अमानत और तौबा – तौबा के बारे में हदीसें और किस्से

अमानत और तौबा

फजीलते दुरूदे पाक

हज़रते मोहम्मद बिन मुन्कदिर रहमतुल्लाह अलैह  अपने वालिद से रिवायत करते हैं कि हज़रते सुफ्यान सौरी रहमतुल्लाह अलैह  ने तवाफ़े का’बा करते हुवे एक ऐसे जवान को देखा जो कदम कदम पर दुरूद शरीफ़ पढ़ रहा था। सुफ्यान सौरी रहमतुल्लाह अलैह  कहते हैं : मैंने कहा : ऐ जवान ! तुम तस्बीह व तहलील छोड़ कर सिर्फ दुरूद शरीफ़ ही पढ़ रहे हो ? क्या इस की कोई खास वजह है ?

जवान ने पूछा : आप कौन हैं ? मैं ने जवाब दिया : सुफ़्यान सौरी ! उस ने कहा : अगर आप का शुमार अल्लाह तआला के नेक बन्दों में न होता तो मैं कभी भी आप को येह राज़ न बताता ! हुवा यूं कि मैं अपने वालिद के हमराह हज के इरादे से निकला, रास्ते में एक जगह मेरे वालिद सख़्त बीमार हो गए, मैंने बहुत कोशिश की मगर उन्हें  मौत से न बचा सका, मौत के बाद उन का चेहरा सियाह हो गया, मैंने “इन्ना लिल्लाहे व इन्ना इलैहे राजेऊन”  पढ़ कर उन का चेहरा ढक दिया,

इसी गम की कैफ़ियत में मेरी आंखें बोझल हो गई और मुझे नींद आ गई । ख्वाब में मैंने एक ऐसे हसीन को देखा जो हुस्न में बे मिसाल था, उस का लिबास नफासत का आईनादार था और उस के वुजूदे मसऊद से खुश्बू की लपटें उठ रही थीं, वह नाजुक खिरामी के साथ आया और मेरे वालिद के चेहरे से कपड़ा हटा कर हाथ से चेहरे की तरफ इशारा किया मेरे वालिद  का चेहरा सफ़ेद हो गया जब वोह वापस तशरीफ़ ले जाने लगे तो मैंने दामन थाम कर अर्ज की : अल्लाह तआला ने आप के तुफैल इस गरीबुल वतनी में मेरे वालिद  की आबरू रख ली, आप कौन हैं ?

उन्हों ने फ़रमाया : तुम मुझे नहीं पहचानते ? मैं साहिबे कुरआन अल्लाह का नबी मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह हूं (स.अ .व.) तेरा बाप अगर्चे बहुत गुनहगार था मगर मुझ पर कसरत से दुरूद भेजता था, जब इस पर मुसीबत नाज़िल हो गई तो इस ने मुझ से मदद तलब की और मैं हर उस शख्स का जो मुझ पर कसरत से दुरूद भेजता है, फ़रयाद-रस हूं। जवान ने कहा : इस के बाद अचानक मेरी आंख खुल गई, मैं ने देखा मेरे वालिद का चेहरा सफेद हो चुका था।

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हज़रते अम्र बिन दीनार रहमतुल्लाह अलैह  अबू जा’फ़र रहमतुल्लाह अलैह  से रिवायत करते हैं कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम   ने फ़रमाया : “जो मुझ पर दुरूद भेजना भूल गया, उस ने जन्नत का रास्ता खो दिया”

अमानत का मतलब

‘अमानत’ अम्न से माखूज़ है और कोई शख्स हक़ को छोड़ कर मामून नहीं रहता, अमानत का उल्टा खियानत है जो खौन से मुश्तक है जिस का माना है कम करना, क्यूंकि जब तुम किसी चीज़ में खियानत करोगे तो उस में कमी वाकेअ हो जाएगी।

 

अमानत के बारे में इरशादाते नबवी

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम  का इरशाद है कि “धोका, फ़रेब और खियानत, जहन्नमियों का शेवा है”

मजीद इरशाद फरमाया कि “जिस ने लोगों के साथ मुआमलात में ज़ुल्म नहीं किया और उन से झूटी बातें नहीं कहीं, उस की मुरादें मुकम्मल हो गई, अदालत जाहिर हो गई और उस से भाईचारा रखना ज़रूरी हो गया”.

