गफ़लत दुनिया की ज़िन्दगी और आखिरत की ज़िन्दगी

गफ़लत- दुनिया और आखिरत की ज़िन्दगी  

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

Color Codes –  कुरआन मजीदहदीसे पाककौल (Quotes). 

गफ़लत से शर्मिंदगी बढती है और नेमत मिटती है, खिदमत का जज़्बा फीका पड़ जाता है. हसद ज्यादा हौता है और मलामत व पछतावे की हालत ज्यादा होती है.

सबसे बड़ी हसरत – एक नेक आदमी ने अपने उस्ताद को ख्वाब में देखा और पुछा आप के नज़दीक सब से बड़ी हसरत कौन सी है? उस्ताद ने जवाब दिया गफ़लत की हसरत सब से बड़ी है.

रिवायत है की किसी शख्श ने हजरते जुन्नून मिस्री रहमतुल्लाह अलैह को ख्वाब में देखा और सवाल किया की अल्लाह ताआला ने आप के साथ क्या सुलूक किया? तो उन्होंने जवाब दिया की अल्लाह ने मुझे अपनी बारगाह में खड़ा किया और फ़रमाया की ऐ झूठे दावेदार! तूने मेरी मोहब्बत का दावा किया और फिर मुझ से गाफिल रहा- शेर

“तू गफ़लत में मुब्तला है और तेरा दिल भूलने वाला है, उम्र ख़त्म हो गयी और गुनाह वेसे के वेसे ही मौजूद हैं”.

हिकायत – एक नेक आदमी ने अपने वालिद को ख्वाब में देख कर पुछा ए अब्बा जान! आप कैसे हैं और क्या हाल है? वालिद ने जवाब दिया हमने गफ़लत में ज़िन्दगी गुज़री और गफ़लत में ही मर गए.

 

मौत के पैगम्बर और याकूब अलैहिसलाम का किस्सा  

ज़हरुर रियाज़ में है की हज़रते याकूब अलैहिसलाम का मलकुल मौत से भाई चारा दोस्ती थी. एक दिन मलकुल मौत हाज़िर हुए तो हज़रत याकूब अलैहिसलाम ने पुछा तुम मुलाकात के लिए आये हो या रूह कब्ज़ करने को? इजराईल ने कहा सिर्फ मुलाक़ात के लिए आया हूँ. आपने फ़रमाया मुझे एक बात कहनी है. मल्कुल्मौत बोले कहिये कौन सी बात है? हज़रत याकूब अलैहिसलाम ने फ़रमाया जब मेरी मौत करीब आ जाये और तुम रूह कब्ज़ करने को आने वाले हो तो मुझे पहले से आगाह कर देना – मलकुल मौत ने कहा मैं अपने आने से पहले आप के पास दो तीन कासिद भेजूंगा

जब हज़रत याकूब अलैहिसलाम का आखिरी वक़्त आया और मलकुल मौत रूह कब्ज़ करने को पहुंचे तो आप ने कहा की तुम ने तो वादा किया था की अपने आने से पहले मेरी तरफ कासीद भेजोगे! इजराईल ने कहा मैंने ऐसा ही किया था, पहले तो आप के काले बाल सफ़ेद हुए, यह पहला कासिद था, फिर बदन की चुस्ती और ताक़त ख़त्म हुयी यह दूसरा कासिद था, फिर आप का बदन झुक गया यह तीसरा कासिद था. ए याकूब अलैहिसलाम, हर इन्सान के पास मेरे भी तीन कासिद आते हैं.

शेर

ज़माना गुज़र गया और गुनाहों को छोड़ गया, मौत का कासिद आ पहुंचा और दिल गाफिल ही रहा.

तेरी दुनियावी नेमते धोका और फ़रेब हैं, और तेरा दुनिया में हमेशा रहना मुहाल और धोका है.

