सब्र- सब्र की किस्मे, मुसीबत बीमारी में अल्लाह से शिकायत?

सब्र- सब्र की किस्मे

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

Color Codes –  कुरआन मजीदहदीसे पाककौल (Quotes).

 

जो शख्श यह चाहता है की वह अल्लाह के अज़ाब से बच जाये, सवाब और रहमत को पा ले, और जन्नती हो जाये तो उसे चाहिए की वह अपने आपको दुनियावी ख्वाइशों से रोके और दुनिया की तकलीफों और परेशानियों पर सब्र करे. जैसा की अल्लाह का फरमान है

अल्लाह सब्र करने वालों को महबूब रखता है.

 

सब्र की किस्मे

सब्र की कई किस्मे हैं – अल्लाह की ईताअत पर सब्र करना, हराम चीज़ों से रुक जाना, तकलीफों पर सब्र करना, और सदमे पर सब्र करना वगेरह.

जो शख्स अल्लाह की इबादत पर सब्र करता है, और हर वक़्त इबादत में डूबा रहता है, उसे क़यामत के दिन अल्लाह ताआला तीन सौ ऐसे दर्जात अता करेगा जिन में हर दर्जे का फासला ज़मीन और आसमान के फासिले के बराबर होगा. जो अल्लाह ताआला की हराम की हुई चीजों से सब्र करता है उसे छः सौ दर्जात अता होंगे जिन में हर दर्जे का फासला सातवें आसमान से सातवीं ज़मीन के फासले के बराबर होगा, जो मुसीबतों पर सब्र करता है उसे सात सौ दर्जे अता होंगे, हर दर्जे का फासला तहतुस्सरा से अर्शे ऊला के बराबर होगा.

 

हज़रत ज़कारिया अलेहिस्सलाम का किस्सा 

किस्सा – हज़रत ज़कारिया अलेहिस्सलाम जब यहूदियों के हमले की वजह से जब शहर से बाहर निकले की कहीं रूपोश हो जाएँ और यहूद उन के पीछे भागे तो आपने, अपने करीब एक दरख़्त देख कर उसे कहा ए दरख़्त मुझे अपने अन्दर छुपा ले, दरख़्त चिर गया और आप उसमे छुप गए. जब यहूद वहां पहुंचे तो शैतान ने उन्हें सारी बात बता कर कहा की इस दरख़्त को आरी से दो टुकड़े कर दो! चुनाचे उन्होंने एसा ही किया और यह सिर्फ इसलिए हुआ की हजरते ज़कारिया अलेहिस्सलाम ने अल्लाह की ज़ात के बजाय अल्लाह की पैदा की हुयी चीज़ से पनाह तलब की थी, आप ने अपने वजूद को मुसीबत में डाला और आप के दो टुकड़े कर दिए गए.

 

हदीसे कुदसी में है की अल्लाह ताआला फरमाता है की 

“जब मेरा कोई बंदा मुसीबतों में मुझ से सवाल करता है, में उसे मांगने से पहले दे देता हूं, और उसकी दुआ को क़ुबूल कर लेता हूँ, और जो बंदा मुसीबतों के वक़्त मेरी मखलूक से मदद मांगता है में उस पर आसमानों के दरवाज़े बंद कर देता हूँ.”

ज़कारिया अलेहिस्सलाम को उफ़ करने की मनाही

कहते हैं की जब आरी हज़रत ज़कारिया अलेहिस्सलाम के दिमाग तक पहुंची तो आपने आह की, इर्शादे इलाही हुआ ऐ ज़कारिया, मुसीबतों पर पहले सब्र क्यों नहीं किया जो अब फरियाद करते हो. अगर दोबारा आह निकाली तो सब्र करने वालों के दफ्तर से तुम्हारा नाम ख़ारिज कर दिया जायेगा.तब हज़रत ने अपने होंठो को बंद कर लिया.चिर कर दो टुकड़े हो गए मगर उफ़ तक नहीं की.

इसलिए हर अक्लमंद के लिए ज़रूरी है की वह मुसीबतों पर सब्र करे और शिकायती हर्फ़ ज़बान पर ना लाये ताकि दुनिया और आखिरत के आजाब से नजात हांसिल कर ले क्यों की इस दुनिया में मुसीबतें अम्बिया अलेहीमुससलाम और औलिया अल्लाह पर ही ज्यादा डाली जाती हैं.

 

सूफियों की नज़र में मुसीबतों की हकीक़त

हज़रात जुनैद बगदादी रहमतुल्लाह अलैह का कौल है “मुसीबतें आरीफीन का चराग, मुरिदीन की बेदारी, मोमिन की इस्लाह और गफिलों के लिए हलाक़त है, मोमिन मुसीबतों पर सब्र किये बगैर ईमान के हलावत मिठास पा नहीं सकता.”

