ज़िन्दगी और कायनात पर गौर और फ़िक्र करना

जिन्दगी के बारे में गौरो फिक्र

(हुज्जतुल इस्लाम इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ. की किताब मुकाशफतुल क़ुलूब से हिंदी अनुवाद)

अल्लाह तआला ने कुरआने मजीद में बहुत से मकामात पर इन्सान को गौरो फ़िक्र करने का हुक्म दिया है चुनान्चे, फ़रमाने इलाही है :

बेशक ज़मीनो आस्मान की पैदाइश और रात दिन के इख़्तिलाफ़ में (अहले बसीरत के लिये निशानियां हैं)।

या’नी रात दिन के एक दूसरे के पीछे आने जाने में अक्लमन्दों के लिये गौरो फ़िक्र की दा’वत है क्यूंकि ज्यों ही एक जाता है, दूसरा आ जाता है, चुनान्चे, इरशादे इलाही है :

अल्लाह तआला वो है जिस ने रात और दिन को एक दूसरे के पीछे आने वाला कर दिया है। हज़रते अता रहमतुल्लाह अलैह का कौल है कि पहली आयत में इख़्तिलाफ़ से मुराद नूर व जुल्मत, कमी और ज़ियादती है। किसी ने क्या खूब कहा है :

(1)….ऐ रात के इब्तिदाई हिस्से में खुश खुश सोने वाले ! कभी सुब्ह को मसाइब भी नाज़िल हो जाया करते हैं। (2.)…..रात के पहले पहर की पाकीज़गी से खुश न हो, रात के बहुत से आख़िरी हिस्से जहन्नम के शो’लों को भड़का देते हैं।

दूसरा शाइर कहता है:

.बेशक रातें लोगों की मन्ज़िल हैं  (2)…..छोटी रातें गमों की वज्ह से तवील हो जाती हैं और तवील रातें मसर्रत की वज्ह से छोटी मा’लूम होती हैं।

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ऊलुल अल बाब कौन हैं

और अल्लाह तआला ने गौरो फ़िक्र करने वालों की तारीफ़ की,

चुनान्चे, फ़रमाने इलाही है :  यह वो लोग हैं जो खड़े हुवे बैठे हुवे और पहलू के बल लैटे हुवे अल्लाह को याद करते हैं और जमीनो आसमान की पैदाइश में गौरो फ़िक्र करते हैं (और कहते हैं) ऐ हमारे परवरदिगार तू ने इन को बे फाइदा पैदा नहीं किया।

 

जाते बारी ता आला में गौरो फ़िक्रकी मुमानअत। अल्लाह की ज़ात में गौरो फ़िक्र न करो

हज़रते इब्ने अब्बास रज़ीअल्लाहो अन्हो से मरवी है कि कुछ लोगों ने अल्लाह तआला की जातो सिफ़ात में गौरो फ़िक्र किया तो हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया : “मख्लूके खुदा के अहवाल में गौरो फ़िक्र करो, अल्लाह की ज़ात में गौरो फ़िक्र न करो क्यूंकि तुम उस की बे मिसाल कुदरत पर कादिर नहीं हो सकते ।”

हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से मरवी है कि एक दिन आप एक ऐसी जमाअत के पास गए जो गौरो फ़िक में डूबी हुई थी, आप ने पूछा : क्या बात है तुम बोलते क्यूं नहीं हो? उन्हों ने जवाब दिया : हम अल्लाह तआला के बारे में गौरो फ़िक्र कर रहे हैं, आप ने फ़रमाया : अच्छा ! लेकिन मख्लूके खुदा में गौरो फ़िक्र करो, खालिके काइनात की ज़ात में गौरो फ़िक मत करो, फिर आप ने फ़रमाया : मगरिब में एक सफ़ेद बर्राक नूरानी ज़मीन है, सूरज का वहां तक चालीस दिनों का सफ़र है, वहां अल्लाह तआला ने एक मख्लूक पैदा फ़रमाई है, वो जब से पैदा हुवे हैं उन्हों ने एक लम्हा भी अल्लाह तआला की ना फ़रमानी नहीं की, लोगों ने पूछा : हुजूर ! उन में शैतान का गुज़र नहीं है ?

