खुद की इस्लाह करना अपने एब दूर करना रियाज़त

रियाजत व फजीलते असहाबे करामत

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 

यह बात अच्छी तरह जेह्न नशीन कर लेनी चाहिये कि अल्लाह तआला जब किसी बन्दे की भलाई चाहता है तो वोह बन्दा अपने उयूब पर निगाह डालता है, जिस की बसीरत कामिल हो जाती है उस से कोई गुनाह पोशीदा नहीं रहता लिहाज़ा वोह जूही अपने उयूब पर मुत्तल होता है उस के लिये इन का इलाज मुमकिन हो जाता है लेकिन अक्सर जाहिल अपने उयूब से ना वाकिफ़ होते हैं, वोह दूसरे की आंख का तिन्का तो देख लेते हैं मगर उन्हें अपनी आंख का शहतीर नज़र नहीं आता, जो शख्स अपने उयूब पर मुत्तलअ होना चाहे उस के लिये चार तरीके हैं :

अपने एब दूर करने के तरीके

पहला तरीका : ऐसे शैखे कामिल की सोहबत इख़्तियार करे जो अपने उयूब का आश्ना हो और पोशीदा नफ़्सानी ख्वाहिशात खबासतों से कमा हक्कुहू वाकिफ़ हो, वोह उसे अपने नफ्स का हाकिम बनाए, इबादात में उस के इशारों पर चले, येही कुछ मुरीद को शैख के हुक्म पर और शागिर्द को उस्ताद के हुक्म पर करना चाहिये ताकि उस का शैख और उस्ताद उस के बातिनी उयूब और इन के इलाज की तश्खीस कर सकें, हमारे ज़माने में इस तरीके की बहुत इज्जत है।

दूसरा तरीका : ऐसे दोस्त का हम मजलिस बने जो सादिक़, साहिबे बसीरत और दीनदार हो, आदमी उसे अपने नफ्स का निगहबान बनाए ताकि वोह दोस्त उस के अहवाल व अफआल पर नज़र रखे और इन में से जो आदत और जाहिरी व बातिनी ऐब नज़र आए वोह उसे उस पर तम्बीह करे । अक्लमन्द और अकाबिर उलमाए दीन का येही तरीक़ था, हज़रते उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो फ़रमाया करते थे कि अल्लाह तआला उस जवान पर रहम फ़रमाए जो मुझे मेरे उयूब पर मुत्तल करे और आप हज़रते सलमान रज़ीअल्लाहो अन्हो से अपने उयूब पूछा करते थे, वोह जब भी आते आप उन से फ़रमाते क्या आप ने मेरे अन्दर कोई ऐसी चीज़ पाई है जिसे आप बुरा समझते हों ? हज़रते सलमान रज़ीअल्लाहो अन्हो ने मा’ज़िरत चाही मगर हज़रते उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो ने जब बहुत इस्रार किया तो उन्हों ने कहा : मुझे मालूम हुवा है कि तुम एक दस्तर ख्वान पर दो सालन जम्अ करते हो और तुम्हारा रात और दिन का अलाहिदा अलाहिदा लिबास है, हज़रते उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया क्या आप ने इस के सिवा कोई और बात भी सुनी है? उन्हों ने कहा : नहीं ! तब आप ने फ़रमाया कि मैं ने इन को तर्क किया। और हज़रते हुजैफ़ा रज़ीअल्लाहो अन्हो से फ़रमाया करते (आप मुनाफ़िकों के बारे में नबिय्ये करीम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम के राज़दान थे) फ़रमाइये ! कहीं मेरे अन्दर आप को मुनाफ़क़त की अलामतें तो नज़र नहीं आई ? आप अपने जलीलुल क़द्र और अज़ीमुश्शान मर्तबे के बा वुजूद अपने नफ़्स की देख भाल और सरज़निश से गाफ़िल न होते।

जिस किसी में अक्ल वाफ़िर और बुलन्द होती है वोह तकब्बुर से किनारा कशी कर लेता है और अपने नफ्स की सरज़निश से गाफ़िल नहीं होता और इसी वज्ह से वोह बुलन्द मरातिब पर सरफ़राज़ हुवा।

