जहन्नम के तबके और अलग अलग अज़ाब

तबकाते जहन्नम और इन के अजाब

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

फ़रमाने इलाही है : उस (जहन्नम) के सात दरवाज़े हैं हर दरवाजे का जुज़ मुकर्रर है। यहां से जुज़ से मुराद गिरौह, जमाअत और फ़ीरके है और दरवाज़ों से मुराद तबकात हैं जो ऊपर नीचे बने हुवे हैं। (जहन्नम का हर तबका एक गिरोह के लिये मख्सूस है.

इब्ने जुरैज का कौल है कि जहन्नम के तबकात सात है : ‘जहन्नम’, ‘लज़ा’ फिर ‘हुतमा’, फिर ‘सईर’ फिर ‘सकर’ फिर ‘जहीम’ और फिर ‘हाविया । पहला तबका मुवहिहदीन के लिये, दूसरा यहूद के लिये, तीसरा नसारा के लिये, चौथा साईबीन के लिये, पांचवां आतीश परस्तों के लिये, छटा मुशरिकों के लिये और सातवां मुनाफ़िकों के लिये है।

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“जहन्नम” सब से ऊपर का तबका है और बाकी सब मजकूरा तरतीब के साथ इस के नीचे हैं। और ये बई मा’ना है कि अल्लाह तआला इब्लीस के पैरोकारों को सात गिरोहों में तक़सीम फ़रमाएगा और हर गिरोह  और फरीक जहन्नम के एक तबके में रहेगा, इस का सबब येह है कि कुफ्र और गुनाहों के मरातिब चूंकि मुख्तलिफ़ हैं इस लिये जहन्नम में दुखूल के लिये इन के दरजात भी मुख्तलिफ़ हैं। और यह भी कहा गया है कि इन सात तबकात को इन्सान के सात आ’जाए बदन के मुताबिक़ बनाया गया है, आ’ज़ा येह हैं : आंख, कान, ज़बान, पेट, शर्मगाह, हाथ और पैर, क्यूंकि येही आ’ज़ा गुनाहों का मर्कज़ हैं इसी लिये इन के वारिद होने के दरवाजे भी सात हैं।

हज़रते अली रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि जहन्नम के ऊपर नीचे (तह ब तह) सात तबकात हैं लिहाज़ा पहले, पहला भरा जाएगा, फिर दूसरा, फिर तीसरा, इसी तरह सब तबकात भरे जाएंगे।

बुख़ारी ने अपनी तारीख में और तिर्मिज़ी ने हज़रते इब्ने उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो से रिवायत की है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : जहन्नम के सात दरवाज़े हैं : इन में एक दरवाजा उस शख्स के लिये है जिस ने मेरी उम्मत पर तल्वार उठाई।

आतीशे जहन्नम की हौलनाकियां – दोज़ख की आग कैसी है?

तबरानी ने औसत में रिवायत की है कि एक मरतबा हज़रते जिब्रील अलैहहिस्सलाम  ऐसे वक्त में तशरीफ़ लाए कि उस वक्त में इस से क़ब्ल किसी वक्त में नहीं आते थे, हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम खड़े हो गए और फ़रमाया : जिब्रील ! क्या बात है ? मैं तुम को मुतगय्यिर देख रहा हूं ? जिब्रील ने अर्ज की : मैं उस वक्त आप के पास आया हूं जब कि अल्लाह तआला ने जहन्नम को दहका देने का हुक्म दिया है। आप ने फ़रमाया : जिब्रील ! मुझे उस आग या जहन्नम के बारे में बतलाओ ! जिब्रील अलैहहिस्सलाम  ने अर्ज की, कि अल्लाह तआला ने “जहन्नम” को हुक्म दिया और उस में एक हज़ार साल तक आग दहकाई गई यहां तक कि वोह सफ़ेद हो गई, फिर उसे हज़ार साल तक दहकाया गया यहां तक कि वोह सुर्ख हो गई, फिर उसे हुक्मे खुदावन्दी से हज़ार साल तक और भड़काया गया यहाँ तक की वोह बिल्कुल सियाह हो गई, अब वोह सियाह और तारीक है, न उस में चिंगारी रोशन होती है और न ही उस का भड़कना ख़त्म होता है और न उस के शो’ले बुझते हैं।

