नमाज़ की फ़ज़ीलत और बरकतें

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नमाज़ अदा करने के फायदे

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

फ़रमाने इलाही है : तहक़ीक़ नमाज़ मुसलमानों पर वक्ते मुकर्रर पर लिखी हुई है। और फ़रमाने नबवी है : अल्लाह तआला ने बन्दों पर पांच नमाजें फ़र्ज़ की, जो शख्स इन्हें बा अज़मत समझते हुवे मुकम्मल शराइत के साथ अदा करता है, अल्लाह तआला का उस के लिये वादा है कि वो उस शख्स को जन्नत में दाखिल फ़रमाएगा और जो इन्हें अदा नहीं करता अल्लाह तआला का उस के लिये कोई वादा नहीं है, चाहे तो उसे अज़ाब दे और अगर चाहे तो जन्नत में दाखिल फ़रमा दे।

फ़रमाने नबवी है कि पांच नमाज़ों की मिसाल तुम में से किसी एक के घर के साथ बहने वाली वसीअ खुश गवार पानी की नहर जैसी है जिस से वो दिन में पांच मरतबा नहाता है, क्या उस के जिस्म पर मेल बाकी रहेगा ? सहाबए किराम ने अर्ज़ की : नहीं, आप ने फ़रमाया : जैसे पानी मेल कुचैल को बहा ले जाता है उसी तरह पांच नमाजें भी गुनाहों को बहा ले जाती हैं।

नमाज गुनाहों का कफ्फारा है

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का इरशादे गिरामी है कि नमाज़े अपने अवकात के माबैन सरज़द होने वाले गुनाहों का कफ्फ़ारा है ब शर्तेकि कबीरा गुनाह से परहेज़ किया जाए जैसा कि फ़रमाने इलाही है:

बेशक नेकियां बुराइयों को खा जाती हैं।

मतलब यह है कि वो गुनाहों का कफ्फारा हो जाती हैं गोया कि गुनाह थे ही नहीं।

बुख़ारी व मुस्लिम और दीगर अस्हाबे सुनन वगैरा ने हज़रते इब्ने मसऊद रज़ीअल्लाहो अन्हो से रिवायत की है कि एक शख्स ने किसी औरत का बोसा ले लिया और हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की ख़िदमत में हाज़िर हो कर यह वाकिआ कह सुनाया, गोया वो इस का कफ्फारा पूछना चाहता था, जब हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम पर यह आयत नाज़िल हुई : और काइम कर नमाज़ दिन के दोनों अतराफ़ में।

तो उस शख्स ने अर्ज की, कि यह मेरे लिये है ? आप ने फ़रमाया : “मेरे हर उस उम्मती के लिये है जिस ने ऐसा काम किया।”

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नमाज की ताकीद में इरशादाते नबविय्या (हदीसे पाक)

मुस्नदे अहमद और मुस्लिम शरीफ़ में हज़रते अबू उमामा रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि नबिय्ये करीम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की खिदमत में एक आदमी हाज़िर हुवा और अर्ज की, कि मुझ पर हद जारी फ़रमाइये ! उस ने एक या दो मरतबा यही बात कही मगर हुजूर  ने तवज्जोह नहीं फ़रमाई, फिर नमाज़ पढ़ी गई । जब नमाज़ से आप फ़ारिग हुवे तो फ़रमाया : वो आदमी कहां है ? उस ने अर्ज़ की : मैं हाज़िर हूं या रसूलल्लाह ! आप ने फ़रमाया : तू ने मुकम्मल वुजू कर के हमारे साथ अभी नमाज़ पढ़ी है? उस ने अर्ज की : जी हां ! आप ने फ़रमाया : “तो तू गुनाहों से ऐसा पाक है जैसे तेरी मां ने तुझे जना था, आयिन्दा ऐसा न करना ।” उस वक्त हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम पर यह आयत नाज़िल हुई कि “नेकियां गुनाहों को ले जाती हैं।”