ऐसे शख्स को दोस्त न रखो जो चश्मपोशी से काम लेते हुवे तुम्हें तुम्हारे उयूब न बतलाए और एक मुकर्रर हद से बढ़ने की कोशिश न करते हुवे तुम्हें अपने मुतअल्लिक अन्धेरे में रखे, नीज़ ऐसे लोगों को दोस्त बनाओ जो हासिद और मतलब परस्त हों ताकि वोह तुम्हारी नेकियां भी ऐबों की सूरत में दिखाएं और तुम उन से सबक़ हासिल करो और ऐसे चश्मपोशी करने वाले दोस्त से बचो जो तुम्हारी बुराइयों को खूबियां कहे।

इसी लिये कहते हैं कि जब हज़रते दावूद ताई अलैहहिस्सलाम  ने लोगों से उजलत नशीनी इख्तियार फ़रमाई तो किसी ने पूछा आप लोगों से मेल जोल क्यूं नहीं रखते ? आप ने फ़रमाया : मैं ऐसी कौम से कैसे तअल्लुकात रखू जो मुझ से ऐब छुपाते हैं।

दीनदार लोग इब्तिदाए हाल ही से इस बात के मुतमन्नी होते थे कि लोग उन्हें उन के उयूब पर मुत्तुलअ करें और वोह अपनी इस्लाह कर लें लेकिन हमारी हालत येह है कि जो हमें नसीहत करता है और हमें हमारे उयूब बताता है, हम उसे अपना सब से बड़ा दुश्मन समझते हैं और येही बात इन्सान के ईमान को कमजोर कर देती है क्यूंकि बुरी आदतें सांप बिच्छू की तरह डसने वाली हैं, अगर हम से कोई शख्स येह कह दे कि तुम्हारे कपड़ों में बिच्छू है तो हम उस के एहसान मन्द होते हैं, उस का शुक्रिय्या अदा करते हैं, बिच्छू से बचाव की सूरत और उसे मारने की तदबीर करने लगते हैं हालांकि इस की तकलीफ़ सिर्फ बदन महसूस करता है और एक दो दिन से ज़ियादा इस का दुख भी बाकी नहीं रहता मगर बुरे खसाइल की तक्लीफ़ दिल की गहराइयों में महसूस की जाती है और मुझे अन्देशा है कि येह दुख मौत के बाद भी बाकी रहेगा, अगर हमेशा बाक़ी न रहा तब भी हज़ारों बरस इस की पादाश में दुख दर्द झेलने पड़ेंगे।

दूसरी बात येह है कि हम बजाए इस के कि नासेह की नसीहत सुन कर अपने इन उयूब के इज़ाले की फ़िक्र करें, अपने मोहसिन का शुक्रिय्या अदा करें, उलटा उस के मुकाबले में उतर आते हैं और उस की बातों के जवाब में यूं कहते हैं कि तुम भी ऐसा ऐसा काम कर चुके हो हमें उस की दुश्मनी सच्ची बातों पर अमल करने से रोक देती है और येह सब कुछ दिल की सख्ती का नतीजा होता है जो कसरते गुनाह से पथ्थर से भी ज़ियादा सख्त हो जाता है, इन का मम्बअ व मर्कज़ ईमान की कमजोरी है लिहाज़ा हम अल्लाह तआला से दुआ करते हैं कि ऐ रब्बे जुल जलाल ! हमें राहे रास्त पर चलने की तौफ़ीक़ दे, हमें अपने ऐब देखने, इन का इलाज करने की हिम्मत दे और हमें अपनी रहमत के तुफैल हर शख्स का शुक्रिय्या अदा करने की तौफ़ीक़ दे, जो हमें हमारे ऐबों पर मुत्तल करे ।