एक आ’राबी, कौम की तारीफ़ में कहता है : वह अमीन हैं किसी के साथ धोका नहीं करते, किसी मुसलमान की हुरमत को पामाल नहीं करते और उन के जिम्मे किसी का हक़ बाकी नहीं है, वह बेहतरीन कौम हैं।

आ’राबी के ममदूहीन गुज़र चुके हैं, अब तो इन्सानी लिबास में भेड़िये फिरते हैं, जैसे किसी ने कहा है :

.उस शख्स के लिये जो इन्सान पर उस की इनाबतों (खुदा की तरफ रुजु करना) के बा वुजूद भरोसा करता है तो फिर इज्जत दार आज़ाद शख्स के लिये ठिकाना कहां रहेगा। …चन्द लोगों को छोड़ कर बाकी सब इन्सानी लिबास में भेड़िये हैं।

एक और शाइर कहता है :….वोह लोग चले गए जिन के चले जाने पर कहा जाता था, काश ! यह शहर वीरान हो जाते और कियामत आ जाती।

हज़रते हुजैफ़ा रज़ीअल्लाहो अन्हो  से मरवी है, हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम  ने फ़रमाया कि “अन करीब अमानत उठा ली जाएगी, लोग बाहम तिजारत करेंगे मगर अमीन कोई नहीं होगा यहां तक कि कहा जाएगा : फुलां कबीले में फुलां आदमी अमीन है,” (या’नी अमीन आदमी ढूंडने से भी नहीं मिलेगा।)

तौबा का वुजूब

तौबा का वुजूब आयाते कुरआनी और अहादीस से साबित है, फ़रमाने इलाही है :

इस आयत में अल्लाह तआला ने मोमिनों को हुक्म दिया है कि वो तौबा करें ताकि उन को फलाह मयस्सर हो । दूसरी आयत में है :

लफ्जे नसूह “नस्ह” से माखूज़ है जिस के मा’ना हैं खालिसतन अल्लाह के लिये तौबा करना जो तमाम उयूब से पाक हो ।

तौबा की फ़ज़ीलत अल्लाह तआला के इस फरमान से साबित होती है :

 “बेशक अल्लाह तआला तौबा करने वालों और पाक रहने वालों को महबूब रखता हैऔर फ़रमाने नबी सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम है,“तौबा करने वाला अल्लाह का दोस्त है, और तौबा करने वाला उस इन्सान की तरह है जिस ने कोई गुनाह न किया हो”।

तौबा के बारे में इरशादाते नबविय्या स.अ.व. (हदीस ए पाक )

फ़रमाने नबवी है कि “रहमते खुदावन्दी को उस इन्सान की तौबा से ज़ियादा मसर्रत होती है जो हलाकत खैज़ ज़मीन में अपनी सुवारी पर खाने पीने का सामान लादे सफ़र कर रहा हो और वहां आराम की गरज से रुक जाए, वोह सर रखे तो उसे नींद आ जाए, जब सो कर उठे तो उस की सुवारी मअसामान के गाइब हो और वोह उस की जुस्त्जू में निकले यहां तक कि शिद्दते गर्मी और प्यास से बदहाल हो कर उसी जगह वापस आ जाए जहां वोह पहले सोया था और मौत के इन्तिज़ार में अपने बाजू का तक्या बना कर लैट जाए, अब जो वोह जागा तो उस ने देखा कि उस की सुवारी मअ-सामान उस के करीब मौजूद है। अल्लाह तआला को बन्दे की तौबा से उस सुवारी वाले शख्स से भी जियादा खुशी होती है जिस का सामान जागने के बाद उस को मिल गया है।”

