जमात के साथ नमाज़ पढने की फ़ज़ीलतें और बरकतें

नमाजे बा जमाअत की फजीलत

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 

नबिय्ये करीम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम फ़रमाते हैं कि तन्हा नमाज़ पढ़ने से नमाजे बा जमाअत को सत्ताईस दरजे फ़ज़ीलत हासिल है।)

हज़रते अबू हुरैरा सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से मरवी है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने बा’ज़ लोगों को चन्द नमाज़ों में जमाअत में न देख कर फ़रमाया : मेरा येह इरादा हुवा कि मैं किसी आदमी को नमाज़ पढ़ाने का हुक्म दूं और मैं उन लोगों के यहां जाऊं जो जमाअत से रह गए हैं और उन को और उन के घरों को जला दूं ।

दूसरी रिवायत में है कि फिर मैं उन लोगों के घरों को लकड़ियों के गठ्ठों के साथ उन पर जलाने का हुक्म दूं जो जमाअत में शरीक नहीं हुवे, अगर उन में से किसी को इल्म होता कि मोटी हड्डी या जानवर के दो हाथ (जमाअत में शरीक होने से) मिलेंगे तो वोह ज़रूर जमाअत में शामिल होते ।

हज़रते उस्मान रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरफूअन मरवी है कि जो इशा की जमाअत में हाज़िर हुवा पस गोया उस ने आधी रात इबादत में गुजारी और जो सुबह की जमाअत में भी शामिल हुवा गोया उस ने सारी रात इबादत में गुज़ारी ।

रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का इरशाद है कि जिस ने नमाजे बा जमाअत अदा की पस गोया उस ने अपने सीने को इबादत से भर लिया ।

हज़रते सईद बिन मुसय्यिब रज़ीअल्लाहो अन्हो का क़ौल है कि बीस बरस से मुतवातिर मैं उस वक़्त मस्जिद में होता हूं जब मुअज्जिन अज़ान देता है । हज़रते मुहम्मद बिन वासे रज़ीअल्लाहो अन्हो फ़रमाते हैं कि मैं दुनिया से तीन चीज़ों की ख्वाहिश रखता हूं, ऐसा भाई कि अगर मैं टेढ़ा हो जाऊं तो वोह मुझे सीधा कर दे, बिगैर काविश के मुख़्तसर रिज्क जिस की बाज़ पुर्स न हो और नमाजे बा जमाअत जिस की गलतियां मेरे लिये मुआफ़ कर दी जाएं और जिस की फ़ज़ीलत मुझे बख़्श दी जाए।

हज़रते अबू उबैदा बिन जर्राह रज़ीअल्लाहो अन्हो ने एक मरतबा कुछ लोगों की इमामत की, जब नमाज़ से फ़ारिग हुवे तो शैतान के मुतअल्लिक़ फ़रमाया कि वोह मुझे बहकाता रहा यहां तक कि मैं ने भी खुद को दूसरे से अफ्ज़ल समझ लिया, मैं आज के बाद इमामत नहीं करूंगा।

हज़रते हसन रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि ऐसे शख्स के पीछे नमाज़ न पढ़ो जो उलमा की मजलिस में न जाता हो । हज़रते नखई रज़ीअल्लाहो अन्हो का क़ौल है कि जो बिगैर किसी इल्म के लोगों की इमामत करता है वोह उस शख्स की तरह है जो समन्दर में रह कर उस का पानी नापता है और उस की कमी ज़ियादती को नहीं समझता।

हज़रते हातिमे असम रज़ीअल्लाहो अन्हो का क़ौल है कि मेरी एक नमाजे बा जमाअत फ़ौत हो गई तो सिर्फ अबू इस्हाक़ बुखारी मेरी ताज़िय्यत को आए, अगर मेरा बच्चा फ़ौत हो जाता तो दस हज़ार से भी ज़ियादा लोग ता’ज़िय्यत के लिये आते क्यूंकि लोग दीन के नुक्सान को दुनिया के नुक्सान से बहुत हल्का जानते हैं।

हज़रते इब्ने अब्बास रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि जिस शख्स ने अजान सुन कर इस का जवाब न दिया उस ने भलाई का इरादा नहीं किया और न ही उसे भलाई नसीब होगी।

हज़रते अबू हुरैरा रज़ीअल्लाहो अन्हो का क़ौल है कि पिघले हुवे सीसे से इन्सान के कानों का भर दिया जाना इस से बेहतर है कि वोह अज़ान सुन कर इस का जवाब न दे।

मन्कूल है कि हज़रते मैमून बिन मेहरान रज़ीअल्लाहो अन्हो मस्जिद में आए तो आप से कहा गया कि लोग तो वापस लौट गए हैं (या’नी नमाज़ हो चुकी है) आप ने येह सुन कर फ़रमाया : “इन्ना लिल्लाहे व इना इलयहे राजेऊन”   और कहा कि इस नमाज़ के पा लेने की फजीलत मुझे इराक की हुकूमत से ज़ियादा पसन्द थी।

चालीस नमाजें जमाअत के साथ अदा करने वाले पर इनाम ए  इलाही

फ़रमाने नबवी है कि जिस ने चालीस दिन तमाम नमाजे बा जमाअत अदा की और उस की तक्बीरे तहरीमा फ़ौत नहीं हुई, अल्लाह तआला उस की ख़ातिर दो बराअतें लिख देता है, एक निफ़ाक़ से बराअत और दूसरी बराअत जहन्नम से ।

येह भी कहा गया है कि जब कियामत का दिन होगा तो कब्रों से एक ऐसी जमाअत उठेगी जिन के चेहरे चमकदार सितारे की तरह होंगे, फ़िरिश्ते उन से कहेंगे कि तुम्हारे आ’माल क्या थे ? वोह जवाब देंगे कि जब हम अज़ान सुनते थे तो वुजू के लिये खड़े हो जाया करते थे और किसी और काम में मश्गूल नहीं होते थे। फिर एक ऐसी जमाअत आएगी जिन के चेहरे चांद की तरह होंगे, वोह फ़िरिश्तों के सुवाल के बाद कहेंगे कि हम वक्त से पहले वुजू किया करते थे, फिर एक ऐसी जमाअत आएगी जिन के चेहरे आफ़्ताब की तरह दरख-शिन्दा होंगे और वोह कहेंगे कि हम अज़ान मस्जिद में सुना करते थे (या’नी अज़ान से पहले मस्जिद में पहुंच जाते थे)।

मरवी है कि सलफे सालिहीन तक्बीरे ऊला के फ़ौत होने पर तीन दिन तक अपनी ता’ज़िय्यत किया करते थे।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

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