तीसरा तरीका : अपने दुश्मनों से अपने उयूब सुने क्यूंकि दुश्मन की आंख हर ऐब को जाहिर कर देती है, अक्लमन्द इन्सान कीना परवर दुश्मन से अपने उयूब सुन कर ऐसे चश्मपोशी करने वाले दोस्त से ज़ियादा नफ्अ हासिल कर सकता है जो उस की तारीफ़ो तौसीफ़ करता रहता है और उस के ऐब छुपाता रहता है मगर मुसीबत येह है कि इन्सानी तबाएअ दुश्मन की बात को झूट और हसद पर मन्नी खयाल करती हैं लेकिन अक्लमन्द दुश्मनों की बातों से भी सबक सीखते हैं और अपने उयूब की तलाफ़ी करते हैं कि आख़िर कोई ऐब तो ज़रूर है जो उस के दुश्मनों की निगाह में है।

चौथा तरीका : लोगों से घुल मिल जाए, उन का जो फेल उसे अच्छा लगे उसे अपनाए और जो फ़े’ल उसे बुरा लगे उस में गौरो फ़िक्र करे कि कहीं ऐसा तो नहीं कि उसे अपने उयूब दूसरे के आईने में नज़र आ रहे हैं क्यूंकि मोमिन मोमिन का आईना होता है लिहाज़ा दूसरों के उयूब के आईने में अपने ऐब तलाश करे और वोह जानता है कि नफ्सानी ख्वाहिश में तबीयतें एक दूसरे के करीब हैं, जो चीज़ एक ज़माने के लोगों में होगी वोह दूसरे जमाने के लोगों में भी होगी लिहाज़ा इसे अपने नफ्स में तलाश करना चाहिये और अपने नफ्स को बुरी चीज़ों से पाक करना चाहिये। मैं समझता हूं कि अदब सिखाने के लिये येह गुर काफ़ी है, अगर लोग उन तमाम चीज़ों को तर्क कर दें जिन को वोह दूसरों से महबूब समझते हैं तो उन्हें किसी दूसरे अदब के सिखाने की ज़रूरत ही न पड़े।

खुद की इस्लाह करना

हज़रते ईसा अलैहहिस्सलाम  से पूछा गया कि आप को अदब किस ने सिखाया ? आप ने फ़रमाया मुझे किसी ने अदब नहीं सिखाया बल्कि मैं ने जाहिल की जहालत को बुरा समझते हुवे उस से किनारा कशी इख़्तियार कर ली।

मजकूरए बाला तमाम तरीके उन लोगों के लिये हैं जिसे शैखे कामिल, अक्लमन्द, साहिबे बसीरत, उयूबे नफ्स पर इन्तिहाई मुश्फिकाना तरीके से नसीहत करने वाला, दीन के मुआमलात को समझाने वाला, अपने नफ़्स की तक्मीले इस्लाह करने वाला और बन्दगाने खुदा की इस्लाह का बीड़ा उठाने वाला रहबर न मिले, जिस ने ऐसे शैखे कामिल को पा लिया उस ने तबीबे हाज़िक को.पा लिया लिहाज़ा उसे उस की सोहबत लाज़िम करनी चाहिये क्यूंकि येही वोह शख्सिय्यत है जो उसे उस की बीमारी से नजात दिलाएगी और इस मोहलिक मरज़ से नजात देगी जो उसे ब तदरीज हलाकत की तरफ़ ले जा रही है।