उस ज़ात की कसम ! जिस ने आप को नबिय्ये बरहक बना कर मबऊस फ़रमाया है, अगर सूई के नाके के बराबर भी जहन्नम को खोल दिया जाए तो तमाम अहले ज़मीन फ़ना हो जाएं, और कसम है ! उस ज़ात की जिस ने आप को हक के साथ भेजा, अगर जहन्नम के फ़रिश्तों में से एक फ़रिश्ता दुन्या वालों पर ज़ाहिर हो जाए तो ज़मीन की तमाम मख्लूक उस की बद सूरती और बदबू की वज्ह से हलाक हो जाए, और कसम है ! उस ज़ात की जिस ने आप को हक़ के साथ मबऊस फ़रमाया, अगर जहन्नम के जन्जीरों का एक हल्का “जिस का अल्लाह तआला ने कुरआने करीम में जिक्र किया है” दुन्या के पहाड़ों पर रख दिया जाए तो वोह रेज़ा रेज़ा हो जाएं

और वोह हल्का “तहतुस्सरा” में जा ठहरे, हुजूरसल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने येह सुन कर फ़रमाया : बस जिब्रील बस ! इतना तजकिरा ही काफ़ी है, मेरे लिये येह बात इन्तिहाई परेशान कुन है। रावी कहते हैं कि तब हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने जिब्रील को देखा ! वोह रो रहे हैं। आप ने फ़रमाया : जिब्रील ! तुम क्यूं रोते हो हालांकि तुम्हारा तो अल्लाह के हां बहुत बड़ा मक़ाम है। जिब्रील ने कहा : मैं क्यूं न रोऊ ? मैं ही रोने का ज़ियादा हक़दार हूं, क्या ख़बर इल्मे खुदा में मेरा इस मक़ाम के इलावा कोई और मक़ाम हो ! क्या ख़बर कहीं मुझे इब्लीस की तरह न आजमाया जाए ! वोह भी तो फ़रिश्तों में रहता था ! और क्या खबर मुझे हारूत व मारूत की तरह आज़माइश में न डाल दिया जाए ! तब हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम और जिब्रील अलैहहिस्सलाम  दोनों अश्कबार हो गए और येह अश्कबारी बराबर जारी रही यहां तक कि आवाज़ आई : “ऐ जिब्रील ! ऐ मुहम्मद ! (सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम) अल्लाह तआला ने तुम दोनों को अपनी नाफरमानी से महफूज कर लिया है” पस इस के बाद जिबील अलैहहिस्सलाम  आस्मानों की तरफ परवाज़ कर गए।

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का गुज़र अन्सार की एक जमाअत से हुवा जो हंस रहे थे और फुजूल बातों में मसरूफ़ थे। आप सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : तुम हंसते हो ! हालांकि तुम्हारे पीछे जहन्नम है जिसे मैं जानता हूं, अगर तुम जानते तो कम हंसते और ज़ियादा रोते, तुम खाना पीना छोड़ देते और पहाड़ों की तरफ निकल जाते और इन्तिहाई मसाइब बरदाश्त कर के अल्लाह की इबादत करते।

उस वक्त अल्लाह तआला की तरफ़ से निदा आई कि ऐ मुहम्मद ! सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम मेरे बन्दों को ना उम्मीद न करो, आप खुश खबरी देने वाले बना कर भेजे गए हैं, लोगों को मसाइब में डालने वाले बना कर नहीं भेजे गए, पस रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया कि राहे रास्त पर गामज़न रहो और रहमते खुदावन्दी से उम्मीद रखो ।

अहमद की रिवायत है : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने जिब्रील से कहा : मैं ने कभी भी मीकाईल को हंसते हुवे नहीं देखा, इस की क्या वज्ह है ? जिब्रील ने कहा कि जब से जहन्नम को पैदा किया गया है मीकाईल अलैहहिस्सलाम  कभी नहीं मुस्कुराए ।

मुस्लिम शरीफ़ में रिवायत है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया कि क़ियामत के दिन जहन्नम को सत्तर हज़ार लगामें दे कर लाया जाएगा और हर लगाम के साथ सत्तर हज़ार फ़रिश्ते उसे खींच रहे होंगे।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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