हदीस शरीफ में है “जो शख्श रात भर बीमार रहा और सब्र करके अल्लाह ताआला की रज़ा का चाहने वाला हुआ तो वह शख्श गुनाहों से ऐसे पाक हो जायेगा जैसे की अपनी पैदाइश के वक़्त था.”

इसीलिए जब तुम बीमार हो जाओ तो आफीयत की तमन्ना ना करो.

जनाब जह्हाक कहते हैं की “जो शख्श चालीस रातों में एक रात में भी मुसीबत और दुःख में गिरिफ्तार ना हुआ हो, अल्लाह ताआला के यहाँ उसके लिए कोई खैर और भलाई नहीं है.”

 

मरीज़ मोमिन के गुनाह नहीं लिखे जाते

हज़रात मआज़ बिन जबल राज़ाल्लाहो अन्हो से रिवायत है की जब मोमिन बंदा किसी बीमारी में मुब्तिला हो जाता है तो उसके बाएं शाने (कंधे) वाले फ़रिश्ते से कहा जाता है की उसके गुनाहों को लिखना बंद कर दो, दायें शाने वाले फ़रिश्ते से कहा जाता है की उसके नामा ए आमाल में वह बेहतरीन नेकियाँ लिखो जो उसने की हैं.

हदीस शरीफ में है “जब कोई बंदा बीमार हो जाता है तो अल्लाह ताआला उस की तरफ दो फ़रिश्ते भेजता है की जाकर देखो मेरा बंदा क्या कहता है? अगर बीमार “अलहम्दोलिल्लाह” कहता है फ़रिश्ते अल्लाह की बारगाह में जाकर उस का कौल अर्ज़ करते हैं, अल्लाह का इरशाद होता है अगर मैं ने उस बन्दे को उस बीमारी में मौत दे दी तो उसे जन्नत में दाखिल करूंगा और अगर सेहत अता की तो उसे पहले से भी बेहतर परवरिश करने वाला गोश्त और खून दूंगा और उसके गुनाहों को माफ़ कर दूंगा.”

एक इबरत अंगेज़ हिकायत -बनी इजराइल का गुनाहगार नौजवान 

बनी इजराइल में एक निहायत ही फजिर और फ़ासिक इन्सान था जो अपने बुरे कामों से कभी बाज़ ना आता था, शहर वाले जब उसकी बदकारियों से महफूज़ रहने की दुआ मांगने लगे, अल्लाह ताआला ने हजरते मूसा अलैहहिससलाम की तरफ वह्यी भेजी की बनी इस्राईल के फलां शहर में एक बदकार जवान रहता है उसे शहर से निकाल दीजिये ताकि उसकी बदकारियों की वजह से पूरे शहर पर आग ना बरसे, हजरते मूसा अलेहिस्सलाम वहां तशरीफ़ ले गए और उस को उस बस्ती से निकाल दिया, फिर अल्लाह का हुक्म हुआ की उसे उस बस्ती से भी निकल दीजिये, जब हजरते मूसा अलैहिस्सलाम ने उसको दूसरी बस्ती से भी निकाल दिया तो उस ने एक एसी ग़ार में ठिकाना बनाया जहाँ ना कोई इंसान था और ना ही कोई चरिंद परिन्द का गुज़र होता था, आस पास में ना कोई आबादी थी और ना कोई हरियाली थी.

उस ग़ार में आकर वह नौजवान बीमार हो गया उस की देख रेख तीमारदारी के लिए कोई भी उस के आस पास मोजूद नहीं था जो उस की खिदमत करता, वह कमजोरी से ज़मीन पर गिर पड़ा और कहने लगा काश इस वक़्त मेरी माँ मेरे पास मोजूद होती तो मुझ पर शफ़क़त करती और मेरी इस बेकसी और बे बसी पर रोती, अगर मेरी बीवी होती तो मेरी जुदाई पर रोती, अगर मेरे बच्चे इस वक़्त मोजूद होते तो कहते ए रब हमारे आज़िज़, गुनाहगार बदकार और मुसाफिर बाप को बख्श दे! जिसे पहले तो शहर बदर किया गया और फिर दूसरी बस्ती से भी निकाल दिया गया था और अब वह ग़ार में भी हर एक चीज़ से ना उम्मीद हो कर दुनिया से आखिरत की तरफ चला है और वह मेरे ज़नाज़े के पीछे रोते हुए चलते.

