शुक्र अदा करने के बारे में कुरान, हदीसे पाक और बुजुर्गों के कौल    

अल्लाह का शुक्र अदा करने की फज़िलतें

रब्बे जुल जलाल ने कुरआने मजीद में ज़िक्र के साथ शुक्र को भी शामिल फ़रमाया है, इरशादे बारी तआला है :

“और बेशक अल्लाह का ज़िक्र बहुत बड़ा है”।

इरशादे इलाही है :

पस तुम मेरा ज़िक्र करो मैं तुम्हारा ज़िक्र करूंगा और मेरा शुक्र करो और कुफ्र न करो।

मज़ीद फ़रमाया :

अगर तुम ईमान लाए और शुक्र गुज़ार बन गए तो अल्लाह तआला तुम्हें अज़ाब नहीं देगा।

और फ़रमाया :

हम अन करीब शुक्र करने वालों को अज्र देंगे। और अल्लाह तआला ने शैतान मर्दूद का किस्सा बयान करते हुवे इरशाद फ़रमाया कि शैतान ने बारगाहे रब्बी में कहा : मैं उन्हें बहकाने के लिये तेरे सीधे रास्ते पर बैठ जाऊंगा। बा’ज़ उलमा का ख़याल है कि यहां सिराते मुस्तकीम से मुराद शुक्र का रास्ता है, शैतान ने अल्लाह तआला की मख्लूक पर ता’न करते हुवे कहा था :

तू उन में से अक्सर को शुक्र गुज़ार नहीं पाएगा। और फ़रमाने इलाही है:

मेरे बन्दों में थोड़े हैं जो शुक्र अदा करते हैं। और अल्लाह तआला ने शुक्र करने पर ने’मतों में ज़ियादती का तजकिरा फ़रमाया है चुनान्चे, फ़रमाने इलाही है : अगर तुम ने शुक्र किया तो मैं नेमतों को जियादा करूंगा। और इस फ़रमान में किसी को मुस्तसना नहीं फ़रमाया और पांच चीजें ऐसी हैं जिन में अल्लाह तआला ने इस्तिसना किया है :

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तवंगरी …..कबूलिय्यत …..रिज्क …..बख्शिश और …..तौबा चुनान्चे फ़रमाने इलाही है:

अगर अल्लाह ने चाहा तो अन करीब तुम्हें मालदार कर देगा।

और इरशाद फ़रमाया है: वह जिसे चाहता है बे हिसाब रिज्क देता है।

और फ़रमाया : “और अल्लाह तआला शिर्क के सिवा जो गुनाह चाहे बख्श देगा”

मजीद फ़रमाया : “अल्लाह तआला जिस की तौबा चाहता है कबूल कर लेता है।”

शुक्र अल्लाह तआला की सिफ़ात में से एक सिफ़त है चुनान्चे इरशादे इलाही है :

और अल्लाह तआला शकूर व हलीम है।

अल्लाह तआला ने शुक्र को जन्नतियों का मुब्तदाए कलाम करार दिया है और फ़रमाया :

(जन्नती जन्नत में दाखिल होते ही कहेंगे) “हम्द और शुक्र है अल्लाह के लिये जिस ने अपना वा’दा सच्चा फ़रमाया ।” और फ़रमाया :

उन की आखिरी पुकार यह होगी हम्द है अल्लाह रब्बुल आलमीन के लिये। शुक्र की फ़ज़ीलत में बहुत सी अहादीस भी वारिद हुई हैं चुनान्चे, फ़रमाने नबवी है : “खा कर शुक्र अदा करने वाले साबिर रोज़ादार की तरह हैं।”

हुजूर मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की शुक्रगुजारी

हज़रते अता रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि हम ने हज़रते आइशा रज़ीअल्लाहो अन्हा की ख़िदमत में हाज़िर हो कर अर्ज की, कि आप हमें हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की कोई मुन्फरिद बात सुनाएं, हज़रते आइशा रज़ीअल्लाहो अन्हा अश्कबार हो गई और फ़रमाया : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की कौन सी बात अजीब नहीं थी, सुनो ! हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम एक रात तशरीफ़ लाए और मेरे बिस्तर या मेरे लिहाफ़ में मेरे साथ लैट गए, यहां तक कि आप का जिस्मे अतहर मेरे जिस्म से मस होने लगा। तब आप ने फरमाया : ऐ अबू बक्र की बेटी ! मुझे इजाजत दो ताकि मैं रब की इबादत करूं, मैं ने अर्ज किया : अगर्चे मैं आप के कुर्ब को बे इन्तिहा पसन्द करती हूं मगर आप की ख्वाहिश को तरजीह देती हूं लिहाज़ा मैं आप को इजाज़त देती हूं, आप ज़रूर इबादत फ़रमाएं । आप उठ कर पानी के मश्कीजे की तरफ़ गए और थोड़े से पानी से वुजू फ़रमा कर आप ने नमाज़ शुरू कर दी और आप रोने लगे यहां तक कि आप के आंसू सीने पर बहने लगे, फिर आप रुकूअ में, सजदे से सर उठा कर भी रोते रहे यहां तक कि हज़रते बिलाल रज़ीअल्लाहो अन्हो ने हाज़िर हो कर नमाजे फ़ज़र  के मुतअल्लिक अर्ज़ किया, मैं ने पूछा : आप तो बख़्शे हुवे हैं, आप किस लिये रोते हैं ? आप ने फ़रमाया : क्या मैं अल्लाह का शुक्र गुज़ार बन्दा न बनूं ? और मैं क्यूं न रोऊं हालांकि अल्लाह ने यह आयत नाज़िल फरमाई है: बेशक आस्मानों और जमीन की पैदाइश और रात और दिन की बाहम बदलियों में निशानियां हैं अक्लमन्दों के लिये