हज़रते हसन रज़ीअल्लाहो अन्हो  से मरवी है कि जब अल्लाह तआला ने हज़रते आदम अलैहिस्सलाम की तौबा क़बूल फ़रमाई तो फ़िरिश्तों ने उन्हें मुबारक बाद पेश की, जिब्रील व मीकाईल अलैहिस्सलाम  हाज़िर हुवे और कहा : ऐ आदम ! आप ने तौबा कर के अपनी आंखों को ठन्डा कर लिया । आदम अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया : अगर इस तौबा की क़बूलिय्यत के बाद रब से फिर सुवाल करना पड़ा तो क्या होगा? अल्लाह तआला ने आदम अलैहिस्सलाम पर वह्यी नाज़िल फ़रमाई कि “ऐ आदम ! तू ने अपनी औलाद को मेहनत और दुख तक्लीफ़ का वारिस बनाया और हम ने उन्हें तौबा बख़्शी, जो भी मुझे पुकारेगा मैं तेरी तरह उस की पुकार को सुनूंगा, जो मुझ से मगफिरत का सवाल करेगा मैं उसे ना उम्मीद नहीं करूंगा क्यूंकि मैं करीब हूं, दुआओं को कबूल करने वाला हूं, मैं तौबा करने वालों को उन की कब्रों से इस तरह उठाऊंगा कि वोह हंसते मुस्कुराते हुवे आएंगे, उन की दुआएं मक़बूल होंगी”.

फ़रमाने नबवी सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम है : “अल्लाह तआला का दस्ते रहमत रात के गुनहगारों के लिये सुब्ह तक और दिन के गुनहगारों के लिये रात तक दराज़ रहता है उस वक्त तक कि जब मग़रीब से सूरज तुलूअ होगा और तौबा का दरवाज़ा बन्द हो जाएगा। (या’नी क़ियामत तक अल्लाह तआला बन्दों की तौबा क़बूल फ़रमाएगा।)

रसूले खुदा सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का इरशादे गिरामी है कि “अगर तुम ने आसमान के बराबर गुनाह कर लिये और फिर शर्मिन्दा हो कर तौबा कर ली तो अल्लाह तआला तुम्हारी तौबा कबूल कर लेगा”.

फ़रमाने नबवी सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम है, “आदमी गुनाह करता है फिर उसी गुनाह के सबब जन्नत में दाखिल होता है पूछा गया : हुजूर वोह कैसे ? आप ने फ़रमाया : गुनाह के बाद फ़ौरन उस की आंखें बारगाहे रब्बुल इज्जत में अश्कबार हो जाती हैं”

फ़रमाने हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम है कि “नदामत गुनाहों का कफ्फारा है”

नबिय्ये करीम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम का इरशादे गिरामी है : गुनाहों से तौबा करने वाला ऐसा है जैसे उस ने कोई गुनाह न किया हो।

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम   की ख़िदमत में एक हबशी हाज़िर हुवा और अर्ज की : या रसूलल्लाह ! मैं खताएं करता हूं, क्या मेरी तौबा क़बूल होगी ? आप ने फ़रमाया : हां ! वोह कुछ दूर जा कर वापस लौट आया और दरयाफ़्त किया कि जब मैं गुनाह करता हूं तो अल्लाह तआला देखता है ? आप ने इरशाद फ़रमाया : हां ! हबशी ने इतना सुनते ही एक चीख मारी और उस की रूह परवाज़ कर गई ।

जिन्दगी के आखिरी सांस तक तौबा कबूल होगी

रिवायत है कि जब अल्लाह तआला ने इब्लीस को मलऊन करार दिया तो उस ने कियामत तक के लिये मोहलत मांगी, अल्लाह ने उसे मोहलत दे दी तो वोह कहने लगा : मुझे तेरे इज्जतो जलाल की कसम ! जब तक इन्सान की ज़िन्दगी का रिश्ता काइम रहेगा मैं उसे गुनाहों पर उक्साता रहूंगा, रब्बुल इज्जत ने फ़रमाया : मुझे अपने इज्जतो जलाल की कसम ! मैं उन की ज़िन्दगी की आखिरी सांसों तक उन के गुनाहों पर तौबा का पर्दा डालता रहूंगा”

फ़रमाने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम  है : “नेकियां गुनाहों को इस तरह दूर ले जाती हैं जैसे पानी मेल को बहा ले जाता है”(दूर कर देता है)।

