क़यामत में सूर फूंकना क्या है? सूर कब कब फूंका जायेगा?

क़यामत में सूर फूंकना, जिस्मों का हश्र व मरने के बाद उठाना

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

 

फ़रमाने नबवी है : मैं कैसे सुकून पाऊं जब कि साहिबे सूर या’नी हज़रते इस्राफ़ील अलैहहिस्सलाम  ने सूर मुंह में लिया हुवा है, पेशानी झुकाई हुई है और कान अल्लाह तआला के फ़रमान पर मुतवज्जेह कर रखे हैं कि उसे कब सूर फूंकने का हुक्म मिले और वो सूर फूंकें।

नफ्खे सूर सूर फूंकना क्या है?

हज़रते मक़ातिल रहमतुल्लाह अलैह का क़ौल है कि सूर एक बूक या सिंग की तरह है जिसे हज़रते इस्राफ़ील अलैहहिस्सलाम बिगुल की तरह अपने मुंह में लिये हुवे हैं, इस सूर की गोलाई आस्मानो जमीन की चौड़ाई (गोलाई) के बराबर है, हज़रते इस्राफ़ील टिकटिकी बांधे अर्श की तरफ़ देख रहे हैं कि उन्हें कब सूर फूंकने का हुक्म होता है, जब पहली मरतबा सूर फूंका जाएगा तो शिद्दते इज़तिराब बैचेनी  से जिब्राईल, मीकाईल, इस्राफ़ील और इज़राईल के सिवा ज़मीनो आस्मान के सब जानदार हलाक हो जाएंगे फिर इज़राईल को हुक्म होगा और वो उन तीनों फरिश्तों की रूह भी कब्ज़ कर लेगा, इस के बा’द इज़राईल को भी फ़ना से हम किनार कर दिया जाएगा यहां तक कि नफ़्खे सूर को चालीस गुज़र जाएंगे, तब अल्लाह तआला इस्राफ़ील को ज़िन्दा करेगा और वो उठ कर दोबारा सूर फूंकेंगे चुनान्चे,फ़रमाने इलाही है :

“फिर दोबारा सूर फूंका जाएगा पस अचानक वो अपने पैरों पर खड़े हो जाएंगे और दोबारा जिन्दा होना देख रहे होंगे”।

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फ़रमाने नबवी है कि जब से इस्राफ़ील को पैदा किया गया है सूर उस के मुंह में है और वो एक कदम आगे और एक क़दम पीछे रखे हुक्मे खुदावन्दी के इन्तिज़ार में है।

होशयार हो जाओ और सूर फूंके जाने के वक्त से डरो ! उस वक्त में लोगों की ज़िल्लत और रुस्वाई और आजिज़ी का तसव्वुर करो जब कि दूसरी मरतबा सूर फूंक कर उन्हें खड़ा किया जाएगा और वो अपने मुतअल्लिक अच्छा या बुरा फैसला सुनने के मुन्तज़िर होंगे और ऐ इन्सान ! तू भी उन की ज़िल्लत व परेशानी में बराबर का शरीक होगा बल्कि अगर तू दुन्या में आसूदा हाल और दौलत मन्द है तो जान ले कि उस दिन दुनिया के बादशाह तमाम मख्लूक़ से ज़ियादा ज़लील और हक़ीर होंगे और वो च्यूंटियों की तरह पामाल होंगे, उस वक्त जंगलों और पहाड़ों से दरिन्दे सर झुकाए कियामत की हैबत से सहमे हुवे अपनी सारी दरिन्दगी

और वहशत भूल कर लोगों में घुल मिल जाएंगे, ये दरिन्दे अपने किसी गुनाह के सबब नहीं बल्कि सूर की ख़ौफ़नाक आवाज़ की शिद्दत की वज्ह से जिन्दा हो जाएंगे और इन्हें लोगों से ख़ौफ़ और वहशत तक महसूस नहीं होगी, चुनान्चे, फ़रमाने इलाही है:

“और जब वहशी जानवर उठाए जाएंगे”। फिर शैतान और सख्त ना फ़रमान अपनी ना फ़रमानी और सरकशी के बाद अल्लाह तआला के हुजूर हाज़िर होने के लिये इन्तिहाई जिल्लत से इस फ़रमाने इलाही की ताईद में हाज़िर होंगे :

“पस कसम है तेरे रब की हम उन्हें शैतानों के साथ इकठ्ठा करेंगे फिर उन्हें जहन्नम के इर्द गिर्द जानूओं के बल गिरे हुवे हाज़िर करेंगे”। ज़रा सोचो ! उस वक्त तुम्हारा क्या हाल होगा ! और जब लोग कब्र से उठाने के बाद नंगे पैर और नंगे बदन मैदाने कियामत में जो एक साफ़ शफ्फ़ाफ़ ज़मीन होगी जिस में कोई कजी और टीला नहीं होगा, आएंगे, उस पर न कोई टीला होगा कि इन्सान इस के पीछे ओझल हो जाए और न ही कोई घाटी होगी जिस में इन्सान छुप जाए बल्कि वो हमवार ज़मीन होगी जिस पर लोग गिरोह दर गिरोह लाए जाएंगे, बेशक रब्बे जुल जलाल अज़ीम कुदरतों का मालिक है जो रूए ज़मीन के गोशे गोशे से तमाम मख्लूक को एक ही मैदान में सूर फूंकने के वक्त जम्अ फ़रमाएगा, दिल इस लाइक है कि उस दिन बेकरार हों और आंखें खौफ़ ज़दा हों।

