इस्लामी महीने ज़िल हिज्जा के दस दिनों की बरकतें

अशर ए जिलहिज्जा की फ़ज़ीलतें

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 हज और कुर्बानी के दिन

हज़रते इब्ने अब्बास रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : और अय्याम ऐसे नहीं हैं जिन में अमल अल्लाह तआला को इन दिनों या’नी ज़िल हिज्जा के दस दिनों के अमल से ज़ियादा पसन्द हो । सहाबए किराम ने अर्ज़ किया : क्या राहे खुदा में जिहाद भी ऐसा नहीं ? आप ने फ़रमाया : हां ! राहे खुदा में जिहाद भी मगर येह कि आदमी अपना मालो जान ले कर राहे खुदा में निकला और इन में से कुछ भी सलामत न लाया।

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हज़रते जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया कि अल्लाह तआला को इन अय्याम से ज़ियादा महबूब और कोई दिन नहीं है और इन दस दिनों से अफ़ज़ल अल्लाह तआला के यहां कोई दिन नहीं है, कहा गया कि राहे खुदा में जिहाद के दिन भी ऐसे नहीं हैं ? आप ने फ़रमाया कि राहे खुदा में जिहाद के दिन भी इन जैसे नहीं मगर जिस शख्स ने राहे खुदा में अपने घोड़े को ज़ख्मी कर दिया और खुद भी ज़ख़्मी हुवा।

हज़रते आइशा रज़ीअल्लाहो अन्हा  से मरवी है कि एक जवान जो अहादीसे रसूल को सुना करता था, जब ज़िल हिज्जा का चांद नज़र आया तो उस ने रोज़ा रख लिया, जब हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम को येह खबर मिली तो आप ने उसे बुलाया और पूछा : तुझे किस ने इस बात पर आमादा किया कि तू ने रोज़ा रख लिया ? उस ने अर्ज की : या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम मेरे मां-बाप आप पर कुरबान हों, येह हज व कुरबानी के दिन हैं, शायद कि अल्लाह तआला मुझे भी इन की दुआओं में शामिल फ़रमा ले। आप ने फ़रमाया : तेरे हर दिन के रोजे का अज्र सो गुलाम आज़ाद करने के बराबर, सो ऊंटों की कुरबानियों और राहे खुदा में दिये गए सो घोड़ों के अज्र के बराबर है। जब आठवीं ज़िल हिज्जा का दिन होगा तो तुझे उस दिन के रोजे का सवाब हज़ार गुलाम आज़ाद करने, हज़ार ऊंट की कुरबानी करने और राहे खुदा में सुवारी के लिये हज़ार घोड़े देने के बराबर हासिल होगा। जब नवीं का दिन होगा तो तुझे उस दिन के रोजे का सवाब दो हज़ार गुलाम आज़ाद करने, दो हज़ार ऊंटों की कुरबानी और राहे खुदा में सुवारी के लिये दिये गए दो हज़ार घोड़ों के अज्र के बराबर होगा ।

नबिय्ये अकरम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का इरशाद है कि नवीं ज़िल हिज्जा का रोज़ा दो साल के रोज़ों के बराबर और आशूरे का रोज़ा एक साल के रोजे के बराबर है।

मुफस्सिरीने किराम इस फ़रमाने इलाही : और हम ने मूसा को तीस रातों का वादा दिया और उस को दस से पूरा किया। की तफ्सीर में लिखते हैं कि इन दस रातों से मुराद ज़िल हिज्जा की पहली दस रातें हैं।