समझ लो कि हम ने जो कुछ जिक्र किया है अगर तुम इसे इब्रत की निगाह से देखो तो तुम्हारी बसीरत कमाल पर पहुंचेगी और इल्म व यक़ीन की वज्ह से तुम पर दिल की तमाम बीमारियां, तक्लीफें और इन के इलाज ज़ाहिर हो जाएंगे, अगर तुम इस दरजए कमाल को न पा सके तब भी ज़रूरी है कि तुम्हारा ईमान और तस्दीके कल्बी फ़ौत न होने पाए और हर उस शख्स की तक्लीद करो जो काबिले तक्लीद हो क्यूंकि इल्म की तरह ईमान के भी दरजात हैं और इल्म ईमान के बाद हासिल होता है चुनान्चे, फ़रमाने इलाही है : अल्लाह तआला उन लोगों को जो तुम में से ईमान लाए बुलन्द मर्तबा देगा और जिन्हें इल्म दिया गया है उन्हें दरजात दिये जाएंगे। लिहाज़ा जिस शख्स ने येह जान लिया कि नफ्स व शहवाते नफ़्सानी की मुखालफ़त ही अल्लाह तआला की तरफ़ जाने का रास्ता है और वो इन के अस्बाब व इलल तक कमा हक्कुहू रसाई हासिल न कर सका, वोह ईमानदारों में से है और जब कोई शख्स शहवात के इन मुआविनीन पर मुत्तलअ हो गया जिन का हम ने ज़िक्र किया है वोह उन लोगों में से है जिन्हें अल्लाह तआला ने इल्म दिया है और जिन से अल्लाह तआला ने भलाई का वादा किया है। और जो शख्स इन उमूर को मद्दे नज़र रखते हुवे कुरआनो सुन्नत और उलमाए किराम के अक्वाल से दीन की हकीकत को समझता है और ईमान की पुख्तगी चाहता है उस का मर्तबा बुलन्दो बाला है, फ़रमाने इलाही है : और जिस ने नफ्स को ख़्वाहिश से रोक दिया पस बेशक जन्नत ही उस का ठिकाना है। और मजीद इरशाद फ़रमाया : येही वोह लोग हैं कि अल्लाह तआला ने जिन के दिलों को तक्वा के लिये खालिस कर लिया है।

 

फ़रमाने नबवी है कि मोमिन पांच मसाइब में घिरा होता है, मोमिन उस से हसद करता है, मुनाफ़िक़ उस से अदावत रखता है, काफ़िर उसे क़त्ल करने की कोशिशों में होता है, शैतान उसे गुमराह करता है और नफ़्स उस से झगड़ा करता है, लिहाज़ा साबित हुवा कि नफ्स झगड़ालू दुश्मन है जिस से मुकाबला करना इन्तिहाई ज़रूरी है।

मरवी है कि अल्लाह तआला ने हज़रते दावूद अलैहहिस्सलाम  की तरफ़ वहयी फ़रमाई : ऐ दावूद ! खुद बचो और दोस्तों को भी ख्वाहिशात की पैरवी करने से डराओ क्यूंकि दिल दुन्यावी ख्वाहिशात में मगन होते हैं, उन की अक्ल मुझ से दूर हो जाती है।

हज़रते ईसा अलैहहिस्सलाम  ने फ़रमाया : उस शख्स के लिये बिशारत है जिस ने इन वा’दा कर्दा इन्आमात की ख़ातिर जो अभी नज़रों से गाइब हैं, ज़ाहिरी चीजों की ख्वाहिशात तर्क कर दी हैं। हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने सहाबा की ऐसी जमाअत से जो जिहाद से आ रहे थे फ़रमाया : खुश आमदीद ! तुम जिहादे असगर से जिहादे अक्बर की तरफ़ वापस आए हो, अर्ज किया गया : या रसूलल्लाह ! जिहादे अक्बर क्या है ? आप ने फ़रमाया : नफ्स से जिहाद करना ।

फ़रमाने नबवी है कि मुजाहिद वोह है जो अल्लाह तआला की इबादत में नफ्स से मुक़ाबला करता है।

फ़रमाने नबवी है कि अपने नफ्स के मसाइब को रोक, इस की ख्वाहिशात की पैरवी में अल्लाह तआला की ना फ़रमानी न कर, जब कियामत के दिन तेरा नफ्स तुझ से झगड़ा करेगा तो तेरे वुजूद का एक हिस्सा दूसरे पर ला’नत करेगा, अल्लाह तआला अगर तुझे बख़्श दे और तेरे ऐबों को ढांप ले तो येह और बात है।

हज़रते सुफ्यान सौरी रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि मैं ने नफ्स से बढ़ कर किसी चीज़ का मुश्किल इलाज नहीं किया जिस में कभी मुझे फाइदा और कभी नुक्सान हुवा। हज़रते अबू अब्बास मौसिली रज़ीअल्लाहो अन्हो फ़रमाया करते थे : ऐ नफ़्स ! न तो तू दुन्यादारों के साथ रह कर ऐशो इशरत के मजे लेता है और न ही तू आखिरत की तलब में नेकों के साथ रह कर इबादतो रियाज़त करता है, गोया तू मुझे जन्नत और दोज़ख़ के दरमियान रोक रहा है तुझे शर्म नहीं आती ?