अहवाले क़यामत के बारे में नबी स.व.स. के इरशादाद  नबिय्ये करीम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का फरमान है कि कियामत के दिन लोग एक चटयल मैदान में खड़े किये जाएंगे जो हर किस्म के दरख्तों, ऊंचे नीचे टीलों और इमारतों से पाक होगा।

और यह ज़मीन दुनिया की जमीन जैसी नहीं होगी बल्कि ये सिर्फ नाम की ही जमीन है चुनान्चे, फ़रमाने इलाही है :

“उस दिन ज़मीन और आसमान दूसरे रूप में बदल दिये जाएंगे”। हज़रते इब्ने अब्बास रज़ीअल्लाहो अन्हो का क़ौल है कि उस ज़मीन में कमी बेशी की जाएगी, उस के दरख्त, पहाड़, वादियां, दरया सब खत्म कर दिये जाएंगे और उसे अकाजी चमड़े की तरह खींचा जाएगा (जिस तरह कच्चे चमड़े को खींचते हैं) वो बिल्कुल चटयल मैदान होगा जिस पर न किसी को कत्ल किया गया होगा और न ही उस पर कोई गुनाह हुवा होगा और आसमानों के सूरज, चांद और सितारे ख़त्म कर दिये जाएंगे।

ऐ नातवां इन्सान ! ज़रा सोच तो सही कि उस दिन की हौलनाकी और शिद्दत कितनी अजीम होगी जब कि लोग उस मैदान में जम्अ होंगे, तमाम सितारे बिखर जाएंगे और सूरज व चांद की रोशनी जाइल होने की वज्ह से ज़मीन अन्धेरे में डूब जाएगी और इसी हालत में आसमान अपनी उस तमाम अज़मत के बा वुजूद फट जाएगा, वो आसमान जिस का हुज्म पान सो बरस का सफ़र और जिस के अतराफ़ व अकनाफ़ पर मलाइका तस्बीह में मश्गूल हैं, उस के फटने की हैबतनाक आवाज़ तेरी कुव्वते समाअत पर ज़बरदस्त खौफ़ छोड़ जाएगी और आस्मान ज़र्दी माइल पिघली हुई चांदी की तरह बह जाएगा और सुर्खी माइल तेल जैसा हो जाएगा, आस्मान झड़ी हुई राख की तरह, पहाड़ रूई के गालों की तरह होंगे और बरह्ना पा लोग वहां बिखरे हुवे होंगे। फ़रमाने नबवी है कि लोग नंगे पैर नंगे बदन उठेंगे और अपने पसीने में कान की लौ तक गर्क होंगे।

उम्मुल मोमिनीन हज़रते सौदह रज़ीअल्लाहो अन्हा  ने अर्ज की : या रसूलल्लाह ! कैसा इब्रतनाक मन्ज़र होगा कि हम एक दूसरे को नंगा देखेंगे ! आप ने फ़रमाया : किसी को किसी का होश नहीं होगा।

उस दिन लोग नंगे होंगे मगर कोई किसी की तरफ़ मुतवज्जेह नहीं होगा क्यूंकि लोग मुख़्तलिफ़ सूरतों में चल रहे होंगे, बा’ज़ लोग पेट के बल और बा’ज़ मुंह के बल चलेंगे, उन्हें किसी की तरफ़ तवज्जोह करने का होश ही नहीं होगा।

कियामत के दिन की तीन हालतें ।

हज़रते अबू हुरैरा रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : कियामत के दिन लोग तीन हालतों में होंगे : सवार, पैदल और मुंह के बल चलने वाले, एक शख्स ने पुछा  कि मुंह के बल कैसे चलेंगे? आप ने फरमाया : जो पैरों पर चला सकता है वो मुंह के बल चलाने पर भी कादिर है।

आदमी की तबीअत में इन्कार का माद्दा बहुत है जिस चीज़ को देख नहीं पाता है उस का इन्कार कर देता है चुनान्चे, अगर इन्सान सांप को पेट के बल इन्तिहाई तेज़ रफ्तारी से दौड़ता हुवा न देखता तो ये बात कभी तस्लीम न करता कि पेट के बल दौड़ा और चला जा सकता है, जिन्हों ने पैरों पर किसी को चलते हुवे नहीं देखा होगा उन के लिये ये बात इन्तिहाई हैरत अंगेज़ होगी कि इन्सान सिर्फ पैरों पर चलता है लिहाज़ा तुम दुन्यावी कियास से काम लेते हुवे उख़रवी अजाइबात का इन्कार न करो, पस इस पर कियास कर लो कि अगर तुम ने दुन्या के अजाइबात न देखे होते और तुम्हें इन के मुतअल्लिक बताया जाता तो तुम तस्लीम करने से इन्कार कर देते।

ज़रा अपने दिल में ये सोचो कि जब तुम नंगे, जलीलो रुस्वा, हैरानो परेशान अपने मुतअल्लिक़ अच्छे या बुरे फैसले के मुन्तज़िर होगे तब तुम्हारी क्या हालत होगी !