आप ने फ़रमाया : उन्हें शैतान की पैदाइश का इल्म ही नहीं, पूछा गया : वो आदम की औलाद में से हैं ? आप ने फ़रमाया : उन्हें तो आदम अलैहहिस्सलाम  की पैदाइश का भी इल्म नहीं है।

हज़रते अता रहमतुल्लाह अलैह से मरवी है कि एक दिन मैं और उबैद बिन उमैर हज़रते आइशा रज़ीअल्लाहो अन्हा  की खिदमत में हाज़िर हुवे, आप के और हमारे दरमियान पर्दा पड़ा हुवा था, उन्हों ने पूछा : उबैद ! तुम हमारी मुलाकात को क्यूं नहीं आते ? उबैद ने कहा : मैं हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम के इस फरमान की वज्ह से देर से हाज़िर होता हूं कि हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया है

– ताख़ीर से मुलाकात करो, महब्बत बढ़ेगी । इब्ने उमैर बोले : आप हमें हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम से मुशाहदा की हुई मुन्फरिद बातों से कोई मुन्फरिद बात बतलाएं । हज़रते आइशा रज़ीअल्लाहो अन्हा रो पड़ी और फ़रमाया : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम की हर बात मुन्फरिद थी।

एक मरतबा हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम रात को मेरे यहां तशरीफ़ लाए और मेरे साथ आराम फ़रमा हुवे, थोड़ी देर के बाद फ़रमाया कि मुझे इजाज़त दो ताकि मैं अल्लाह तआला की इबादत करूं । चुनान्चे, आप एक मश्कीजे की तरफ़ गए, वुजू फ़रमाया और नमाज़ में खड़े हो गए। नमाज़ शुरूअ करते ही आप ने रोना शुरू किया यहां तक कि आप की मुबारक दाढ़ी आंसूओं से तर हो गई, फिर सजदा किया यहां तक कि रोते रोते ज़मीन गीली हो गई, सलाम के बाद आप पहलू के बल लैट गए ता आकी   हज़रते बिलाल रज़ीअल्लाहो अन्हो ने सुब्ह की अजान दे दी और आप को नमाज़ के लिये बुलाया और अर्ज की : या रसूलल्लाह ! आप किस लिये रोते हैं हालांकि अल्लाह तआला ने आप के सबब आप के अगलों और पिछलों की खताएं मुआफ़ फ़रमाई। आप ने फ़रमाया : अफ्सोस ! बिलाल तुम मुझे रोने से रोकते हो हालांकि अल्लाह तआला ने आज की रात मुझ पर यह आयत नाज़िल फ़रमाई है :  “बेशक ज़मीनो आसमान की पैदाइश और रात दिन के इख़्तिलाफ़ में अक्लमन्दों के लिये निशानियां हैं”। फिर इरशाद फ़रमाया : उस शख्स पर अफ्सोस है ! जिस ने यह आयत पढ़ी और इस में गौरो फ़िक्र नहीं किया।

इमाम औज़ाई रज़ीअल्लाहो अन्हो से पूछा गया कि इन आयात में गौरो फ़िक्र करने से क्या मुराद है ? तो उन्हों ने जवाब दिया : इन आयात को पढ़ो और फिर इन्हें समझने की कोशिश करो।

मुहम्मद बिन वासेअ रहमतुल्लाह अलैह से मरवी है कि बसरा का एक शख्स हज़रते अबू ज़र रज़ीअल्लाहो अन्हो की वफ़ात के बाद उन की ज़ौजए मोहतरमा की खिदमत में हाज़िर हुवा और उन से हज़रते अबू ज़र रज़ीअल्लाहो अन्हो की इबादत के मुतअल्लिक पूछा । उन की बीवी ने जवाब दिया कि वो सारा दिन घर के कोने में बैठे गौरो फ़िक्र किया करते थे।

हज़रते हसन रहमतुल्लाह अलैह का कौल है कि एक लम्हे का गौरो फ़िक्र रात भर की इबादत से बेहतर है, हज़रते फुजेल का कौल है कि गौरो फ़िक्र एक आईना है जो तुझे तेरी नेकियां और बुराइयां दिखाता है।

हज़रते इब्राहीम रहमतुल्लाह अलैह से कहा गया कि आप बहुत ज़ियादा गौरो फ़िक्र करते हैं, उन्हों ने कहा कि गौरो फ़िक्र अक्ल का मगज़ है।

हज़रते सुफयान बिन उयैनाह रहमतुल्लाह अलैह शाइर के इस शे’र को अक्सर बतौरे तमसील पेश किया करते थे :

जब आदमी में गौरो फ़िक करने का माद्दा हो तो उसे हर चीज़ में इब्रतें नज़र आती हैं।

 

हजरते ईसा का हवारियों को जवाब

हज़रते ताऊस रहमतुल्लाह अलैह से मरवी है कि हवारियों ने हज़रते ईसा अलैहहिस्सलाम  से कहा कि आज रूए ज़मीन पर आप जैसा कोई और भी है ? आप ने फ़रमाया : जिस का बोलना ज़िक्रे इलाही में हो, जिस की ख़ामोशी गौरो फ़िक्र में और जिस की निगाह, निगाहे इब्रत हो, वो मुझ जैसा है।