एक पथ्थर की गिर्या व जारी

यह हदीस इस बात पर दलालत करती है कि इन्सान कभी भी बारगाहे रब्बुल इज्जत में रोना बन्द न करे और इस राज़ की तरफ़ यह रिवायत भी इशारा करती है कि अल्लाह तआला के एक नबी का ऐसे पथ्थर से गुज़र हुवा जो खुद तो छोटा था मगर उस से पानी बहुत निकल रहा था, अल्लाह तआला के नबी को बहुत तअज्जुब हुवा, अल्लाह तआला ने पथ्थर को कुव्वते गोयाई अता कर दी और उस ने कहा : जब से मैं ने अल्लाह तआला का यह फ़रमान सुना है कि

इन्सान और पथ्थर जहन्नम का ईंधन होंगे। मैं बराबर अल्लाह के ख़ौफ़ से रो रहा हूं।

अल्लाह के नबी ने अल्लाह से दुआ मांगी कि इस पथ्थर को जहन्नम की आग से बचा ले अल्लाह ने दुआ कबूल फ़रमा ली कुछ मुद्दत गुज़रने के बाद उन का फिर उसी तरफ़ जाना हुवा, देखा तो पथ्थर बराबर रोए जा रहा है उन्हों ने पूछा : अब क्यूं रोए जा रहा है ? पथ्थर ने जवाब दिया : उस वक़्त ख़ौफ़ की वज्ह से रो रहा था अब खुशी और मसर्रत में रो रहा हूं।

इन्सान का दिल भी पथ्थर की तरह या इस से भी ज़ियादा सख्त है, इस की सख्ती खौफ़ और शुक्र दोनों हालतों में गिर्या व जारी करने से ख़त्म होती है।

नबिय्ये अकरम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम फ़रमाते हैं : क़ियामत के दिन कहा जाएगा कि हम्द करने वाले खड़े हो जाएं, लोगों का एक गिरोह खड़ा हो जाएगा, उन के लिये झन्डा लगाया जाएगा और वो तमाम जन्नत में जाएंगे पूछा गया : या रसूलल्लाह ! हम्द करने वाले कौन हैं ? आप ने फ़रमाया : जो लोग हर हाल में अल्लाह का शुक्र अदा करते हैं।

दूसरी रिवायत के अल्फ़ाज़ येह हैं “जो हर दुख-सुख में अल्लाह का शुक्र अदा करते हैं।”

 फ़रमाने नबवी हैं कि शुक्र रब्बे रहमान की चादर है।

अल्लाह तआला ने हज़रते अय्यूब अलैहहिस्सलाम  की तरफ़ वहयी  फ़रमाई कि मैं तवील बातों के बदले अपने दोस्तों से शुक्र करने पर राजी हो गया हूं और साबिरीन की तारीफ़ में फ़रमाया कि उन का घर जन्नत में है, जब वो जन्नत में जाएंगे तो मैं उन्हें शुक्र करना सिखलाऊंगा क्यूंकि शुक्र बेहतरीन बात है और इस से मैं ने’मतें ज़ियादा करूंगा और उन की मुद्दते दीदार तवील करता जाऊंगा।

जब जम्ए अम्वाल के सिलसिले में वहयी ए रब्बानी का नुजूल हुवा तो हज़रते उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो ने रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से पूछा कि हम कौन सा माल इकठ्ठा करें ? आप ने फ़रमाया : जिक्र करने वाली ज़बान और शुक्र करने वाला दिल । इस हदीस से मालूम हुवा कि हमें माल के बदले शुक्र गुज़ार दिल को पसन्द करना चाहिये । हज़रते इब्ने मसऊद रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि शुक्र निस्फ़ ईमान है।