 

शैख़ अबू अली दक्काक  रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं की में एक ऐसे बीमार नेक मर्द की अयादत को गया जिन की गिनती बड़े मशाईख में हौती थी, मैंने उन के पास उन के शागिर्दों को बैठे हुए देखा, शैख़ अबू अली रहमतुल्लाह अलैह रो रहे थे मैंने कहा ऐ शैख़ क्या आप दुनिया पर रो रहे हैं? उन्होंने फ़रमाया नहीं, मैं अपनी नमाज़ों के कज़ा होने पर रो रहा हूँ, मैंने कहा आप तो इबादत गुज़र शख्श थे फिर नमाज़ें किस तरह कज़ा हुई? उन्होंने फ़रमाया मैंने हर सजदा गफ़लत में किया और हर सजदे से गफ़लत में सर उठाया और अब गफ़लत की हालत में मर रहा हूँ, फिर एक आह भरी और यह अशआर पढ़े

मैंने अपने हश्र, कयामत के दिन और कब्र में रहने के बारे में सोचा

जो इज्ज़त और वकार वाले वजूद के साथ मिटटी का गिरवी होगा और मिटटी ही उस का तकिया होगा.

मैंने हिसाब के दिन की तवालत के बारे में सोचा और उस वक़्त की रुसवाई का ख्याल किया जब नामा ए आमाल मुझे दिया जायेगा.

मगर ऐ रब्बे ज़ुल्जलाल! मेरी उम्मीदें तेरी रहमत के साथ हैं, तू ही मेरा खालिक और मेरे गुनाहों को बख्शने वाला है.

 

महज़ दावा बेकार है

महज़ दावा बेकार हैउयुनुल अखबार में है हज़रत शकीक बल्खी रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं, लोग तीन बातें महज़ जबानी करते हैं मगर अमल उस के खिलाफ करते हैं

1 यह कहते हैं की हम अल्लाह ताआला के बन्दे हैं लेकिन काम गुलामों जैसे नहीं करते बल्कि आज़ादों की तरह अपनी मर्ज़ी पर चलते हैं.

2 यह कहते हैं की अल्लाह ताआला ही हमें रिज्क रोज़ी देता है लेकिन उन के दिल दुनिया और दुनिया की दौलत जमा किये बगैर मुतमईन नहीं होते और यह उन के इकरार के सरासर खिलाफ है.

3 तीसरा यह की कहते हैं की आखिर हमें मर जाना है लेकिन काम ऐसे करते हैं जैसे उन्हें कभी मरना ही नहीं.

ऐ मुखातब! ज़रा सोच तो सही, अल्लाह के सामने तु कौनसा मुंह लेकर जाएगा और कौन सी ज़बान से जवाब देगा? जब वह तुझ से हर छोटी-बड़ी चीज़ के बारे में सवाल करेगा, उन सवालों के लिए अभी से अच्छा जवाब तलाश कर ले !

अल्लाह का फरमान है

“और अल्लाह से डरो! बेशक तुम जो कुछ करते हो, अल्लाह उससे आगाह है और खबर रखता है.”

फिर अल्लाह ने मोमिनों को समझाया की वह उस के अहकामात को ना छोड़ें और हर हालत में उस की वहदानियत (एक होने) का इकरार करते रहें.

अल्लाह की इताअत

 हदीस शरीफ में आया है की “अर्शे इलाही के पाए पर तहरीर है की जो मेरी इताअत करेगा, मैं उसकी बात मानूंगा, जो मुझसे मोहब्बत करेगा मै उसे अपना महबूब बनाऊंगा, जो मुझ से मांगेगा में उसे अता करूँगा और बख्शिश की तलब करेगा उसे बख्श दूंगा.”

इस फरमाने नबवी सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की रौशनी में हर समझदार और अक्लमंद के लिए ज़रूरी है की वह खौफ और भरपूर खुलूस के साथ अल्लाह ताआला की इबादत करता रहे और राज़ी बकज़ा रहे, उस की दी हुई मुसीबतों पर सब्र करे, उस की नेमतों का शुक्र करते हुए कम व ज्यादा पर राज़ी हो जाए. अल्लाह ताआला फरमाता है जो मेरी कज़ा पर राज़ी, मसाइब पर साबिर नहीं और नेमतों का शुक्र अदा नहीं करता और कम व ज्यादा पर कनाअत नहीं करता, वह मेरे सिवा कोई और रब तलाश कर ले.

 

हज़रत हसन बसरी का एक दिलनशीं जवाब

एक शख्श ने जनाब हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह से कहा की ताज्जुब है की मै इबादत में लुत्फ़ नहीं पाता! आप ने जवाब दिया “शायद तूने किसी ऐसे शख्श को देख लिया है जो अल्लाह से नहीं डरता.”

