जुमे के दिन की फज़िलतें और बरकतें

जुमे के दिन की फज़िलतें और बरकतें

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

जुमा का दिन एक अज़ीम दिन है, अल्लाह तआला ने इस के साथ इस्लाम को अज़मत दी और येह दिन मुसलमानों के लिये ख़ास कर दिया, फ़रमाने इलाही है : जब जुमा के दिन नमाज के लिये पुकारा जाए पस जल्दी करो अल्लाह के ज़िक्र की तरफ़ और खरीदो फरोख्त छोड़ दो। इस आयत से मालूम हुवा कि अल्लाह तआला ने जुमा के वक्त दुन्यावी शगल हराम करार दिये हैं और हर वो चीज़ जो जुमा के लिये रुकावट बने ममनूअ करार दे दी गई है। हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का फरमान है कि तहक़ीक़ अल्लाह तआला ने तुम पर मेरे इस दिन और इस मकाम में जुमा को फ़र्ज़ करार दे दिया है। एक और इरशाद है कि जो शख्स बिगैर किसी उज्र के तीन जुमा की नमाजें छोड़ देता है अल्लाह तआला उस के दिल पर मोहर लगा देता है।

एक रिवायत के अल्फ़ाज़ येह हैं कि “उस ने इस्लाम को पसे पुश्त डाल दिया।”

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जुम्मे की नमाज़ छोड़ देने पर अज़ाब

एक शख्स हज़रते इब्ने अब्बास रज़ीअल्लाहो अन्हो के पास मुतअद्दिद बार आता रहा और एक ऐसे शख्स के मुतअल्लिक़ पूछता रहा जो मर गया और नमाजे जुमा और जमाअतों में शरीक नहीं होता था। हज़रते इब्ने अब्बास रज़ीअल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया : वोह जहन्नम में है, वोह शख्स पूरा एक महीना येही पूछता रहा और आप येही कहते रहे कि वोह जहन्नम में है।

हदीस शरीफ़ में है कि अहले किताब को जुमा का दिन दिया गया मगर उन्हों ने इस में इख्तिलाफ़ किया लिहाजा येह दिन, उन से वापस ले लिया गया, अल्लाह तआला ने हमें इस की हिदायत की, उसे इस उम्मत के लिये मुअख्खर किया और इन के लिये इसे ईद का दिन बनाया लिहाज़ा येह लोग सब लोगों से सबक़त ले जाने वाले हैं और अहले किताब इन के ताबेअ हैं।

हज़रते अनस रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है, हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : मेरे पास जिब्रील आए, उन के हाथ में सफ़ेद आईना था, उन्हों ने कहा : येह जुमा है, अल्लाह तआला इसे आप पर फ़र्ज़ करता है ताकि येह आप के और आप के बाद आने वाले लोगों के लिये ईद हो, मैं ने पूछा : इस में हमारे लिये क्या है ? जिब्रील ने कहा : इस में एक उम्दा साअत है, जो शख्स इस में भलाई की दुआ मांगता है अगर वोह चीज़ उस शख्स के मुक़द्दर में हो तो अल्लाह तआला उसे अता फ़रमाता है वरना उस से बेहतर चीज़ उस के लिये ज़ख़ीरा कर दी जाती है या कोई शख्स इस साअत में ऐसी मुसीबत से पनाह मांगता है जो इस का मुक़द्दर हो चुकी है तो अल्लाह तआला इस मुसीबत से भी बड़ी मुसीबत को टाल देता है और वोह हमारे नज़दीक सब दिनों का सरदार है और हम आख़िरत में एक यौम मजीद मांगते हैं, मैं ने कहा : वोह क्यूं ? जिब्रील ने अर्ज़ की : आप के रब ने जन्नत में एक ऐसी वादी बनाई है जो सफ़ेद है और मुश्क की खुश्बू से लबरेज़ है, जब जुमा का दिन होता है तो अल्लाह तआला इल्लिय्यीन से कुरसी पर (अपनी शान के लाइक) नुजूले इजलाल फ़रमाता है यहां तक कि सब उस के दीदार से मुशर्रफ़ होते हैं।हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम फ़रमाते हैं कि सब से उम्दा दिन जिस में सूरज तुलूअ होता है, जुमा का दिन है, इसी दिन आदम अलैहहिस्सलाम  की पैदाइश हुई, इसी दिन वोह जन्नत में दाखिल किये गए, इसी दिन वोह जन्नत से जमीन की तरफ़ उतारे गए, इसी दिन उन की तौबा क़बूल हुई, इसी दिन उन का विसाल हुवा।

इसी दिन क़ियामत काइम होगी और वोह अल्लाह के नज़दीक यौमे मज़ीद है, आस्मानी फ़रिश्तों में इस दिन का येही नाम है और येही जन्नत में अल्लाह तआला के दीदार का दिन है ।

 जूमआ के दिन जहन्नम से आजादी नसीब होती है

हदीस शरीफ़ में है कि अल्लाह तआला हर जुमा के दिन छ लाख इन्सानों को जहन्नम से आज़ाद करता है।

हज़रते अनस रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है, हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया कि जब तू ने जुमा को सालिम कर लिया तो गोया तमाम दिनों को सालिम कर लिया। ।

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया कि जहन्नम हर रोज़ ज़हूवए कुब्रा (निस्फुन्नहार) में जवाल से पहले भड़काया जाता है या’नी सूरज जब ऐन आस्मान के दिल में होता है लिहाज़ा इस साअत में नमाज़ मत पढ़ो मगर जुमा के दिन येह कैद नहीं है क्यूंकि जुमा सारे का सारा नमाज़ है और इस दिन जहन्नम नहीं भड़काया जाता।

हज़रते का’ब रज़ीअल्लाहो अन्हो का फ़रमान है कि अल्लाह तआला ने सब शहरों से मक्कए मुअज्जमा को फजीलत बख़्शी है, सब महीनों में रमज़ान को फ़ज़ीलत अता की है, सब दिनों में जुमा के दिन को फजीलत दी है और सब रातों में लैलतुल कद्र को फ़ज़ीलत अता फरमाई है।

कहा गया है कि जुमा के दिन हशरातुल अर्ज़ और परीन्दे एक दूसरे से मुलाकात करते हैं और कहते हैं कि इस नेक दिन में सलाम हो, सलाम हो।

नबिय्ये अकरम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम फ़रमाते हैं कि जो शख्स जुमा के दिन और जुमा की रात को फ़ौत हुवा, अल्लाह तआला उस के लिये सो शहीदों का सवाब लिखता है और उसे क़ब्र के फ़ितने से बचा लेता है।

शैख अब्दुल हक़ मुहद्दिसे देहलवी ‘अशिअतुल लम्आत’ में फ़रमाते हैं कि इस हदीस के दो रावियों, अबुल खलील और अबू क़तादा की मुलाक़ात साबित नहीं ।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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