कब्र और जनाज़ा के बारे में नसीहत और हदीसें

जनाज़ा और कब्र

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 जनाज़े, देखने वालों के लिये सामाने इबरत होते हैं, इस में अक्लमन्दों के लिये याद देहानी और तम्बीह होती है मगर गाफ़िल इस से गाफ़िल ही होते हैं, उन का मुशाहदा उन के दिलों की सख़्ती को ज़ियादा करता है क्यूंकि वोह यह समझते हैं कि हम हमेशा दूसरों के जनाज़े देखते रहेंगे और यह नहीं समझते कि उन्हें भी एक दिन ला महाला इसी तरह उठाया जाएगा या वोह इस पर गौरो फ़िक्र करें लेकिन वोह कुर्ब के बा वुजूद गौरो फ़िक्र नहीं करते और न ही येह सोचते हैं कि आज जो लोग जनाज़ों पर उठाए जा रहे हैं येह भी उन की तरह गिनती व शुमार में लगे रहते थे मगर उन के सब हिसाब बातिल हो गए हैं और अन करीब उन की मीआद खत्म होगी लिहाज़ा कोई बन्दा जनाज़े को न देखे मगर खुद को इसी हालत में देखे क्यूंकि अन करीब वोह भी इसी तरह उठा कर ले जाया जाएगा, वोह उठ गया, येह कल या परसों इस दुनिया से उठ जाएगा।

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हज़रते अबू हुरैरा रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि आप जब जनाज़ा देखते तो फ़रमाते : चलो ! हम भी तुम्हारे पीछे आने वाले हैं।

हज़रते मक्हूल दिमश्की रज़ीअल्लाहो अन्हो जब जनाज़ा देखते तो फ़रमाते : तुम सुब्ह को जाओ और हम आयिन्दा शाम को आने वाले हैं, येह ज़बरदस्त नसीहत और तेज़ गफलत है, पहला चला जाता है और दूसरा इस हाल में रहता है कि उस में अक्ल नहीं होती।

हज़रते उसैद बिन हुजेर रज़ीअल्लाहो अन्हो का कहना है कि मैं किसी जनाज़े में हाज़िर नहीं हुवा मगर मेरे नफ़्स ने मुझे ऐसी बातों में लगाए रखा जो इस के अन्जामे कार और जो कुछ मेरे साथ होगा उस से इलावा थीं।

जब हज़रते मालिक बिन दीनार रज़ीअल्लाहो अन्हो का भाई फ़ौत हुवा तो आप रोते हुवे उस के जनाज़े में निकले और फ़रमाया : ब खुदा ! उस वक्त तक मेरी आंखें ठन्डी नहीं होंगी जब तक कि मुझे मालूम न हो जाए कि मेरा ठिकाना कौन सा है ? और मैं ज़िन्दगी भर इसे जान नहीं सकूँगा !

हज़रते आ’मस रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि हम जनाज़ों में जाते और तमाम को देख कर येह न जानते कि हम किस से ताज़िय्यत करें।

हज़रते साबित बुनानी रज़ीअल्लाहो अन्हो फ़रमाते हैं कि हम जनाज़ों में जाते तो हर शख्स को कपड़ा लपेटे रोता देखते, वाकेई वोह लोग मौत से इन्तिहाई खौफ़ज़दा होते थे मगर आज हम ऐसे लोगों को देखते हैं जो जनाजों में शामिल होते हैं मगर उन में से अक्सर हंसते रहते हैं, लह्वो लइब में मश्गूल होते हैं और उस की मीरास की बातें करते और उस के वुरसा की बातें करते हैं और मरने वाले के अज़ीज़ो अकारिब ऐसी राहों की जुस्त्जू में होते हैं जिस के जरीए वोह उस के छोड़े हुवे माल से कुछ हासिल कर सकें और उन में से कोई भी अपने जनाज़े के मुतअल्लिक़ नहीं सोचता और जब वोह भी इसी तरह उठाया जाएगा इस बारे में वोह गौरो फ़िक्र नहीं करता।

इस गफलत का सबब उन के दिलों की सख्ती है जो गुनाहों और ना फ़रमानियों की कसरत से पैदा हुई है यहां तक कि हम अल्लाह तआला, कियामत और उन वहशत नाकियों को भी भूल गए हैं जो हमें पेश आने वाली हैं, हम लह्वो लइब में मश्गूल हो गए जो हमारे लिये बेकार हैं।

पस हम अल्लाह से इस गफ़्लत से बेदारी का सुवाल करते हैं क्यूंकि जनाज़ों के हाज़िरीन की सब से उम्दा सिफ़त येह है कि वोह जनाज़ों में मय्यित पर रोएं हालांकि अगर उन्हें अक्ल होती तो वोह मय्यित की बजाए अपनी हालत पर रोते।