बंदगी का हक़ यह है की अल्लाह की रज़ा के लिए तमाम चीज़ों को छोड़ दिया जाये.

किसी शख्श ने जनाब अबी यज़ीद रहमतुल्लाह अलैह से कहा की मै इबादत में कैफ और सुरूर नहीं पाता!  उन्होंने जवाब दिया की यह इसलिए है की तू इबादत की बंदगी करता है, अल्लाह ताआला की बंदगी नहीं करता! तू अल्लाह की बंदगी कर फिर देख इबादत में कैसा मज़ा आता है.

 

अल्लाह की इबादत या मखलूक की इबादत

एक शख्श ने नमाज़ शुरू की, जब “इय्याका नाअ बोदू” पढ़ा तो उसके दिल में ख्याल आया की में खालिसतन (केवल) अल्लाह की इबादत कर रहा हूँ, गैब से आवाज़ आई तूने झूठ बोला है! तू तो मखलूक की इबादत करता है, तब उसने मखलूक से नाता तोड़ लिया और नमाज़ शुरू की, जब फिर उसी आयत तक पहुंचा तो वही दिल में गुज़रा, फिर निदा आई की तू अपने माल की इबादत करता है, उसने सारा माल राहे खुदा में खर्च कर दिया, और नमाज़ की नियत की, जब उसी आयत तक पहुंचा तो फिर ख्याल आया की मै हक़ीक़त में अल्लाह की इबादत करने वाला हूँ, निदा आई की तुम झूठे हो, तुम अपने कपड़ों की इबादत करते हो! उस वक़्त उस अल्लाह के बन्दे ने बदन के कपड़ों के अलावा सब कपडे अल्लाह के रास्ते में लुटा दिए, अब जो नमाज़ में उस आयत पर पहुंचा तो आवाज़ आई की अब तुम अपने दावे में सच्चे हो.

 

नसीहत पर गुलाम को आज़ाद कर दिया

रौनक उल मजालिस में है की एक शख्श की अबायें (लिबास) गुम हो गईं, और यह नहीं पता चल रहा था की उन्हें कौन ले गया, जब उस शख्श ने नमाज़ शुरू की तो उसे याद आ गया, ज्यों ही नमाज़ से फारिग हुआ, गुलाम को आवाज़ दी की जाओ फलां आदमी से मेरी अबायें ले आओ! गुलाम ने कहा की आप को यह कब याद आया? उसने कहा मुझे नमाज़ में याद आया गुलाम ने फ़ौरन जवाब दिया तब तो आपने नमाज़ अबा के लिए पढ़ी, अल्लाह के लिए नहीं, यह बात सुनते ही उस शख्श ने उस गुलाम को आज़ाद कर दिया.

इसलिए हर समझदार के लिए ज़रूरी है की वह दुनिया को तर्क कर दे और अल्लाह की इबादत करता रहे, आइन्दा के बारे में गौर व फ़िक्र करता रहे और अपनी आखिरत संवारता रहे जैसा की फरमाने इलाही है-

“जो शख्श आखिरत की खेती की फ़िक्र करता है तो हम उसकी खेती ज्यादा करते हैं और जो शख्श दुनिया की खेती का इरादा करता है हम उसे उस में से कुछ देंगे और आखिरत में उस का कुछ हिस्सा नहीं.”

यानी उसके दिल से आखिरत की मोहब्बत निकाल दी जाती है, इसीलिए हज़रते अबू बकर सिद्दीक़ रज़िअल्लाहो अन्हो ने हुज़ूरे अकरम मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की ज़ात पर चालीस हज़ार दीनार एलानिया और चालीस हज़ार दीनार पोशीदा तौर पर खर्च कर दिए थे यहाँ तक की उनके पास कुछ भी बाकी ना रहा. हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम और आप के अलहे बैत दुनिया और उसकी ख्वाइश से मुकम्मल परहेज़ करते थे, इसीलिए हज़रते फ़ातिमा रज़िअल्लाहो अन्हा का जहेज़ सिर्फ मेंढे की एक रंगी हुई खाल और एक चमड़े का तकिया था जिस में खजूर की छाल भरी हुई थी.

*** हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ.-किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

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