अल्लाह से मिलने मोहम्मद स.अ.व. का मेराज के सफ़र पर आसमानों में जाना

मेराज शरीफ का वक़ेआ

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 

बुखारी ने क़तादा से, इन्हों ने अनस बिन मालिक रज़ीअल्लाहो अन्हो से, इन्हों ने मालिक बिन सा’सआ रज़ीअल्लाहो अन्हो से रिवायत की है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने इन्हें मे’राज की रात का वाकिआ सुनाया और फ़रमाया कि मैं हतीमे का’बा में था और येह भी फ़रमाया कि मैं मकामे हजर में लैटा हुवा था कि यकायक मेरे पास एक आने वाला आया और उस ने कुछ कहा, मैं ने सुना वोह कह रहा था फिर इस जगह और उस जगह के दरमियान चाक किया गया (रावी कहता है मैं ने जारूद रज़ीअल्लाहो अन्हो से पूछा, वोह मेरे करीब बैठे हुवे थे कि इस जगह और उस जगह से क्या मुराद है ? उन्हों ने कहा : हल्कूम से नाफ़ तक) फिर उन्हों ने मेरा दिल निकाला और मेरे पास एक सोने का तश्त लाया गया जो ईमान से लबरेज़ था, इस के बाद मेरा दिल धोया गया फिर इसे इल्म व ईमान से लबरैज़ कर के वापस रख दिया गया।

 

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मेराज के दौरान बुर्राक का ज़िक्र

फिर मेरे पास एक सफ़ेद जानवर लाया गया जो खच्चर से पस्त और गधे से ऊंचा था (जारूद ने हज़रते अनस रज़ीअल्लाहो अन्हो से पूछा कि ऐ अबू हम्जा क्या वोह बुराक था ? हज़रते अनस रज़ीअल्लाहो अन्हो ने जवाब दिया : हां ! वोह अपना क़दम मुन्तहाए नज़र पर रखता था) मैं उस पर सुवार हुवा और जिब्रील मुझे ले कर चले यहां तक कि आस्माने दुन्या तक पहुंचे, जिब्रील ने उस का दरवाज़ा खुलवाया, पूछा गया : कौन है ? उन्हों ने कहा : जिब्रील, कहा गया : और तुम्हारे साथ कौन है? जिब्रील ने कहा : मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम पूछा गया : वोह बुलाए गए हैं ? जिबील ने कहा : हां ! कहा गया : उन्हें खुश आमदीद हो, उन का आना मुबारक हो, फिर दरवाज़ा खोल दिया गया।

जब मैं वहां पहुंचा तो वहां आदम अलैहहिस्सलाम  मौजूद थे। जिब्रील ने कहा : यह आप के बाप आदम हैं, इन्हें सलाम कीजिये ! लिहाज़ा मैं ने सलाम किया, उन्हों ने सलाम का जवाब दिया और कहा : सालेह बेटे और सालेह नबी को खुश आमदीद हो।

फिर जिब्रील मेरे साथ ऊपर चढ़े यहां तक कि दूसरे आस्मान पर पहुंचे और जिब्रील ने दरवाज़ा खुलवाया, पूछा गया : कौन है ? कहा : जिब्रील, पूछा गया : तुम्हारे हमराह कौन है ? उन्हों ने कहा : मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम पूछा गया : क्या वोह बुलवाए गए हैं ? जिब्रील बोले : हां ! कहा गया : उन का आना मुबारक हो और दरवाज़ा खोल दिया।

जब मैं वहां पहुंचा तो मैं ने हज़रते ईसा अलैहहिस्सलाम  और हज़रते यहयाअलैहहिस्सलाम  : को वहां पाया और वोह दोनों आपस में ख़ालाज़ाद भाई हैं, जिब्रील ने कहा कि येह यहया और ईसा ! अलैहहिस्सलाम  हैं, इन्हें सलाम कीजिये ! मैं ने उन्हें सलाम किया, उन्हों ने सलाम का जवाब दिया और कहा : सालेह भाई और सालेह नबी को खुश आमदीद हो।।

फिर जिब्रील मुझे तीसरे आस्मान पर ले गए और दरवाजा खुलवाना चाहा, पूछा गया कौन ? कहा : जिब्रील, पूछा गया : तुम्हारे साथ और कौन है ? कहा : मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम कहा गया : क्या वोह बुलाए गए हैं ? जिबील ने कहा : हां ! कहा गया : खुश आमदीद, इन का आना बहुत अच्छा और मुबारक है और दरवाज़ा खोल दिया गया।