हज़रते अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि अल्लाह तआला ने दिनों में से चार दिन, महीनों में से चार महीने, औरतों में से चार औरतें पसन्द फ़रमाई हैं, चार आदमी जन्नत में सब से पहले जाएंगे और चार आदमियों की जन्नत मुश्ताक है, दिनों में से पहला जुमुआ का दिन है, इस में ऐसी साअत है कि जब कोई बन्दा इस साअत में अल्लाह तआला से दुन्या या आख़िरत की किसी ने मत का सुवाल करता है तो अल्लाह तआला उसे अता फ़रमाता है। दूसरा नवीं ज़िल हिज्जा (अरफ़ा) का दिन है, जब अरफ़ा का दिन होता है तो अल्लाह तआला फ़रिश्तों में फ़ख्न करता है और फ़रमाता है : ऐ फ़िरिश्तो ! मेरे बन्दों को देखो जो बिखरे बाल, गुबार आलूद चेहरे लिये माल खर्च कर के और जिस्मों को मशक्कत में डाल कर हाज़िर हुवे हैं, तुम गवाह हो जाओ मैं ने उन्हें बख़्श दिया है। तीसरा कुरबानी का दिन है। जब कुरबानी का दिन होता है और बन्दा कुरबानी से कुर्बे इलाही तलब करता है तो जूही कुरबानी के खून का पहला कतरा जमीन पर गिरता है वोह बन्दे के हर गुनाह का कफ्फ़ारा हो जाता है। चौथा ईदुल फित्र का दिन है, जब बन्दे माहे रमज़ान के रोजे रख लेते हैं और ईद की नमाज़ पढ़ने बाहर निकलते हैं तो अल्लाह तआला फ़िरिश्तों से फ़रमाता है कि हर काम करने वाला उजरत तलब करता है, मेरे बन्दों ने महीने भर रोज़े रखे और अब ईद के लिये आए हैं और अपना अज्र तलब कर रहे हैं, मैं तुम्हें गवाह बनाता हूं कि मैं ने उन्हें बख़्श दिया है, और पुकारने वाला पुकार कर कहता है : ऐ उम्मते मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम तुम लौट जाओ, अल्लाह तआला ने तुम्हारी बुराइयों को नेकियों में बदल दिया है।

चार पसन्दीदा महीने में

चार पसन्दीदा महीने येह हैं : रजबुल मुरज्जब, जी का’दा, ज़िल हिज्जा और मुहर्रमुल हराम। औरतें येह हैं : मरयम बिन्ते इमरान, ख़दीजा बिन्ते खुवैलिद (जो जहान की औरतों में सब से पहले अल्लाह और उस के रसूल पर ईमान लाई) फ़िरऔन की बीवी आसिया बिन्ते मुज़ाहिमऔर जन्नती औरतों की सरदार फ़ातिमा बिन्ते मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ।

सब से सबकत ले जाने वाले

हर कौम में से एक सबक़त ले जाने वाला है, अरब में से सबक़त ले जाने वाले हमारे आका व मौला मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम हैं, फ़ारिस से हज़रते सलमान, रूम से हज़रते सुहैब और हबशा से हज़रते बिलाल रज़ीअल्लाहो अन्हो हैं।

और वोह चार जन्नत जिन की मुश्ताक है येह हज़रते अली बिन अबी तालिब, हज़रते सलमान फ़ारिसी, हज़रते अम्मार बिन यासिर और हज़रते मिक्दाद बिन अस्वद रज़ीअल्लाहो अन्हो हैं।

नबिय्ये करीम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से मरवी है : आप ने फ़रमाया कि जिस ने यौमुत्तरविय्या (आठवीं ज़िल हिज्जा) का रोज़ा रखा, अल्लाह तआला उसे हज़रते अय्यूब अलैहहिस्सलाम  के मसाइब पर सब्र करने के बराबर सवाब अता फ़रमाता है और जिस ने यौमे अरफ़ा (ज़िल हिज्जा की नवीं) का रोज़ा रखा, अल्लाह तआला उसे हज़रते ईसा अलैहहिस्सलाम  के बराबर सवाब अता फ़रमाता है।

आप से येह भी मरवी है कि जब अरफ़ा का दिन होता है तो अल्लाह तआला अपनी रहमत को फैलाता है, इस दिन से ज़ियादा किसी दिन में भी लोग आग से आज़ाद नहीं हुवे और जिस ने अरफ़ा के दिन अल्लाह तआला से दुन्या या आखिरत की हाजत तलब की तो अल्लाह तआला उस की हाजत पूरी कर देता है और अरफ़ा के दिन का रोज़ा एक साल गुज़श्ता और एक साल आयिन्दा के गुनाहों का कफ्फारा होता है और इस में येह हिक्मत है , कि येह दिन दो ईदों के दरमियान है और ईदैन मोमिनों के लिये मसर्रत के दिन होते हैं और इस से बढ़ कर कोई मसर्रत नहीं कि उन लोगों के गुनाह बख़्श दिये जाएं

आशूरे का दिन ईदैन के बाद होता है लिहाज़ा इस का रोज़ा एक साल के गुनाहों का कफ्फ़ारा है, दूसरी वज्ह येह है कि यौमे आशूरा मूसा अलैहहिस्सलाम  के लिये था और यौमे अरफ़ा हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम के लिये है और आप की इज्जतो अजमत दीगर अम्बिया से अरफ़अ व आ’ला है।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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