हज़रते सईद बिन मुसय्यिब रज़ीअल्लाहो अन्हो  से मरवी है कि यह आयत

उस शख्स के बारे में नाज़िल हुई जो गुनाह करता फिर तौबा कर लेता फिर गुनाह करता और फिर तौबा कर लेता था।

हज़रते फुजैल रहमतुल्लाह अलैह  का क़ौल है : रब्बे जुल जलाल का इरशाद है : गुनहगारों को बशारत दे दो, अगर वोह तौबा करें तो मैं कबूल कर लूंगा, सिद्दीक़ीन को मुतनब्बेह कर दीजिये अगर मैं ने आ’माल का वज़्न किया तो उन्हें अज़ाब से कोई नहीं बचा सकता।

हज़रते अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो  का इरशाद है : जो गुनाहों की याद में पशेमान हो गया और उस का दिल खौफे खुदा से कांप गया, उस के गुनाहों को मिटा दिया जाता है।

 

तौबा का दरवाज़ा कभी बन्द नहीं होता

हज़रते इब्ने मसऊद रज़ीअल्लाहो अन्हो  से एक शख्स ने दरयाफ्त किया : मैं गुनाह कर के इन्तिहाई शर्मिन्दा हूं, मेरे लिये तौबा है ? आप ने मुंह फेर लिया, जब दोबारा उस शख्स की तरफ़ देखा तो आप की आंखों से आंसू रवां थे, फ़रमाया : जन्नत के आठ दरवाज़े हैं, खोले भी जाते हैं और बन्द भी किये जाते हैं सिवाए बाबे तौबा के, वोह कभी भी बन्द नहीं होता और इसी काम के लिये उस पर एक फरिश्ता मामूर है। अमल करता रह और रब की रहमत से ना उम्मीद न हो।

रिवायत है कि बनी इस्राईल में से एक जवान शख्स ने बीस साल मुतवातिर अल्लाह तआला की इबादत की, फिर बीस साल गुनाहों में बसर किये, एक मरतबा आईना देखा तो उसे दाढ़ी में बुढ़ापे के आसार नज़र आए, वोह बहुत गमगीन हुवा और बारगाहे रब्बुल इज्जत में गुज़ारिश की : ऐ रब्बे जुल जलाल ! मैं ने बीस साल तेरी इबादत की, फिर बीस साल गुनाहों में बसर किये, अब अगर मैं तेरी तरफ़ लौट आऊं तो मुझे कबूल कर लेगा? उस ने हातिफ़े गैबी की आवाज़ सुनी, वोह कह रहा था : तू ने हम से महब्बत की, हम ने तुझे महबूब बनाया, तू ने हमें छोड़ दिया हम ने तुझे छोड़ दिया, तू ने गुनाह किये हम ने मोहलत दे दी, अब अगर तू हमारी बारगाह में लौटेगा तो हम तुझे शरफे कबूलिय्यत बख्शेंगे।

तौबा के बारे में सरवरे कोनेन सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम  का इरशादे गिरामी

 हज़रते इब्ने अब्बास रज़ीअल्लाहो अन्हो  से मरवी है कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम  ने फ़रमाया “जब बन्दा तौबा करता है, अल्लाह तआला उस की तौबा कबूल कर लेता है, मुहाफ़िज़ फ़िरिश्ते उस के माज़ी (past)  के गुनाहों को भूल जाते हैं, उस के आजा ए जिस्मानी (शरीर के अंग) उस की खताओं को भूल जाते हैं, जमीन का वोह टुकड़ा जिस पर उस ने गुनाह किया है और आसमान का वो हिस्सा जिस के नीचे उस ने गुनाह किया है उस के गुनाहों को भूल जाते हैं, जब वह कियामत के दिन आएगा तो उस के गुनाहों पर गवाही देने वाला कोई नहीं होगा”.