अर्स ए  महशर की कैफ़िय्यत ।

मख्लूक के इज़दिहाम और भीड़ भाड़ के मुतअल्लिक ज़रा ख़याल करो कि अर्सए महशर में ज़मीनो आस्मान की तमाम मख्लूक फ़िरिश्ते, जिन्न, इन्सान, शैतान, जानवर, दरिन्दे, परन्दे सब जम्अ होंगे, फिर सूरज निकलेगा, उस की गर्मी पहले से दुगनी होगी और उस की हिद्दत तेज़ी  में मौजूदा कमी दूर हो जाएगी, सूरज लोगों के सरों पर एक कमान के फ़ासिले के बराबर आ जाएगा, उस वक्त अशें इलाही के साए के सिवा कहीं साया नहीं होगा और उस के साए में अबरार होंगे, सूरज की शदीद तमाज़त की वज्ह से हर जानदार शदीद दुख और बे पनाह मुसीबत में होगा, लोग एक दूसरे को हटाएंगे ताकि इज़दिहाम कम हो, उस वक्त लोग अल्लाह तआला के हुजूर हाज़िरी के ख़याल से इन्तिहाई शर्मिन्दा और ज़लीलो रुस्वा होंगे उस वक्त सूरज की गर्मी, सांसों की गर्मी, दिलों में पशेमानी की आग और ज़बरदस्त ख़ौफ़ व हिरास तारी होगा और हर एक बाल से पसीना बहना शुरूअ होगा, यहां तक कि वो कियामत के मैदान में पानी की तरह भर जाएगा और उन के जिस्म ब क़दरे गुनाह पसीने में डूबे होंगे बा’ज़ घुटनों तक, बा’ज़ कमर तक, बा’ज़ कानों की लौ तक और बा’ज़ सरापा पसीने में गर्क होंगे।

हज़रते इब्ने उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : लोग अल्लाह की बारगाह में खड़े होंगे यहां तक कि बा’ज़ लोग कानों तक पसीने में डूबे हुवे होंगे।

हज़रते अबू हुरैरा रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : कियामत में लोगों का पसीना सत्तर हाथ ऊंचा हो जाएगा और उन के कानों तक पहुंच जाएगा । इसे बुखारी व मुस्लिम ने रिवायत किया है।

एक और रिवायत है कि लोग चालीस बरस बराबर आस्मान की जानिब टिकटिकी बांधे देखते रहेंगे और शदीद तक्लीफ़ की वज्ह से पसीना उन के मुंह तक पहुंचा हुवा होगा।

हज़रते उक्बा बिन आमिर रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि क़ियामत के दिन सूरज लोगों के इन्तिहाई करीब होगा, लोगों को शदीद पसीना आएगा चुनान्चे, बा’ज़ लोग टखनों तक, बा’ज़ आधी पिन्डली तक, बा’ज़ घुटनों तक, बा’ज़ रानों तक, बा’ज़ कमर तक, बा’ज़ मुंह तक (और आप ने हाथ के इशारे से बतलाया कि उन्हें पसीने की लगाम लगी होगी) और बा’ज़ लोग पसीने में डूब जाएंगे और आप ने सर की तरफ़ इशारा फ़रमाया।

ए कमज़ोर इन्सान जरा क़यामत के रोज़ के पसीने और दुःख दर्द को याद कर और सोच उन में ऐसे लोग भी होंगे जो कहेंगे ऐ अल्लाह! हमें इस मुसीबत से निजात दे अगरचे तू हमें जहन्नम में भेज दे, और तू भी उन्ही में से एक होगा और तुझे मालूम नहीं की तू कहाँ तक पसीने में डूबा होगा.

हर वह इन्सान जिस का हज, जिहाद, रोज़ा, नमाज़, किसी भाई की ज़रुरत पूरी करने नेकी का हुक्म और बुराईयों से मना करने के सिलसिले में पसीना नहीं बहा रहा है क़यामत के दिन शर्मिंदगी और डर की वजह से उस का पसीना बहेगा और बहुत ज्यादा रंज और आलम होगा (की उस से एसा काम सरजद नहीं हुआ है)

अगर इन्सान जहालत और फ़रेब से किनारा काश होकर सोचे तो उसे मालूम होगा की इबादतों में सख्ती बर्दाश्त करना, कियामत के लम्बे सख्त और शदीद दिन के इंतेज़ार और पसीने के अज़ाब से बहुत ही आसान है.

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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