हज़रते इब्राहीम ज़य्यात रज़ीअल्लाहो अन्हो ने ऐसे लोगों को देखा जो मुर्दे पर इज़्हारे रहम कर रहे थे, आप ने फ़रमाया : अगर तुम मय्यित की बजाए अपने आप पर रहम करते तो तुम्हारे लिये बेहतर था क्यूंकि वोह तीन वहशत नाकियों से नजात पा गया है, उस ने इज़राईल का चेहरा देख लिया है, मौत के जाइके की तल्खी चख चुका है और ख़ातिमे के खौफ़ से बा अम्न हो गया है।

हज़रते अबू अम्र बिन अला रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि मैं जरीर के यहां बैठा हुवा था और वोह अपने कातिब से शे’र लिखवा रहे थे, तब एक जनाज़ा आया तो वोह रुक गए और कहा कि ब खुदा ! मुझे इन जनाज़ों ने बूढ़ा कर दिया है और उन्हों ने येह शे’र पढ़े :

जनाज़े हमें आते हुवे ख़ौफ़ज़दा कर देते हैं और जब चले जाते हैं तो हम इन के पीठ फेरते ही लह्वो लइब में लग जाते हैं। भेड़ों के गल्ले की तरह जो भेड़िये के गार में खौफजदा होता है और जब भेड़िया गाइब हो जाता है तो वोह चरने लगती है।

जनाज़े के आदाब

जनाज़े के आदाब में से तफ़क्कुर, तम्बीह, मुस्तइदी और मुतवाजेअ हो कर उस के आगे चलना है जैसा कि फ़िक़ह में इस के आदाब और तरीके मजकूर हैं।

उन आदाब में से येह भी है कि आदमी सब से हुस्ने जन रखे अगर्चे वोह फ़ासिक ही क्यूं न हो और बुरे ख़यालात को अपनी तरफ़ से समझे क्यूंकि अगर्चे वोह ज़ाहिरी तौर पर अच्छा क्यूं न हो, ख़ातिमा ऐसी चीज़ है जिस का खतरा जारी व सारी रहता है इसी लिये हज़रते उमर बिन ज़र रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि इन का एक हमसाया फ़ौत हो गया जो बद किरदार था तो बहुत से लोग उस के जनाज़े से रुक गए, आप उस के जनाज़े में शरीक हुवे, उस की नमाज़े जनाज़ा पढ़ी, जब उसे कब्र में उतारा जाने लगा तो आप ने उस की क़ब्र पर खड़े हो कर कहा : ऐ पिदरे फुलां ! अल्लाह तुझ पर रहम करे, यक़ीनन तू ने अपनी ज़िन्दगी तौहीद में बसर की और अपने चेहरे को सजदों से गुबार आलूद किया और अगर लोगों ने तुझे गुनहगार और बद किरदार कहा तो हम में से ऐसा कौन है जो गुनहगार और बद किरदार नहीं।

एक गुनाहगार का अजीबो गरीब वाकिआ

एक आदमी जो गुनाहों में मुन्हमिक रहता था, मर गया, वोह बसरा के करीब रहता था मगर जब वोह मरा तो उस की औरत ने ऐसा कोई आदमी न पाया जो जनाज़ा उठाने में उस का हाथ बटाता क्यूंकि उस के हमसाए उस के कसरते गुनाह के सबब किनारा कश हो गए चुनान्चे, उस ने दो मजदूर उजरत पर लिये और वोह उसे जनाज़ा गाह में ले गए मगर किसी ने उस की नमाज़े जनाज़ा न पढ़ी और वोह उसे सहरा में दफ्न करने के लिये ले गए।

उस अलाके के नज़दीक पहाड़ में एक बहुत बड़ा ज़ाहिद रहता था, औरत जब अपने शोहर का जनाज़ा उठवा कर ले गई तो ज़ाहिद को मुन्तज़िर पाया चुनान्चे, ज़ाहिद ने उस की नमाजे जनाज़ा पढ़ाने का इरादा किया तो शहर में येह खबर फैल गई कि ज़ाहिद पहाड़ से उतरा है ताकि फुलां शख्स की नमाज़े जनाज़ा पढ़ाए चुनान्चे, शहर के सब लोग वहां रवाना हो गए और उन्हों ने ज़ाहिद की इक्तिदा में उस की नमाज़े जनाज़ा पढ़ी।