हज़रते हसन रहमतुल्लाह अलैह का क़ौल है कि जिस शख्स की गुफ्तगू हकीमाना नहीं वो लग्व है, जिस की ख़ामोशी गौरो फ़िक्र की ख़ामोशी नहीं है वो भूल है और जिस की निगाह, निगाहे इब्रत नहीं वो बेहूदा है।

फ़रमाने इलाही है :

अलबत्ता मैं अपनी निशानियों से ज़मीन पर नाहक तकब्बुर करने वालों को फेर दूंगा।

हज़रते हसन रहमतुल्लाह अलैह कहते हैं कि इस आयत के मा’ना यह हैं कि मैं उन के दिलों में गौरो फ़िक्र करने की सलाहिय्यत ही नहीं रहने दूंगा।

हज़रत अबू सईद खुदरी रज़ीअल्लाहो अन्होसे मरवी है : हुजूर सल्लल्लाहो अलैह व सल्लम ने फ़रमाया कि अपनी आंखों को इबादत का हिस्सा दो, अर्ज की गई : हुजूर ! इन का इबादत से क्या हिस्सा है ? आप ने इरशाद फ़रमाया : कुरआने मजीद को देखना, उस में गौरो फ़िक्र करना और उस के अजाइबात में सबक हासिल करने वाली निगाह से गौरो ख़ौज़ करना ।

मक्कए मुअज्जमा के करीब जंगल में रहने वाली औरत से मरवी है उस ने कहा : अगर नेकों के दिल गौरो फ़िक्र में डूब कर गैब के पर्दों में पोशीदा उन इन्आमात को देख लें जिन को अल्लाह तआला ने उन के लिये तय्यार किया है तो उन की दुन्यावी ज़िन्दगी उन पर भारी हो जाए और दुन्या उन की नज़रों में बिल्कुल हक़ीर हो जाए।

हज़रते लुक्मान अलैहहिस्सलाम  तन्हाई में बैठ कर बहुत देर तक गौरो फ़िक्र में डूबे रहते, उन का ख़ादिम वहां से गुज़रता और कहता कि आप हमेशा तन्हा बैठे रहते हैं, अगर लोगों के साथ बैठा करें तो आप उन से उल्फ़त हासिल करें, आप जवाब में फ़रमाते कि तवील तन्हाई दाइमी गौरो फ़िक्र अता करती है और तवील तफ़क्कुर जन्नत का रास्ता है।

हज़रते वहब बिन मुनब्बेह रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि जिस शख्स का गौरो फ़िक्र बढ़ जाता है उसे इल्म अता होता है और जिसे इल्म अता होता है वो अमल करता है।

हज़रते उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि अल्लाह तआला की ने’मतों में गौरो फ़िक्र करना सब से अफ़ज़ल इबादत है।

हज़रते अब्दुल्लाह बिन मुबारक रज़ीअल्लाहो अन्हो ने एक दिन सहल बिन अली रज़ीअल्लाहो अन्हो को खामोश और मुतफक्किर देख कर पूछा : कहां तक पहुंचे हो ? वो बोले कि पुल सिरात के मुतअल्लिक गौरो फ़िक्र कर रहा हूं।

हज़रते बिश्र रहमतुल्लाह अलैह का क़ौल है कि अगर लोग अल्लाह तआला की अज़मत में गौरो फ़िक करें तो कभी भी अल्लाह तआला की ना फ़रमानी न करें।

हज़रते इब्ने अब्बास रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि ऐसी दो रक्अतें जो हुजूरे कल्ब और इन्तिहाई गौरो फ़िक्र से पढ़ी जाएं वो सारी रात की बे हुजूरे कल्ब इबादत से अफ़ज़ल हैं।।

हज़रते अबू शुरैह रहमतुल्लाह अलैह चले जा रहे थे कि अचानक चादर लपेट कर बैठ गए और रोना शुरू कर दिया, रोने का सबब दरयाफ़्त किया गया तो इन्हों ने कहा : मैं अपनी गुज़श्ता उम्र, कलील नेकियों और मौत के जल्द आने पर गौर कर के रो रहा हूं।

अबू सुलैमान रहमतुल्लाह अलैह का कौल है : आंखों को रोने का और दिलों को गौरो फ़िक्र करने का आदी बनाओ, मजीद फ़रमाया : दुनिया के बारे में गौरो फ़िक्र आखिरत के लिये एक पर्दा है और नेकों के लिये अज़ाब है लेकिन आख़िरत के मुतअल्लिक़ गौरो फ़िक्र इल्म का वारिस बनाता है और दिलों को ज़िन्दा करता है।

