par raat ke.. ubharata hai ek gam.. log kahate chaand hain.. main kahata be-raham..***

khusheeyon kee manjil dhundhee to gam kee gard milee chaahat ke nagamen chaahe to aahen sard milee dil ke bojh ko duna kar gaya, jo gamakhaar mila…***

(sad shayari)na kisee ka phenka hua mile, na kisee se chheena hua | mujhe bas mere naseeb me likha hua mile, na mile ye bhee to koee gam nahee | mujhe bas meree mehanat ka mile***

tumhen dekh na paane ka gam nahin padh letee hoon tumhen shayaree kee tarah***

log lete hai yoon hee………? shamaan aur paravaane ka naam kuchh nahin hai is jahaan mein……? gam ke afasaane ka naam_***

dayaar-e-gam mein dil-e-beqaraar chhoot gaya sambhal ke dhoondhane jao bahut andhera hai firaq***

vo bade taajjub se poochh baitha mere gam kee vajah… phir halka sa muskuraaya aur kaha…. tumane mohabbat kee hai kabhee.***

kabhee aah lab pe machal gaee kabhee ashq aankh se dhal gae, ye gam ke chiraag hai,kabhee bujh gae kabhee jal gae…**

*na khushiyon se mohabbat kee na gam se dushmanee rakhee… mere dil ne mere haalaat se bas dostee rakhee…***

dil ko gam e hayaat gavaara hai in dinon, dil ko jo dard tha,vahee pyaara hai***

shaakh se kat kar alag hone ka ham ko gam naheemphool hain khushboo luta kar khaak ho jaenge ham***

(sad shayari)aapakee yaad aatee rahee raat-bhar” chaandanee dil dukhaatee rahee raat-bhar, . gaah jalatee huee, gaah bujhatee huee sham-e-gam jhilamilaatee rahee raat bhar**

*jisase dur ho jae mere gam ! maun rah kar bhee tere dil kee gaharaee tak phailee us tanhaee se baat kar sakoon !***

ham par gam – ai – jahaan hain, ye aur baat hai…ham phir bhee bezubaan hain, ye aur baat hai …!!***

beete din ab kabhee laut kar na aayenge,ham kaun se zinda hain ki is gam mein mar jaayenge.***

vo jab yaad aaye, bahot yaad aayegam-e-jindagee ke, andhere mein ham hai chiraag-e-mohabbat jalae bujhae …***

gam kee garmee se dil pighalate rahe tajarbe aansuon mein dhalate rahe***kya jaanoo sajan hotee hai kya gam kee shaam jal uthe sau die,jab liya tera naam.***

aansuo thodee madad mujh ko tumhaaree chaahie gam chale jaenge varna dil ko banjar chhod kar***

nikala hoon main talaash mein shaayad vafa mile, is dard-o-gam ke vaaste koee dava mile!***

gam-e-dauraan mein toot-tootakar bikharee hai hastee meree kar kuchh aur sitam mera vajood abhee baakee hai***

hai ab is maamoore mein, qahat-e-gam-e-ulfat asad, hamane ye maana ke, dillee mein rahe khaavenge kya? mirz ghalib***

aasooon mein chaand dooba raat murajhaee jindagee mein door tak, failee hai tanahaee jo gujare ham pe vo kam hai, tumhaare gam ka mausam hai …!!***

un logon ka kya hua hoga; jinako meree tarah gam ne maara hoga; kinaare par khade log kya jaane; doobane vaale ne kis-kis ko pukaara hoga.***

agar kho gaya ek nasheman to kya gam? makaamaat-e-aah-o-phugaan aur bhee hain***

gam mein doobe hee rahe dam na hamaara nikala bahar-e-hastee ka bahut door kinaara nikala***

tumhaare vaaste ye gam uthaane vaala hoonruko e aansuo main muskuraane vaala hoon .***

hans hans ke meree haalate gam dekhanevaaleye daulate gam teree badaulat hee milee hai….!***

hansane par aansoo aate hain rona hai pharebee aankhon ka,us din se gam hai mere dil mein jis din se ulfat hai seene mein,,,***

jhooth kahate hain log ki mohabbat sab kuchh chheen letee hai. . mainne to mohabbat karake, gam ka khajaana pa liya…!!!***

ek shakhs hee bahut hai gam baantane ke liyemahafilon mein to bas tamaashe banate hain***

zindagee mein saara jhagada hee khvaahishon ka hai…..na to kisee ko gam chaahie aur na hee kisee ko kam chaahie………***

main zindagee ka saath nibhaata chala gaya, gam aur khushee mein phark na mahasoos ho jaha, main dil ko us maqaam pe laata chala gaya.***

chale aate hain gam baar-baar..kya tareeka hai..koee kah do jindagee se bhee…”ye ho chuka hai”..!!***

ghar mein tha kya jo tera gam use gaarat karata?vo jo ham rakhate the ik hasarat-e taameer,so hai! mirz ghalib***

too dekh ya mat dekh , is baat ka gam nahin !par ye mat kah kee ham tere kuchh nahin !!***

ye jo apanee jaan ke hareef ham, teree berukhee ka shikaar thejo gila karen bhee to kya karen, tere apane gam hee hazaar the..!***

musalasal gam uthaane se ye behatar hai,agar maano kinaara karane vaalon se kinaara kar liya jae….!***

kar raha tha gam-e-jahaan ka hisaab aaj tum yaad behisaab aae …. !!***

shaam-e-gam hai teree yaadon ko saja rakkha haimain ne daanista charaagon ko bujha rakkha hai***

vo jo tumane ek dava batalaee thee gam ke lie,gam to jyoon ka tyoon raha bas ham sharaabee ho gaye***

mayakhaane mein aaoonga magar piyoonga nahin saakee ..ye sharaab mera gam mitaane kee taakat nahin rakhatee.***

dard mein lazzat bahut ashkon mein raanaee bahutai gam-e-hastee hamen duniya pasand aaee bahut,***

gujar jaega ye daur bhee zara itmeenaan to rakh jab khushee hee na thahareeto gam kee kya aukaat hai.***

pee leta hoon yu hain kabhee-kabhee gam bhulaane koke dagamagaana zarooree hai sambhalane ke lie***

mahabbat mein karen kya haal dil ka khushee hee kaam aatee hai na gamabharee mahafi‍la mein har ik se bacha kar teree aankhon ne mujhase baat kar lee***

vahee main hoon vahee hai tere gam kee kaar-faramaee* //kabhee tanhaee mein mahafil kabhee mahafil mein tanhaee***

jo gam-e-habeeb se door the vo khud apanee aag mein jal gaejo gam-e-habeeb ko pa gae vo gamon se hans ke nikal gae.***

tumase kya kahen .. kitane gam sahe hamane bevafa ..tere pyaar mein ……! din guzar gaya aitabaar mein raat kat gayee intazaar mein ……..

 

1 thought on “SAD Shayari ग़म शायरी”

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