लोगों को ज़ाहिद के इस फ़ेल से सख़्त हैरत हुई, ज़ाहिद ने कहा कि मुझ से ख्वाब में कहा गया है कि फुलां जगह जाओ, वहां तुम्हें एक जनाज़ा नज़र आएगा जिस के साथ सिर्फ एक औरत होगी, तुम उस शख्स की नमाज़े जनाज़ा पढ़ो क्यूंकि वोह मगफूर है, येह बात सुन कर लोगों के तअज्जुब में और इज़ाफ़ा हुवा।

ज़ाहिद ने औरत से उस मर्द के हालात दरयाफ्त किये और उस की बख्शिश के अस्बाब की तहकीक करना चाही तो औरत ने कहा जैसा कि मशहूर है उस का सारा दिन शराब ख़ाने में गुज़रता और शराब में मस्त रहते गुज़रता था।

ज़ाहिद ने कहा कि क्या तुम इस की किसी नेक आदत को भी जानती हो ? औरत ने कहा : हां ! तीन चीजें जानती हूं, जब वोह सुबह के वक्त मदहोशी से इफ़ाका पाता तो कपड़े तब्दील करता, वुजू करता और सुब्ह की नमाज़ जमाअत से पढ़ा करता था फिर शराब ख़ाने में जाता और बदकारियों में मश्गूल रहता।

दूसरे येह कि उस के घर में हमेशा एक या दो यतीम रहा करते थे, उन से वोह औलाद से भी ज़ियादा मेहरबानी से पेश आया करता था।

तीसरे येह कि जब वोह रात की तारीकी में नशे की मदहोशी से इफ़ाका पाता तो रोता और कहता : ऐ रब्बे करीम ! जहन्नम के कोनों में से कौन से कोने को मेरे इस ख़बीस नफ्स से तू पुर करेगा ? ज़ाहिद येह सुनते ही लौट गया और उस की बखिशश का राज़ खुल गया।

हज़रते जहाक रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि एक शख्स ने हुजूर * से पूछा कि सब से बड़ा ज़ाहिद कौन है ? आप ने फ़रमाया : जो क़ब्र और मसाइब को न भूला, दुन्यावी जेबो जीनत की उम्दा चीज़ों को तर्क कर दिया, फ़ानी चीज़ों पर दाइमी चीज़ों को तरजीह दी, आयिन्दा कल को अपनी ज़िन्दगी में शुमार न किया और खुद को अहले कुबूर में से शुमार किया ।

हज़रते अली रज़ीअल्लाहो अन्हो से पूछा गया क्या वज्ह है कि आप कब्रिस्तान के करीब रहते हैं ? आप ने फ़रमाया : मैं ने इन्हें उम्दा हमसाया पाया है, सच्चे हमसाए जो ज़बानें बन्द रखते हैं और आखिरत की याद दिलाते हैं।

हज़रते उस्मान बिन अफ्फान रज़ीअल्लाहो अन्हो जब कब्रों पर खड़े होते तो रोया करते यहां तक कि आप की दाढ़ी आंसूओं से तर हो जाती आप से इस के मुतअल्लिक़ पूछा गया और कहा गया कि आप जन्नत और जहन्नम का तजकिरा करते हैं और नहीं रोते लेकिन कब्रों पर क्यूं रोते हैं ? आप ने फ़रमाया : मैं ने हुजूर * को येह फ़रमाते हुवे सुना है कि कब्र आख़िरत के मनाज़िल में से पहली मन्ज़िल है, अगर साहिबे क़ब्र इस से नजात पा लेता है तो बा’द की मन्ज़िलें उस के लिये आसान हो जाती हैं और अगर इस से नजात नहीं पाता तो बा’द की मन्ज़िलें और ज़ियादा सख्त होती हैं ।

कहा गया है कि हज़रते अम्र बिन आस रज़ीअल्लाहो अन्हो ने कब्रिस्तान को देखा तो सवारी से उतर पड़े और दो रक्अत नमाज़ अदा की, फिर उन से कहा गया कि पहले तो आप ऐसा नहीं करते थे, आप ने फ़रमाया : मैं ने कब्रिस्तान वालों को और उस चीज़ को याद किया जो इन के और मेरे दरमियान हाइल की गई है तो मैं ने इस बात को पसन्द किया कि दो रक्अतें अदा कर के मैं रब का कुर्ब चाहूं।

हज़रते मुजाहिद रज़ीअल्लाहो अन्हो फ़रमाते हैं कि सब से पहले कब्र इन्सान से येह कलाम करती है कि मैं कीड़ों, तन्हाई, गुर्बत और अन्धेरे का घर हूं, मैं ने तेरे लिये येही कुछ तय्यार किया है, तू मेरे लिये क्या तय्यार कर के लाया है ?

हज़रते अबू ज़र रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि क्या मैं तुम्हें अपने फ़क़र का दिन बताऊं ? येह वोह दिन होगा जब मुझे कब्र में रखा जाएगा।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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