रमज़ान की लैलतुल कद्र की बरकतें

फ़जाइले लैलतुल कद्र

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 हज़रते इब्ने अब्बास रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम के हुजूर में बनी इस्राईल के ऐसे शख्स का तजकिरा किया गया जिस ने हज़ार माह राहे खुदा में अपने कन्धे पर हथयार उठाए थे, हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने उस पर इज़हारे तअज्जुब फ़रमाया और अपनी उम्मत के लिये ऐसी नेकी की तमन्ना फ़रमाई और कहा : ऐ रब ! तू ने मेरी उम्मत को सब उम्मतों से कम उम्र वाला बनाया और आ’माल में सब उम्मतों से कम किया है, तब अल्लाह तआला ने आप को लैलतुल क़द्र अता फ़रमाई जो हज़ार महीनों की इबादत से अफ़ज़ल है, जितनी मुद्दत बनी इस्राईल के उस आदमी ने राहे खुदा में हथयार उठाए थे, आप सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम को और आप की उम्मत को इस तवील मुद्दत के मुकाबले में एक रात बख़्शी गई येह नेमते उजमा (लैलतुल क़द्र) इस उम्मत के ख़साइस में से है।

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मुसलमानों को लैलतुल कद्र क्यों अता की गई ?

एक रिवायत में है कि उस शख्स का नाम शमऊन था, उस ने कामिल एक हज़ार माह दुश्मनों से जिहाद किया और कभी भी उस के घोड़े का नम्दा) (पसीने से) खुश्क न हुवा, उसे अल्लाह तआला ने जो कुव्वत और दिलेरी अता फ़रमाई थी उस के बल बूते पर उस ने दुश्मनों को मगलूब किया ता आंकि उन के दिल बहुत तंग हुवे और उन्हों ने उस की औरत की तरफ़ एक कासिद भेजा और वोह इस बात के ज़ामिन हुवे कि वोह औरत को सोने का भरा हुवा थाल पेश करेंगे, अगर वोह अपने शोहर को कैद कर ले ताकि वोह उस मर्दे मुजाहिद को अपने तय्यार कर्दा मकान में कैद कर दें और सब लोग राहत व सुकून पाएं चुनान्चे, जब वोह सो गया तो औरत ने उसे खजूर के छाल से बटे हुवे मज़बूत रस्सों से बांध दिया, जब वोह बेदार हुवा तो उस ने अपने जिस्म को हरक़त दी जिस से उस ने रस्सियों को टुकड़े टुकड़े कर दिया और औरत से पूछा : तू ने ऐसा क्यूं किया ? औरत बोली : मैं तुम्हारी कुव्वत का अन्दाज़ा लगाना चाहती थी। जब काफ़िरों को इस की खबर मिली तो उन्हों ने औरत की तरफ़ एक मोटी जन्जीर भेजी, औरत ने उसे फिर बांध दिया और उस मर्दे मुजाहिद ने पहले की तरह उसे भी तोड़ दिया। तब इब्लीस काफ़िरों के पास आया और उन्हें येह बात समझाई कि वोह औरत से कहें कि वोह मर्द ही से पूछे कि कौन सी चीज़ ऐसी है जिस के तोड़ने की वोह ताकत नहीं रखता, चुनान्चे, उन्हों ने औरत की तरफ़ आदमी भेजा और उसे येही कहला भेजा चुनान्चे, औरत ने उस से सवाल किया तो उस मर्दे मुजाहिद ने कहा : मेरे गेसू, उस के अठ्ठारह तवील गैसू थे जो ज़मीन पर घिसटते रहते थे। जब वोह सो गया तो औरत ने चार गैसूओं से उस के पाउं और चार से उस के हाथ बांध दिये, फिर काफ़िर आ गए और उन्हों ने उसे पकड़ लिया और उसे अपनी कुरबानगाह की तरफ़ ले गए, वोह चार सो हाथ बुलन्द थी मगर इतनी बुलन्दी और फ़राखी के बा वुजूद उस में सिर्फ एक सुतून था, काफ़िरों ने उस के कान और होंट काट दिये और वोह तमाम वहीं जम्अ थे, तब उस मर्दे मुजाहिद ने अल्लाह तआला से सुवाल किया कि उसे उन बन्धनों को तोड़ने की कुव्वत बख़्शे और उन काफ़िरों पर येह सुतून मअ सकफ़ के गिरा दे और उसे उन के चंगुल से नजात दे चुनान्चे, अल्लाह तआला ने उसे कुव्वत बख़्शी वोह हिला तो उस के तमाम बन्धन टूट गए, तब उस ने सुतून को हिलाया जिस की वज्ह से छत काफ़िरों पर आ गिरी और अल्लाह तआला ने उन सब को हलाक कर दिया और उसे नजात बख़्शी ।