हज़रते अली रज़ीअल्लाहो अन्हो  से मरवी है हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम  ने फ़रमाया कि “मख्लूक की पैदाइश से चार हजार बरस क़ब्ल अर्श के चारों तरफ़ लिख दिया गया था कि “जिस ने तौबा की और ईमान लाया और नेक अमल किये मैं उसे बख्शने वाला हूं”. सगीरा और कबीरा तमाम गुनाहों से तौबा फ़र्जे ऐन है क्यूंकि सगीरा गुनाहों पर इस्रार उन्हें कबीरा गुनाह बना देता है।

तौबए नसूह यह है कि इन्सान ज़ाहिरो बातिन से तौबा करे और आगे गुनाह न करने का पक्का इरादा करे, जो शख्स ज़ाहिरी तौर पर तौबा करता है उस की मिसाल ऐसे मुर्दार की है जिस पर रेशम व कम ख्वाब की चादरें डाल दी गई हों, और लोग उसे हैरत व इस्ति’जाब से देख रहे हों, जब उस से चादरें हटा ली जाएं तो लोग मुंह फेर कर चल दें, इसी तरह लोग इबादते रियाई करने वालों को तअज्जुब की निगाह से देखते रहते हैं लेकिन कियामत का दिन होगा तो इन के फ़रेब का पर्दा चाक कर दिया जाएगा और फरिश्ते मुंह फेर कर चल देंगे चुनान्चे, रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम   ने इरशाद फ़रमाया : अल्लाह तआला तुम्हारी सूरतों को नहीं देखता बल्कि तुम्हारे दिलों को देखता है”.

हज़रते इब्ने अब्बास रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है : क़ियामत के दिन बहुत से लोग ऐसे होंगे जो खुद को ताइब समझ कर आएंगे मगर उन की तौबा क़बूल नहीं हुई होगी इस लिये कि उन्हों ने तौबा के दरवाजे को शर्मिन्दगी से मुस्तहकम नहीं किया होगा, तौबा के बाद गुनाह न करने का अज्म नहीं किया होगा, गुनाहों को अपनी पूरी  ताकत से दूर नहीं किया होगा और आसान उमूर के जवाज़ के सिलसिले में जो काम उन्हों ने किये हैं और उन से तलबे मगफिरत में उन्हों ने कोई एहतिमाम नहीं किया और उन के लिये येह बात आसान है कि अल्लाह तआला उस से राजी हो जाए

गुनाहों को भूल जाना बहुत खतरनाक बात है, हर अक्लमन्द के लिये ज़रूरी है कि वह अपने नफ्स का मुहासबा करता रहे और अपने गुनाहों को न भूले।

(1)…..ऐ गुनाहों को शुमार करने वाले मुजरिम ! अपने गुनाहों को मत भूल और गुज़श्ता गलतियों को याद करता रह। (2)……मौत से पहले अल्लाह तआला की तरफ़ रुजूअ कर ले, गुनाहों से रुक जा और गलतियों का ए’तिराफ़ कर ले।

फ़क़ीह अबुल्लैस रहमतुल्लाह अलैह से मरवी है : हज़रते उमर रज़ीअल्लाहो अन्हो एक मरतबा हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम  की खिदमत में रोते हुवे हाज़िर हुवे, आप ने दरयाफ्त फ़रमाया कि ऐ उमर ! क्यूं रोते हो ? अर्ज की : हुजूर ! दरवाजे पर खड़े हुवे जवान की गिर्या व ज़ारी ने मेरा जिगर जला दिया है। आप सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम   ने फ़रमाया : उसे अन्दर बुलाओ ! जब जवान हाज़िरे खिदमत हुवा तो आप सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम   ने पूछा : ऐ जवान ! तुम किस लिये रो रहे हो ?

अर्ज की : हुजूर मैं अपने गुनाहों की कसरत और रब्बे जुल जलाल की नाराजी के ख़ौफ़ से रो रहा हूं। आप ने पूछा : क्या तू ने शिर्क किया है ? कहा : नहीं या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम  ,

आप ने दोबारा पूछा : क्या तू ने किसी को ना हक़ क़त्ल किया है ? अर्ज किया : नहीं या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम  ! आप ने इरशाद फ़रमाया : अगर तेरे गुनाह सातों आस्मानों, जमीनों और पहाड़ों के बराबर हों तब भी अल्लाह तआला अपनी रहमत से बख़्श देगा।