जब मैं वहां पहुंचा तो मुझे यूसुफ़ अलैहहिस्सलाम  मिले, जिब्रील ने कहा : येह यूसुफ़ अलैहहिस्सलाम  हैं, इन्हें सलाम कीजिये ! मैं ने उन्हें सलाम किया, उन्हों ने सलाम का जवाब दिया और कहा : सालेह भाई और सालेह नबी को खुश आमदीद हो।

फिर जिबील मुझे चौथे आस्मान पर ले गए और दरवाज़ा खुलवाना चाहा, पूछा गया कि कौन है ? इन्हों ने कहा : जिब्रील ! पूछा गया : तुम्हारे साथ और कौन है ? जिब्रील बोले मोहम्मद कहा गया : क्या उन्हें बुलाया गया है ? जिब्रील ने कहा : हां ! दरबान ने कहा : खुश आमदीद, उन का आना बहुत मुबारक है और दरवाज़ा खोल दिया गया।

जब मैं वहां पहुंचा तो मैं ने हज़रते इदरीस अलैहहिस्सलाम  को देखा, जिब्रील ने कहा : यह इदरीस अलैहहिस्सलाम  हैं, इन्हें सलाम कीजिये ! मैं ने उन्हें सलाम किया उन्हों ने सलाम का जवाब दिया और कहा : सालेह भाई और सालेह नबी को खुश आमदीद हो ।

फिर मुझे जिब्रील साथ ले कर ऊपर चढ़े यहां तक कि पांचवें आस्मान पर पहुंचे, उन्हों ने दरवाजा खुलवाया, पूछा गया : कौन है ? कहा : जिब्रील, पूछा गया : तुम्हारे साथ कौन है ? कहा : मोहम्मद पूछा गया : क्या उन्हें बुलाया गया है ? जिब्रील ने कहा : हां ! कहा गया उन्हें खुश आमदीद हो, उन का आना मुबारक हो ।

जब मैं वहां पहुंचा तो हज़रते हारून मिले, जिब्रील ने कहा : येह हारून अलैहहिस्सलाम  हैं, इन्हें सलाम कीजिये ! मैं ने उन्हें सलाम किया, उन्हों ने सलाम का जवाब दिया और कहा : सालेह भाई और सालेह नबी को खुश आमदीद हो ।

फिर जिब्रील मुझे ऊपर ले गए यहां तक कि हम छटे आस्मान पर पहुंचे, उन्हों ने दरवाज़ा खुलवाया, पूछा गया : कौन है ? कहा : जिब्रील, पूछा गया : तुम्हारे साथ और कौन है ? कहा : मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम कहा गया : क्या वोह बुलाए गए हैं ? जिब्रील ने कहा : हां ! उस फ़िरिश्ते ने कहा : उन्हें खुश आमदीद हो, उन का आना मुबारक है।

जब मैं वहां पहुंचा तो हज़रते मूसा अलैहहिस्सलाम  से मुलाकात हुई, जिब्रील ने कहा : येह मूसा अलैहहिस्सलाम  हैं इन्हें सलाम कीजिये, मैं ने उन्हें सलाम किया, उन्हों ने सलाम का जवाब दिया और कहा : सालेह भाई और सालेह नबी को खुश आमदीद हो, फिर हम जब आगे बढ़े तो वोह रोए, उन से कहा गया : आप क्यूं रोते हैं ? तो उन्हों ने कहा : मैं इस लिये रोया हूं कि मेरे बाद एक नौजवान मबऊस किया गया है जिस की उम्मत के लोग मेरी उम्मत से ज़ियादा जन्नत में जाएंगे।

फिर जिबील मुझे सातवें आस्मान पर चढ़ा ले गए और उस का दरवाज़ा खुलवाया, पूछा गया : कौन ? कहा : जिब्रील, पूछा गया : तुम्हारे साथ और कौन है ? कहा : मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम पूछा गया : क्या वोह बुलाए गए हैं ? कहा : हां ! कहा गया : उन्हें खुश आमदीद हो, उन का आना मुबारक है।