और आप सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम इरशाद है कि हमारे और मुनाफ़िकों के दरमियान फ़र्क, इशा और फज्र की नमाज़ है वो इन में आने की ताकत नहीं रखते।

हुजूर सरवरे काइनात सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का इरशाद है : जो शख्स अल्लाह तआला से इस हालत में मुलाकात करे कि उस ने नमाजें जाएअ कर दी हों तो अल्लाह तआला उस की नेकियों की परवा नहीं करेगा।

फ़रमाने नबवी है कि नमाज़ दीन का सुतून है, जिस ने इसे छोड़ दिया उस ने दीन (की इमारत) को ढा दिया ।

हुजूर रज़ीअल्लाहो अन्हो से पूछा गया कि कौन सा अमल अफ़ज़ल है ? तो आप ने फ़रमाया कि नमाज़ को इन के अवकात में अदा करना ।

फ़रमाने नबवी है : जिस ने मुकम्मल पाकीज़गी के साथ सहीह अवकात में हमेशा पांच नमाज़ों को अदा किया कयामत के दिन नमाजे उस के लिये नूर और हुज्जत होंगी और जिस ने इन्हें जाएअ कर दिया वोह फ़रऔन और हामान के साथ उठाया जाएगा।

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का इरशाद है कि नमाज़ जन्नत की कुन्जी है।

मजीद फ़रमाया कि अल्लाह तआला ने तौहीद के बाद नमाज़ से ज़ियादा पसन्दीदा कोई अमल फ़र्ज़ नहीं किया और अल्लाह तआला ने पसन्दीदगी ही की वज्ह से फ़रिश्तों को इसी इबादत में मसरूफ़ फ़रमाया है, लिहाज़ा इन में से कुछ रुकूअ में, कुछ सजदे में, बा’ज़ क़ियाम में और बा’ज़ कुऊद की हालत में इबादत कर रहे हैं।।

फ़रमाने नबवी है : “जिस ने जान बूझ कर नमाज़ छोड़ दी वो हद्दे कुफ्र के करीब हो गया” या’नी वो ईमान से निकलने के करीब हो गया क्यूंकि उस ने अल्लाह की मजबूत रस्सी को छोड़ दिया और दीन के सुतून को गिरा दिया जैसे उस शख्स को जो शहर के करीब पहुंच जाए कहा जाता है कि वो शहर में पहुंच गया है, दाखिल हो गया है, इसी तरह इस हदीस में भी फ़रमाया गया है ।

और हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया कि जिस ने जान बूझ कर नमाज़ छोड़ दी वो मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की जिम्मेदारी से निकल गया ।

हज़रते अबू हुरैरा रज़ीअल्लाहो अन्हो का फ़रमान है : जिस ने बेहतरीन वुजू किया फिर नमाज़ के इरादे से निकला वो नमाज़ में है जब तक कि वो नमाज़ के इरादे से मस्जिद की तरफ़ चलता रहे, उस के एक क़दम के बदले नेकी लिखी जाती है और दूसरे कदम के बदले में एक गुनाह मिटा दिया

जाता है। जब तुम में से कोई एक इक़ामत सुने तो उस के लिये ताखीर मुनासिब नहीं है, तुम में से वो ज़ियादा अज्र पाता है जिस का घर दूर होता है, पूछा गया : अबू हुरैरा इस की क्या वज्ह है ? आप ने फ़रमाया : ज़ियादा कदम चलने की वज्ह से उसे यह फजीलत हासिल है।

और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : तन्हाई की इबादत से अफ़ज़ल कोई अमल नहीं है जिस की बदौलत अल्लाह तआला का कुर्ब जल्द हासिल हो जाए।

हुजूर नबिय्ये करीम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का इरशाद है कि ऐसा कोई मुसलमान नहीं है जो रजाए इलाही के लिये सजदा करता है और उस के हर सजदे के बदले में उस का एक दरजा बुलन्द न होता हो और अल्लाह तआला उस का एक गुनाह न मिटा देता हो ।