जवान बोला : या रसूलल्लाह ! मेरा गुनाह इन से भी बड़ा है, आप ने फ़रमाया : तेरा गुनाह बड़ा है या कुरसी ? अर्ज की : मेरा गुनाह, आप ने फ़रमाया : तेरा गुनाह बड़ा है या अर्शे इलाही ? अर्ज की : मेरा गुनाह, आप ने फ़रमाया तेरा गुनाह बड़ा है या रब्बे जुल जलाल ! अर्ज की रब्बे जुल जलाल बहुत अज़ीम है। हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम   ने फ़रमाया : बिला शुबा जुर्मे अज़ीम को रब्बे अजीम ही मुआफ़ फ़रमाता है। फिर आप ने फ़रमाया : तुम मुझे अपना गुनाह तो बतलाओ, अर्ज की : हुजूर मुझे आप के सामने अर्ज करते हुवे शर्म आती है, आप ने फ़रमाया : कोई बात नहीं तुम बतलाओ ! अर्ज की : हुजूर मैं सात साल से कफ़न चोरी कर रहा हूं, अन्सार की एक लड़की फ़ौत हो गई तो मैं उस का कफ़न चुराने जा पहुंचा, मैं ने कब्र खोद कर कफ़न ले लिया और चल पड़ा, कुछ ही दूर गया था कि मुझ पर शैतान गालिब आ गया और मैं उलटे कदम वापस पहुंचा और लड़की से बदकारी की । मैं गुनाह कर के अभी चन्द ही कदम चला था कि लड़की खड़ी हो गई और कहने लगी : ऐ जवान, ख़ुदा तुझे गारत करे तुझे उस निगहबान का खौफ़ नहीं आया जो हर मज़लूम को ज़ालिम से उस का हक़ दिलाता है, तू ने मुझे मुर्दो की जमाअत से बरह्ना कर दिया और दरबारे खुदावन्दी में नापाक कर दिया है, हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम   ने जब येह सुना तो फ़रमाया : दूर हो जा ! ऐ बद बख़्त ! तू नारे जहन्नम का मुस्तहिक है।

जवान वहां से रोता हुवा और अल्लाह तआला से इस्तिगफार करता हुवा निकल गया। जब उसे इसी हालत में चालीस दिन गुज़र गए और उस ने आस्मान की तरफ़ निगाह की और कहा : ऐ मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम   व आदम अलैहिस्सलाम  व इब्राहीम अलैहिस्सलाम  के रब ! अगर तू ने मेरे गुनाह को बख्श दिया है तो हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम   और आप के सहाबा को मुत्तलअ फ़रमा वगरना आसमान से आग भेज कर मुझे जला दे और जहन्नम के अज़ाब से बचा ले । उसी वक़्त हज़रते जिब्रील अलैहिस्सलाम  आप की खिदमत में हाज़िर हुवे और कहा : आप का रब आप को सलाम कहता है

और पूछता है कि मख्लूक को तुम ने पैदा किया है ? आप ने फ़रमाया : नहीं बल्कि मुझे और तमाम मख्लूक को अल्लाह ने पैदा किया है और उसी ने रिज्क दिया है, तब जिब्रील ने कहा : अल्लाह तआला फ़रमाता है मैं ने जवान की तौबा कबूल कर ली है । पस हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम  ने जवान को बुला कर उसे तौबा की कबूलिय्यत का मुज़दा सुनाया।