हज़रते हसन रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि नफ्स सरकश जानवर से भी ज़ियादा लगाम का मोहताज है, हज़रते यहया बिन मुआज़ रज़ीअल्लाहो अन्हो का क़ौल है कि नफ़्स का रियाज़त की तल्वारों से मुकाबला कर । रियाज़त की चार किस्में हैं : मामूली खाना, मा’मूली सोना, हाजत के वक्त बोलना और तमाम लोगों से दुख उठाना, कम खाने से शहवात मर जाती हैं, कम सोने से इरादे पाकीजा होते हैं, कम बोलने से सलामती अता होती है और लोगों से दुःख  उठाने की वज्ह से इन्सान आ’ला मरातिब तक पहुंच जाता है। किसी इन्सान के लिये जुल्म के वक्त हौसले से बढ़ कर उम्दा चीज़ और कोई नहीं है, तकालीफ़ में सब्र करना भी इसी तरह है, जब भी नफ़्स गुनाहों और ख्वाहिशात की तरफ़ मैलान करे, फुजूल गुफ्तगू करने के खुश गवार तसव्वुर करने लगे, इस पर कम खाने, कम सोने और बेदारी की तल्वारें खींच कर इसे कम बोलने की सजा दे. पोशीदगी में इस पर वार कर ! यहां तक कि तू जुल्म और इन्तिकाम से महफूज हो जाए, तमाम लोगों को इस की आफ़ात से अम्न हासिल हो, इस की शहवात की तारीकियों को ज़ाइल कर, ताकि इस की गुमराही की मुसीबत से नजात पा ले, तब तू पाकीज़ा और रूहानी व नूरानी असरार का मालिक बन जाएगा फिर तू उस तेज़ रफ़्तार घोड़े की तरह जो मैदान में अपनी तेज़ रफ्तारी के जोहर दिखाता है नेकियों और इबादत की राहों में अपनी सुबुक रवी और तेज़गामी के जोहर दिखाना और बाग के मालिक की तरह बाग की रविशों पर चहल कदमी करना।

आप सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने मजीद फ़रमाया कि इन्सान के तीन दुश्मन हैं : दुनिया,शैतान और नफ्स, दुनिया को छोड़ कर इस से महफूज रह, शैतान की मुखालफ़त कर और ख्वाहिशात छोड़ कर नफ़्स के शर से महफूज़ हो जा।

किसी हकीम का कौल है कि जिस शख्स पर उस का नफ्स गालिब आ जाता है वो शहवात की महब्बत का असीर हो जाता है और ख्वाहिशात की जेल का कैदी बन जाता है, नफ़्स के हाथ में उस की बागें होती हैं, वोह उस पर जुल्म व तशहद करता है और जहां चाहता है. उसे घसीट कर ले जाता है लिहाजा उस का दिल तमाम दीनी फवाइद से महरूम कर दिया जाता है।

हज़रते जा’फ़र बिन हमीद रज़ीअल्लाहो अन्हो फ़रमाते हैं कि मैं ने उलमा व हुकमा को इस अम्र पर मुत्तफ़िक पाया है कि दुन्यावी ने’मतें छोड़े बिगैर उख़रवी ने मते हासिल नहीं हो सकतीं।

हज़रते अबू यहूया अल वर्राक़ रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि जिस शख्स ने अपने आ’ज़ा की ख्वाहिशात को पूरा किया, उस ने गोया दिल में पशेमानियों के बीज बोए । हज़रते वहब बिन वर्द रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि जो कुछ कूते-ला-यमूत (इस कदर खूराक जिस से ज़िन्दगी काइम रहे) से ज़ाइद है वोह शहवत है, मजीद फ़रमाया कि जिस ने दुन्यावी ख्वाहिशात को महबूब रखा वोह रुस्वाई के लिये तय्यार हुवा।