मरवी है कि एक शख्स ने हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से अर्ज की, कि मेरे लिये दुआ फ़रमाइये कि अल्लाह तआला मुझे आप की शफाअत के मुस्तहिकीन में से बनाए और जन्नत में आप की सोहबत नसीब फ़रमाए, हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया कि कसरते सुजूद से मेरी इआनत तलब करो।(या’नी कसरत से इबादत करो) नीज़ कहा गया है कि इन्सान सजदे में रब के बहुत करीब होता है चुनान्चे, फ़रमाने इलाही है :

और सजदा कर और करीब हो जा।

फ़रमाने इलाही है :

उन की निशानी उन के चेहरों पर सजदों के असरात

 

इस आयत की तफ्सीर में मुख्तलिफ़ अक्वाल हैं : यह कि इस से मुराद चेहरों का वो हिस्सा है जो सजदों के वक्त जमीन से लगता है या यह कि इस से मुराद खुशूअ व खुजूअ का नूर (यह आयते सजदा है और आयते सजदा पढ़ने या सुनने से सजदा वाजिब हो जाता है ख्वाह सुनना या पढ़ना बिल कस्द हो या बिला कस्द और इसी तरह तर्जमे का हुक्म है)

है जो बातिन से ज़ाहिर पर चमकता है और इस की शुआएं चेहरों पर नुमायां होती हैं और येही बात ज़ियादा सहीह है। या यह कि इस से मुराद वो नूर है जो वुजू के निशानात पर कियामत के दिन उन के चेहरों पर चमकेगा। फ़रमाने नबवी है : जब इन्सान सजदे की आयत पढ़ कर सजदा करता है तो शैतान रोते हुवे अलाहिदा हो जाता है और कहता है : हाए अपसोस ! इसे सजदों का हुक्म दिया गया और इस ने सजदा कर के जन्नत पा ली और मुझे सजदे का हुक्म दिया गया था मगर मैं ने ना फ़रमानी की और मेरे लिये जहन्नम बनाया गया।

नमाज के बारे में इरशादाते बुजर्गाने दीन

हज़रते अली बिन अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि आप हर रोज़ हज़ार सुजूद करते थे इस लिये लोग इन्हें सज्जाद कहा करते थे।

मरवी है कि हज़रते उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रज़ीअल्लाहो अन्हो हमेशा मिट्टी पर सजदा किया करते थे।

हज़रते यूसुफ़ बिन अस्बात रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाया करते : ऐ जवानो ! मरज़ से पहले तन्दुरुस्ती को गनीमत समझते हुवे आगे बढ़ो, सिवाए एक आदमी के और कोई ऐसा नहीं है जिस पर मैं रश्क करता हूं, वो है रुकूअ और सुजूद मुकम्मल करने वाला, यही मेरे और उस के दरमियान हाइल हो गए हैं।

हज़रते सईद बिन जुबैर रज़ीअल्लाहो अन्हो फ़रमाते हैं कि सुजूद के सिवा मुझे दुन्या की किसी चीज़ से उन्स नहीं है।

हज़रते उक्बा बिन मुस्लिम रज़ीअल्लाहो अन्हो ने कहा है : अल्लाह तआला को बन्दे की उस आदत से बढ़ कर कोई और चीज़ ज़ियादा पसन्द नहीं है जिस में वो अल्लाह तआला की मुलाकात को पसन्द करता है और ऐसा कोई लम्हा नहीं है जिस में इन्सान अल्लाह के करीब तर हो जाता हो जब कि वो सर ब सुजूद हो जाता है।

हज़रते अबू हुरैरा रज़ीअल्लाहो अन्हो का फरमान है : इन्सान सजदे की हालत में रब से बहुत करीब हो जाता है लिहाज़ा सुजूद में बहुत ज़ियादा दुआएं मांगा करो।

 

 

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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