जब सहाबए किराम रज़ीअल्लाहो अन्हो ने येह बात सुनी तो उन्हों ने कहा : या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम क्या हम भी उस जैसा सवाब पा सकते हैं ? आप ने फ़रमाया : मुझे इस का इल्म नहीं, फिर आप ने अपने रब से सुवाल किया तो अल्लाह तआला ने आप को लैलतुल क़द्र अता की जैसा कि पहले मजकूर हुवा है।

हज़रते अनस रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है, हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : जब लैलतुल कद्र आती है तो जिब्रील  : फ़िरिश्तों की एक जमाअत के साथ नाज़िल होते हैं और हर उस बन्दे पर रहमत भेजते हैं और बख्शिश की दुआ करते हैं जो खड़े हो कर या बैठ कर अल्लाह तआला के ज़िक्र में मश्गूल व मसरूफ़ होता है।

लैलतुल कद्र में बे शुमार रहमतों का नुजूल

हज़रते अबू हुरैरा रज़ीअल्लाहो अन्हो कहते हैं कि लैलतुल कद्र में जमीन पर बे शुमार फ़रिश्ते उतरते हैं(3) और उन के उतरने के लिये आस्मान के दरवाजे खोल दिये जाते हैं।

जैसा कि हदीस शरीफ़ में वारिद हुवा है, तब अन्वार चमकते हैं, अज़ीम तजल्ली होती है जिस में मुल्के अज़ीम मुन्कशिफ़ हो जाता है, लोग इस में मुख्तलिफ़ दरजात पर फ़ाइज़ होते हैं, बा’ज़ ऐसे होते हैं जिन पर ज़मीनो आस्मान के मलकूत मुन्कशिफ़ होते हैं और जब उन पर आस्मानों के मलकूत मुन्कशिफ़ होते हैं तो वोह आस्मानों में फ़रिश्तों को उन सूरतों में देखते हैं जिन में वोह मश्गूले इबादत होते हैं, बा’ज़ क़ियाम में, बा’ज़ कुऊद में, बा’ज़ रुकूअ में, बा’ज़ ज़िक्र में, बा’ज़ शुक्र में और बा’ज़ तस्बीह व तहलील में मसरूफ़ हैं।

बा’ज़ लोगों पर जन्नत के अहवाल मुन्कशिफ़ होते हैं और वोह जन्नत के महल्लात, घर, हरें, नहरें, दरख्त और जन्नत के फल वगैरा देखते हैं और अर्श आ’जम का नज्जारा करते हैं जो कि जन्नत की छत है, अम्बिया, औलिया, शुहदा और सिद्दीक़ीन के मकामात देखते हैं। बा’ज़ ऐसे लोग भी होते हैं जिन की आंखों से हिजाब उठ जाते हैं और वोह रब्बे जुल जलाल के जमाल के इलावा और कुछ नहीं देख पाते।

हज़रते उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है, हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : जिस शख्स ने माहे रमज़ान की सत्ताईसवीं शब, सुब्ह होने तक इबादत में गुज़ारी वोह मुझे रमज़ान की तमाम रातों की इबादत से ज़ियादा पसन्द है । हज़रते फ़ातिमतुज्जहरा राज़ी अल्लाहो अन्हा  ने अर्ज की : ऐ अब्बाजान ! वोह ज़ईफ़ मर्द और औरतें क्या करें जो कियाम पर कुदरत नहीं रखते, आप ने फ़रमाया : क्या वोह तक्ये नहीं रख सकते जिन का सहारा लें और इस रात के लम्हात में से कुछ लम्हात बैठ कर गुज़ारें और अल्लाह तआला से दुआ मांगें मगर येह बात अपनी उम्मत के तमाम माहे रमज़ान को कियाम में गुज़ारने से ज़ियादा महबूब है।

हज़रते आइशा रज़ीअल्लाहो अन्हा रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है, हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : जिस ने लैलतुल कद्र बेदार हो कर गुज़ारी और इस में दो रक्अत नमाज अदा की और अल्लाह तआला से बख्शिश तलब की तो अल्लाह तआला ने उसे बख़्श दिया, उसे अपनी रहमत में जगह देता है और जिब्रील अलैहहिस्सलाम  ने उस पर अपने पर फेरे और जिस पर जिब्रील ने अपने पर फेरे वोह जन्नत में दाखिल हुवा।

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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