हिकायत

अजीजे मिस्र की बीवी ने हज़रते यूसुफ़ अलैहहिस्सलाम  को जब सल्तनते मिस्र पर फ़ाइज़ पाया और खुद यूसुफ़ की गुज़रगाह पर एक बुलन्द टीले के ऊपर बैठी हुई थी, हज़रते यूसुफ़ अलैहहिस्सलाम  तकरीबन बारह हज़ार उमराए ममलुकत के साथ वहां से गुज़र रहे थे तो उस ने कहा : पाक है वोह जात जो गुनाहों के सबब बादशाहों को गुलाम बना देती है, बेशक हिर्स और ख्वाहिशाते नफ़्सानी ने बादशाहों को गुलाम बना दिया है और येही मुसिदीन की जज़ा है और सब्र व तकवा ने गुलामों को बादशाह कर दिया है, हज़रते यूसुफ़ अलैहहिस्सलाम  को अल्लाह तआला ने जब अज़ीज़े मिस्र की बीवी की चालीस बातें बतलाईं तो वोह बे साख्ता कह उठे जैसा कि फ़रमाने इलाही है :

“बेशक जो तक्वा और सब्र इख्तियार करता है अल्लाह तआला नेकियां करने वालों के अज्र को जाएअ नहीं करता है।”

हज़रते जुनैद रज़ीअल्लाहो अन्हो का कहना है कि एक मरतबा मैं रात को बेदार हो कर इबादत में मश्गूल हुवा मगर मुझे इबादत में मज़ा न आया, तब मेरा इरादा हुवा कि जा कर सो जाऊं लेकिन नींद मुझ से कोसों दूर, मैं उठ कर बैठ गया फिर भी मुझे चैन न आया चुनान्चे, मैं बाहर निकल गया, रास्ते में मैं ने एक आदमी को कम्बल में लिपटा पड़ा देखा जब उस ने मेरी आहट महसूस की तो कहा ऐ अबल कासिम ! ज़रा मेरी तरफ़ तशरीफ़ लाइये ! मैं ने कहा : आका ! बिगैर किसी के बुलाए के आ जाऊं? वोह कहने लगा : हां ! मैं ने अल्लाह तआला से सुवाल किया था कि आप के दिल में मेरे लिये तहरीक पैदा करे । मैं ने कहा : अल्लाह तआला ने ऐसे ही किया है, बतलाइये ! आप की हाजत क्या है ? वोह शख्स कहने लगा : नफ्स की बीमारी उस के लिये इलाज कब बनती है ? मैं ने कहा : जब आप अपने नफ्स की ख्वाहिशात की मुखालफ़त करें। तब वोह अपने आप से कहने लगा : सुन लिया ! मैं ने सात मरतबा तुझे येही बात बतलाई थी मगर तू ने जुनैद के सिवा किसी की बात सुनने से इन्कार कर दिया था, अब सुन लिया कि जुनैद क्या कहता है ? फिर वोह चल दिया और जाने कहां गाइब हो गया।

हजरते यजीदुर्रक्काशी रज़ीअल्लाहो अन्हो ने कहा कि तुम मझे दुनिया में ठन्डे पानी से बचाओ. कहीं मैं आखिरत में इस से महरूम न हो जाऊं । किसी ने हजरते उमर बिन अब्दुल अजीज रज़ीअल्लाहो अन्हो से पूछा : मैं कब बोलूं ? उन्हों ने कहा : जब तुझे चुप रहने की ख्वाहिश हो, उस ने कहा : और चुप कब रहूं ? आप ने फ़रमाया : जब तुझे गुफ्तगू करने की ख्वाहिश हो।

हज़रते अली रज़ीअल्लाहो अन्हो का फरमान है कि जो जन्नत का मुश्ताक हो वो दुन्यावी ख्वाहिशात से किनारा कश हो जाए।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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