हज़रते हातिम रहमतुल्लाह अलैह का कौल है कि इब्रत हासिल करने से इल्म बढ़ता है, ज़िक्र से महब्बत बढ़ती है और गौरो फ़िक्र से खौफे खुदा बढ़ता है।

हज़रते इब्ने अब्बास रहमतुल्लाह अलैह का कौल है कि नेकियों में गौरो फ़िक्र नेकियों की तरगीब देता है और गुनाहों पर पशेमानी गुनाह छोड़ने पर आमादा करती है।

रिवायत है, अल्लाह तआला ने अपनी बा’ज़ किताबों में फ़रमाया है कि मैं हर आलिम व दानिशमन्द का, कलाम नहीं उस की निय्यत और महब्बत देखता हूं, अगर उस की निय्यत व महब्बत मेरे लिये होती है तो मैं उस की ख़ामोशी को गौरो फ़िक्र की खामोशी, उस की गुफ्तगू को हम्द करार देता हूं, अगर्चे वोह ख़ामोश बैठा हुवा हो।

हज़रते हसन रहमतुल्लाह अलैह का क़ौल है कि अक्लमन्द हमेशा ज़िक्र से फ़िक्र की जानिब और गौरो फ़िक्र से ज़िक्रे खुदा की जानिब रुजूअ होते हैं यहां तक कि उन के दिल बोलते हैं और इल्मो हिक्मत की बातें करते हैं।

इस्हाक बिन खलफ़ रहमतुल्लाह अलैह कहते हैं कि हज़रते दावूद ताई  एक चांदनी रात में छत पर बैठे अल्लाह तआला के अजाइबाते अर्को समा में गौरो फ़िक्र कर रहे थे और वो आस्मान की तरफ़ देख कर रो रहे थे यहां तक कि बे खुदी की हालत में हमसाए के घर में गिर पड़े, मकान का मालिक अपने बिस्तर से बरह्ना तल्वार ले कर झपटा, वो समझा शायद कोई चोर आ गया है लेकिन जब उस ने आप को देखा तो तल्वार मियान  में कर के पूछा : आप को किसी ने छत से धक्का दिया है ? आप ने फ़रमाया : मुझे मालूम नहीं।

हज़रते जुनैद रहमतुल्लाह अलैह का कौल है कि बेहतरीन और उम्दा मजलिस, मजलिसे गौरो फ़िक्र है जो तौहीद के मैदान में अन्जाम दी जाए और महब्बत के समन्दर से महब्बत के जाम पीना बेहतरीन शराब और मा रिफ़त की मुअत्तर हवाओं से लुत्फ़ अन्दोज़ होना सब हवाओं से बेहतर है और अल्लाह तआला से अजरे हसन की उम्मीद रखना उम्दगी में बे मिसाल है। फिर फ़रमाया : वो दिल कैसा बेहतरीन है जो इन मजालिस का शनासा है और उसे खुश खबरी हो जो महब्बत के उन लज़ीज़ तरीन जामों से काम व दह्न की तवाज़ोअ करता है।

इमामे शाफ़ेई रज़ीअल्लाहो अन्हो का कौल है कि गुफ्तगू पर खामोशी से और हुसूले इल्म के लिये गौरो फ़िकर करने से इमदाद तलब करो।

मजीद फ़रमाया : कामों के बारे में अच्छी तरह सोच समझ लेना धोके से बचाता है और उम्दा राए शर्मिन्दगी और हद से ज़ियादा बढ़ जाने से बचा लेती है, कामों में तफ़क्कुर और गौरो खौज़ होशयारी पैदा करता है, दानाओं के मश्वरे और ज़हानते नफ़्स की पाएदारी और बसीरत की कुव्वत हैं लिहाज़ा इरादा करने से पहले सोच, काम करने से पहले गौरो फ़िकर कर और क़ब्ल अज़ वक्त मश्वरा हासिल कर।

मजीद फ़रमाया कि फ़ज़ाइल चार हैं :

“हिक्मत”……………जिस का दारो मदार गौरो फ़िक्र पर हो,

“पाकबाज़ी”…………जिस का दारो मदार शहवत से इजतिनाब है,

“कुव्वत”…………..जिस का दारो मदार गुस्से पर है, “अद्ल”……………..जिस का दारो मदार कवाए नफ्सानी के ए’तिदाल पर है

 

-इमाम मोहम्मद गज़ाली र.अ., किताब मुकाशफतुल क़ुलूब

 

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