अल्लाह का शुक्र अदा करने के तरीके

शुक्र, ज़बान, दिल और बदन से होता है। दिल का शुक्र नेकियों का इरादा करना और मख्लूक से इसे पोशीदा रखना । ज़बान का शुक्र यह है कि उन कलिमात को अदा करे जो इज़हारे शुक्र के लिये मख्सूस हैं। आ’जाए बदन का शुक्र यह है कि इन्हें इबादते इलाही में मसरूफ़ रखे और बुरे कामों में इस्ति’माल न करे, आंखों का शुक्र यह है कि वो जिस मुसलमान का ऐब देखें तो उसे ढांप लें । कानों का शुक्र येह है कि वो किसी मुसलमान की बुराई सुनें तो उसे छुपाएं, ये ही उन का शुक्र है। ज़बान का शुक्र येह है कि वो तक़दीरे इलाही पर अपनी रज़ा का इज़हार करे और इसे ये ही हुक्म दिया गया है, चुनान्चे, हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने एक शख्स से पूछा : कैसे हो ? उस ने कहा : अच्छा हूं। आप ने फिर पूछा ताकि तीसरी मरतबा पूछने पर उस शख्स ने कहा : अच्छा हूं अल्लाह की हम्द और शुक्र करता हूं तब हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया कि मैं ये ही कुछ तुम से सुनना चाहता था।

बुजर्गाने सलफ़का तरीकए शुक्रगुजारी

बुजुर्गाने सलफ़ का यह तरीका था कि वो दूसरों से पूछा करते थे कि कैसे हो ? उन की निय्यत यह होती थी कि लोग जवाब में अल्लाह का शुक्र करें और जवाब देने वाले और पूछने वाले दोनों का शुमार शुक्र गुज़ारों में हो जाए, उन की इस बात में रिया का क़तई दख्ल नहीं होता था। जिस शख्स से भी उस की हालत पूछी जाए वोह तीन बातों में से एक बात करेगा, शुक्र अदा करेगा, शिकायत करेगा या फिर खामोश रहेगा, अल्लाह का शुक्र अदा करना इबादत है, शिकायत करना गुनाह है जो दीनदारों के नज़दीक सख़्त ना पसन्दीदा फेल है, अल्लाह तआला के यहां उस की बुराई का कहना ही क्या जो बादशाहों का बादशाह है जिस के दस्ते कुदरत में बन्दए नाचीज़ की तमाम चीजें हैं लिहाज़ा इन्सान के लिये ज़रूरी है अगर वो मसाइब पर सबर नहीं कर सकता, कज़ाए इलाही पर राजी नहीं रह सकता और ला मुहाला अपनी तही दामनी का शिक्वा करना चाहता है तो वो लोगों के आगे शिकायतें करने के बजाए अल्लाह रब्बुल इज्जत के हुजूर अपनी गुज़ारिशात पेश करे वो ही मसाइब में मुब्तला करने वाला और वो ही इन से नजात देने वाला है और यह हक़ीक़त है कि बन्दए नाचीज़ का अल्लाह की बारगाह में अपनी ज़िल्लत का इज़हार करना हक़ीकी इज्जत है मगर अपने जैसे बन्दों के आगे शिक्वे करना और ज़िल्लत उठाना इन्तिहाई रुस्वा कुन चीज़ है।

फ़रमाने इलाही है : “तहक़ीक़ तुम अल्लाह के सिवा जिन को (मा’बूद समझ कर) पुकारते हो वो तुम्हारे जैसे अल्लाह के बन्दे हैं।”

नीज़ फ़रमाया : “तहक़ीक़ तुम अल्लाह के सिवा जिन की इबादत करते हो वोह तुम्हारे रिज्क के मालिक नहीं हैं अल्लाह के यहां रिज्क तलाश करो और उस की इबादत करो और उस का शुक्र अदा करो।”

शुक्र की अक्साम में से ज़बान से शुक्र अदा करना भी है चुनान्चे, मरवी है कि हज़रते उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रज़ीअल्लाहो अन्हो की खिदमत में एक वफ़्द आया तो उन में से एक जवान खड़ा हो कर आप से गुफ्तगू करने की तय्यारी करने लगा। आप ने फ़रमाया : बड़ों की इज्जत करो या’नी बड़ों को मुझ से गुफ़्त्गू करने दो। इस पर वो जवान बोला : ऐ अमीरुल मोमिनीन ! अगर कियादत का मे’यार उम्र होता तो मुसलमानों में ऐसे बूढों की कसीर ता’दाद मौजूद है जो आप से उम्र में बड़े हैं। आप ने यह सुन कर फ़रमाया : चलो बात करो ! उस ने कहा : हम कुछ लेने नहीं आए क्यूंकि आप की मेहरबानियों से हमें बहुत कुछ मिल चुका है, किसी से खौफ़ज़दा हो कर नहीं आए क्यूंकि आप के अद्लो इन्साफ़ ने हमारे तमाम खौफ़ दूर कर के अम्न की ज़िन्दगी बख़्शी है, हम सिर्फ इस लिये आए हैं कि अपनी ज़बानों से आप का शुक्रिया अदा करें और वापस चले जाएं।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 

 

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