फिर वो नौजवान कहने आला ऐ अल्लाह, तू ने मुझे माँ बाप और बीवी बच्चों से तो दूर किया है मगर अपने फ़ज़ल और करम से दूर ना करना तू ने ने मेरा दिल अज़ीज़ों की जुदाई में जलाया है, अब मेरे सरापा को मेरे गुनाहों की वजह से जहन्नम की आग में ना जलाना, उसी वक़्त अल्लाह ताआला ने एक फ़रिश्ता उसके बाप के हम शक्ल बना कर, एक हूर को उस की माँ और एक हूर को उस की बीवी की हम शक्ल बना कर और गिल्माने जन्नत (जन्नत के खादिमों) को उस के बच्चों के रूप में भेज दिया, यह सब उसके करीब आकर बैठ गए और उस की बेहद तकलीफ पर अफ़सोस और आह व ज़ारी करने लगे. जवान उन्हें देख कर बहूत खुश हुआ और उसी खुशी में उसका इन्तेकाल हो गया, तब अल्लाह ताआला ने हजरते मूसा अलेह्हिस्सलाम की तरफ वह्यी भेजी की फलां ग़ार की तरफ जाओ, वहां हमारा एक दोस्त मर गया है,  तुम उसके दफ़न व कफ़न का इंतज़ाम करो.

हुक्मे इलाही के मुताबीक हज़रत मूसा अलेहिस्सलाम जब ग़ार में पहुंचे तो उन्होंने वहां उसी जवान को मरा हुआ पाया.  जिस को उन्होंने पहले शहर और फिर दूसरी बस्ती से निकला था,  उस के पास हूरें ताजियत करने वालों की तरह बैठ हुई थी, मूसा अलेहिस्सलाम ने अल्लाह से अर्ज़ की ए रब्बुल इज्ज़त!  यह तो वही जवान है  जिसे मेने तेरे हुक्म से शहर और बस्ती से निकाला था.  अल्लाह ने फ़रमाया ए मूसा मैंने उसके बहूत ज्यादा रोने और अज़ीज़ों की जुदाई में तड़पने की वजह से उस पर रहम किया है और फ़रिश्ते को उस के बाप की और हूर व गिलमान को उस की माँ, बीवी और बच्चों के हमशक्ल बना कर भेजा है, जो ग़ुरबत में उस की तकलीफों पर रोते हैं, जब ये मरा तो उस की बे चारगी पर ज़मीन और आसमान वाले रोये और में अररहमरराहेमीन  फिर क्यों ना उस के गुनाहों को माफ़ करता.      

जब मुसाफिर मुसाफरत में इन्तेकाल करता है

जब किसी मुसाफिर पर नज़ा (दम निकलना) का आलम तारी हौता है तो अल्लाह ताआला फरिश्तों से फरमाता है यह बेचारा मुसाफिर है, अपने बाल बच्चों और माँ बाप वगेरह को छोड़ चुका है, जब यह मरेगा तो इस पर कोई अफ़सोस करने वाला भी नहीं होगा तब अल्लाह ताआला फरिश्तों को उसके माँ बाप औलाद और दोस्त अहबाब की शक्ल में भेजता है, जब वह उन्हें अपने करीब देखता है तो उनको अपने दोस्त और अहबाब समझ कर हद दर्जा खुश होता है,और उसी ख़ुशी की हालत में उसकी रूह निकल जाती है, फिर वह फ़रिश्ते परेशान हाल होकर उसके जनाज़े के पीछे पीछे चलते हैं,और क़यामत तक उसकी बक्शीश की दुआ करते रहते हैं.

अल्लाह का फरमान है – “अल्लाह अपने बन्दों पर मेहरबान है”

अल्लाह से शिकायत करना कैसा है?

इब्ने अता रहमतुल्लाह अलैह कहते हैं इन्सान का सच व झूठ उसकी मुसीबत और ख़ुशी के वक़्त ज़ाहिर होता है, जो शख्श ख़ुशी व खुशहाली में तो अल्लाह ताआला का शुक्र अदा करता है, मगर मुसीबतों में फरियाद और फुगाँ करता है वह झूठा है. अगर किसी को दो आलम का इल्म अता कर दिया जाये, फिर उस पर मुसीबतों की यलगार हो और वह शिकवा करने लगे तो उसे उसका यह इल्म व अमल कोई फायदा नहीं देगा.

हदीसे कुदसी है – “अल्लाह ताआला इरशाद फरमाता है जो मेरी कज़ा पर राज़ी नहीं मेरी अता पर शुक्र नहीं करता वह मेरे सिवा कोई और रब तलाश करे.”

हिकायत – वहाब बिन मम्बा कहते है अल्लाह के एक नबी ने पचास साल अल्लाह की इबादत की, तब अल्लाह ताआला ने उन नबी की तरफ वह्यी फरमाई की मैंने तुझे बख्श  दिया है, नबी ने अर्ज़ की ए अल्लाह!मैंने तो कोई गुनाह ही नहीं किया, बख्शा किस चीज़ पर गया? अल्लाह ताआला ने उनकी एक रग को बंद कर दिया जिस की वजह से वह सारी रात ना सो सके, सुबह को जब उन के पास फ़रिश्ता आया तो उन्होंने रग बंद हो जाने की शिकायत की, तब फ़रिश्ता बोला, अल्लाह ताआला फरमाता है तेरी पचास साल की इबादत से तेरी यह एक शिकायत ज्यादा है!.

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