एक दर्द अंगेज़ तौबा

हज़रते मूसा अलैहिस्सलाम के ज़माने में एक शख्स ऐसा था जो अपनी तौबा पर कभी कायम नहीं रहता था, जब भी वोह तौबा करता उसे तोड़ देता यहां तक कि उसे इस हाल में बीस साल गुज़र गए। अल्लाह तआला ने हज़रते मूसा . की तरफ़ वह्यी की, मेरे उस बन्दे को कह दो मैं तुझ से सख्त नाराज़ हूं, जब हज़रते मूसा ने उस आदमी को अल्लाह का पैगाम दिया तो वोह बहुत गमगीन हुवा और बयाबानों की तरफ़ निकल गया, वहां जा कर बारगाहे रब्बुल इज्जत में अर्ज की : ऐ रब्बे जुल जलाल ! तेरी रहमत जाती रही या मेरे गुनाहों ने तुझे दुख दिया ? तेरी बख्शिश के खजाने ख़त्म हो गए या बन्दों पर तेरी निगाहे करम नहीं रही ? तेरे अफ्वो दर गुज़र से कौन सा गुनाह बड़ा है ? तू करीम है, मैं बख़ील हूं, क्या मेरा बुख़्ल तेरे करम पर गालिब आ गया है ? अगर तू ने अपने बन्दों को अपनी रहमत से महरूम कर दिया तो वोह किस के दरवाजे पर जाएंगे ? अगर तू ने उन्हें रांदए दरगाह कर दिया तो वोह कहां जाएंगे ? ऐ रब्बे कादिरो कहार ! अगर तेरी बख्शिश जाती रही और मेरे लिये अज़ाब ही रह गया है तो तमाम गुनाहगारों का अज़ाब मुझे दे दे, मैं उन पर अपनी जान कुरबान करता हूं। अल्लाह तआला ने मूसा अलैहिस्सलाम से फ़रमाया : जाओ और मेरे बन्दे से कह दो कि तू ने मेरे कमाले कुदरत और अपवो दर गुज़र की हक़ीक़त को समझ लिया है, अगर तेरे गुनाहों से ज़मीन पुर हो जाए तब भी मैं बख़्श दूंगा।

रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम  का इरशाद है कि अल्लाह तआला को गुनहगार तौबा करने वाले की आवाज़ से ज़ियादा महबूब और कोई आवाज़ नहीं है, जब वोह अल्लाह कह कर बुलाता है तो रब तआला फ़रमाता है : मैं मौजूद हूं, जो चाहे मांग ! मेरी बारगाह में तेरा रुतबा मेरे बा’ज़ फरिश्तों के बराबर है, मैं तेरे दाएं, बाएं, ऊपर हूं और तेरी धड़कन से ज़ियादा करीब हूं, ऐ फरिश्तो ! तुम गवाह हो जाओ कि मैं ने उसे बख़्श दिया”.

अल्लाह तआला के बहुत से ऐसे बन्दे हैं

हज़रते जुन्नून मिस्री रहमतुल्लाह अलैह  ने कहा है : अल्लाह तआला के बहुत से ऐसे बन्दे हैं जिन्हों ने ख़ताओं के पौधे लगाए, इन्हें तौबा का पानी दिया और हसरतो नदामत का फल खाया, वह दीवानगी के बिगैर दीवाने कहलाए और बिगैर किसी मशक्कत के लज्जतें हासिल कीं, वह लोग अल्लाह और उस के रसूल सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम  की मा’रिफ़त रखने वाले फ़सीहो बलीग हज़रात हैं और अदीमुन्नज़ीर हैं, उन्हों ने महब्बत के जाम पिये और मसाइब पर सब्र करने की दौलत से माला माल हुवे फिर आलमे मलकूत में उन के दिल गमज़दा हो गए और आलमे जबरूत के हिजाबात की सैर ने उन के अफ़कार को जिला बख़्शी, उन्हों ने नदामत के खैमों में बसेरा किया, अपनी खताओं के सहीफ़ों को पढ़ा और गिर्या व ज़ारी में मश्गूल हो गए, यहां तक कि वोह अपनी परहेज़गारी की बदौलत ज़ोह्द के आ’ला मरातिब पर फ़ाइज़ हुवे उन्हो ने तर्के दुन्या की तल्खी को शीरीं समझा और सख़्त बिस्तरों को इन्तिहाई नर्म जाना ताआंकि उन्हों ने राहे नजात और सलामती की बुन्यादों को पा लिया, उन की अरवाह को बिहिश्त के बागों में जगह मिली और अबदी ज़िन्दगी के मुस्तहिक करार पाए, उन्हों ने आहो बुका की खन्दकों को पाट दिया और ख्वाहिशात की पुलों को उबूर कर गए यहां तक कि वोह इल्म के हमसाए हुवे और हिक्मत व दानाई के तालाब से सैराब हुवे, वोह फ़मो फ़िरासत की किश्तियों में सवार हुवे, उन्हों ने सलामती के दरया में नजात की दौलत से कल्ए बनाए और राहत के बागात और इज्जतो करामत के ख़ज़ानों के मालिक बन गए।

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