जब मैं वहां पहुंचा तो हज़रते इब्राहीम मिले, जिब्रील ने कहा : यह आप के वालिदे गिरामी इब्राहीम हैं, इन्हें सलाम कीजिये, मैं ने उन्हें सलाम किया, उन्हों ने सलाम का जवाब दिया और कहा : सालेह बेटे और सालेह नबी को खुश आमदीद हो ।

सिदरतुल मुन्तहा की कैफिय्यत

फिर मुझे सिद्रतुल मुन्तहा तक ले जाया गया, उस के फल मकामे हजर के मटकों की तरह और उस के पत्ते हाथी के कानों जैसे थे, वहां चार नहरें थीं, दो ज़ाहिर और दो पोशीदा, मैं ने जिब्रील से पूछा : येह नहरें कैसी हैं ? उन्हों ने कहा : जो दो पोशीदा हैं वोह जन्नत की नहरें हैं और जो दो नहरें ज़ाहिर हैं वोह नील और फुरात हैं।

फिर बैतुल मा’मूर मेरे सामने जाहिर किया गया जिस में सत्तर हज़ार फ़िरिश्ते हर रोज़ दाखिल होते हैं । फिर मुझे एक शराब (शरबत) का बरतन, एक दूध का और एक शहद का बरतन दिया गया, मैं ने दूध का इन्तिखाब कर लिया, जिब्रील ने कहा : येही फ़ितरत है। आप और आप की उम्मत इस पर काइम रहेंगे, इस के बाद मुझ पर हर रोज़ की पचास पचास नमाजें फ़र्ज़ करार दे दी गई।

मूसा अलैहहिस्सलाम का पचास नमाज़ों को कम करवाने का अर्ज़ करना

फिर जब मैं वापस हुवा तो मूसा अलैहहिस्सलाम  ने कहा : आप को किस बात का हुक्म दिया गया है ? मैं ने कहा : हर दिन में पचास नमाज़ों का, मूसा अलैहहिस्सलाम  ने कहा : आप की उम्मत रोज़ाना पचास नमाजें नहीं पढ़ सकेगी, मैं आप से पहले लोगों को आजमा चुका हूं और मैं ने बनी इस्राईल से सख्त बरताव किया है लिहाज़ा अपने रब के पास लौट जाइये और अपनी उम्मत के लिये तख़्फीफ़ कराइये, चुनान्चे, मैं लौटा और (दो बारियों में) दस नमाजे मुआफ़ कर दी गई।

फिर मैं मूसा अलैहहिस्सलाम  के पास आया, उन्हों ने पहले की तरह कहा, मैं फिर लौट गया और फिर दस नमाजें मुआफ़ कर दी गई, । मैं फिर मूसा .. के पास आया, उन्हों ने पहले की तरह कहा : मैं फिर लौट गया और फिर दस नमाजें मुआफ़ कर दी गई। मैं फिर मूसा अलैहहिस्सलाम  के पास आया तो उन्हों ने इसी तरह कहा : मैं फिर वापस लौट गया और मुझे रोज़ाना दस नमाज़ों का हुक्म दिया गया मैं फिर मूसा अलैहहिस्सलाम  के पास आया तो उन्हों ने इसी तरह कहा : मैं फिर वापस लौट गया और मुझे हर रोज़ पांच नमाज़ों का हुक्म दिया गया।

मैं जब मूसा अलैहहिस्सलाम  के पास लौट कर आया तो उन्हों ने पूछा कि आप को क्या हुक्म मिला है ? मैं ने कहा : रोज़ाना पांच नमाज़ों का हुक्म मिला है, उन्हों ने कहा कि आप की उम्मत रोज़ाना पांच नमाजें भी नहीं पढ़ सकेगी, मैं ने आप से पहले लोगों का तजरिबा किया है और बनी इस्राईल पर सख्त बरताव कर चुका हूं लिहाज़ा आप फिर अपने रब के हुजूर जाएं और अपनी उम्मत के लिये तख्फीफ़ की दरख्वास्त करें।

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया कि मैं अपने रब से कई बार दरख्वास्त कर चुका हूं, अब मुझे शर्म आती है लिहाज़ा अब मैं राजी हूं और रब के हुक्म को तस्लीम करता हूं।

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम फ़रमाते हैं कि जब मैं आगे बढ़ा तो किसी पुकारने वाले ने आवाज़ दी कि मैं ने अपना हुक्म जारी कर दिया और अपने बन्दों से तख़्फ़ीफ़ कर दी है।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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